सोमवार, 4 जनवरी 2016

कड़ी 5- बेबी शावर डे


प्रकाशित-साहित्य कुंज अंतर्जाल मासिक पत्रिका जनवरी प्रथम अंक 2016 में लिंक http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/S/SudhaBhargava/05_Baby_Shower_Day.htm 

डायरी के पन्ने 

कनाडा सफर के अजब अनूठे रंग
सुधा भार्गव 

12/4/2003

बेबी शॉवर डे

कनाडा पहुँचने के दो दिन पहले बर्फीला तूफान आ चुका था। 10अप्रैल तक सड़क के दोनों ओर बर्फ ही बर्फ  जमी थी।अब यह पिघल गई है। खिड़की से झाँककर इस अनूठे प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद उठा रही हूँ । आमने खड़ा चिनार का वृक्ष (maple tree) पल्लवविहीन होते हुए भी सूर्य की आभा से जीवन पा रहा है। उसके नीचे बिछी बर्फ की शुभ्रता युद्ध के मँडराते बादलों के मध्य शांति का संदेश देती प्रतीत होती है । अमेरिका –ईराक के युद्ध के समाचार सुनते –पढ़ते कान पक चुके हैं । टी.वी. में देखे हुए रोंगटे खड़े करने वाले दृश्यों से राहत पाने के लिए प्रकृति में खो जाना चाहती हूँ।
आज दोपहर लंच के लिए बहू शीतल की सहेली नमिता के घर जाना है। यहाँ  भारत से आए माँ –बाप को विशेष अनुग्रह द्वारा निमंत्रित किया जाता है । जहां से निमंत्रण मिलता है वहाँ मित्र एक –एक सब्जी , पूरियाँ या मिठाई बना कर ले जाते हैं। इस सहयोग से 30 जनों के खाने का प्रबंध सरलता से हो जाता है । यहाँ यह जरूरी भी है क्योंकि नौकर शाही प्रथा के अभाव में खुद ही मालिक हैं और खुद ही नौकर । शीतल ने भी ले जाने के लिए केक बना ली है वह भी बिना अंडे के । नमिता की माँ अंडा नहीं खाती हैं।
हमने जैसे ही नमिता के घर में प्रवेश किया फोटोग्राफी होने लगी । सबकी नजरे  शीतल पर टिकी थीं । मैं हैरान –यह सब क्या हो रहा है!
बाद में पता लगा कि  मेरे बहू का ही बेबी शावर डे (baby shower day)मनाने का आयोजन है । इस अवसर की सफलता के लिए चुपके –चुपके तैयारियां करके भावी माँ का अभिनंदन तालियों की गड़गड़ाहट व आश्चर्य मिश्रित भाव-भंगिमाओं के साथ किया जाता है । मित्र और रिश्तेदार नवशिशु की कुशलता व उसके आगमन की कामना करते हैं। इससे  वात्सल्य तरंगे झनझना उठती हैं।  जो इस कार्यक्रम के प्रबंधकर्ता होते हैं उनको ही इस उत्सव की जानकारी होती है बाकी सब अनभिज्ञ । इसीकरण मुझे व शीतल को इसके बारे में कुछ पता न था ।
शीतल किसी की मीठी धुन में समा गई। आने वाले बच्चे की सुखद कल्पना से उसके चेहरे पर ताजी गुलाब खिल गए । उसे कुर्सी पर बैठा दिया गया है ताकि थकान उसके लावण्य को कम न कर दे । बारी –बारी से मित्रों ने उपहार देकर अपने  स्नेह धागे से उसे बांध दिया। सारे पैकिट खोलकर वह  सबको दिखा रही है और बेटा पास में बैठा देने वालों की प्रशंसा कर रहा है । शौक व अरमानों से अगर कोई वस्तु भेंट में दे तो उस ही के सामने उसकी तारीफ में दो बोल बहुत जरूरी है –यह मैंने अभी महसूस किया ।
बहुत कुछ तो दिया है दोस्तों ने –मॉनिटर ,डायपर्स ,कॉट,कारसीट आदि –आदि । कोई बेकार का समान नहीं ,यह देखकर मुझे बहुत अच्छा लगा । इससे नवशिशु के आने के बाद आर्थिक बोझ उठाने में भी सहायता मिलती है। उपहार देने से पहले पूछ लिया जाता है कि क्या चाहिए ?कुछ लोग शिशु पालन से संबन्धित वस्तुओं की सूची बनाकर दुकानदार को भेज देते हैं और बंधुगण अपने पसंद की वस्तु का चुनाव  कर दुकान से खरीद लेते हैं । यदि  भावी माँ –बाप के पास एक ही तरह की वस्तु दो हो जाएँ तो दुकान से उसे बदला भी जा सकता है । बिल होने पर दाम लौटा दिए जाते हैं। वस्तु लौटाने की अवधि 3-4 माह होती है । यह नियम बड़ा ही भला लगा ।न ही अनावश्यक वस्तु का जमाव हो न  पैसा नष्ट हो।
लंच के बाद आत्मीयता से एक दूसरे से  परिचय कराया गया। कनेडियन्,इटेलियन,मराठी,पंजाबी,मद्रासी बंगाली सभी तों हैं। विभिन्न क्यारियों के फूल एक ही क्यारी में नजर आ रहे हैं।
-अब कुछ खेल खेले जाएंगे जिनका संबंध गर्भवती माँ से है। शीतल की दोस्त ने ऐलान किया और मुझसे कहा – आंटी एक बात पूछूं?शैतानी उसकी आँखों से टपक रही थी ।
-हाँ !हाँ पूछो । मैं भी बहुत उत्साहित थी ।
-अच्छा बताइये !शीतल के पेट का घेरा कितना बड़ा होगा ?
मैं तो सकपका गई । जबाब देते न बना। खिसियाई बिल्ली बन मुंह छिपाने लगी । विनोदी लहजे में वह कहने लगी –आंटी आप तो सबसे ज्यादा शिल्पी के पास रहती हैं ,आपको इतना भी नहीं मालूम ! एक क्षण तो मुझे लगा ,वाकई में बड़ी भारी गलती ही गई । मुझे सोच में डूबा देख दूसरी बोली –यह सब हंसी मजाक है ताकि होने वाली माँ को अधिक से अधिक खुश रखा जा सके।
उपयुक्त उत्तर की आशा में उसने प्रश्न दूसरों की तरफ उछाल दिया । कोई संतोषजनक उत्तर नहीं  आने पर  दूसरा प्रश्न पूछा  गया-
-अब यह बताया जाए कि बालक किस तिथि को जन्म लेगा ?सबने अपने अंदाज भरे तीर चलाए । डॉक्टर ने शिशु जन्म की तारीख 8मई बताई थी। मगर यह किसी को मालूम न थी।जिसने 8तारीख के सबसे पास वाली तारीख बताई उसे इनाम दिया गया। तालियों की गड़गड़ाहट ओसकी बूंद बन माथों पर झलक पड़ी।
मेरी  नजरों के सामने 2-3गर्भवती महिलाएँ बैठी है जिन्हें अपने बेबी शावर का बेसब्री से इंतजार है पर विचित्र बात है ऐसी महिला न  उसका प्रबंध कर सकती है और न उसे आखिरी समय तक अपने ही बेबी शावर का पता लग पाता है । हाँ उसका पति अवश्य दूसरों से गुप्त रूप से मिला होता है। शुभ कामनाओं की बौछार करने की बड़ी रोमांचक व अनूठी प्रथा है । इस उत्सव की विनोदप्रियता व चुहुलबाजी मुझे अब भी  रहरहकर गुदगुदा देती है।

