शनिवार, 1 सितंबर 2018

॥ 2॥ रेल दुर्घटना

 2. रेल दुर्घटना

प्रकाशित 
साहित्य  सुधा वेब पत्रिका 
अंक सितम्बर प्रथम २०१८ 
http://www.sahityasudha.com/articles_sep_1st_2018/sansamaran/sudha_bhargava/sansamaran.pdf

जाको राखे साइयाँ मार सके न कोय 
      बात उन दिनों की है जब मैं हॉस्टल में रहकर अलीगढ़ टीकाराम गर्ल्स कालिज में पढ़ती थी। बी॰ए॰ प्रथम वर्ष की परीक्षाएँ समाप्त हो गई थी। मुझे पिता जी ने अनूपशहर(जिला बुलंदशहर) से चचेरे भाई मिक्की को लेने भेज दिया था। उसके साथ मेरा छोटा भाई संजू भी था।दोनों ताऊ जी के ठहरे हुए थे। ताऊजी गंभीरपुरा में रहते थे और धर्मसमाज कॉलेज के वाइस प्रिन्सिपल थे।एक दिन पहले ही अनूपशहर ले जाने वाली अटैची उनके यहाँ रख आई थी। 
      जिस दिन टीका राम गर्ल्स कॉलेज बंद हुआ, उसके दूसरे दिन ही 11 बजे के करीब संजू और और मिक्की  हॉस्टल आन पहुंचे । उसी दिन मैं अनूपशहर जाना चाहती थी-माँ की बहुत याद आ रही थी। स्कूल के गेट से निकलते ही मन में विचार आया कि जाने से पहले अपनी आँखें टैस्ट करा लूँ। काफी दिनों से आंखों में दर्द हो रहा था मगर परीक्षा के कारण टालती आ रही थे। समय बहुत कम था। सो रिक्शा वाले को उल्टे हाथ की बजाय सीधे हाथ की ओर चलने का इशारा किया। डाक्टर मोहनलाल नेत्रालय अस्पताल पर रिक्शा रुकाई। परीक्षण करने के लिए नंबर लिया। वहाँ एक घंटा तो लग ही गया क्योंकि तीन बार तो एट्रोपीन ही डाली होगी।उसके असर से साफ दिखाई नहीं दे रहा था। आँखें मिचमिचाती हुई वहाँ से चल दी।
      विष्णुपुरी के आगे से जब हम निकले सीटी देती  हुई ट्रेन की  आवाज साफ सुनाई दी। समझ गए धड़ -धड़ करती ट्रेन आने वाली है और रेलवे क्रॉसिंग का गेट जरुर बंद मिलेगा। न जाने कितनी देर ट्रेन के गुजर जाने का इंतजार करना पड़े । पर आश्चर्य तभी मैंने रेलवे क्रॉसिंग पर मेनुएल गेट का पड़ा लंबा मोटा सा डंडा ऊपर उठते देखा।  दोनों ओर का रुका ट्रैफिक आधाधुंध चल दिया । उसके बाद क्या हुआ मुझे कुछ नहीं मालूम। मुझे जब होश आया मैंने अपने को अंधेरी सी गुफा में पाया। हाथों से दायें बाएँ, ऊपर-नीचे   टटोलकर देखा । दोनों तरफ रेल की पटरियों का आभास हुआ। हाथों को  ऊपर किया तो लोहे के पतले पतले सींखचों से उँगलियाँ टकराईं। मेरा दिमाग बड़ी तेजी से काम करने लगा-
-अरे मैं तो रिक्शा में बैठी थी ,जरूर उसके  पलटने के कारण  रेल की पटरियों के बीच गिर गई हूँ और रेल मेरे ऊपर से जा रही है। अगर मैं धोबिन की तरह पैर फैलाकर पटरियों के बीच में हो जाऊं तो ट्रेन मेरे ऊपर से चली जाएगी और मैं बच जाऊँगी।मुझमें अनंत साहस का संचार होने लगा।
       कुछ दिन पहले सुना था कि हमारी धोबिन रेल की पटरियों को पार कर अपनी बस्ती जा रही थी कि उसकी धोती पटरियों में उलझ गई । दूर से  आती ट्रेन को  देख हड़बड़ा उठी और जल्दी से पटरियों के बीच में लेट गई। ट्रेन उसके ऊपर से निकाल गई और उसका बाल बांका भी नहीं हुआ। 
      मैं जब पटरियों के बीच में होने की कोशिश कर रही थी तो लगा कोई मुझे बाहर की तरफ खींच रहा है। वह जितना खींचता उतना ही मैं अंदर हो जाती तभी कानों में आवाज आई-एक्सीडेंट एक्सीडेंट ,पटरी  से  बाहर आओ। मैं सरक कर बीच से किनारे के पास आ गई । जैसे ही उसने इस बार मुझे निकालने को ज़ोर लगाया मैं खिंची चली आई।बाहर आते ही निगाहें भाइयों को खोजने लगीं।
       सामने ही पटरियों से बाहर ईंटों की कंकरीट पर संजू को पीठ किए खड़ा  पाया। पीछे सिर से उसके खून निकल रहा था।वह मेरे घुटनों पर बैठा हुआ था। उछलकर शायद सिर के बल कंकरीट पर जा गिरा होगा। उल्टे हाथ की ओर देखा तो मिक्की  धीरे -धीरे आ रहा था। दहशत की परछाईं साफ उसके चेहरे पर झलक रही थी। हम तीनों चिपट कर ऐसे गुंथ गए कि दुनिया की कोई शक्ति हमें अलग न कर सके। शब्द प्रस्फुटित हो रहे थे- संजू ठीक तो है? जीजी----। मिक्की कहीं लगी तो नहीं ---। नहीं ---आ-प? मुझे कुछ नहीं हुआ। उन्हें देख मेरी जान में जान  आई।
      हममें से किसी को अपनी चोटों की परवाह न थी । संजू तो मुश्किल से पाँचवी कक्षा में पड़ता था और सबसे ज्यादा चोट उसी को आई थी मगर आँखों में एक आँसू न था। न जाने कैसे हम इतने सहनशील बन गए थे या एक दूसरे की हिम्मत बांधने के लिए कोई ऐसे शब्द नहीं बोलना चाहता था जो दूसरे को कमजोर  बनाए। अचानक मुझे अहसास हुआ मैं बड़ी बहन हूँ जिसे  निश्चित करना है कि आगे क्या किया जाय!
       हम जहां खड़े हुए थे वह दुर्घटना का अंतिम छोर था।  वहाँ से चलने से पहले भारी भरकम इंजन पर एक भरपूर नजर डाली जो राक्षस की तरह कहता नजर आया बच्चू बच गए।
इतने मेँ रिक्शा वाला आया-“बहन जी,आप सब ठीक तो हो?”
     “हाँ भैया। तुमने मुझे बचा लिया।’’
    “मैंने पहले ही देख लिया था कि गलती से गेटकीपर ने रेलवे क्रासिंग का गेट खोल दिया है । आती हुई ट्रेन पूरी रफ्तार पर थी। झट से रिक्शा से कूद गया। जो खून खराबा होना था वह तो पहले ही हो गया ।’’
      “तुम्हारी रिक्शा कहाँ है?”
     “रिक्शा की कुछ न पूछो।वह तो एक धक्का में ही टुकड़ा-टुकड़ा हो गई। आप पटरियों के बीच गिरी और  इंजन ठीक आपके पास आकर रुक गया। आपमें और पहियों मेँ केवल एक फुट की दूरी ऊपर वाले ने  बचा लिया। । मैं ही तो आपको पटरियों से बाहर निकालने की कोशिश कर रहा था। छोटे भाई जी गिरे पड़े थे उनकू मैंने खड़ा कर दिया।’’
      “मैं तो हेंडिल पर बैठा बैठा न जाने कितनी दूर तक फिसलता चला गया।पर देखो मेरे कोई चोट भी नहीं आई।’’ मिक्की  हाथ घुमा घुमाकर दिखने लगा। इस चमत्कार पर वह खुद ही हैरत में था।
      मैं कान से सुन रही थी पर आँखें कान से ज्यादा खुली थीं। एक तरफ पड़ी अपनी कुचली चप्पलों को मैंने पैरों मेँ फंसाया। एक हाथ से संजू को पकड़ा और दूसरे हाथ से  मिक्की का हाथ थामा। लोग हमारे पास भी आने लगे थे। तमाशाई बनने से पहले मैंने वहाँ से खिसक जाना ठीक समझा। दो रिक्शावालों ने हमें बैठाने से मना कर दिया । शायद इस डर से कि कहीं पुलिस की पूंछताछ के चक्कर में न पड़ जाएँ। मैं भाइयों को खींचती हुई रेलवे क्रॉसिंग से बाहर आ गई। लगा जंग के मैदान से सही सलामत हम निकल आए हैं। सड़क पर एक रिक्शा मिल गया। बूढ़ा चालक बड़ा भला मानस था। वह समझ गया हम रेल दुर्घटना के शिकार है। उसने संजू  को सहारा देते हुए रिक्शा में बैठाया। बड़ी आत्मीयता से पूछा –लल्ली कहाँ चलना है?
उसके मीठे बोलों में अपनेपन की बू पाकर मन में आया उसके सामने फूटफूटकर रो पड़ूँ—पर मेरे फूट पड़ने का भाई भी रोये बिना न रहते।उनको रोता मैं नहीं देख सकती थी इसलिए अपने पर काबू किए रही।
     रिक्शावाले ने पूछा –‘कहाँ जाना है?”
     “जाना तो गंभीरपुरा है पर उससे पहले किसी डॉक्टर के दवाईखाने पर ले चलो। जरा भाई के पट्टी करवा लूँ। देखो न ---इसके खून निकल रहा है।’’मैंने गिड़गिड़ाते हुए कहा।
