बुधवार, 14 नवंबर 2012

ग्यारहवाँ पन्ना



किशोर की डायरी /सुधा भार्गव 




पापा एक हफ्ते के बाद सिंगापुर  से आये हैं ।उनका हवाई जहाज  देर से आया ।माँ आपको डिनर  पार्टी में जाना था उनका इन्तजार नहीं कर सकीं ।
मैं ड्राइंग रूम में बैठकर घड़ी देखने लगा ----प्यारे पापा----- आते होंगे ---बस आते ही होंगे ।
पापा आ गए ।बड़े थके -थके लग रहे थे ।घर में घुसते ही उनकी निगाहें आपको ढूँढ़ रही थीं ।

माँ ,आपके बिना वे अकेले हैं ।मैं अकेलेपन का दर्द जानता हूँ ।वह तो अच्छा है कि मैं यहाँ हूँ  ।मैं ही उनका साथ दे दूँगा । 
पापा नहा -धोकर कुर्सी पर बैठने ही वाले थे कि  मैं चिल्लाया --पापा मेरे पास बैठो ।वे चेहरे पर एक जबरदस्ती मुस्कान लाये और मेरी पास वाली कुर्सी पर बैठ गए ।इससे  मुझे बड़ा  सुख मिला  ।

मुझे बहुत भूख लग रही थी ।सोचा  पापा को भी लग रही होगी ,सो मैंने पूछा -खाना लाऊँ !
-तुमने खा लिया बेटे ?
-नहीं पापा ।मेरी आँख का एक कोना गीला हो गया ।

-चलो दोनों मिलकर खाते हैं ।
हम मेज -कुर्सी पर पास -पास बैठ गए ।पापा ने पहले मेरी प्लेट लगाई फिर अपनी ।मैं खुश होकर खाने लगा मालूम है क्यों ?बहुत दिनों के बाद ऐसा मौक़ा आया  कि  पापा मेरे  साथ थे ।लेकिन पापा बना हिलेडुले बैठे ही रहे ।मैंने झुककर उनकी आँखों में झांका |पापा की आँखें गीली थीं ।अचानक  एक बूँद टप से उनके हाथ पर  चूँ पड़ी ।  मैं सिसक पड़ा --   नहीं पापा जी !मैंने लपककर उस बूंद को मिटा दिया ।

पापा ने मुझे अपने सीने से चिपका कर भींच लिया ।आज मुझे मालूम हुआ मेरी ही नहीं मेरे पापा की आँखें भी गीली रहती हैं मगर क्यों --समझ नहीं पा रहा हूँ  ।



शनिवार, 10 नवंबर 2012

दसवाँ पन्ना




किशोर डायरी /सुधा भार्गव  












इस बार लक्ष्य छुट्टियों में नही आ  रहा है ।चाचा जी अस्वस्थ हैं ।चाची उनको  अकेला छोड़ नहीं सकतीं और लक्ष्य बिना चाची के कहीं  रह नहीं   सकता ।



आपको जब यह मालूम हुआ तो खुशी -खुशी मुझे चाचाजी के पास भेजने का इरादा बना लिया वह भी एक माह को ।बिना मुझसे पूछे  मेरे बार में निर्णय ले लिया ।एक बार तो मुझसे पूछ लिया  होता ---।जानता  हूँ --बहुत अच्छी तरह से जानता हूँ --मेरे रहने से आपकी आजादी में खलल पड़ता है ।अब कुछ दिनों को तो बंधन मुक्त हो गईं ।मुझे भी आपकी याद नहीं सतायेगी ---आदत जो पड़  गई है बिना आपके रहने की ।

एक बात नहीं समझ सका ।जब कोई माँ अपने बच्चे की अंगुली पकडे सड़क पर जाती है या उसे दुलारती है ,जब  खूँटे से बंधी गाय अपने बच्चे को चूमती -चाटती है तो मेरे सीने में बेचैनी होने लगती है ।दोनों हथेलियों से मुंह ढाप कर जोर- जोर से रोने को मन करता है ।ऐसा मेरे साथ क्यों होता है---- ?

कोई  भूख लगने पर रोता है कोई माँ के न होने पर रोता है ,कोई मनपसंद खिलौना न मिलने पर आँसू  गिराता है ।मेरे पास तो यह सब कुछ है  फिर भी आँखें बार -बार गीली हो जाती हैं ।इसकी भाषा कोई नहीं जानता !