क्रमश: 

कड़ी 4 -कनाडा एयरपोर्ट


साहित्य कुंज अंतर्जाल मासिक पत्रिका ,जनवरी प्रथम अंक 2016 में प्रकाशित,

लिंक-http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/S/SudhaBhargava/04_Canad_airport.htm

कनाडा डायरी 

04 कनाडा एयरपोर्ट

कनाडा एयरपोर्ट पर बहू-बेटे दोनों ही लेने आए थे। दिल से तो मैं यही चाहती थी कि बहू शीतल एयरपोर्ट पर न आए क्योंकि उसका प्रसवकाल निकट था। उसे फुर्ती से अपनी ओर आते देखा ,लगा तो बहुत अच्छा। गृहस्थी की गाड़ी को खींचने वाले दोनों पहिये समान रूप से सक्रिय नजर आए। उन्होंने  हमारे चरण स्पर्श किए और और सीने से लग गए।तीन वर्ष का वियोग क्षण भर में मिट गया।
सफर की सारी थकान हम अपनी मंजिल पर पहुँचते ही भूल गए। कार में एक दूसरे से नजर टकराते ही आँखों में चमक आ जाती।मूक होकर भी हजार बात कह देते। कार रॉकेट बनी हवा को चीरती चिकनी सड़कों पर सरपट दौड़ रही थी। मेरी समझ में नहीं आया –ठंडे सुहावने मौसम में भी बेटे ने कार के शीशे चढ़ा रखे हैं  और एयर कंडीशन चल रहा है।
-यहाँ तो प्रदूषण भी नहीं है । ताजी हवा के झोंके आने के लिए खिड़कियों के शीशे नीचे कर दो। मैंने सलाह दी।
उसने हमारी तरफ का शीशा थोड़ा सा हटा दिया। यह क्या !हवा के तीव्र झोंकों से हम आतंकित हो उठे। दूसरे कार की स्पीड भी बहुत तेज थी। साँय-साँय की आवाज ऐसी कर्णभेदी हो गई मानो जंगल में हलचल मच गई हो।
-अरे बंद कर शीशा । मैं चिल्ला उठी।
-बंद कर दूँ ---। आपजान कर बेटा ज़ोर से बोला और हंसने लगा। अब आया समझ में राज शीशे बंद रखने का।
रोज़लोन कोर्ट में घुसते ही उसके बंगले के सामने खड़े हो गए । सीट पर बैठे ही रिमोट कंट्रोल का बटन दबाने से खुल जा समसम की तरह गैराज का शटर ऊपर जाने लगा। लौंडरी रूम,रसोईघर ड्राइंगरूम पार करते हुए ऊपर जाने लगे। बेटा बहुत विनोदी स्वभाव का है सो सीढ़ियाँ चढ़ते-चढ़ते उसका टेप रिकॉर्डर चालू हो गया। 
-माँ, सुबह-सुबह ताजी हवा खाने के चक्कर में नीचे का दरवाजा न खोल देना। अलार्म बज उठा तो पुलिस आन धमकेगी और पकड़कर ले जाएगी।
-हम क्या चोर है!
-चोर तो नहीं पर खतरे की घंटी तो बज जाएगी। सुबह उठकर एलार्म का गलेटुआ घोंटना पड़ता है।
-यहाँ भी चोरी होती है क्या।?धनी राष्ट्रों में हमारे देश की तरह गरीबी कहाँ!भार्गव जी बोले।  
-चोरी गरीब ही नहीं करता । आदत पड़ने पर अमीर भी चोरी कर सकता है। चोरी भी तो चौसठ कलाओं में से एक है।  
-अरे वाह !पहले से क्यों नहीं बताया माँ। मैंने बेकार आई.आई.टी. में चार साल गँवाए, यही कला सीखता।
-ओह ,तू तो बहुत खिजाता है। बस मेरी बात पकड़ ली।
शीतल हमारी बातों का आनंद उठा रही थी। व्यवस्थित मास्टर बेडरूम ,बेबी रूम,से होते हुए हम अपने शयनागार में पहुंचे । स्वच्छ चादर व फूलदार लिहाफ हमारा इंतजार कर रहे थे। शीतल के हाथ का खाना खाकर कुछ ही देर में हम शुभ रात्रि कहते हुए उसमें दुबक गए।
दिल्ली में तो मन में उथल पुथल मची ही रहती थी कि बच्चे पराई संस्कृति में रह रहे हैं, कहीं बदल न जाएँ। न जाने किस विचारधारा से टकरा कर सुविधा के जाल में फंस जाएँ पर संस्कारों की जड़ें इतनी मजबूत लगीं कि भटकन की कोई गुंजाइश नहीं दिखाई दी।  
विचारों की घाटियों से गुजरते 2बज गए। दिमाग ने कहा –सोने की कोशिश तो करनी ही पड़ेगी,कल से नए वातावरण से समझौता करने और उसे समझने का श्री गणेश हो जाएगा। कुछ भी हो हम 8 अप्रैल के चले 10 की रात कनाडा अपने घर तो पहुँच ही गए थे सो चिंतारहित चादर तान सो गए ।

क्रमश:     