      अंजान डॉक्टर के पास जाना नहीं चाहती थी। न जाने क्या उल्टा-पुलता कर दे। ताऊ जी से भी नहीं पूछना चाहती थी । वे बहुत परेशान हो जाते। इतना तो मैं समझ गई थी कि चोट गंभीर नहीं है। इसलिए अपने ही दिमाग की मशीन में तेल डाल उसे चालू रखना चाहा। हठात उन डॉक्टर का नाम याद आते ही उछल पड़ी जो हॉस्टल में हमको देखने आया करते थे। मगर एक अड़चन फिर रास्ता रोक खड़ी हो गई। नाम पता होने से क्या होता है – उनके क्लीनिक का तो अता-पता ही नहीं मालूम था। तब भी मैंने धैर्य नहीं खोया। पूछते-पाछते हम आखिर उनके क्लीनिक पहुँच ही गए।
      मुझे देखते ही वे चौंक पड़े। घुसते ही मैं बदहवास सी बोलने लगी-“डॉक्टर साहब आप संजू को तो दवा लगाकर पट्टी बांध दीजिए । मेरी और मिक्की की चोटों पर पट्टी मत बांधिएगा। उन्हें देख ताऊ जी घबरा जाएंगे और हमें पाँच बजे अनूपशहर नहीं जाने देंगे। वे नाहक परेशान होंगे। पिताजी तो खुद डॉक्टर हैं और उनके दोस्त भी। वे सब सँभाल लेंगे।’’ मैं एक सांस मेँ सब कह गई जो मुझे कहना था।
      एक मिनट को तो डॉक्टर साहब मेरे मुंह की ओर ताकते रहे। वे भी सोचते होंगे यह तूफान कहाँ से आ गया। फिर हँसते हुए बोले-“बिटिया एक मिनट बैठो तो। लो पहले तुम सब पानी पीओ। तुमको मैंने----कहीं देखा है!”
     “हाँ हाँ डॉक्टर साहब, मैं टीका राम गर्ल्स हॉस्टल मेँ रहती हूँ।आप वहाँ हर माह आते हैं न।’’
      “ओह!अब याद आया। तुम चिंता न करो । मैं चुटकी मेँ मरहम पट्टी करता हूँ।’’ उन्होने संजू  का घाव साफ कर दवापट्टी की। मिक्की के टिंचर लगा दिया क्योंकि उसके खरोंचें ही आई थीं ।
मेरी बारी आई तो बोले –“पट्टी तो तुम बंधवाओगी नहीं जबकि दोनों कोहनी मेँ घाव हैं। जो दवा लगाऊँगा उससे बहुत दर्द होगा।’’
     “कोई बात नहीं। मैं सब सह लूँगी।’’
      उन्होंने भूरे से पाउडर मेँ ट्यूब से कोई मरहम मिलाया और उसे लगाने लगे।इतनी जलन  और दर्द हुआ कि मैंने कसकर दाँत भींच लिए। आश्चर्य जरा भी न कराही।फीस देने लगी तो उन्होंने इंकार कर दिया और मेरे सिर पर स्नेह सिक्त हाथ रखते हुए बोले- “बहुत बहादुर बेटी है।’’  
      मुसीबत का बहुत बड़ा जंगल पार कर लिया था । खुशी से जल्दी जल्दी कदम बढ़ते हुए धम से रिक्शा में बैठ गई।
      रिक्शा से ताऊजी के घर पर उतरे। ताई ने दरवाजा खोला । विस्मय से ताई का मुंह खुला का खुला रह गया-“अरे  संजू को क्या हुआ?यहाँ से तो भला-चंगा गया था।’’
      “कुछ नहीं बस गिर पड़ा था। दवा लगवा दी है।’’ मैं सकपकाती बोली।
      इतने में ताऊ जी के लड़के पंकज  कॉलेज से आए। बड़े उत्तेजित दीख रहे थे। साइकिल रखते हुए वे कहने लगे- पिताजी---पिताजी  रेलवे क्रॉसिंग पर बड़ा भारी एक्सीडेंट हो गया है। भीड़ ही भीड़ जमा है। ट्रेन आ रही थी कि गलती से गेट खोल दिया। सबसे पहले कार चपेट मेँ आई फिर तांगे वाला का घोड़ा ही कट गया।, सुना हैं एक रिक्शा से भी टक्कर हुई। मुझे लगा-मानो रेडियो से कोई ताजी और अनहोनी खबर सुनाई जा रही हो।
      मुझसे  सत्य छिपाना भारी हो गया और बोल उठी – “हाँ,उसमें हम तीनों थे।’’
     “तुम तीनों!”एक पल को चेहरों पर मुर्दनी छा गई।
     “चोट तो नहीं लगीं।’’ ताऊ जी बोले।
      “नहीं-- नहीं।  ऐसी कोई बात नहीं। हम ठीक हैं। संजू के जरूर सिर मेँ पीछे की तरफ चोट आई। खून निकल रहा था। सो मैंने रास्ते मेँ हॉस्टल के डॉक्टर से पट्टी करा दी।’’ मैंने जबर्दस्ती बेफिक्री के अंदाज में कहा। अंदर ही अंदर दिल धड़ धड़ कर रहा था—कहीं ताऊ जी ने रोक लिया तो --?थोड़ी सी समझ थी कि चोटें तुरंत दर्द नहीं करती पर बाद में असर दिखाती हैं। इसलिए जल्दी से जल्दी अपने डॉक्टर पिताजी के पास पहुँच जाना चाहती थी।
     “पाँच बजे की बस से तुम अनूपशहर जाने को बैठे हो। जा सकोगे?” ताऊ जी के माथे पर चिंता की रेखाएँ उभर आईं।
      “हाँ-हाँ। हम चले जाएंगे। ’’ भाइयो की ओर देखते हुए बोली। जिससे  वे मेरा इशारा समझ जाएँ और मेरी हाँ में हाँ मिला दें।
      “कहो तो पंकज को तुम्हारे साथ भेज दूँ ?”
      “नहीं ताऊ जी। यहाँ बैठकर सीधे अनूपशहर बस अड्डे ही तो उतरेंगे।’’ उनको तसल्ली देने की कोशिश की।
      पंकज भाई बस अड्डे हमें छोड़ने गए। बस मेँ चढ़ने से पहले एक बार फिर उन्होंने पूछा –“तुम लोग जा पाओगे वरना लौट चलो।’’ उत्तर में हँसते हुए मैंने ‘न’ में गर्दन हिला दी। मैं किसी तरह कमजोर नहीं पड़ना चाहती थी।
      हमें आगे की सीट मिल गई । आराम से बैठ गए। पर मेरे मन को चैन कहाँ?जल्दी से उड़कर अम्मा-पिताजी में की छत्रछाया में पहुँच जाना चाहती थी । संजू और मिक्की चुप से हो गए थे।न कोई बात करते थे न ही पूछते थे। दो छोटे भाइयों की ज़िम्मेदारी,उनकी सुरक्षा का भार मुझ पर है-इस अहसास ने चंद घंटों में मुझे उम्र से बहुत बड़ा बना दिया था।   
      बस चल दी । हम एक ही सीट पर तीनों बैठे थे। मैं बीच में थी और दोनों के हाथ कसकर पकड़ रखे थे।  4-5 किलो मीटर चलने के बाद हठात बस का एक  पहिया पंचर  हो गया। पीछे से आवाज आई ड्राइवर साहब सँभलकर ,सवारी भारी है। पीछे मुड़कर देखा ,हॉकी लिए तीन लड़के बैठे हैं। समझते देर न लगी ये धर्मसमाज या बारह सैनी कालिज के लड़के हैं। मैंने चुप ही रहना ठीक समझा। रेल दुर्घटना की खबर अब तक पूरे शहर में बिजली की तरह फैल चुकी थी। इन लड़कों को भी भनक मिल गई होगी। बस में भी दुर्घटना की चर्चा खूब गरम थी पर हम इस तरह बैठे हुए थे मानो एकदम अंजान हों। वरना प्रश्नों की बौछार शुरू हो जाती।
      अनूपशहर बस अड्डे पर पहुँचते ही रिक्शा ली। रिक्शावाला रिक्शा ठीक ही चला रहा था पर लग रहा था उसकी गति तो चींटी की सी है। दरवाजे में घुसते ही मैं ज़ोर से चिल्लाई पिताजी ---पिताजी---। पिताजी घबराते हुए ऊपर की मंजिल से नीचे उतरकर आए। संजू के पट्टी बंधे देख चौंक भी गए।बड़े यत्न से संभाली सुबकियाँ उन्हें देखते ही बिखर पड़ीं और मैं उनसे चिपट गई।  धैर्य और साहस का थामा हुआ दामन  आंसुओं में भीग गया। मुझे रोता देख संजू और मिक्की  की भी हिचकियाँ बंध गई।
      ताई के आते ही मिक्की उनकी छाया में जाकर खड़ा हो गया। संजू अम्मा के आँचल में छिप गया।
      “अरे बेटा क्या हुआ? तीनों रोते ही रहोगे या कुछ बोलोगे भी।’’ अम्मा बोलीं।
      “चाची, एक्सीडेंट हो गया।’’ मिक्की ने बड़ी देर बाद अपना मौन तोड़ा। अपनी सुरक्षा के प्रति अब वह आश्वस्त था। पर ताई,अम्मा बेचैन हो उठीं।
      पिता जी ने बात सँभाली-“अरे पहले इनके लिए ठंडी कोकोकोला मँगवाओ। शांति से बातें करेंगे। मैं डॉक्टर साहब को बुलाने किसी को भेजता हूँ।’’ 
      जब तक डॉक्टर साहब आए हमने घरवालों को अपनी रामकहानी सुना दी थी। डाक्टर साहब ने हमारे हाथ-पाँव हिलाकर जांच--पडताल की। बोले सब ठीक है। बच्चों को आराम करने दो। हाँ जाते-जाते एक एक इंजेक्शन जरूर ठोक गए।