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शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

नौवाँ पन्ना


किशोर डायरी /सुधा भार्गव   






मेरा चचेरा भाई कक्षा 5 में पढता  है । उसका नाम लक्ष्य है ।ज्यादातर कक्षा में पहले या दूसरे नंबर  आता है ।गरमी की छुट्टियों में चाची हमेशा उसके साथ आती हैं ।चाची घर पर ही रहती हैं ।पेंटिंग का उन्हें बड़ा शौक है ।इतने सुन्दर रंग  लगाती हैं कि देखने वाला उसे खरीद ही ले ।चाचाजी काम के चक्कर में देश -विदेश जाते  रहते हैं ।उनके हिस्से का प्यार भी वे उस पर  उड़ेल देती हैं ।

वह बड़ा भाग्यवान है जो उसे चाची जैसी माँ मिली हैं ।स्कूल से आकर एक -एक बात उन्हें बताता है ।चाची धैर्य से सुनकर अपनी राय  देती हैं ।एक  अच्छे दोस्त की तरह हमेशा उसकी जरूरत पर उसके साथ खड़ी  रहती हैं ।उसको कोई  मास्टर पढ़ाने  नहीं आता ।चाची ही उसकी गुरू हैं ।

माँ ,आप हमेशा उससे बराबरी करती रहती हो ---देख तो कितने अच्छे नंबरों से पास हुआ है ।कुछ तो सीख उससे ।ऐसा कहकर आप हमेशा मुझे नीचा दिखाती हो ।मेरी आँखें आंसुओं से भर जाती हैं ।उन्हें टपकने से जबरदस्ती रोकता हूँ पर मन करता है दहाड़ मारकर रो पडूँ --शायद कोई मेरे अन्दर का दर्द समझ सके ।

हाँ ---हाँ मुझमे और लक्ष्य में अन्तर है -----ठीक उसी तरह --जैसे उसकी माँ और मेरी माँ में है ।अभी मुझमें इतना कहने का साहस नहीं है पर एक दिन साहस आ ही जाएगा और यह सच अवश्य कहूँगा  ।

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आठवाँ पन्ना



 किशोर डायरी /
सुधा भार्गव 


नौकरानी को सुबह आने में देर हो गई | घर में दूध - ब्रेड चाहिये थी ।पापा जैसे ही बाजार जाने को तैयार हुए ,मैंने कहा --मैं दूध ब्रेड लेकर आता हूँ ।
-तुम कहाँ जाओगे ।तुम्हारे हाथ से चोर -उचक्का रुपया छीन कर ले जा सकता  है ।

पापा आपने  मुझे एक पल में ही बता दिया कि  मैं किसी काम का नहीं ।माँ से थोड़ी उम्मीद थी   --पूछा 
--माँ ब्रेड ले आऊँ ।
-नहीं --नहीं,बासी ब्रेड ले आओगे ।सड़क भी ऊबड़ खाबड़ है --गिर पड़ोगे ।घर में ही बैठो ।
मन में उथल पुथल होने लगी --क्या मैं इतना बेबकूफ हूँ ।

थोड़ी देर में रसोई में पानी लेने पहुंचा ।पीछे -पीछे माँ ,आप जा पहुंची--
-क्या करना है ?
--फ्रिज से पानी लूंगा ।
--मैं देती हूँ ,तू  इसे खुला छोड़ देगा ।

छूट्टी  के दिन बस यही नाटक होता है ।जब आप आठ -आठ -घंटे घर से गायब रहती हैं तब भी तो नौकरानी गड़बड़ करती रहती है ।उससे कुछ नहीं कहतीं ।कहें भी कैसे ---ज़रा चूँ चपड़  की तो घर का काम छोड़कर चली जायेगी ।मैं तो घर छोड़कर जा भी नहीं सकता |आप दोनों मेरी मजबूरी का फायदा उठाते हैं ।

मुझे  आप कोई काम नहीं सिखाएंगी----बस डराती रहेंगी या डरती  रहेंगी । माँ--- इतना न डराओ वरना  मुझे कोई  काम ही नहीं आयेगा ।ऐसी जिन्दगी से मैं तंग आ चुका हूँ ।मुझे कायर बना कर रख देंगी ।शुरू में सबसे गलती होती है ।गलती नहीं करूंगा तो सीखूँगा कैसे ?अपने पर भरोसा कैसे होगा ।

क्या आप चाहती हैं --बात -बात पर आपका मुंह ताकता रहूं ,अपने पैरों पर न खड़ा होऊं ।

