शुक्रवार, 10 अप्रैल 2015

कनाडा डायरी के पन्ने,कड़ियाँ 1,2,3



मित्रों
 एक अरसा हो गया कनाडा गए। मगर कनाडा  में बिताए मीठे -कड़वे अनुभवों को डायरी में कैद करती  चली गई थी।  आज जब भी उसको पढ़ती हूँ तो रोमांचित हो उठती हूँ --और लगता है कल ही  तो  कनाडा से अपने वतन लौटी हूँ। मेरी  डायरी के पन्ने सुमन कुमार घई जी को  पसंद आए और उन्होंने इसको साहित्य कुंज में क्रमश; प्रकाशित करने का निश्चय किया । इससे मुझे अपनी डायरी के पन्नों को उलटने पलटने का मौका मिला। मैं इसके लिए  उनकी बहुत शुक्रगुजार हूँ।व्यस्त ज़िंदगी से कुछ  अनमोल पल निकाल कर आप भी  इसे अवश्य पढ़ने का  प्रयत्न कीजिएगा और बताइएगा आपने कैसा महसूस किया।
इसे आप साहित्य कुंज में भी पढ़ सकते हैं।
लिंक है -
http://sahityakunj.net/
Sahitya Kunj Aapkee Sahitiyak Patrika -साहित्य कुंज आपकी साहित्यिक पत्रिका