      माँ-बाप के पास जाकर लगा जैसे मैं बहुत हल्की हो गई । दूसरे दिन से ही हम लोगों का सारा शरीर बहुत दुखने लगा।दिन में एक ही कमरे में चारपाई बिछा दी जाती। दो-तीन दिन तो करवट लेते भी कराहने लगते -- कभी एक दूसरे की तरफ देखकर हंसते पर दुर्घटना की चर्चा हमने एकदम नहीं की। एक बुरे स्वप्न की तरह भुलाने की कोशिश करते रहे। पर अतीत की काली परछाईं से कभी कोई बचा है। वर्षों पहले घटित इस दुर्घटना की याद अब भी मेरी रूह को कंपा देती है पर एक सच मेरी झोली में आकर जरूर गिरा कि जिस पर ईश्वर का हाथ होता है उसका बाल-बांका नहीं हो सकता।   रेल दुर्घटना
जाको राखे साइयाँ मार सके न कोय /सुधा भार्गव
      बात उन दिनों की है जब मैं हॉस्टल में रहकर अलीगढ़ टीकाराम गर्ल्स कालिज में पढ़ती थी। बी॰ए॰ प्रथम वर्ष की परीक्षाएँ समाप्त हो गई थी। मुझे पिता जी ने अनूपशहर(जिला बुलंदशहर) से चचेरे भाई मिक्की को लेने भेज दिया था। उसके साथ मेरा छोटा भाई संजू भी था।दोनों ताऊ जी के ठहरे हुए थे। ताऊजी गंभीरपुरा में रहते थे और धर्मसमाज कॉलेज के वाइस प्रिन्सिपल थे।एक दिन पहले ही अनूपशहर ले जाने वाली अटैची उनके यहाँ रख आई थी। 
      जिस दिन टीका राम गर्ल्स कॉलेज बंद हुआ, उसके दूसरे दिन ही 11 बजे के करीब संजू और और मिक्की  हॉस्टल आन पहुंचे । उसी दिन मैं अनूपशहर जाना चाहती थी-माँ की बहुत याद आ रही थी। स्कूल के गेट से निकलते ही मन में विचार आया कि जाने से पहले अपनी आँखें टैस्ट करा लूँ। काफी दिनों से आंखों में दर्द हो रहा था मगर परीक्षा के कारण टालती आ रही थे। समय बहुत कम था। सो रिक्शा वाले को उल्टे हाथ की बजाय सीधे हाथ की ओर चलने का इशारा किया। डाक्टर मोहनलाल नेत्रालय अस्पताल पर रिक्शा रुकाई। परीक्षण करने के लिए नंबर लिया। वहाँ एक घंटा तो लग ही गया क्योंकि तीन बार तो एट्रोपीन ही डाली होगी।उसके असर से साफ दिखाई नहीं दे रहा था। आँखें मिचमिचाती हुई वहाँ से चल दी।
      विष्णुपुरी के आगे से जब हम निकले सीटी देती  हुई ट्रेन की  आवाज साफ सुनाई दी। समझ गए धड़ -धड़ करती ट्रेन आने वाली है और रेलवे क्रॉसिंग का गेट जरुर बंद मिलेगा। न जाने कितनी देर ट्रेन के गुजर जाने का इंतजार करना पड़े । पर आश्चर्य तभी मैंने रेलवे क्रॉसिंग पर मेनुएल गेट का पड़ा लंबा मोटा सा डंडा ऊपर उठते देखा।  दोनों ओर का रुका ट्रैफिक आधाधुंध चल दिया । उसके बाद क्या हुआ मुझे कुछ नहीं मालूम। मुझे जब होश आया मैंने अपने को अंधेरी सी गुफा में पाया। हाथों से दायें बाएँ, ऊपर-नीचे   टटोलकर देखा । दोनों तरफ रेल की पटरियों का आभास हुआ। हाथों को  ऊपर किया तो लोहे के पतले पतले सींखचों से उँगलियाँ टकराईं। मेरा दिमाग बड़ी तेजी से काम करने लगा-
-अरे मैं तो रिक्शा में बैठी थी ,जरूर उसके  पलटने के कारण  रेल की पटरियों के बीच गिर गई हूँ और रेल मेरे ऊपर से जा रही है। अगर मैं धोबिन की तरह पैर फैलाकर पटरियों के बीच में हो जाऊं तो ट्रेन मेरे ऊपर से चली जाएगी और मैं बच जाऊँगी।मुझमें अनंत साहस का संचार होने लगा।
       कुछ दिन पहले सुना था कि हमारी धोबिन रेल की पटरियों को पार कर अपनी बस्ती जा रही थी कि उसकी धोती पटरियों में उलझ गई । दूर से  आती ट्रेन को  देख हड़बड़ा उठी और जल्दी से पटरियों के बीच में लेट गई। ट्रेन उसके ऊपर से निकाल गई और उसका बाल बांका भी नहीं हुआ। 
      मैं जब पटरियों के बीच में होने की कोशिश कर रही थी तो लगा कोई मुझे बाहर की तरफ खींच रहा है। वह जितना खींचता उतना ही मैं अंदर हो जाती तभी कानों में आवाज आई-एक्सीडेंट एक्सीडेंट ,पटरी  से  बाहर आओ। मैं सरक कर बीच से किनारे के पास आ गई । जैसे ही उसने इस बार मुझे निकालने को ज़ोर लगाया मैं खिंची चली आई।बाहर आते ही निगाहें भाइयों को खोजने लगीं।
       सामने ही पटरियों से बाहर ईंटों की कंकरीट पर संजू को पीठ किए खड़ा  पाया। पीछे सिर से उसके खून निकल रहा था।वह मेरे घुटनों पर बैठा हुआ था। उछलकर शायद सिर के बल कंकरीट पर जा गिरा होगा। उल्टे हाथ की ओर देखा तो मिक्की  धीरे -धीरे आ रहा था। दहशत की परछाईं साफ उसके चेहरे पर झलक रही थी। हम तीनों चिपट कर ऐसे गुंथ गए कि दुनिया की कोई शक्ति हमें अलग न कर सके। शब्द प्रस्फुटित हो रहे थे- संजू ठीक तो है? जीजी----। मिक्की कहीं लगी तो नहीं ---। नहीं ---आ-प? मुझे कुछ नहीं हुआ। उन्हें देख मेरी जान में जान  आई।
      हममें से किसी को अपनी चोटों की परवाह न थी । संजू तो मुश्किल से पाँचवी कक्षा में पड़ता था और सबसे ज्यादा चोट उसी को आई थी मगर आँखों में एक आँसू न था। न जाने कैसे हम इतने सहनशील बन गए थे या एक दूसरे की हिम्मत बांधने के लिए कोई ऐसे शब्द नहीं बोलना चाहता था जो दूसरे को कमजोर  बनाए। अचानक मुझे अहसास हुआ मैं बड़ी बहन हूँ जिसे  निश्चित करना है कि आगे क्या किया जाय!