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2015

कनाडा डायरी के पन्ने,कड़ियाँ 1,2,3



मित्रों
 एक अरसा हो गया कनाडा गए। मगर कनाडा  में बिताए मीठे -कड़वे अनुभवों को डायरी में कैद करती  चली गई थी।  आज जब भी उसको पढ़ती हूँ तो रोमांचित हो उठती हूँ --और लगता है कल ही  तो  कनाडा से अपने वतन लौटी हूँ। मेरी  डायरी के पन्ने सुमन कुमार घई जी को  पसंद आए और उन्होंने इसको साहित्य कुंज में क्रमश; प्रकाशित करने का निश्चय किया । इससे मुझे अपनी डायरी के पन्नों को उलटने पलटने का मौका मिला। मैं इसके लिए  उनकी बहुत शुक्रगुजार हूँ।व्यस्त ज़िंदगी से कुछ  अनमोल पल निकाल कर आप भी  इसे अवश्य पढ़ने का  प्रयत्न कीजिएगा और बताइएगा आपने कैसा महसूस किया।
इसे आप साहित्य कुंज में भी पढ़ सकते हैं।
लिंक है -
http://sahityakunj.net/
Sahitya Kunj Aapkee Sahitiyak Patrika -साहित्य कुंज आपकी साहित्यिक पत्रिका






कनाडा के अजब अनूठे रंग                   

8 अप्रैल 2003 
(1) स्वदेश से विदा

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उसके साथ बिताए पलों को मैने मुट्ठी में कसकर बंद कर रखा था । केवल सोते समय मुट्ठियाँ खुलती थीं। परन्तु वे सुनहरे पल धीरे-धीरे मेरी उँगलियों के बीच से इस प्रकार सरकने लगे जैसे बालू। फोन पर बातें करते-करते आवाज भर्रा उठती और एक व्यापक मौन मुझसे ही टकराकर पूरे जिस्म में फैल जाता। चाँद बेटा मेरी  हलचल को मीलों दूर कनाडा में बैठे भाँप गया। मेरी मनोस्थिति तो पतिदेव (भार्गव जी) भी ताड़ गए थे। इसीलिए शीघ्र ही कनाडा की राजधानी ओटवा जाने का कार्यक्रम बन गया।
8अप्रैल,2003 को सुबह 8:45 पर हमने अपने देश से विदा ली।एयर इंडिया विमान से लंदन हिथ्रो एयरपोर्ट बड़े आराम से पहुँच गए। लंदन घड़ी 9 की सुबह 11:30 बजा रही थी। वहाँ से 12:55 पर कनाडा उड़ान पकडनी थी। दोनों उड़ानों के बीच का समय बहुत कम था। अत : औपचारिकता पूरी कर भी न पाए थे कि विदेशी भूमि पर एयर कनाडा उड़ान हम जैसे बहुत से लोगों को असहाय छोडकर उड़ गई।
उन दिनों अमेरिका-ईराक जंग ज़ोरों पर थी । दूसरे टोरंटो में सार्स बीमारी के भयानक रूप से पैर जम गए थे। पूछताछ करने पर पता लगा-कोई उड़ान रद्द हो रही है तो किसी का मार्ग बदला जा रहा है परंतु टोरेंटों की उड़ानें ज़्यादातर खाली हैं। वहाँ से कनाडा जल्दी पहुंचना मुश्किल नहीं है। हम टोरेंटों का टिकट खरीदने वाले ही थे कि जयपुरवासी डॉक्टर राणा से टकरा गए। बड़ी आत्मीयता से बोले –आप भूलकर भी टोरेंटों नहीं जाइएगा।  सार्स तो बड़ा खतरनाक रहस्यमय निमोनिया है। लक्षण हैं-सिरदर्द खांसी,सांस लेने में कष्ट --। उनकी पूरी बात सुने बिना ही भागे हम। सिरदर्द तो उड़ान छूटने के बाद ही शुरू हो गया था। एक दो मिनट और उनकी बात सुनते तो दम जरूर घुट जाता। दिमाग की हांडी में खौफ की खिचड़ी पकने लगी। टोरेंटों की उड़ान का हमने इरादा छोड़ दिया।
एयरपोर्ट पर लेकिन कब तक पड़े रहते?टिकट पाने के लिए लंदन एयरलाइंस के अफसर को अपनी करुण कथा सुनाने बैठ गए। वह बड़े धैर्य से हमारी बातों पर कान लगाए रहा और अगले दिन 10अप्रैल का एयर कनाडा का टिकट हाथों में थमाकर मुनि दधीचि की तरह हमें उबार लिया।
एयर बस से हमें रेडिसन एडवरडियन होटल रात गुजारने के लिए पहुंचा दिया गया क्योंकि यह एयरलाइंस की जिम्मेवारी थी। जल्दी से जल्दी पेटपूजा करनी थी,दोपहर के तीन बज गए थे। हम शाकाहारी भोजन कक्ष में बहुत देर तक माथापच्ची करते रहे। मनमाफिक भोजन न मिलने से केक-पेस्ट्री खाकर पेट भरा। वेटर और उसके साथी हमारी मुखमुद्राओं को देखकर हंस रहे थे जिसमें बड़ा तीखा व्यंग था।वहाँ से उठकर मैं गैलरी में निकल आई। सालों पुरानी चांदी की हसली शीशे के फ्रेम में जड़ी दीवार की शोभा बढ़ा रही थी।ठीक वैसी ही दादी माँ ने मुझे भी दी थी पर मुझ मूर्ख ने उसे पुराने फैशन की कहकर तुड़वा दिया। ब्रिटिशर्स के कलात्मक प्रेम को देखकर मुझे अपने पर बेहद गुस्सा आया। हम क्यों नहीं अपने पूर्वजों की धरोहर सुरक्षित रखते हैं। आगे बढ़ी तो नजरें उलझ कर रह गईं। 6/6 के आकार का, एक दूसरा खूबसूरत फ्रेम और टंगा था। चांदी पर मीनाकारी की दो पुरानी घड़ियाँ उसमें विराजमान थी। गुलाबी नगरी जयपुर की स्पष्ट झलक थी जो पुकार-पुकारकर कह रही थीं –हमें अपने वतन से जबर्दस्ती  लाया गया है । इस महल में लगता है कोई हमारा गला दबा रहा है। ओ मेरे देशवासी,मुझे अपनों के बीच ले चलो।
एक क्षण विचार आया ,शीशा तोड़कर उन्हें आजाद कर दूँ मगर मजबूर थी। कुछ शब्द हवा में लहरा उठे –गुलामी की दास्तान !
भोजन कक्ष में बड़ा सा दूरदर्शन रखा था। बी.बी.सी से समाचार प्रसारित हो रहे थे-------------------
अमरीकन फौज बगदाद में घुस गई है। सद्दाम हुसैन घायल हो गए हैं। अमरीकी फौज को पानी भी मयस्सर नहीं। पानी के पाइप काटकर व्यवस्था छिन्न –भिन्न कर दी गई है। फौजियों की कष्टप्रद दशा को देखकर ईराकवासियों का दिल भर आया है। अपने घरों से पानी –खाना लाकर दे रहे हैं।
 अमेरिका अपनी कूटनीति से यहाँ भी बाज नहीं आया।ईराकी भ्रमजाल में फंसे लगते हैं कि अमेरिका विजयी होने पर उनकी ज़िंदगी मे खुशियों का चंदोवा तानदेगा।वे अमेरिकन फौज के हरे –भरे वायदों के चक्कर में पड़े उनके चारों तरफ मक्खियों की तरह भिनभिना रहे हैं। मुझे तो ईराकी जनता पर तरस आने लगा है।  अमेरिका अपना मकसद (तेल के कुंओं पर आधिपत्य )पूरा होने पर  उनकी तरफ से गूंगा  ,बहरा  और अंधा  हो जाएगा ।
आग की तरह लपलपाती खबरों से यही समझ में आया कि अमेरिका ईराक की प्राचीन बहुमूल्य धरोहर तथा सांस्कृतिक गौरव की धज्जियां उड़ा कर रहेगा और छोड़ दिया जाएगा निर्दोष वतन प्रेमियों को केवल कराहने के लिए।हाँ ,मदद के नाम पर उनके सामने चुगगा जरूर डाल देगा। दिन दहाड़े एक राष्ट्र का बलात्कार ! यही द्वंद मुझे खोखला करने लगा ।नफरत का बीज फूट पड़ा। रात की स्याही गहरा उठी पर मेरी नींद चिंदी चिंदी होकर न जाने कहाँ उड़ गई।

