गुरुवार, 8 नवंबर 2012

पाँचवाँ पन्ना



किशोर डायरी/सुधा भार्गव 

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 आज रात मौसी -मौसा जी मिलने आये थे ।मैं चुपचाप बैठा उनकी बातें सुन रहा था ।मैंने सोचा -मुझे भी कुछ कहना चाहिए वर्ना मौसी समझेंगी मैं गूंगा हूँ ।


मैंने डरते -डरते कहा ----
-मौसी आप एक  बात बतायेंगी ---हवाईजहाज, जमीन पर दौड़ता है ,हवा में भी उड़ता है ।चिड़िया --धरती पर फुदकती है ,आकाश में उडती है ।तितली --फूलों पर बैठती है  और पंख फैलाए उडान भरती है ।मैं --केवल जमीन पर चलता हूँ ,उनकी तरह उड़ क्यों नहीं सकता ?
-बेटे, तुम्हारे पंख नहीं हैं ।
--क्यों नहीं हैं ?

इसी बीच माँ तुम बड़ी बेरहमी से मेरा गला घोंटने आ गईं --
--कितनी बार कहा है बड़े जब बातें करते हैं तो बीच में नहीं बोलना चाहिए ।फालतू की बातें मत करो और जाओ अपने कमरे में ।

तुम मुझसे अधिक शक्तिशाली हो ,इसलिए मुझ कमजोर को तुम्हारे सामने घुटने टेकने पड़े ।
आंसुओं को सभांलता  वहां से उठ गया ।
मेरा भी तो मन करता है सबसे मिलने को ।सबके साथ हंसने  को व्याकुल रहता हूँ ।

अनुशासन ही सिखाना था तो  स्नेह का हाथ फेरकर भी  समझा सकती थीं ।इस तरह मेरा अपमान करने की क्या जरूरत है ।मेरी भी तो कोई इज्जत है ।छोटा हूँ तो क्या हुआ ,महसूस तो उसी तरह करता हूँ जैसे आप करती हो ।

मैं आपसे अच्छा व्यवहार करूं इसके लिए आपको भी शिष्ट होना पड़ेगा । 

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