       हम जहां खड़े हुए थे वह दुर्घटना का अंतिम छोर था।  वहाँ से चलने से पहले भारी भरकम इंजन पर एक भरपूर नजर डाली जो राक्षस की तरह कहता नजर आया बच्चू बच गए।
इतने मेँ रिक्शा वाला आया-“बहन जी,आप सब ठीक तो हो?”
     “हाँ भैया। तुमने मुझे बचा लिया।’’
    “मैंने पहले ही देख लिया था कि गलती से गेटकीपर ने रेलवे क्रासिंग का गेट खोल दिया है । आती हुई ट्रेन पूरी रफ्तार पर थी। झट से रिक्शा से कूद गया। जो खून खराबा होना था वह तो पहले ही हो गया ।’’
      “तुम्हारी रिक्शा कहाँ है?”
     “रिक्शा की कुछ न पूछो।वह तो एक धक्का में ही टुकड़ा-टुकड़ा हो गई। आप पटरियों के बीच गिरी और  इंजन ठीक आपके पास आकर रुक गया। आपमें और पहियों मेँ केवल एक फुट की दूरी ऊपर वाले ने  बचा लिया। । मैं ही तो आपको पटरियों से बाहर निकालने की कोशिश कर रहा था। छोटे भाई जी गिरे पड़े थे उनकू मैंने खड़ा कर दिया।’’
      “मैं तो हेंडिल पर बैठा बैठा न जाने कितनी दूर तक फिसलता चला गया।पर देखो मेरे कोई चोट भी नहीं आई।’’ मिक्की  हाथ घुमा घुमाकर दिखने लगा। इस चमत्कार पर वह खुद ही हैरत में था।
      मैं कान से सुन रही थी पर आँखें कान से ज्यादा खुली थीं। एक तरफ पड़ी अपनी कुचली चप्पलों को मैंने पैरों मेँ फंसाया। एक हाथ से संजू को पकड़ा और दूसरे हाथ से  मिक्की का हाथ थामा। लोग हमारे पास भी आने लगे थे। तमाशाई बनने से पहले मैंने वहाँ से खिसक जाना ठीक समझा। दो रिक्शावालों ने हमें बैठाने से मना कर दिया । शायद इस डर से कि कहीं पुलिस की पूंछताछ के चक्कर में न पड़ जाएँ। मैं भाइयों को खींचती हुई रेलवे क्रॉसिंग से बाहर आ गई। लगा जंग के मैदान से सही सलामत हम निकल आए हैं। सड़क पर एक रिक्शा मिल गया। बूढ़ा चालक बड़ा भला मानस था। वह समझ गया हम रेल दुर्घटना के शिकार है। उसने संजू  को सहारा देते हुए रिक्शा में बैठाया। बड़ी आत्मीयता से पूछा –लल्ली कहाँ चलना है?
उसके मीठे बोलों में अपनेपन की बू पाकर मन में आया उसके सामने फूटफूटकर रो पड़ूँ—पर मेरे फूट पड़ने का भाई भी रोये बिना न रहते।उनको रोता मैं नहीं देख सकती थी इसलिए अपने पर काबू किए रही।
     रिक्शावाले ने पूछा –‘कहाँ जाना है?”
     “जाना तो गंभीरपुरा है पर उससे पहले किसी डॉक्टर के दवाईखाने पर ले चलो। जरा भाई के पट्टी करवा लूँ। देखो न ---इसके खून निकल रहा है।’’मैंने गिड़गिड़ाते हुए कहा।
      अंजान डॉक्टर के पास जाना नहीं चाहती थी। न जाने क्या उल्टा-पुलता कर दे। ताऊ जी से भी नहीं पूछना चाहती थी । वे बहुत परेशान हो जाते। इतना तो मैं समझ गई थी कि चोट गंभीर नहीं है। इसलिए अपने ही दिमाग की मशीन में तेल डाल उसे चालू रखना चाहा। हठात उन डॉक्टर का नाम याद आते ही उछल पड़ी जो हॉस्टल में हमको देखने आया करते थे। मगर एक अड़चन फिर रास्ता रोक खड़ी हो गई। नाम पता होने से क्या होता है – उनके क्लीनिक का तो अता-पता ही नहीं मालूम था। तब भी मैंने धैर्य नहीं खोया। पूछते-पाछते हम आखिर उनके क्लीनिक पहुँच ही गए।
      मुझे देखते ही वे चौंक पड़े। घुसते ही मैं बदहवास सी बोलने लगी-“डॉक्टर साहब आप संजू को तो दवा लगाकर पट्टी बांध दीजिए । मेरी और मिक्की की चोटों पर पट्टी मत बांधिएगा। उन्हें देख ताऊ जी घबरा जाएंगे और हमें पाँच बजे अनूपशहर नहीं जाने देंगे। वे नाहक परेशान होंगे। पिताजी तो खुद डॉक्टर हैं और उनके दोस्त भी। वे सब सँभाल लेंगे।’’ मैं एक सांस मेँ सब कह गई जो मुझे कहना था।
      एक मिनट को तो डॉक्टर साहब मेरे मुंह की ओर ताकते रहे। वे भी सोचते होंगे यह तूफान कहाँ से आ गया। फिर हँसते हुए बोले-“बिटिया एक मिनट बैठो तो। लो पहले तुम सब पानी पीओ। तुमको मैंने----कहीं देखा है!”
     “हाँ हाँ डॉक्टर साहब, मैं टीका राम गर्ल्स हॉस्टल मेँ रहती हूँ।आप वहाँ हर माह आते हैं न।’’
      “ओह!अब याद आया। तुम चिंता न करो । मैं चुटकी मेँ मरहम पट्टी करता हूँ।’’ उन्होने संजू  का घाव साफ कर दवापट्टी की। मिक्की के टिंचर लगा दिया क्योंकि उसके खरोंचें ही आई थीं ।
मेरी बारी आई तो बोले –“पट्टी तो तुम बंधवाओगी नहीं जबकि दोनों कोहनी मेँ घाव हैं। जो दवा लगाऊँगा उससे बहुत दर्द होगा।’’
     “कोई बात नहीं। मैं सब सह लूँगी।’’
      उन्होंने भूरे से पाउडर मेँ ट्यूब से कोई मरहम मिलाया और उसे लगाने लगे।इतनी जलन  और दर्द हुआ कि मैंने कसकर दाँत भींच लिए। आश्चर्य जरा भी न कराही।फीस देने लगी तो उन्होंने इंकार कर दिया और मेरे सिर पर स्नेह सिक्त हाथ रखते हुए बोले- “बहुत बहादुर बेटी है।’’  
      मुसीबत का बहुत बड़ा जंगल पार कर लिया था । खुशी से जल्दी जल्दी कदम बढ़ते हुए धम से रिक्शा में बैठ गई।
      रिक्शा से ताऊजी के घर पर उतरे। ताई ने दरवाजा खोला । विस्मय से ताई का मुंह खुला का खुला रह गया-“अरे  संजू को क्या हुआ?यहाँ से तो भला-चंगा गया था।’’
      “कुछ नहीं बस गिर पड़ा था। दवा लगवा दी है।’’ मैं सकपकाती बोली।