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रेडिसन होटल में जूस ,फल चॉकलेट आदि का सेवन करते-करते गड़बड़ा गए। एयरलाइंस की ओर से प्रति व्यक्ति 42अमेरिकल डोलर्स खाने-पीने को मिले थे। मगर वहाँ तो सब फीका लगने लगा। स्वदेश की दाल-रोटी याद आ गई। एक डर अंदर ही अंदर हर शिरा को कंपा रहा था कि कहीं कल भी होटल में न रुकना पड़ जाए। होटल की गगन चुम्बी भव्य इमारत कहने को तो विलासिता की देवी थी पर उस सुनहरे पिंजरे में ज्यादा देर कैद होना हमें मंजूर न था।

(प्रकाशित -मार्च अंक 2015) 

क्रमश: 


10 अप्रैल 2003
(2) ओ.के.(o.k)की मार
 
,अगले दिन सुबह बड़ी रुपहली लगी। खुशी-खुशी गुनगुनाती धूप में रेडिसन होटल को नमस्कार किया और एयरबस से पुन: एयरपोर्ट जा पहुंचे। उसी दिन दोपहर 12:30 पर विमान कनाडा जाना था।डी जोनमें पहुँचकर जब हमने काउंटर पर टिकट दिखाकर बोर्डिंग पास मांगा तो कनेडियन पदाधिकारी ने कहा-आपका टिकट पूर्णतया स्वीकृत नहीं है। नाम प्रतीक्षासूची में है।
हमारे तो देवता कूच कर गए। सूखे पत्ते की तरह विदेशी भूमि पर खड़े खड़खड़ाने लगे। टिकट पर तो ओ.के.लिखा था और हम मान कर चल रहे थे कि आज अपने बेटे के पास पहुँच जाएंगे।
 –जब अनुमोदित टिकट न था तो आपने इस पर 0.k. क्यों लिख दिया। मैं झल्ला उठी।
-0.k. तो इसलिए लिख दिया ताकि आप एयरपोर्ट से बाहर जाकर होटल में आराम कर सकें। आप साढ़े ग्यारह बजे तक प्रतीक्षा कीजिए। टिकट मिल जाएगा, अगर नहीं मिला तो बताइएगा।
उन्हें हमारी रोनी सूरत पर शायद तरस आ गया होगा और हम--- हम ओ.के. की मार खाकर भी चुप हो गए। लगा दिमाग ठस हो गया है और कानों से कम सुनाई देने लगा है।
अब डेढ़ घंटा तो किसी तरह गुज़ारना ही था।