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गुरुवार, 8 नवंबर 2012

सातवाँ पन्ना


किशोर  डायरी /सुधा भार्गव  






आज मुझे रिपोर्ट कार्ड मिला ।मेरे दोस्तों के साथ उनकी माँ या बाप थे ।कोई आफिस से छुट्टी लेकर आया था ,कोई घर का काम छोड़कर अपने बच्चे की मैडम से मिलने आया था ।सब उनकी कमियाँ या खूबियाँ जानना चाहते थे ।

आप कैसे आतीं ! आफिस में कुछ ख़ास लोग आने वाले थे ।मेरी परवाह भी कहाँ है आपको ।पापा का तो मेरे लिए होना या न होना बराबर है ।उन्हें तो यह भी नहीं मालूम होगा  कि  मैं कौन सी कक्षा में पढ़ता  हूँ !
स्कूल जाने के लिए मैं सुबह जल्दी उठता हूँ ।उस समय वे सोते रहते हैं ।जब वे रात को फैक्टरी से लौटते हैं तो मैं सो जाता हूँ । 

बड़ा ताज्जुब है ---उन्हें अपने बॉस के लिए ,दोस्तों  के लिए ,आपके लिए समय है बस मेरे लिए-- नहीं ।
मैं रात में सो जाता हूँ तो क्या हुआ !कमरा तो खुला रहता है ।अकेले कमरे में परेशान हो जाता हूँ ।दिल से चाहता हूँ कोई आये ,मुझसे दोस्ती करे ।पापा आकर मेरे गाल की चुम्बी तो ले सकते हैं ।मैं तो सोते -सोते भी  उनको पहचान सकता हूँ ।

आप लोगों के होते हुए भी मैं अनाथों की तरह रिपोर्ट कार्ड लेने गया ।मेरा लटका मुंह देखकर मैडम बड़े अपनेपन से बोलीं --परेश मेहनत करो ,तुम अच्छे बच्चे हो ।अपनी मम्मी से कहना -फ़ोन पर बात कर लें ।मन में हंसा --मेरे लिए फुरसत हो तब ना ।

शाम को रिपोर्ट कार्ड आपकी हथेली पर रखा  ।उसे देखते ही  उसे इतनी जोर से जमीन पर पटका मानो बिच्छू ने डंक मार दिया हो ।हर विषय में मुझे बी ग्रेड मिला था ।आपने दो -तीन चांटे मेरे गाल पर जड़ दिए ।बिना रोये मैं चुप खड़ा रहा ।असल में अब मुझे मार खाने ,डांट  खाने की आदत सी हो गई है ।खाने -पीने -सोने के साथ यह भी मेरे लिए जरूरी हो गया है ।

मेरी चुप्पी से आपका पारा गर्म हो गया --
--बेशर्म की तरह खड़ा है ।न जाने दिमाग में क्या भरा है ।तीन -तीन मास्टर पढ़ने आते हैं ,तब भी बी --बी मिलता है ।कितना पैसा खर्च करवाएगा !

मैं आपको कैसे समझाऊँ -पैसे से आप मेरे लिए बुद्धि नहीं खरीद सकतीं ।मेरा दिमाग उड़ा  सा रहता है ।पढने 
की इच्छा ही नहीं होती ।पढता भी हूँ  तो दिमाग को ज्यादा देर काबू  में नहीं रख पाता ।गुस्से से तमतमाता आपका चेहरा मेरी आँखों के आगे आ जाता है ।मेरा शरीर कांपने लगता है ,आपकी डांट  मेरे लिए जहर है ।कडवे बोल शरीर में तीर की तरह चुभते रहते हैं ।मुझे सब फीका -फीका लगता है ।मेरे में न पढ़ने का उत्साह है न आगे बढ़ने की लगन