      इतने में ताऊ जी के लड़के पंकज  कॉलेज से आए। बड़े उत्तेजित दीख रहे थे। साइकिल रखते हुए वे कहने लगे- पिताजी---पिताजी  रेलवे क्रॉसिंग पर बड़ा भारी एक्सीडेंट हो गया है। भीड़ ही भीड़ जमा है। ट्रेन आ रही थी कि गलती से गेट खोल दिया। सबसे पहले कार चपेट मेँ आई फिर तांगे वाला का घोड़ा ही कट गया।, सुना हैं एक रिक्शा से भी टक्कर हुई। मुझे लगा-मानो रेडियो से कोई ताजी और अनहोनी खबर सुनाई जा रही हो।
      मुझसे  सत्य छिपाना भारी हो गया और बोल उठी – “हाँ,उसमें हम तीनों थे।’’
     “तुम तीनों!”एक पल को चेहरों पर मुर्दनी छा गई।
     “चोट तो नहीं लगीं।’’ ताऊ जी बोले।
      “नहीं-- नहीं।  ऐसी कोई बात नहीं। हम ठीक हैं। संजू के जरूर सिर मेँ पीछे की तरफ चोट आई। खून निकल रहा था। सो मैंने रास्ते मेँ हॉस्टल के डॉक्टर से पट्टी करा दी।’’ मैंने जबर्दस्ती बेफिक्री के अंदाज में कहा। अंदर ही अंदर दिल धड़ धड़ कर रहा था—कहीं ताऊ जी ने रोक लिया तो --?थोड़ी सी समझ थी कि चोटें तुरंत दर्द नहीं करती पर बाद में असर दिखाती हैं। इसलिए जल्दी से जल्दी अपने डॉक्टर पिताजी के पास पहुँच जाना चाहती थी।
     “पाँच बजे की बस से तुम अनूपशहर जाने को बैठे हो। जा सकोगे?” ताऊ जी के माथे पर चिंता की रेखाएँ उभर आईं।
      “हाँ-हाँ। हम चले जाएंगे। ’’ भाइयो की ओर देखते हुए बोली। जिससे  वे मेरा इशारा समझ जाएँ और मेरी हाँ में हाँ मिला दें।
      “कहो तो पंकज को तुम्हारे साथ भेज दूँ ?”
      “नहीं ताऊ जी। यहाँ बैठकर सीधे अनूपशहर बस अड्डे ही तो उतरेंगे।’’ उनको तसल्ली देने की कोशिश की।
      पंकज भाई बस अड्डे हमें छोड़ने गए। बस मेँ चढ़ने से पहले एक बार फिर उन्होंने पूछा –“तुम लोग जा पाओगे वरना लौट चलो।’’ उत्तर में हँसते हुए मैंने ‘न’ में गर्दन हिला दी। मैं किसी तरह कमजोर नहीं पड़ना चाहती थी।
      हमें आगे की सीट मिल गई । आराम से बैठ गए। पर मेरे मन को चैन कहाँ?जल्दी से उड़कर अम्मा-पिताजी में की छत्रछाया में पहुँच जाना चाहती थी । संजू और मिक्की चुप से हो गए थे।न कोई बात करते थे न ही पूछते थे। दो छोटे भाइयों की ज़िम्मेदारी,उनकी सुरक्षा का भार मुझ पर है-इस अहसास ने चंद घंटों में मुझे उम्र से बहुत बड़ा बना दिया था।   
      बस चल दी । हम एक ही सीट पर तीनों बैठे थे। मैं बीच में थी और दोनों के हाथ कसकर पकड़ रखे थे।  4-5 किलो मीटर चलने के बाद हठात बस का एक  पहिया पंचर  हो गया। पीछे से आवाज आई ड्राइवर साहब सँभलकर ,सवारी भारी है। पीछे मुड़कर देखा ,हॉकी लिए तीन लड़के बैठे हैं। समझते देर न लगी ये धर्मसमाज या बारह सैनी कालिज के लड़के हैं। मैंने चुप ही रहना ठीक समझा। रेल दुर्घटना की खबर अब तक पूरे शहर में बिजली की तरह फैल चुकी थी। इन लड़कों को भी भनक मिल गई होगी। बस में भी दुर्घटना की चर्चा खूब गरम थी पर हम इस तरह बैठे हुए थे मानो एकदम अंजान हों। वरना प्रश्नों की बौछार शुरू हो जाती।
      अनूपशहर बस अड्डे पर पहुँचते ही रिक्शा ली। रिक्शावाला रिक्शा ठीक ही चला रहा था पर लग रहा था उसकी गति तो चींटी की सी है। दरवाजे में घुसते ही मैं ज़ोर से चिल्लाई पिताजी ---पिताजी---। पिताजी घबराते हुए ऊपर की मंजिल से नीचे उतरकर आए। संजू के पट्टी बंधे देख चौंक भी गए।बड़े यत्न से संभाली सुबकियाँ उन्हें देखते ही बिखर पड़ीं और मैं उनसे चिपट गई।  धैर्य और साहस का थामा हुआ दामन  आंसुओं में भीग गया। मुझे रोता देख संजू और मिक्की  की भी हिचकियाँ बंध गई।
      ताई के आते ही मिक्की उनकी छाया में जाकर खड़ा हो गया। संजू अम्मा के आँचल में छिप गया।
      “अरे बेटा क्या हुआ? तीनों रोते ही रहोगे या कुछ बोलोगे भी।’’ अम्मा बोलीं।
      “चाची, एक्सीडेंट हो गया।’’ मिक्की ने बड़ी देर बाद अपना मौन तोड़ा। अपनी सुरक्षा के प्रति अब वह आश्वस्त था। पर ताई,अम्मा बेचैन हो उठीं।
      पिता जी ने बात सँभाली-“अरे पहले इनके लिए ठंडी कोकोकोला मँगवाओ। शांति से बातें करेंगे। मैं डॉक्टर साहब को बुलाने किसी को भेजता हूँ।’’ 
      जब तक डॉक्टर साहब आए हमने घरवालों को अपनी रामकहानी सुना दी थी। डाक्टर साहब ने हमारे हाथ-पाँव हिलाकर जांच--पडताल की। बोले सब ठीक है। बच्चों को आराम करने दो। हाँ जाते-जाते एक एक इंजेक्शन जरूर ठोक गए।
      माँ-बाप के पास जाकर लगा जैसे मैं बहुत हल्की हो गई । दूसरे दिन से ही हम लोगों का सारा शरीर बहुत दुखने लगा।दिन में एक ही कमरे में चारपाई बिछा दी जाती। दो-तीन दिन तो करवट लेते भी कराहने लगते -- कभी एक दूसरे की तरफ देखकर हंसते पर दुर्घटना की चर्चा हमने एकदम नहीं की। एक बुरे स्वप्न की तरह भुलाने की कोशिश करते रहे। पर अतीत की काली परछाईं से कभी कोई बचा है। वर्षों पहले घटित इस दुर्घटना की याद अब भी मेरी रूह को कंपा देती है पर एक सच मेरी झोली में आकर जरूर गिरा कि जिस पर ईश्वर का हाथ होता है उसका बाल-बांका नहीं हो सकता। 
समाप्त  