 3-एयरपोर्ट का नजारा

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कनाडा ऑफिस के सामने ही सुंदर सोफे पड़े थे। वही हम अपनी यात्रा का भविष्य जानने को बैठ गए। मन ही मन मैंने गायत्री मंत्र का जाप शुरू कर दिया। । ब्रह्मा,विष्णु महेश का आवाहन करने कगी। संकटमोचन हनुमान भी दिमाग में छाए थे पर शीघ्र ही वहाँ के शोर शराबा,तड़क भड़क और फैशनपरस्ती में खो गई।
हमारे जैसे बहुत से परेशान यात्री अपना समय किसी तरह बिताने के लिए मजबूर थे।बैठने वाला कभी खड़ा हो जाता ,कभी ट्रॉली पर अटैची रखकर कैपच्योनो कॉफी पीने चल देता। अंत में उसकी आँखें घड़ी पर टिक जातीं या उस सूची पर जहां विमानों के आने-जाने का समय बिजली की रोशनी में दमकता रहताहै।  
हाँ ,एक बात की मैं प्रशंसा किए बिना न रहूँगी । मैंने एयरपोर्ट पर देखा-विकलांगों ,रोगियों और वृद्धों की विशेष देखभाल हो रही है।
कुछ देर में मेरे सामने वाली बैंच पर एक बुजुर्ग आकर बैठे। वे खुद चलने में पूर्ण समर्थ न थे इसलिए पहिये वाली कुर्सी पर बैठकर लाए गए। एयरलाइंस के कर्मचारी आते जाते उन्हें हलो कह रहे थे। एक कर्मचारी आया उन्हें पानी पिला गया,सेवा धर्म निभा गया। पर ये वृद्ध बड़े हताश से लग रहे थे। गुमसुम से अपनी छड़ी हिला रहे थे मानो वह ही उनके शेष जीवन की साथिन हैं। चेहरे की मुसकान अकेलेपन के दर्द की चादर से ढकी नजर आई। कुछ देर बाद उनकी उड़ान का समय हुआ –एक कर्मचारी भागा आया और उनको ले गया।धीरे –धीरे वे दूर होते गए पर बहुत कुछ छोड़ गए मेरे मानस मंथन के लिए।   
व्हील चेयर वाले वुजुर्ग वहाँ काफी थे पर आश्चर्य! किसी के साथ भी उनका कोई
रिश्तेदार नहीं। मुझे बुढ़ापे का रंग बड़ा मटमैला और असहाय लगा। वैसे तो बुजुर्ग नागरिक की देखभाल का दायित्व लंदन,अमेरिका,कनाडा आदि देशों में सरकार पर है जिन बच्चों को माँ –बाप ने जन्म दिया है उसके प्रति संतान का भी तो कुछ कर्तव्य बनता है। बच्चों का भी क्या कसूर !व्यक्तिगत भोगवादी –सुविधावादी प्रवृति में लिप्त माता -पिता इतने व्यस्त हैं कि औलाद की खातिर अपने सुख का त्याग करने को ज्यादा समय के लिए शायद वे तैयार नहीं। ममता के आँचल और पिता की छत्रछाया के अभाव में रेतीली आंधियों का उठना तो स्वभाविक है फिर भावनाएँ भी दरक जाएँ तो आश्चर्य नहीं। इस शुष्कता के जंगल में वर्ष में एक बार मातृ दिवस या पितृदिवस मनाने से क्या होगा,हृदयस्थली तो सरस हो नहीं पाएगी। मुझे तो ऐसा लग रहा है कि यहाँ प्यार की बौछारें भी गणित के नियमों से बद्ध हैं।
आशा के विपरीत कुछ ही दूरी पर हंसी का फब्बारा छूटता  देख आश्चर्य से भर उठी। भारतीय अधेड़ पति –पत्नी की दंत पंक्तियाँ जगमगा रही थीं। लंदन में पढ़ने वाला जवान बेटा उनसे मिलने आया था। माँ ने अपने पुत्र का हाथ कसकर पकड़ रखा था ताकि  एहसास बना रहे कि उसका बच्चा दूर नहीं। बेटा भी बड़ी आत्मीयता से माँ-बाप के साथ अपने अनुभव बाँट रहा था।
कानों में उसका मृदुल स्वर गूँजा -
-माँ--माँ यहाँ कॉफी बहुत अच्छी मिलती है। ले आऊँ !
-न बेटा बड़ी मंहगी है।
बेटा ‘अभी आया’ कहकर गायब हो गया। पलक ठीक से झपके भी नहीं थे कि दोनों हाथों में दो कॉफी गिलास लेकर हाजिर हो गया।
-पापा ---कॉफी लो।
-बेटा तू पी ले।
-मैं और माँ एक में से ही चुसकियाँ ले लेंगे। मैं तो पीता ही रहता हूँ। हाँ, माँ के हाथ की बनी पूरी-सब्जी नहीं मिलती। जल्दी से दो न माँ! शिशु की तरह जवान बेटा मचल उठा।
-न जाने कितने समय से तुम्हारे हाथ का जायकेदार खाना नहीं खाया है -कहकर माँ के पास भोली सूरत बनाकर वह बैठ गया।
शब्दों की गहराई को नाप माँ पुलकित हो उठी।
-मैं पूरी के साथ भरवां करेले भी बनाकर लाई हूँ। बहुत दिनों तक ये खराब नहीं होंगे ।फ्रिज में रख देना।
-ये तो बहुत हैं!
-बहुत नहीं हैं। जब भी तू इन्हें खाएगा 'माँ'शब्द की मिठास इनमें घुल जाएगफिर सब कुछ भूलभालकर मेरी यादों में खो जाएगा।
-माँ ऐसा कहोगी तो तुम्हारे पास ही बैठा रहूँगा।
-सच !माँ ने दोनों हाथों से पुत्र का चेहरा थाम लिया और बेटा निहाल हो गया।

माँ ने बड़े सधे हाथों से आधी पूरी में आलू की सब्जी रख उसे लपेटा और बेटे के मुंह में डाल दिया। तभी एक एंग्लोइंडियन वहाँ आकर खड़ा हो गया। एक मिनट उनको घूरता रहा फिर मंद हास से उसके ओठ थिरक उठे--हैपी फैमिली(happy family)। रिश्तों की यह मधुरिमा पश्चिमी हवाओं में कहाँ?

(प्रकाशित -अप्रैल अंक 2015)

क्रमश:

सोमवार, 8 दिसंबर 2014

संस्मरण -वह चाँद सा मुखड़ा


यह  साहित्यिकी अंक अपने में विशेष है। इसकी परियोजना के समय किसी ने सोचा भी न था कि सुकीर्ति जी की स्मृति ही शेष रह जाएगी और उनकी मधुर यादों को इसमें संजोना पड़ेगा । पत्रिका के एक खंड में उनको समरण करते हुए श्रद्धांजलि देने का प्रयास है तो दूसरे खंड में साहित्यिकी मित्रों के विविध संस्मरणों का लेखा -जोखा है।

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निम्न लिखित संस्मरण इसी पत्रिका का एक अंश है।

वह चाँद सा मुखड़ा/सुधा भार्गव 
कभी -कभी जीवन में ऐसा घटित होता है जो भूलते भी नहीं बनता और याद आते ही  उसकी खरोंच दिल को लहूलुहान कर देती है । अनेक वर्षों पहले मेरे भाई  के आँगन में दो पुत्रियों के बाद पुत्र का जन्म लेना किसी समारोह से कम न था। पहली वर्षगाँठ  पर उस चाँद से  टुकड़े पर  अंजुली भर -भर आशीष लुटाया पर वह कम पड़  गया । 