कनाडा के अजब अनूठे रंग                   

8 अप्रैल 2003 
(1) स्वदेश से विदा

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उसके साथ बिताए पलों को मैने मुट्ठी में कसकर बंद कर रखा था । केवल सोते समय मुट्ठियाँ खुलती थीं। परन्तु वे सुनहरे पल धीरे-धीरे मेरी उँगलियों के बीच से इस प्रकार सरकने लगे जैसे बालू। फोन पर बातें करते-करते आवाज भर्रा उठती और एक व्यापक मौन मुझसे ही टकराकर पूरे जिस्म में फैल जाता। चाँद बेटा मेरी  हलचल को मीलों दूर कनाडा में बैठे भाँप गया। मेरी मनोस्थिति तो पतिदेव (भार्गव जी) भी ताड़ गए थे। इसीलिए शीघ्र ही कनाडा की राजधानी ओटवा जाने का कार्यक्रम बन गया।
8अप्रैल,2003 को सुबह 8:45 पर हमने अपने देश से विदा ली।एयर इंडिया विमान से लंदन हिथ्रो एयरपोर्ट बड़े आराम से पहुँच गए। लंदन घड़ी 9 की सुबह 11:30 बजा रही थी। वहाँ से 12:55 पर कनाडा उड़ान पकडनी थी। दोनों उड़ानों के बीच का समय बहुत कम था। अत : औपचारिकता पूरी कर भी न पाए थे कि विदेशी भूमि पर एयर कनाडा उड़ान हम जैसे बहुत से लोगों को असहाय छोडकर उड़ गई।
उन दिनों अमेरिका-ईराक जंग ज़ोरों पर थी । दूसरे टोरंटो में सार्स बीमारी के भयानक रूप से पैर जम गए थे। पूछताछ करने पर पता लगा-कोई उड़ान रद्द हो रही है तो किसी का मार्ग बदला जा रहा है परंतु टोरेंटों की उड़ानें ज़्यादातर खाली हैं। वहाँ से कनाडा जल्दी पहुंचना मुश्किल नहीं है। हम टोरेंटों का टिकट खरीदने वाले ही थे कि जयपुरवासी डॉक्टर राणा से टकरा गए। बड़ी आत्मीयता से बोले –आप भूलकर भी टोरेंटों नहीं जाइएगा।  सार्स तो बड़ा खतरनाक रहस्यमय निमोनिया है। लक्षण हैं-सिरदर्द खांसी,सांस लेने में कष्ट --। उनकी पूरी बात सुने बिना ही भागे हम। सिरदर्द तो उड़ान छूटने के बाद ही शुरू हो गया था। एक दो मिनट और उनकी बात सुनते तो दम जरूर घुट जाता। दिमाग की हांडी में खौफ की खिचड़ी पकने लगी। टोरेंटों की उड़ान का हमने इरादा छोड़ दिया।
एयरपोर्ट पर लेकिन कब तक पड़े रहते?टिकट पाने के लिए लंदन एयरलाइंस के अफसर को अपनी करुण कथा सुनाने बैठ गए। वह बड़े धैर्य से हमारी बातों पर कान लगाए रहा और अगले दिन 10अप्रैल का एयर कनाडा का टिकट हाथों में थमाकर मुनि दधीचि की तरह हमें उबार लिया।
एयर बस से हमें रेडिसन एडवरडियन होटल रात गुजारने के लिए पहुंचा दिया गया क्योंकि यह एयरलाइंस की जिम्मेवारी थी। जल्दी से जल्दी पेटपूजा करनी थी,दोपहर के तीन बज गए थे। हम शाकाहारी भोजन कक्ष में बहुत देर तक माथापच्ची करते रहे। मनमाफिक भोजन न मिलने से केक-पेस्ट्री खाकर पेट भरा। वेटर और उसके साथी हमारी मुखमुद्राओं को देखकर हंस रहे थे जिसमें बड़ा तीखा व्यंग था।वहाँ से उठकर मैं गैलरी में निकल आई। सालों पुरानी चांदी की हसली शीशे के फ्रेम में जड़ी दीवार की शोभा बढ़ा रही थी।ठीक वैसी ही दादी माँ ने मुझे भी दी थी पर मुझ मूर्ख ने उसे पुराने फैशन की कहकर तुड़वा दिया। ब्रिटिशर्स के कलात्मक प्रेम को देखकर मुझे अपने पर बेहद गुस्सा आया। हम क्यों नहीं अपने पूर्वजों की धरोहर सुरक्षित रखते हैं। आगे बढ़ी तो नजरें उलझ कर रह गईं। 6/6 के आकार का, एक दूसरा खूबसूरत फ्रेम और टंगा था। चांदी पर मीनाकारी की दो पुरानी घड़ियाँ उसमें विराजमान थी। गुलाबी नगरी जयपुर की स्पष्ट झलक थी जो पुकार-पुकारकर कह रही थीं –हमें अपने वतन से जबर्दस्ती  लाया गया है । इस महल में लगता है कोई हमारा गला दबा रहा है। ओ मेरे देशवासी,मुझे अपनों के बीच ले चलो।
एक क्षण विचार आया ,शीशा तोड़कर उन्हें आजाद कर दूँ मगर मजबूर थी। कुछ शब्द हवा में लहरा उठे –गुलामी की दास्तान !
भोजन कक्ष में बड़ा सा दूरदर्शन रखा था। बी.बी.सी से समाचार प्रसारित हो रहे थे-------------------
अमरीकन फौज बगदाद में घुस गई है। सद्दाम हुसैन घायल हो गए हैं। अमरीकी फौज को पानी भी मयस्सर नहीं। पानी के पाइप काटकर व्यवस्था छिन्न –भिन्न कर दी गई है। फौजियों की कष्टप्रद दशा को देखकर ईराकवासियों का दिल भर आया है। अपने घरों से पानी –खाना लाकर दे रहे हैं।
 अमेरिका अपनी कूटनीति से यहाँ भी बाज नहीं आया।ईराकी भ्रमजाल में फंसे लगते हैं कि अमेरिका विजयी होने पर उनकी ज़िंदगी मे खुशियों का चंदोवा तानदेगा।वे अमेरिकन फौज के हरे –भरे वायदों के चक्कर में पड़े उनके चारों तरफ मक्खियों की तरह भिनभिना रहे हैं। मुझे तो ईराकी जनता पर तरस आने लगा है।  अमेरिका अपना मकसद (तेल के कुंओं पर आधिपत्य )पूरा होने पर  उनकी तरफ से गूंगा  ,बहरा  और अंधा  हो जाएगा ।
आग की तरह लपलपाती खबरों से यही समझ में आया कि अमेरिका ईराक की प्राचीन बहुमूल्य धरोहर तथा सांस्कृतिक गौरव की धज्जियां उड़ा कर रहेगा और छोड़ दिया जाएगा निर्दोष वतन प्रेमियों को केवल कराहने के लिए।हाँ ,मदद के नाम पर उनके सामने चुगगा जरूर डाल देगा। दिन दहाड़े एक राष्ट्र का बलात्कार ! यही द्वंद मुझे खोखला करने लगा ।नफरत का बीज फूट पड़ा। रात की स्याही गहरा उठी पर मेरी नींद चिंदी चिंदी होकर न जाने कहाँ उड़ गई।