सोमवार, 20 अगस्त 2018

॥1॥ आश्चर्य पर आश्चर्य




प्रकाशित
साहित्य सुधा -साहित्यकारों की वेब पत्रिका 
अंक अगस्त -2018 

http://www.sahityasudha.com/articles_aug_2nd_2018/sansamaran/sudha_bhargava/ashcharya.html.pdf

स्मृतियों की संदूकची


आश्चर्य पर आश्चर्य 

सुधा भार्गव

14मई ,2017

     मेरे छोटे बेटे को आश्चर्य पर आश्चर्य देने की आदत है। उसकी पत्नी भी उसका खूब साथ देती है। अचानक झोली में आन पड़ी खुशियों का भार सँभालना कभी कभी मुश्किल भी हो जाता है। पर इतना अवश्य है कि एक अरसे तक आश्चर्य के सम्मोहन से रोम -रोम पुलकायमान रहता है।  
मुझे अच्छी तरह याद हैं बेटे की शादी के बाद हम पति- पत्नी  पहली बार उससे मिलने अमेरिका गए थे। एक दिन रात को भोजन करने के बाद वह बोला-“पापा मैं अभी आता हूँ।’’वह और बहू खुसर-पुसुर करते गायब हो गए। हम सोचते ही रहे—इतनी रात गए  अचानक कहाँ जाना पड़ गया! ऑफिस से आने के बाद तो वह हमारे बिना कहीं जाता ही नहीं है ।
करीब एक घंटे के बाद दोनों लौट कर आए। चेहरे पर हर्ष की लहरें तरंगित हो रही थीं । एकाएक इतना उल्लास!  
     बेटा खनकती आवाज में बोला-“पापा,खिड़की से जरा बाहर झांक कर तो देखो।”
     “दरवाजे पर तो कार खड़ी सी लगती है।कोई आया है क्या?
     “यह मैंने आपके लिए खरीदी है। कल से खूब घूमेंगे।“
     “अरे वाह! तूने कार खरीद ली।”  वे बच्चे की तरह चहक पड़े और बेटे को गले लगा लिया ।
     कुछ वर्षों के बाद वह पूना आ गया। उन दिनों हम दिल्ली रहते थे। सर्दी के दिन थे इसलिए जल्दी खा-पीकर लिहाफ में दुबक जाते।रूम हीटर और साथ में टी॰ वी। दोनों चालू कर देते। उस रात भी टी॰ वी॰ बंद कर सोने का उपक्रम कर ही रहे थे कि दरवाजे की घंटी बज उठी ।हम दोनों ही एक बारगी तो बुरी तरह चौंक पड़े, फिर मैं बोली-“सो जाओ—सो जाओ। रात के बारह बजे हमसे मिलने कौन आयेगा?किसी ने गलती से बजा दी है।” 
एक मिनट बाद फिर घंटी बोल पड़ी। साथ ही मेरा मोबाइल भी घरघरा उठा –हेलो माँ! कैसी हो?
     “कौन,मन्नू! इतनी रात गए तेरा फोन! सब ठीक तो है। मैं अनहोनी की  आशंका से ग्रसित हो उठी।
    “हाँ माँ।’’
    “जरा मन्नू  से बात करो जी ,मैं जाकर दरवाजे पर देखती हूँ –।’’ मैं फुर्ती से कमरे से बाहर हो गई।
    ये ज़ोर से बोले –“दरवाजा न खोलना।’’
    मैं सांस रोके दरवाजे के पास खड़ी थाह लेने लगी, “कौन हो सकता है? निश्चय ही दरवाजे से बाहर कोई खड़ा है।”
    तभी दरवाजा किसी ने ज़ोर से थपथपाया। मैंने कड़ककर पूछा–“कौन है?”
    धीमी रेशम सी आवाज आई –“माँ मैं हूँ।”
    “तू मन्नू !अभी तो पूना से तेरा फोन आया था। यहाँ कैसे हो सकता है?”
    “माँ मैंने यहीं से फोन किया था। दरवाजा खोलो।”
    पीछे से दहशत भरा स्वर गूँजा ---दरवाजा न खोलो। मुझे रोकने को मेरे पति  छटपटाते मेरी  तरफ दौड़े दौड़े आए। तब तक मैं दरवाजा खोल चुकी थी। मन्नू अंदर आते ही बोला- “पापा हैपी बर्थ डे।” एक मिनट को उन्हें अपनी आँखों पर विश्वास न हुआ पर दूसरे पल ही वास्तविकता का भान हुआ तो गदगद हो बेटे को अपनी बाहों के घेरे में ले लिया।
    “बेटा आने की खबर भी न की।” प्यार भरा लहजा शिकायत से भरपूर था ।
    “ओह प्यारे पापा, आपके जन्मदिन पर अचानक आकर दोनों को चकित कर देना चाहता था।”
    “इतना बड़ा हो गया पर तेरी सरप्राइज़ देने की आदत गई नहीं। अच्छा अचानक आना कैसे हुआ?
    “आपकी बर्थडे के लिए ही आया हूँ। पापा यह रहा आपका गिफ्ट।”
   “बेटा सबसे बड़ा गिफ्ट तो यही है कि तू हमसे मिलने आ गया।” बड़ी देर तक मैं उसके हाथ को ममता से सहलाती रही।
    हाँ अब तो वह दो बच्चों का बाप हो गया है। पर वक्त - बेवक्त दूसरों को हैरानी में डालना नहीं छोड़ा है। ऐसी प्लानिंग करता है कि किसी को कानों-कान खबर हो ही नहीं पाती।
     कल ही हम गोवा से लौटकर आए हैं। दो हफ्ते पहले वह बोला था – “माँ गोवा चलोगी?”
“हाँ हाँ क्यों नहीं। बाहर गए हुए भी बहुत दिन हो गए हैं।” मैंने साधारण तौर से कह दिया।
गोवा जाने के लिए 14 मई की हवाई जहाज की टिकटें उसने बुक करा दीं।
    उस दिन बड़े सवेरे बेटी का फोन आया–“माँ, हैपी मदर्स डे। सुनते ही दिमाग को जोरदार झटका लगा और वह बड़ी तेजी से काम करने लगा। अब समझ में आया बेटे ने गोआ जाने के लिए 14 तारीख ही क्यों चुनी। अधरों पर वात्सल्य में डूबी मुस्कराहट फैल गई।
    संयोग की बात, इस ट्रिप में तीन माँ साथ साथ थीं।मैं, मेरी पोतियों की माँ और मां की माँ –मतलब मेरी समधिन जी। गोवा ट्रिप की बजाय इसे मदर्स ट्रिप कहा जाय तो ठीक रहेगा।
अब मुझे अगले आश्चर्य का इंतजार है।बेटे का  हर सरप्राइज़ मेरी  उम्र बढ़ा देता है। ऐसा लगता है जैसे ईशवर ने मेरे कंधे पर अपनी उँगलियों की छाप छोड़ दी हो।

समाप्त  



रविवार, 25 फ़रवरी 2018

कनाडा डायरी की तेईसवीं कड़ी


अंक जनवरी 2018
http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/S/SudhaBhargava/23_anokhi_bachcha_party.