रात का भोजन  मिलकर करना परिवार  का नियम था । भोजन समाप्ति पर माँ  ममता का आँचल पसार नन्हें नकुल को कुर्सी से उतारती और कहती -बेटा चल , हाथ मुँह धो ले वाशवेसिन पर।   कभी गोदी के झूले में झुलाती,कभी स्टूल पर खड़ा करके कुल्ले कराती। वह नटखट इतनी ज़ोर से कुल्ला करता कि नीचे पानी पानी ही हो जाता और फिर भागता फिसलता हुआ माँ की बाहों से।उसे पानी से खेलने का बड़ा शौक था इसीकरण कुल्ला खुद करना चाहता था ताकि पानी से खेल कर सके। नहाता तो नल की धार से जग में पानी भरभरकर अपने ऊपर उड़ेलता और अपनी माँ के ऊपर भी भिगो देता । 
-ठहर शरारती ,अभी तुझे बताती हूँ । मुझे सारा भिगोकर रख दिया। माँ डांटती भी और फिर खुद ही यशोदा मैया की तरह उसकी बाल सुलभ क्रीड़ाओं पर हंस देती।
उस वाशबेसिन के पास एक बाथरूम बना था। वहाँ एक स्टूल पर पानी का मग रक्खा रहता था ताकि पानी से भरे प्लास्टिक के ड्रम से पानी लेकर बाल्टी में डाला जा सके।वह ड्रम करीब 3फुटा होगा। पानी नलों में चौबीस घंटे नहीं आता था इसलिए पानी एकत्र करके रखना पड़ता था।  
उस काली रात नकुल खाने के बाद कब -कब में कुर्सी से सरककर कहाँ चला गया पति - पत्नी को पता ही नहीं चला । 
काफी देर बाद होश आया --अरे नकुल कहाँ चला गया !नकुल  --नकुल आवाज लगने लगीं । उसकी बहनों ने कमरे छान मारे । माँ  ने बाथरूम ,शौचालय ,रसोई देखी ,उसके पापा छत की ओर दौड़े ,नौकरों ने पास पड़ोस में पूछना शुरू कर दिया --अजी आपने नकुल को तो नहीं देखा । परेशान उसके पापा बोले -घर में ही होगा ! वह बाहर जा ही नही सकता --जरूर शैतान पलंग के नीचे  छिप गया होगा या दरवाजे  के पीछे खड़ा होगा ,मैं दुबारा देखता हूँ । .बाथरूम का दरवाजा अधखुला था और लाईट नही जली थी पर बरांडे के बल्व की रोशनी वहां पड  रही थी । भाई ने नकुल को खोजते समय जैसे ही दरवाजा पूरा खोला .उसकी चीख से घर हिल उठा । ,सब लोग दौड़े -दौड़े आये ...देखा --ड्रम के बीच में दो अकड़े सीधे पैर !ड्रम में मुश्किल से दो बाल्टी  पानी होगा । उसके बीच में था पानी से भरा मग्गा ,मग्गे मं फंसा हुआ था नकुल का सिर । आँख ,नाक मुँह सब  पानी में डूबे हुए थे । काफी पानी उसके शरीर में जा चुका था।पूरा शरीर अकड़कर सीधा खड़ा था । 

अंदाज लगाया गया -हाथ धोने नकुल बाथरूम में गया होगा । ड्रम में पानी कम होने के कारण उसने स्टूल पर खड़े होकर मग्गे से पानी झुककर लेना चाहा , इस कोशिश में वह इतना झुक गया कि  सर के बल ड्रम  में जा पड़ा और नियति का ऐसा भयानक खेल --सर उसका मग में फँसा …। न वह हिलडुल सकता था न चीख -चिल्ला सकता था ।, देखने वाले सदमें से बेहोश !भारी दिलों से उसे निकला और पेट से पानी निकालने की कोशिश की ,कृत्रिम सांस प्रक्रिया की । मेरा भाई डाक्टर --सब कुछ समझते हुए भी समझने का साहस खो बैठा था  । कोई चमत्कार होने की आशा में चिल्लाया --किसी डाक्टर को बुलाकर तो दिखाओ और ढाढें मारकर रो उठा।तब तक छोटे  भाई वहाँ पहुँच चुके थे। हितैषी पड़ोसियों से घर घिर गया था।डाक्टर साहब आए। एकसाथ सैकड़ों उम्मीद भरी निगाहें उनकी ओर उठ गई।  जैसे आये थे वैसे ही चले गए हरे -भरे घर आँगन में वेदना की मोहर लगा कर।मासूम नन्हा नकुल असमय ही खिलने से पहले ही इस दुनिया को छोडकर जा चुका था।

घर में आंसुओं की बाढ़ आ गई , वहाँ से आती कराहटें सुननेवालों के दिल दहला देती। किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि बेटे से बिछुड़े सुबकते माँ -बाप को किन शब्दों में सांत्वना दें । सांत्वना देने वाला कुछ कहे उससे पहले ही वह रो उठता। गमगीन वातावरण में हम सब जिंदा लाश बन कर रह गए थे। 

इस घटना को बीते वर्षों बीत गए पर जब भी  याद आती है तो एक छिलन पैदा होती है और रिसने लगती है उससे न कभी खत्म होने वाली अंतर्वेदना की कसमसाहट। क्या करूँ! अपने प्यारे चाँद से भतीजे की बड़ी बड़ी आँखें,भोली बातें,ठुमक ठुमक कर चलना भूल भी तो नहीं पाती।  

मंगलवार, 27 मई 2014

मोदी अध्याय

महाविजय का नाद 




हमारे देश की राजनीति में मोदी अध्याय शुरू हो चुका है। कल 26 मई को भव्य शपथ ग्रहण समारोह में नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद और गोपनीयता की शपथ ग्रहण की। वे भारत के15वे प्रधान मंत्री बने हैं।समारोह के सुनहरे अवसर पर राष्ट्रपति भवन के प्रांगण में करीब 3000 लोगों से भी ज्यादा उपस्थित होने का अनुमान है ।
बड़ी बड़ी हस्तियो के साथ पाकिस्तान के प्रधान मंत्री आए थे। दक्षेश के सदस्य (दक्षीण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संघ के सदस्य )भी मौजूद थे।। उनको आमंत्रित करके हमारे प्रधानमंत्री ने एकता की ओर ठोस कदम बढ़ाया है । 

राष्ट्रीय धुनों के साथ समारोह का आरंभ और अंत हुआ। नरेंद्र मोदी ने शपथ लेने के बाद देश के नाम संदेश दिया –आइए हम सब मिलकर एक सुनहरे और सशक्त भारत का निर्माण करें । 

कल देशवासियों की हजार आँखें दूरदर्शन में दिखाई देने वाले इस समारोह और अपने नए प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी पर लगी थीं जिन्होंने बड़ी उम्मीदों के साथ उन्हें अपना प्यार दिया ,विश्वास दिया और सिर माथे पर बैठाया । नए प्रधान मंत्री की राह भी काँटों से भरी हैं पर उनमें गज़ब का आत्मविश्वास है।एक चाय वाला प्रधान मंत्री कैसे बन गया ?यह कोई चमत्कार नहीं हुआ है बल्कि उनकी वर्षों की कड़ी तपस्या का फल है। 12 वर्ष गुजरात के मुख्य मंत्री रहकर राजनैतिक अनुभवों के भंडार हैं। अपने रण चातुर्य ,दूरदर्शिता ,सकारात्मक सोच और पक्के इरादों के कारण भारतीय जनता की उम्मीदों पर मेहनती प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी अवश्य खरे उतरेंगे ऐसी हमारी सकारात्मक सोच है।   