यह उत्साह मास्टरजी नहीं दे सकते ।मेरी तारीफ में यदि आप दो शब्द भी बोल  दोगी तो मुझे बड़ी ठंडक पहुंचेगी ।मुझसे कहो तो --बेटा आगे बढ़ो --ऐसा करोगे तो जरूर अच्छे नंबर लाओगे ।मुझे एक बार प्यार से रास्ता तो दिखाओ --फिर देखना मेरा उत्साह !अपने साथियों को  पढ़ाई में ही नहीं खेल में भी पछाड़ दूँगा ।  मेरी ओर  ममता का हाथ तो बढ़ाओ ---।
लेकिन नहीं ------आप नहीं समझोगी ।मेरे साथ उठने -बैठने से आपका कीमती समय नष्ट होता है ।कई बार सुन चुका हूँ --पढ़ूँगा तो यह होगा --नहीं पढ़ूँगा तो यह होगा ।मैं इस चक्र को नहीं समझता ।मैं तो वही कर पात़ा हूँ जो मेरा दिमाग कहता है ।दिमाग क्या कहता है वह भी आप पर निर्भर करता है ।आप अपने व्यवहार से जैसा सिखाओगी ,उसकी छाप हमेशा के लिए मेरे दिमाग पर पड़ जायेगी ।अब ये आदतें अच्छी होंगी  या बुरी ,यह मैं नहीं जानता ।यह भी आप या आपकी दुनिया निश्चित करेगी ।मैं तो इस समय दूसरों के हाथों की कठपुतली हूँ ।



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छटा पन्ना



किशोर डायरी 

दादी माँ बताती हैं --

आप रोज मंदिर जाती थीं ।भगवान् से कहती थीं --मुझे एक  गुड्डा चाहिए ।

उसने गुड्डे के रूप में मुझे भेज  दिया ।उस समय मेरे दांत नहीं थे ,चल फिर भी नहीं सकता था ।आपने मुझे दूध पीना सिखाया ।रगड़ -रगड़ कर नहलातीं,गोदी में लिए घूमतीं ।
धीरे -धीरे दांत निकल आये ,चलने फिरने लगा ,पहले -पहले दाल चावल सटक जाता था ,अब खूब चबा -चबा कर खाता हूँ ।

लेकिन  माँ यह सब एक दिन में नहीं हुआ ,धीरे -धीरे हुआ ।अभी तो मुझे बहत  कुछ सीखना है ।आपको धैर्य तो रखना ही पडेगा ।क्यों जल्दी -जल्दी में अपनी आवाज भी कड़वी  कर लेती हो ।लगता है मुझसे तंग आ गई  हो ।पर मेरा क्या कसूर !
मैं खुद आपके पास चलकर नहीं आया बल्कि बुलाया गया ।मैं तो भगवान् का दिया उपहार हूँ ।इसकी देखभाल तो करनी ही पड़ेगी --चाहे खुश होकर करो या  दुखी होकर ।दुखी होकर करोगी तो मैं मुरझा जाऊँगा ।



प्यार भरी छुअन ,प्यार भरी निगाहें तो मैं पैदा होते ही पह्चानता  हूँ ।

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पाँचवाँ पन्ना



किशोर डायरी/सुधा भार्गव 

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 आज रात मौसी -मौसा जी मिलने आये थे ।मैं चुपचाप बैठा उनकी बातें सुन रहा था ।मैंने सोचा -मुझे भी कुछ कहना चाहिए वर्ना मौसी समझेंगी मैं गूंगा हूँ ।


मैंने डरते -डरते कहा ----
-मौसी आप एक  बात बतायेंगी ---हवाईजहाज, जमीन पर दौड़ता है ,हवा में भी उड़ता है ।चिड़िया --धरती पर फुदकती है ,आकाश में उडती है ।तितली --फूलों पर बैठती है  और पंख फैलाए उडान भरती है ।मैं --केवल जमीन पर चलता हूँ ,उनकी तरह उड़ क्यों नहीं सकता ?
-बेटे, तुम्हारे पंख नहीं हैं ।
--क्यों नहीं हैं ?

इसी बीच माँ तुम बड़ी बेरहमी से मेरा गला घोंटने आ गईं --
--कितनी बार कहा है बड़े जब बातें करते हैं तो बीच में नहीं बोलना चाहिए ।फालतू की बातें मत करो और जाओ अपने कमरे में ।

तुम मुझसे अधिक शक्तिशाली हो ,इसलिए मुझ कमजोर को तुम्हारे सामने घुटने टेकने पड़े ।
आंसुओं को सभांलता  वहां से उठ गया ।
मेरा भी तो मन करता है सबसे मिलने को ।सबके साथ हंसने  को व्याकुल रहता हूँ ।

अनुशासन ही सिखाना था तो  स्नेह का हाथ फेरकर भी  समझा सकती थीं ।इस तरह मेरा अपमान करने की क्या जरूरत है ।मेरी भी तो कोई इज्जत है ।छोटा हूँ तो क्या हुआ ,महसूस तो उसी तरह करता हूँ जैसे आप करती हो ।

मैं आपसे अच्छा व्यवहार करूं इसके लिए आपको भी शिष्ट होना पड़ेगा । 

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