डायरी के पन्ने


सुधा भार्गव
    
30 5 2003
    
    समय के तो पंख लगे है। देखते ही देखते मेरी पोती  एक मास की हो गई। आज ही के दिन वह नटखट गुड़िया की तरह अपनी मम्मी को अस्पताल में सता रही थी।
    सुबह उठते ही उसका पापा बोला “माँ,आज कुछ मित्र अपने  छोटे बच्चों के साथ आएंगे।फिर मिलकर अवनि का जन्मदिन मनाएंगे।”
    “अरे जन्मदिन मनाने के तो बहुत दिन हैं। अभी तो एक माह की ही हुई है।”
    “हाँ तो एक माह वाला जन्मदिन ही तो मनाएंगे।”
    मैं तो हैरान सी उसकी ओर ताकने लगी।मेरे लिए तो यह अनोखी बात थी।
     मेरे मनोभावों को ताड़ते हुए बोला-“अवनि की एक एलबम तैयार करनी है। इसलिए उसकी तरह तरह की मतलब हँसते हुए,रोते हुए,मुंह बनाते हुए की फोटूएँ खींचनी हैं। । जिससे याद रहेगा एक माह की वह क्या -क्या गुल खिलाती थी। फिर अगले माह भी ऐसा ही करेंगे। इस तरह एक साल तक हर माह उसका जन्मदिन मनाएंगे। उसकी सारी गतिविधियां कैमरे में कैद कर लेंगे। एक साल के बाद जब अपनी फोटुयें देखेगी तो उसे बड़ा मजा आएगा।”
   “विचार तो बहुत अच्छा है। एक साल तक बच्चे का विकास बहुत तेजी से होता है। हमें भी उसके विभिन्न रूप देख आनंद आएगा। तरह तरह के मुंह बनाने में तो वह उस्ताद है। अच्छा एक काम कर।”
    “क्या माँ?
    “एक माह तक तो उसके मालिश नहीं हुई। सोच रही हूँ आज से उसके तेल मालिश शुरू कर दूँ। एक फोटो मालिश करते समय की ले लेना। बड़ी होकर अवनि को पता तो लगेगा कि मैंने उसके तेल लगाया था।”
    “हाँ—हाँ एक नहीं दस ले लूँगा।”
    ‘आज तो नहलाने के बाद उसे उसकी बुआ के कपड़े पहनाऊंगी।‘ यह सोचकर उठी और छटुलनी का पिटारा खोल बैठी। उसकी बुआ ने छ्टुलनी का सामान पैक करके मेरे साथ भेजा था। हमारे यहाँ यह रस्म हैं कि नवजात शिशु की बुआ उसकी जरूरत का सामान  सँजोकर भेजती हैं। उसी को छ्टुलनी कहते हैं। उसमें से चादर तकिये निकालकर उसका पालना पहली बार सुसज्जित किया। बहुत सुंदर लग रहा था उसका कमरा। मुझे लगा -रेशम के तारों से कढ़ी चादर में हँसते फूल उसका अभिनंदन करने में बाजी लगा रहे हैं कि देखें किसको वह प्रथम छूती है।
    बेटा तो ओफिस चला गया । शाम को ही पार्टी फार्टी होनी थी। मैंने महसूस किया कि अवनि के आने से मोह का धागा बड़ा मजबूत हो गया है। जितना  इसे समेटने की कोशिश करती हूँ  उतना ही फैलकर एक कसक पैदा करने से बाज नहीं आता –तू यहाँ से चली जाएगी तो पोती को बिना देखे कैसे रहेगी?मगर मैं मजबूर हूँ। बस एक गहरी सांस लेकर रह जाती हूँ।
    दोपहर को मोंटेसरी वार्षिकोत्सव में चली गई थी पर शाम होते होते लौट आई। उस समय तक आत्मीय मित्र अपने बच्चों के साथ आ गए थे। बच्चे बच्चों को देख बड़े खुश। उनके कारण अच्छी ख़ासी चहल-पहल थी ।  
    मेज पर चाकलेट की परतों से ढका सजा केक देखकर बाँछें खिल गईं। मेरी पोती तो अपनी मम्मी की गोद में समाई केक को एकटक देख रही थी। लगता था उसके मुंह में पानी आ रहा है।  बेटे ने अपनी बेटी के मन की शायद बात समझ ली।,इसीकरण उसने केक का छोटा सा टुकड़ा काट कर उसके होंठों से लगाया और बाद में खुद खा गया।
    रोना –मचलना,हँसना-मुसकराना सभी रंग फैले हुए थे। बड़े बच्चे अवनि को गोद में लेने को उत्सुक थे। कभी उसे छूकर देखते ।कभी मुट्ठी खोल नाजुक सी उँगलियों को अपने हाथ में लेते। वह इन्हें गुड़िया सी लग रही थी। एक तरह से यह बच्चा पार्टी थी।सबको ही चिंता थी-बच्चे भूखे न रह जाएँ। कैमरे भी बच्चों की भोली-भाली सूरत ही को अपने कलेजे से लगाना चाहते थे। पार्टी जल्दी ही खतम हो गई। क्योंकि बच्चों के सोने -सुलाने का समय हो गया था।
    चाँद और शीतल काफी थक गए हैं। एक बार मेरा मन हुआ कि कहूँ-रात में अवनि जागे तो मुझे दे जाना। अपनी बाहों का पालना बनाकर उसे झुलाती रहूँगी।इससे  तुम्हें 2-3 घंटे सोने का समय भी मिल जाएगा। इतना कहने की लेकिन हिम्मत न जुटा पाई।शायद बच्चों को रखने का मेरा तरीका 30 वर्ष पुराना हो। पालन पोषण का तरीका चाहे बदल गया हो परंतु वात्सल्यमयी गोद ,प्यार पूरित हृदय की परिभाषा में तो कोई परिवर्तन नहीं हुआ।

क्रमश :

रविवार, 22 अक्टूबर 2017

कनाडा डायरी की 22वीं कड़ी



डायरी के पन्ने         
        

सुधा भार्गव

साहित्यकुंज में प्रकाशित
10.12॰2017
http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/S/SudhaBhargava/22_King.htm/