शुक्रवार, 9 मई 2014

समुद्री यात्रा का चौथा दिन

 हृदयग्राही सामुद्रिक यात्रा
-बुधवार 14-9-05

पहले दिन की क्षति पूर्ति करने मैं जल्दी उठ गई और सूर्योदय के समय की गगन की शोभा और पयोधि की शालीन मुद्रा निरखने लगी। आज तो मुझे कागज के कोरे टुकड़ों पर सागर राज का हृदय उड़ेल कर रख ही देना था  तूलिका से उसमें चमकीले रंग भरने लगी।
क्रूज पर कार्यक्रम तो  आज भी बड़े लुभावने थे । कहीं नेपकिन फोल्ड करना सिखाया जाना था ,कहीं सब्जी –फलों को काट –तराशकर उन्हें सुंदर रूप देने का प्रदर्शन । बच्चों –किशोरों के प्रथक कार्यक्रम थे।बच्चों का स्वीमिंग पुल देख तो मैं चकित रह गई ,एकदम बालप्रकृति के अनुकूल। 

कंप्यूटर सेंटर ,स्वीमिंग पूल ,जिम,जकूजी –सोना बाथ सेंटर आदि में जाने का तो समय ही नहीं था। यहाँ पर हर एक की रुचियों का ध्यान रखा गया है। लाफ्टर योगा क्लास में मेरी जरूर रुचि थी मगर भार्गव जी ने सनराइज़ वॉक का आग्रह किया । 5 मिनट बॉडी स्ट्रेच कक्षा में भी झांकी मार ली । गाइड ने खड़े होकर ,लेटकर ,इस तरह शरीर के अंगों को तानकर उनमें खिंचाव करना सिखाया कि सुस्ती ,शरीर का दर्द मिनटों में छूं मंतर हो गया।ब्लू लैगून एशियन वीस्ट्रो में नाश्ता करके बालकनी में जा बैठे । दोनों तरफ ---खामोश समुद्र ---दूर --–सपाट दूर ---आकाश समुद्र मिले हुए।एक – दूसरे में खोए,एक ही रंग में रंगे ,कितना अदूभुत प्रकृति का जलमंच। अजीब सी शांति मन में समा गई । लहरों को चीरता जहाज आगे बढ़ रहा था ,न कोई रुकावट न कोई बंदिश। गतिमान के साथ निरंतर गतिमान। काश! मैं भी ऐसा कर सकती ।
देखते ही देखते सूर्य ऊपर चढ़ आया । सूर्य की किरने लहरों पर पड़ने के कारण वे शुभ्रता छिटकाती चांदी की सी मछलियाँ प्रतीत होती थीं । नीलांबर में खरगोशी चपलता लिए बादल भी टिकने का नाम नहीं ले रहे थे । सूरज उनकी ओर ललचाई दृष्टि से देख रहा था । शायद बालकों की तरह उनके साथ आँख मिचौनी खेलने को लालायित हो ।
दोपहर के भोजन पश्चात स्वागत कक्ष में हमने एक्सेस कार्ड जमा कर दिए और पासपोर्ट व अन्य कागजात वापस ले लिए।

स्वागत कक्ष 
केबिन हमें शाम के पाँच बजे छोड़ देना था । इसलिए सामान उसके बाहर ही रख आए थे ताकि कर्मचारी वहाँ से उठा ले और सिंगापुर में हमें दे दे। मटरगश्ती करते हुए 4बजे एक रेस्टोरेन्ट में घुस गए । खिड़की के सहारे रखी कुर्सियों पर बैठकर गरम –गरम चाय –पेस्ट्री का आनंद उठाने लगे लेकिन हमारा ध्यान खिड़की से बाहर ही था । धरती का छोर दिखाई देने लगा था । जहां से चले बहीं पहुँचने की प्रतीक्षा करने लगे ।
जलयान के कुछ कर्मचारी भारतीय भी थे। वे बड़े अपनेपन से बातें करते रहे। उनमें से एक ने आकर बताया –अगले वर्ष स्टार क्रूज भारत में भी बंबई से चलनेवाला है। इसका नाम है –सुपर स्टार लिब्रा। यह लक्षदीप,कोची और गोवा जाएगा। मेरे नियुक्ति भी उसी जलयान पर होनवाली है। वह बहुत खुश था क्योंकि ऐसा होने पर वह भारत में अपने परिवार से मिल पाएगा। ।
पाँच बजते ही डेक 6पर बालकनी क्लास के यात्री पैवेलियन रूम में बैठ गए। वर्ल्ड क्रूसर श्रेणी के अतिथि डेक 7से सिंगापुर हार्बर उतरने वाले थे। भीड़ होते हुए भी सब अनुशासनबद्ध,पंक्तिबद्ध थे।
क्रूज यात्रा खतम होने जा रही थी पर इतनी मनोरंजक और हृदयग्राही सामुद्रिक सैर से जी न भरा था। लहरों पर ये बिताए चंद दिन जीवन केहसीन पलों में गुंथ गए। हार्बर आने पर हम सीढ़ियाँ उतर रहे थे कि संगीत उभरा –
ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना-----
पीछे मुड़कर देखा समुद्र ,क्रूज और उसके स्टाफ की हजार हजार निगाहें स्नेह से हमें देख रही हैं।
मेरे पैर भी तो बड़ी मुश्किल से आगे बढ़ रहे थे। यात्रा से विदाई का क्षण ऐसी ही मधुर उदासी से भरा होता है । एक ओर यात्रा समाप्ति का दुख तो दूसरी ओर जन -जन के साथ यात्रा के मधुर अनुभव बांटने का उत्साह ।  