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रेडिसन होटल में जूस ,फल चॉकलेट आदि का सेवन करते-करते गड़बड़ा गए। एयरलाइंस की ओर से प्रति व्यक्ति 42अमेरिकल डोलर्स खाने-पीने को मिले थे। मगर वहाँ तो सब फीका लगने लगा। स्वदेश की दाल-रोटी याद आ गई। एक डर अंदर ही अंदर हर शिरा को कंपा रहा था कि कहीं कल भी होटल में न रुकना पड़ जाए। होटल की गगन चुम्बी भव्य इमारत कहने को तो विलासिता की देवी थी पर उस सुनहरे पिंजरे में ज्यादा देर कैद होना हमें मंजूर न था।

(प्रकाशित -मार्च अंक 2015) 

क्रमश: 


10 अप्रैल 2003
(2) ओ.के.(o.k)की मार
 
,अगले दिन सुबह बड़ी रुपहली लगी। खुशी-खुशी गुनगुनाती धूप में रेडिसन होटल को नमस्कार किया और एयरबस से पुन: एयरपोर्ट जा पहुंचे। उसी दिन दोपहर 12:30 पर विमान कनाडा जाना था।डी जोनमें पहुँचकर जब हमने काउंटर पर टिकट दिखाकर बोर्डिंग पास मांगा तो कनेडियन पदाधिकारी ने कहा-आपका टिकट पूर्णतया स्वीकृत नहीं है। नाम प्रतीक्षासूची में है।
हमारे तो देवता कूच कर गए। सूखे पत्ते की तरह विदेशी भूमि पर खड़े खड़खड़ाने लगे। टिकट पर तो ओ.के.लिखा था और हम मान कर चल रहे थे कि आज अपने बेटे के पास पहुँच जाएंगे।
 –जब अनुमोदित टिकट न था तो आपने इस पर 0.k. क्यों लिख दिया। मैं झल्ला उठी।
-0.k. तो इसलिए लिख दिया ताकि आप एयरपोर्ट से बाहर जाकर होटल में आराम कर सकें। आप साढ़े ग्यारह बजे तक प्रतीक्षा कीजिए। टिकट मिल जाएगा, अगर नहीं मिला तो बताइएगा।
उन्हें हमारी रोनी सूरत पर शायद तरस आ गया होगा और हम--- हम ओ.के. की मार खाकर भी चुप हो गए। लगा दिमाग ठस हो गया है और कानों से कम सुनाई देने लगा है।
अब डेढ़ घंटा तो किसी तरह गुज़ारना ही था।

