2013
कलकत्ता की यादों के नए परिधान
सुधा भार्गव
नए साल 2013 ने जैसे ही धरती पर अपने कदम बढ़ाये मैंने अपने से वायदा किया कि यादों के शहर में जरूर जाऊँगी जहाँ जिन्दगी के सबसे अनमोल चालीस साल बिताये ।वह है कोलकता शहर जहाँ के खट्टी मीठे अनुभवों का गुच्छा सदैव अपने साथ रखती हूँ ।
14 जनवरी को वहां पहुँचते ही फ़ोन खटखटाने शुरू कर दिए ताकि ज्यादा से ज्यादा मित्रों से मिला जा सके ।इस में मेरी सहेली जयश्री दास गुप्ता ने मेरी बहुत मदद की ।कहते हैं --अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता --अगर वह नहीं होती तो मेरी यात्रा सफल न हो पाती ।मैं उसी के निवास स्थान पर रुकी थी ।
मैंने उसके साथ बिरला हाई स्कूल में 22 वर्षों तक साथ -साथ पढ़ाया ।22वर्षों में इतनी बातें नहीं हुई होंगी जितनी दो हफ्ते में हम दिल खोल बैठे ।हर पल छाया की तरह मेरे साथ रहती ।मजाल है कहीं अकेली तो चली जाऊं ।कौन कहता है रिश्ते जन्म से होते हैं ,रिश्ते तो बनाये जाते हैं जिसकी धुरी केवल निश्छल प्रेम ही होती है ।और हाँ उसने मुझे खूब सन्देश और मिष्टी दही खिलाया ।
कभी -कभी तो चिंता में पड़ जाती थी कि कहीं कमर कमरा न हो जाए पर यही सोचकर --चार दिन की चांदनी फिर अँधेरी रात --पटापट खा जाती ।यही नहीं --जिस मित्र के जाती वहां भी सन्देश खाने को मिलता ।
कितने समझदार हैं मेरे मित्र --!जानते हैं जबसे मेरा कलकत्ता छूटा ,सन्देश के नाम से ही भूखे ब्राह्मण की तरह मेरी लार टपकने लगती है।
सबसे पहले सत्यवती तिवारी जी से मैंने मिलना चाहा ।वे हिन्दी अपार्टमेंट में बिरला हाई स्कूल में मेरी सीनियर रह चुकी हैं। हम दोनों ही हिन्दी पढ़ाते थे पर मैंने अध्यापन के दौरान उनसे बहुत कुछ सीखा । मेरी साथिन श्री रासबिहारी एवेन्यू में रहती है और सत्यवती जी टालीगंज में ।उनके घर जाना हमें कठिन लगा ,हम बड़ी दुविधा में पड़े थे पर सत्यवती जी ने हमें उबार लिया ।निश्चय हुआ कि वे हमें लेने आ जायेंगी ।
वे हम दोनों को समय पर लेने आ गईं पर कार टालीगंज की तरफ न मुड़कर मिन्टोपार्क की ओर मुड़ गई और बिरला हाई स्कूल दिखाई दिया |
लगा अभी नटखट -मासूम बच्चे दौड़कर आयेंगे और चिल्ला उठेंगे --हिन्दी मिस --हिन्दी मिस ।
यह वही विद्या का मंदिर है जहाँ योग्य शिक्षक- शिक्षिकाओं के प्रयास से मेरे दोनों बेटे रवि -रजत उन्नत पथ पर अग्रसर हुए ।रजत सीनियर स्कूल में कक्षा ,6,7,8,में लगातार प्रथम पोजीशन लाया और मुझे विशेष अतिथि बनने का सुअवसर मिला ।मैंने उस वर्ष के मेधावी छात्रों को इनाम वितरित किये ।
जड़ें तो उनकी जूनियर हाई स्कूल में ही जम चुकी थीं और उन दिनों वहां की प्रिंसपल मिसेज एन . बाली थीं जो सर्वगुण संपन्न .कर्तव्यनिष्ठ व् साहसी महिला हैं |
वे दिन उमड़ घुमड़कर शीतल बूंदों की बरखा करने लगे जब हम हर क्षेत्र में कूद पड़ते थे ---चाहें वह खेल का मैदान हो
चाहें मंच हो
और चाहे साथियों के स्वागत का समय हो या उनकी विदायगी का ।
कार आगे बढ़ गई ।खरगोश से फुदकते ख्याल पीछे ही छूट गए ।दो मिनट के बाद ही गोविन्द रेस्टोरेंट के आगे कार रुक गई ।
“अरे हम यहाँ कहाँ ?मैं आश्चर्य में थी ।
‘यह सेंटर प्लेस हैं और मेरा घर एक कोने में पड़ जाता है ।यहाँ अन्य सहेलियाँ भी मिलने आ सकेंगी ।स्कूल में हमारे समय की कुछ ही शिक्षिकाएं हैं ।फ्री पीरियड होने पर वे भी यहाँ तक पहुंच सकेंगी ।फ़ोन से उन लोगों को सूचना दे दी गई है ।”सत्यवती जी बोलीं ।
मुझे उनकी बुद्धि की दाद देनी पड़ी ।मेरी खोपड़ी में यह विचार आया ही नहीं ।असल में सीनियर,सीनियर ही रहते हैं ।
गोविन्द रेस्टोरेंट पहुँचते ही सविता महरोत्रा दिखाई दीं । चहरे पर प्रशासकीय गरिमा की छाप थी ।वे अब भी स्कूल में प्रशासकीय विभाग में अति मुस्तैदी से अपना कर्तव्य पूर्ण कर रही हैं ।
कुछ ही देरी में सुमन महेश्वरी व् रीता कपूर भी स्कूल से आ गये। पहले जी भर गले मिले ।चेहरे से खुशी टपकी पड़ती थी ।दिल की धडकनें उसकी गवाह थीं ।रीता तो जल्दी चली गई क्योंकि उसे क्लास लेनी थी पर कुछ ही देर में बहुत कुछ दे गई अपना असीमित स्नेह ।
लंच करते -करते 2-3घंटे कैसे गुजर गए पता ही नहीं लगा ।सब एक दूसरे के परिवार की खुशहाली व् वृद्धि के बारे में जानने को उत्सुक थे ।पता लगा हम सबको कई उपाधियाँ मिल गई हैं ।कोई दादी माँ बन गया है तो कोई नानी माँ --कोई परदादी बनने का सपना संजो रहा है ।
विभिन्न विचार ,विभिन्न व्यक्तित्व के होते हुए भी समरसता का अभाव न था ।.