 समाप्त

गुरुवार, 8 मई 2014

क्रूज यात्रा का तीसरा दिन

फुकेट का समुद्री तट 
मंगलवार :१३-९-05


प्रात: उदय होते सूर्यदेव के दर्शन की इच्छा अपूर्ण रह गई क्योंकि नींद देर से खुली। चाय पीने हम रेस्टोरेन्ट पहुंचे तो देखा फुकेट (थाईलैंड )टूर पर जाने वाले पर्यटक जमकर खा रहे हैं ।हमें तो किसी प्रकार की जल्दी थी नहीं।
दोपहर 12 बजे के करीब फुकेट पोर्ट पर जहाज ने लंगर डाल दिया। विराट समुद्र के दर्शन के लिए हमारे पास 6घंटे थे। । मन किया उसी क्षण समुद्र तटीय बलुआ मैदान में दौड़ लगाऊं,उसका स्पर्श करूं ,समुद्री फैन को अंजुरी में  भरकर उससे खिलवाड़ करूँ।
लेकिन पहले ताज होटल में आरक्षण कराना था ।सोचा वहाँ बहुत भीड़ होती होगी पर लंच रूम मे हम पति –पत्नी दो ही थे।नाम बड़े दर्शन छोटे वाली बात! खाने वाले भी वहाँ कम ही आते होंगे क्योंकि बिल चुका कर भोजन मिलता है। जब मुफ्त मे उससे हजार गुना स्वादिष्ट  खाद्य और पेय पदार्थ मिलें तो वहाँ क्यों जाएँ?हम दो पर बैरा तीन!सोच -सोचकर हंस रहे थे ।
एक्सेस कार्ड दिखाने के बाद ही जलपोत से उतरने की आज्ञा मिली । तीर पर कोस्टगार्ड और क्रूज के सुरक्षा अधिकारी बैठे थे । कुछ दूरी पर छोटा सा बाजार लगा हुआ था। दूर तक विराट जल की भीम क्रीडा को देखते हुए काफी दूर तक चलते रहे हम । बाजार में हस्त शिल्प का सौंदर्य बिखरा पड़ता था ।  कुछ टीशर्ट,चाबी के गुच्छे उपहार स्वरूप देने के लिए खरीदे। एक चाबी का गुच्छा तो अब भी मेरे पर्स में लटका रहता है जो वहाँ की याद दिलाता है । 



टीन की चादर से बने अनोखे पेंसिल शार्पनर लो देख कर तो मैं उनको लेने बच्चों की तरह मचल उठी । हाथ की कारीगरी देखते ही बनती थी।  एक लड़का उन्हें छोटी सी मेज लगाए बेच रहा था। 


पहले तो विश्वास ही नहीं हुआ कि वाद्य संगीत की ये आकृतियाँ पेंसिल की धुनाई भी कर सकती हैं। मैंने उन्हें सजावट का समान ही समझा था। जब लड़के ने पेंसिल छील कर दिखाई तो इतनी खुश हुई  कि उसे मुंह  मांगे दाम  देकर चार खरीद लिए ।     
समुद्र के किनारे से किनारा करते –करते शाम के छ्ह तो बज ही गए। 6 बजे हैपी आवर्स(Happy hours) शुरू हो गए थे इसलिए हम रेसेप्शन हॉल मेँ ही बिछे सोफो पर बैठ गए । आकेस्ट्रा बज रहा था। सामने स्त्री -पुरूष अंग्रेज़ी धुनों पर थिरक रहे थे। हमारे दोनों ओर छोटी पर खूबसूरत दुकानों पर विदेशी सुरा रखी थी। सोविनियर्स से वहाँ की शोभा दुगुनी हो गई थी मगर वे हमें बहुत कीमती लगे। हैपी आवर्स मेँ एक गिलास लेने से दूसरा मुफ्त मिल रहा था। अभी तक 300 सिंगापुर डोलर्स के कूपन भोजन पर खर्च न कर पाए थे इसलिए वहाँ से हमने महंगी होने पर भी ब्लैक लेबिल शैम्पेन व आस्ट्रेलियन शीराज वाइन खरीद ली । कूपन का इस्तेमाल हर हाल मेँ करना था वरना वे बेकार हो जाते ।
वैलाविस्टा रेस्टोरेन्ट में आज गला डिनर था। उसमें उपयुक्त परिधानों का विशेष ध्यान रखा गया । कोई भी नेकर, वरमूडा ,बिना बांह की कमीज या चप्पल पहनकर नहीं जा सकता था।दरवाजे पर एक्सेस कार्ड दिखाकर अंदर घुसे । मेज का नंबर हमारा पहले से ही निश्चित था। हम वहाँ खास मेहमान थे। यान परिचारिकाएँ मेजबानी में खड़ी थीं। 

रेस्टोरेन्ट
रंगबिरंगे बल्बों से कोना –कोना जगमगा रहा था। संगीतमय मदभरी शाम में हमने कुछ समय के लिए खुद को राजे –महाराजे समझने का मजा लिया। कुछ पर्यटक नोबल हाउस (चाइनीज)समुराय (जापानीज़)होटल के गाला डिनर में चले गए थे पर हमारी मंजिल तो बैलाविस्टा ही थी। शाकाहारी भोजन वहीं अच्छा था ।
डीनर के बाद हम पिक्चर गैलरी चले गए। सैकड़ों तस्वीरे दीवार पर लगी हुई थीं ताकि सैर करने वाले इन्हें देखें ,सराहें और खरीदें। स्टार क्रूज के फोटोग्राफरों ने यात्रियों के चित्र कैमरे मेँ कैद कर लिए थे। हमने भी अपनी दो तस्वीरें खरीदीं। एक नर्तकी के साथ दूसरी जोकर के साथ।
रात के बारह बजे डिजायर प्रहसन (las vegas style toples revue)देखने जाना था। यह 40 मिनिट का लीडो शो होता है । प्यार और रोमांस से भरी यह रात दर्शकों के दिल की धड़कनों को तेज करने वाली थी । अल्हड़ लड़कियां झीने वस्त्र पहने रूपहले जुगनुओं की तरह चमक रही थीं। उनमें नीली आँखों वाली एक लड़की थी। लगता है इससे कवि पैब्लो नेरूदा अवश्य मिले होंगे  


कवि पैब्लो नेरूदा 
तभी तो उनकी कुछ पंक्तियों मेँ उसका सार्थक चित्रण है –
जादू भरे उभारों में
दो अग्नि शिखाएँ लहक रही थीं
और वे अग्नि धाराएँ ,स्वच्छ मांसल लहरों से इठलाती हुई
कदली खंभ जैसी जांघों से तैरती हुई
उसके चरणों तक उतर गई थीं
पर
उसकी निगाहों से तिरछी हरी –भरी किरणों के
निर्मल झरने झरते थे ।
लेकिन ऐसी दृष्टि सबकी कहाँ? वहाँ बैठे लोगों की नजरें तो अनावृत उरोजों से टकरा रही थीं । आखिर था तो नारी देह प्रदर्शन ही। ‘नारी कब तक दिल बहलाने का साधन बनी रहेगी?’ जैसे प्रश्न से जूझती मैं व्यर्थ ही परेशान होती रही ।  

क्रमश :