 3-एयरपोर्ट का नजारा

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कनाडा ऑफिस के सामने ही सुंदर सोफे पड़े थे। वही हम अपनी यात्रा का भविष्य जानने को बैठ गए। मन ही मन मैंने गायत्री मंत्र का जाप शुरू कर दिया। । ब्रह्मा,विष्णु महेश का आवाहन करने कगी। संकटमोचन हनुमान भी दिमाग में छाए थे पर शीघ्र ही वहाँ के शोर शराबा,तड़क भड़क और फैशनपरस्ती में खो गई।
हमारे जैसे बहुत से परेशान यात्री अपना समय किसी तरह बिताने के लिए मजबूर थे।बैठने वाला कभी खड़ा हो जाता ,कभी ट्रॉली पर अटैची रखकर कैपच्योनो कॉफी पीने चल देता। अंत में उसकी आँखें घड़ी पर टिक जातीं या उस सूची पर जहां विमानों के आने-जाने का समय बिजली की रोशनी में दमकता रहताहै।  
हाँ ,एक बात की मैं प्रशंसा किए बिना न रहूँगी । मैंने एयरपोर्ट पर देखा-विकलांगों ,रोगियों और वृद्धों की विशेष देखभाल हो रही है।
कुछ देर में मेरे सामने वाली बैंच पर एक बुजुर्ग आकर बैठे। वे खुद चलने में पूर्ण समर्थ न थे इसलिए पहिये वाली कुर्सी पर बैठकर लाए गए। एयरलाइंस के कर्मचारी आते जाते उन्हें हलो कह रहे थे। एक कर्मचारी आया उन्हें पानी पिला गया,सेवा धर्म निभा गया। पर ये वृद्ध बड़े हताश से लग रहे थे। गुमसुम से अपनी छड़ी हिला रहे थे मानो वह ही उनके शेष जीवन की साथिन हैं। चेहरे की मुसकान अकेलेपन के दर्द की चादर से ढकी नजर आई। कुछ देर बाद उनकी उड़ान का समय हुआ –एक कर्मचारी भागा आया और उनको ले गया।धीरे –धीरे वे दूर होते गए पर बहुत कुछ छोड़ गए मेरे मानस मंथन के लिए।   
व्हील चेयर वाले वुजुर्ग वहाँ काफी थे पर आश्चर्य! किसी के साथ भी उनका कोई
रिश्तेदार नहीं। मुझे बुढ़ापे का रंग बड़ा मटमैला और असहाय लगा। वैसे तो बुजुर्ग नागरिक की देखभाल का दायित्व लंदन,अमेरिका,कनाडा आदि देशों में सरकार पर है जिन बच्चों को माँ –बाप ने जन्म दिया है उसके प्रति संतान का भी तो कुछ कर्तव्य बनता है। बच्चों का भी क्या कसूर !व्यक्तिगत भोगवादी –सुविधावादी प्रवृति में लिप्त माता -पिता इतने व्यस्त हैं कि औलाद की खातिर अपने सुख का त्याग करने को ज्यादा समय के लिए शायद वे तैयार नहीं। ममता के आँचल और पिता की छत्रछाया के अभाव में रेतीली आंधियों का उठना तो स्वभाविक है फिर भावनाएँ भी दरक जाएँ तो आश्चर्य नहीं। इस शुष्कता के जंगल में वर्ष में एक बार मातृ दिवस या पितृदिवस मनाने से क्या होगा,हृदयस्थली तो सरस हो नहीं पाएगी। मुझे तो ऐसा लग रहा है कि यहाँ प्यार की बौछारें भी गणित के नियमों से बद्ध हैं।
आशा के विपरीत कुछ ही दूरी पर हंसी का फब्बारा छूटता  देख आश्चर्य से भर उठी। भारतीय अधेड़ पति –पत्नी की दंत पंक्तियाँ जगमगा रही थीं। लंदन में पढ़ने वाला जवान बेटा उनसे मिलने आया था। माँ ने अपने पुत्र का हाथ कसकर पकड़ रखा था ताकि  एहसास बना रहे कि उसका बच्चा दूर नहीं। बेटा भी बड़ी आत्मीयता से माँ-बाप के साथ अपने अनुभव बाँट रहा था।
कानों में उसका मृदुल स्वर गूँजा -
-माँ--माँ यहाँ कॉफी बहुत अच्छी मिलती है। ले आऊँ !
-न बेटा बड़ी मंहगी है।
बेटा अभी आया कहकर गायब हो गया। पलक ठीक से झपके भी नहीं थे कि दोनों हाथों में दो कॉफी गिलास लेकर हाजिर हो गया।
-पापा ---कॉफी लो।
-बेटा तू पी ले।
-मैं और माँ एक में से ही चुसकियाँ ले लेंगे। मैं तो पीता ही रहता हूँ। हाँ, माँ के हाथ की बनी पूरी-सब्जी नहीं मिलती। जल्दी से दो न माँ! शिशु की तरह जवान बेटा मचल उठा।
-न जाने कितने समय से तुम्हारे हाथ का जायकेदार खाना नहीं खाया है -कहकर माँ के पास भोली सूरत बनाकर वह बैठ गया।
शब्दों की गहराई को नाप माँ पुलकित हो उठी।
-मैं पूरी के साथ भरवां करेले भी बनाकर लाई हूँ। बहुत दिनों तक ये खराब नहीं होंगे ।फ्रिज में रख देना।
-ये तो बहुत हैं!
-बहुत नहीं हैं। जब भी तू इन्हें खाएगा 'माँ'शब्द की मिठास इनमें घुल जाएगफिर सब कुछ भूलभालकर मेरी यादों में खो जाएगा।
-माँ ऐसा कहोगी तो तुम्हारे पास ही बैठा रहूँगा।
-सच !माँ ने दोनों हाथों से पुत्र का चेहरा थाम लिया और बेटा निहाल हो गया।

माँ ने बड़े सधे हाथों से आधी पूरी में आलू की सब्जी रख उसे लपेटा और बेटे के मुंह में डाल दिया। तभी एक एंग्लोइंडियन वहाँ आकर खड़ा हो गया। एक मिनट उनको घूरता रहा फिर मंद हास से उसके ओठ थिरक उठे--हैपी फैमिली(happy family)रिश्तों की यह मधुरिमा पश्चिमी हवाओं में कहाँ?

(प्रकाशित -अप्रैल अंक 2015)

क्रमश:

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