पुरानी यादों को एक नया अम्बर मिल चुका था ।सदैव जुड़े रहने के लिए ईमेलआई डी ,मोबाइल न .का आदान प्रदान हुआ ।मीठी -मीठी यादों पर समय की धूल न पड़ने का संकल्प करते हुए हम अपनी -अपनी दिशा की ओर बढ़ गए ।
सपना मुखर्जी अस्वस्थ होने के कारण मिलने न आ सकी।बाद में मैं और जयश्री उससे मिलने गए ।कोयल सी मीठी आवाज में उसने हमारा स्वागत किया ।हमें देखते ही उसके चेहरे पर हजार गुलाब खिल गए ।तबियत ठीक न होने पर भी उसने घर पर ही लंच बनाया ।आह !दही बड़े तो लाजवाब थे ।होते भी क्यों न !वे दही बड़े के अलावा और भी बहुत कुछ थे ।जबसे उससे जुदा हुई हूँ उसके स्वास्थ्य के लिए ईश्वर से दुआ करती हूँ ।
रीता खंडेलवाल से भी मिलना हुआ ।पिछले माह ही रिटायर हुई है पर वही हँसमुख गोल -गोल चेहरा ----।हँसे तो लगे चारों ओर चांदनी छिटक गई है ।हम उसके घर पहुंचे तो उसकी प्यारी सी पोती ने शर्माते हुए नमस्ते की ।उसकी हिचकिचाहट दूर करने के उद्देश्य से मैंने उसके खेल खिलौनों व् कहानी की पस्तक के बारे में बातें करनी शुरू का कर दीं ।उसने मुझे अपनी ड्राइंग भी दिखाई ।फिर तो मैं उसकी अच्छी दादी बन गई । रीता के हाथ की बनी चाट और घुघनी खाने का मन बहुत था ।स्कूल में अक्सर वह बनाकर लाती थी और हम सबको बड़े शौक से खिलाती ।समय अभाव् के कारण मेरे कहने की हिम्मत नहीं पड़ी ।
हँसी -मजाक ,सुखद -दुखद घटनाओं की बयार ऐसी चली की 3-4 घंटे फुर्र से उड़ गए ।
शाम की चाय के साथ उसने घर में ही बहुत स्वादिष्ट व्यंजन बनाए थे ।इसमें उसकी बहूरानी का भी हाथ था , इसलिए ज्यादा ही स्वाद आया ।छोटे जब बड़ों को कुछ बनाकर खिलाते है तो उसकी कुछ और ही बात होती है ।
हमने स्वाद ले-लेकर खाया और स्वत :ही प्रशंसा के बोल फूट पड़े ।भविष्य से अनजान होते हुए भी हमने - बार -बार मिलने का वायदा किया और साँसों में घुली माधुर्यता का अह्सास करते चल पड़े ।
बिरला हाई स्कूल के कुछ मित्र साल्ट लेक में बस गए थे ।सविता सेठी से न मिलने का मलाल अंत तक रहा ।कुछ दूरी थी कुछ मजबूरीथी और कुछ महानगरी की माया थी ।हाँ फ़ोन से जरूर मिलन का साज सजाते रहे ।
चित्रा भास्कर का फ़ोन आया था -मिसेज भार्गव आप कलकत्ते हैं ---।मैं आपसे जरूर मिलती पर मिल नहीं सकती ।यू. एस .ए आई हुई हूँ बेटे के पास ।मेरे लिए यही बहुत था ।भाग -दौड़ की इतनी व्यस्त जिन्दगी में उसने मुझे याद किया ।फेसबुक जिंदाबाद !उस पर तो इनसे मिलना हो ही जाता है ।
अतीत में नयेपन का खुमार इतना ज्यादा रहा कि बैंगलौर आने के बाद कई दिनों तक मेरे मानस पटल पर वह छाया रहा। मैं उसे धूमिल भी नहीं होने देना चाहती क्योंकि .......
जीवन में विविध रंग भरने के लिए दोस्तों का भी होना निहायत जरूरी है ।