गुरुवार, 8 नवंबर 2012

सातवाँ पन्ना


किशोर  डायरी /सुधा भार्गव  






आज मुझे रिपोर्ट कार्ड मिला ।मेरे दोस्तों के साथ उनकी माँ या बाप थे ।कोई आफिस से छुट्टी लेकर आया था ,कोई घर का काम छोड़कर अपने बच्चे की मैडम से मिलने आया था ।सब उनकी कमियाँ या खूबियाँ जानना चाहते थे ।

आप कैसे आतीं ! आफिस में कुछ ख़ास लोग आने वाले थे ।मेरी परवाह भी कहाँ है आपको ।पापा का तो मेरे लिए होना या न होना बराबर है ।उन्हें तो यह भी नहीं मालूम होगा  कि  मैं कौन सी कक्षा में पढ़ता  हूँ !
स्कूल जाने के लिए मैं सुबह जल्दी उठता हूँ ।उस समय वे सोते रहते हैं ।जब वे रात को फैक्टरी से लौटते हैं तो मैं सो जाता हूँ । 

बड़ा ताज्जुब है ---उन्हें अपने बॉस के लिए ,दोस्तों  के लिए ,आपके लिए समय है बस मेरे लिए-- नहीं ।
मैं रात में सो जाता हूँ तो क्या हुआ !कमरा तो खुला रहता है ।अकेले कमरे में परेशान हो जाता हूँ ।दिल से चाहता हूँ कोई आये ,मुझसे दोस्ती करे ।पापा आकर मेरे गाल की चुम्बी तो ले सकते हैं ।मैं तो सोते -सोते भी  उनको पहचान सकता हूँ ।

आप लोगों के होते हुए भी मैं अनाथों की तरह रिपोर्ट कार्ड लेने गया ।मेरा लटका मुंह देखकर मैडम बड़े अपनेपन से बोलीं --परेश मेहनत करो ,तुम अच्छे बच्चे हो ।अपनी मम्मी से कहना -फ़ोन पर बात कर लें ।मन में हंसा --मेरे लिए फुरसत हो तब ना ।

शाम को रिपोर्ट कार्ड आपकी हथेली पर रखा  ।उसे देखते ही  उसे इतनी जोर से जमीन पर पटका मानो बिच्छू ने डंक मार दिया हो ।हर विषय में मुझे बी ग्रेड मिला था ।आपने दो -तीन चांटे मेरे गाल पर जड़ दिए ।बिना रोये मैं चुप खड़ा रहा ।असल में अब मुझे मार खाने ,डांट  खाने की आदत सी हो गई है ।खाने -पीने -सोने के साथ यह भी मेरे लिए जरूरी हो गया है ।

मेरी चुप्पी से आपका पारा गर्म हो गया --
--बेशर्म की तरह खड़ा है ।न जाने दिमाग में क्या भरा है ।तीन -तीन मास्टर पढ़ने आते हैं ,तब भी बी --बी मिलता है ।कितना पैसा खर्च करवाएगा !

मैं आपको कैसे समझाऊँ -पैसे से आप मेरे लिए बुद्धि नहीं खरीद सकतीं ।मेरा दिमाग उड़ा  सा रहता है ।पढने 
की इच्छा ही नहीं होती ।पढता भी हूँ  तो दिमाग को ज्यादा देर काबू  में नहीं रख पाता ।गुस्से से तमतमाता आपका चेहरा मेरी आँखों के आगे आ जाता है ।मेरा शरीर कांपने लगता है ,आपकी डांट  मेरे लिए जहर है ।कडवे बोल शरीर में तीर की तरह चुभते रहते हैं ।मुझे सब फीका -फीका लगता है ।मेरे में न पढ़ने का उत्साह है न आगे बढ़ने की लगन

यह उत्साह मास्टरजी नहीं दे सकते ।मेरी तारीफ में यदि आप दो शब्द भी बोल  दोगी तो मुझे बड़ी ठंडक पहुंचेगी ।मुझसे कहो तो --बेटा आगे बढ़ो --ऐसा करोगे तो जरूर अच्छे नंबर लाओगे ।मुझे एक बार प्यार से रास्ता तो दिखाओ --फिर देखना मेरा उत्साह !अपने साथियों को  पढ़ाई में ही नहीं खेल में भी पछाड़ दूँगा ।  मेरी ओर  ममता का हाथ तो बढ़ाओ ---।
लेकिन नहीं ------आप नहीं समझोगी ।मेरे साथ उठने -बैठने से आपका कीमती समय नष्ट होता है ।कई बार सुन चुका हूँ --पढ़ूँगा तो यह होगा --नहीं पढ़ूँगा तो यह होगा ।मैं इस चक्र को नहीं समझता ।मैं तो वही कर पात़ा हूँ जो मेरा दिमाग कहता है ।दिमाग क्या कहता है वह भी आप पर निर्भर करता है ।आप अपने व्यवहार से जैसा सिखाओगी ,उसकी छाप हमेशा के लिए मेरे दिमाग पर पड़ जायेगी ।अब ये आदतें अच्छी होंगी  या बुरी ,यह मैं नहीं जानता ।यह भी आप या आपकी दुनिया निश्चित करेगी ।मैं तो इस समय दूसरों के हाथों की कठपुतली हूँ ।



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