25.5.2003
किंग 

     कनाडा पहुँचने से पहले ही बेटे ने एक किंग खरीदा था। था। देखने में बड़ा सुंदर और शक्तिशाली!। जैसा नाम वैसा ही काम---–इतना मजबूत कि 10 मोटे –ताजे  भी उस पर चढ़  जाएँ तो थकने का नाम नहीं। आप बड़े असमंजस में होंगे कि यह कैसा किंग है! चलिए राज की बात बता ही दूँ। असल में यह एक किंग साइज पलंग है। यह मुझे बेहद पसंद है। इसलिए नहीं कि उसका मूल्य  डेढ़ लाख है  बल्कि इसलिए कि मोटे मोटे डबल गद्दे वाले पलंग पर मेचिंग  तकिये,लिहाफ चादर –कुल मिलाकर राजसी छ्टा  बिखरी पड़ती है ।
     चाँद का  दोस्त तुषार भी पलंग की तलाश में था । खरीद्ने से पहले उसने इस किंग से मिलना ठीक समझा और एक दिन अपनी माँ के साथ हमारे घर आन पहुंचा । वे तो उस भव्य पलंग की शान देख निहाल हो गईं और बोली-बेटा, तू तो आँख मींचकर ऐसा ही पलंग खरीद ले । कम से कम आखिरी दिनों में तो मेरे दिल की एकमात्र इच्छा पूरी हो जाए।
     “माँ इतना उतावलापन ठीक नहीं । मुझे सोचने –समझने का मौका तो दो।”
    “अरे क्या सोचना ?तेरे डैडी ने तो कभी मेरी  इच्छा के बारे में सोचा ही नहीं और तू, तू भी बस सोचता ही रह जाएगा।”
    तुषार से कुछ कहते नहीं बन रहा था। ऐसी नाजुक स्थिति से उसे बचाने के लिए मैं उसकी माँ को लेकर डाइनिंग रूम में ले गई।एकांत पाकर वे तो पूरी तरह बिखर ही पड़ीं। ऐसा लगा बहुत दिनों का दबा लावा फूटकर बाहर आना चाहता है।
   “बहन जी,रिटायरमेंट के बाद इन्होंने नया घर खरीदा और मेरी  दिली इच्छा थी कि गृह प्रवेश से पहले एक खूबसूरत पलंग खरीदकर कमरे को सजाऊँ पर तकदीर की मारी –मेरे घर में दाखिल होने से पहले ही राक्षसनुमा  पलंग ने आसान जमा लिया था । इनका कोई दोस्त उसे बेचकर अमेरिका जा रहा था और उनको वह पसंद आ गया। बोले –इसकी लकड़ी बहुत अच्छी है । बाजार खरीदने जाओ तो दुगुने दाम  में पड़ेगा।मैं इसे खरीद लेता हूँ ।  मैं मन मसोस कर रह गई।
    इस बात को तीन साल हो गए लेकिन आज भी जब तब महसूस होता है कि कोई इस पर करवटें बदल रहा है। कभी खिल्ली उड़ाने की आवाजें आती हैं—हा—हा—हमारे इस्तेमाल किए पलंग पर सो रहे हो। तुम दोयम दर्जे के हो ----दोयम दर्जे के।  हा—हा-।  
   यह आवाज मेरे कानों में शीशा सा पिघला देती है जिसकी यंत्रणा का कोई अंत नहीं। हर रात अतीत की ढेरी से एक चिंगारी निकलकर मुझे अंदर से झुलस जाती है। एक ही बात उस समय जेहन में आती है –इस पलंग को बदलना है । कभी-कभी अपने भीतर उमड़ते तूफान से विचलित हो दूसरे कमरे में सोने का उपक्रम करती हूँ लेकिन क्या सो पाती हूँ? एक बार मेरे पति ने इस चहलकदमी का कारण पूछा। समझाने पर भी मेरी अनुभूतियों की गहराई में न उतर सके।”
   भावुक दिल की भंडास निकाल कर वे कुछ शांत हुईं पर उनकी आँखें आंसुओं से लवालव थीं जो पनपते विक्षोभ को सम्हाले हुए थीं।
   “आप अपने को संभालिए। ज़िंदगी कभी -कभी ऐसे गुल खिलाती है कि उस पर हमारा वश नहीं।” मैंने उन्हें सांत्वना देने की कोशिश की।
   “क्या मेरे जैसे दोयम दर्जे के और लोग भी हैं या मेरे साथ ही ऐसा होता है।’’ आहत सी बोलीं।
“ऐसी बात नहीं,किसी के साथ भी ऐसा घट सकता है। मेरी यादों में एक किस्सा उभर कर आ रहा है। हाँ याद आया—मैंने वह  किस्सा अपनी  चाची से  सुना था। 
     वे कहा करती थीं –हमारे पड़ोस में एक लड़की लीला रहती थी। उसकी माँ के मरने के बाद पिता ने दूसरी शादी कर ली। कुछ समय बाद ही लीला की नई माँ दो बच्चों की माँ बन गई । काम के बोझ के कारण लीला की उसने पढ़ाई छुड़वादी और रात दिन उसे घर के काम में जोत दिया। मुसीबतों और कष्टों की भरमार ने उसे समय से पहले ही बड़ा कर दिया।
    छोटी बहन की शादी हो गई पर लीला की शादी माँ ने नहीं होने दी। उसकी शादी करने से मुफ्त की नौकरानी हाथ से जो निकल जाती। पर शादी के दो साल के बाद ही छोटी बहन की मृत्यु हो गई। उसके 6 मास के दूधमुंहे बच्चे को लीला सीने से चिपकाए रहती। अचानक सौतेली माँ की जीभ से कंटीली झाड़ियाँ न जाने कहाँ गायब हो गईं और उससे फूल झरने लगे। लीला के खान-पान और आराम का ध्यान रखा जाने लगा। एक दिन सुनने में आया उसकी शादी उसकी मृत बहन के पति से होने वाली है। ताकि घर का जमाई, जमाई ही बना रहे और एक बच्चे को माँ मिल जाए। यहाँ भी उसे बहन की उतरन ही मिल रही थी। यह लीला की बर्दाश्त से बाहर था। उसने उसी रात घर छोड़ दिया।”
   “लीला किस्मत वाली थी जो उसे बहन की उतरन से छुटकारा मिल गया।मेरे तो दूसरे का  इस्तेमाल किया पलंग अभी तक चिपका हुआ है। होगा एक समय जब वह किंग साइज पलंग किंग सा लगता होगा पर अब तो लुंजू –पुंजू थका- थका सा हो गया है। उस पर बैठते ही मेरी उम्र में 10 साल जुड़ जाते हैं और उसी की तरह  जीर्ण –शीर्ण थरथराता कंपायमान मेरे अंग अंग में समा जाता है।’’
    अपनी वेदना व्यक्त कर वे तो हलकापन महसूस करने लगीं पर उसका हलाहल मेरे गले से न उतर सका।

नोट-रंगबिरंगे किंग पर क्लिक करते ही आप इसे साहित्य कुंज अंतर्जाल पत्रिका में भी पढ़ सकते हैं। 
क्रमश:
    


गुरुवार, 5 अक्टूबर 2017

कनाडा डायरी की 21वीं कड़ी


डायरी के पन्ने 
सुधा भार्गव 
साहित्य कुंज में प्रकाशित
09॰07॰2017 
http://sahityakunj.net/LEKHAK/S/SudhaBhargava/21_tulip_utsav.htm
ट्यूलिप अंतर्रराष्ट्रीय एकता का प्रतीक 


19.5॰2003
ट्यूलिप उत्सव 

     अवनि ने वॉल माट बाजार में तंग नहीं किया , इसलिए हमारी हिम्मत बढ्ने लगी और 21 दिन की नाजुक सी बच्ची के साथ ट्यूलिप उत्सव जाने का विचार किया।
    यह उत्सव कनाडा की राजधानी ओटवा में  हर वर्ष 1-19मई तक मनाया जाता है। कनाडा प्रवास के समय बड़ी इच्छा थी कि इसे देखा जाय पर हिम्मत नहीं हो रही कि छोटी सी पोती को लेकर जाएँ।  19 तारीख उत्सव का अंतिम दिन--- बेचैनी होने लगी । आज भी नहीं गए तो न जाने भविष्य में फिर मौका मिले या न मिले।
    बड़े साहस औए सोचा विचारी के बाद आखिर 19 मई को 12 बजे निकल ही पड़े और हमारी कार कमिशनर्स पार्क की ओर दौड़ने लगी। बेबी सीट पर सोती हुई अवनि को कस दिया । हमने भी अपनी -अपनी पेटियाँ बांध लीं। यहाँ तो हरएक को कार यात्रा के समय पेटी बांधना अनिवार्य है।
    कुछ ही देर में अवनि जाग गई।उसने हाथ पैर चलाने चाहे पर खुद को बंधा महसूस कर रोने लगी। उसे रोता देख उठाने के लिए मेरे हाथ कुलबुलाने लगे। पर चलती कार में गोदी में लेकर उसे दुलार नहीं सकती थी।इस मजबूरी से मुझे घुटन होने लगी। वह तो ईश्वर की बड़ी कृपा रही कि कार के हिचकोलों ने थपकी दे उसे जल्दी ही फिर सुला दिया। एक पल तो मुझे ऐसा लगा मानो कैदी को जंजीरों से बांध दिया हो।पर सुरक्षा की दृष्टि से यह नियम भी उचित जान पड़ा।
     पार्क में घुसते ही रंग -बिरंगे ट्यूलिप फूलों की बहार देख मुझे लगा सजे –धजे चमकते परिधान पहने बाराती बगीचे में टोली बनाए मुस्कुरा रहे हैं और दर्शक उनको निहारते-स्वागत करते थक नहीं रहे। मैंने तब तक कोई फूल इतने रंगों में नहीं देखा था। 
    यहाँ  तो पीले,नारंगी,सफेद,महरून, लाल-गुलाबी—कोई रंग तो नहीं छूटा था। इतने मनमोहक रंगों की छटा ने बरबस हमें अपनी ओर खींच लिया।
    पढ़ –सुन रखा था कि हमारे देश में  श्रीनगर डलझील के किनारे पहाड़ियों की चोटियों पर बना इंदिरा गांधी मेमोरियल ट्यूलिप उद्यान है।जहां 70 किस्म के ट्यूलिप करीब 13लाख से भी ज्यादा हैं। यहाँ अप्रैल के पहले हफ्ते में बड़ी शान व उत्साह से ट्यूलिप समारोह मनाया जाता है। इस बाग में भी फूल होलेण्ड से ही आए हैं इसके देखने का सौभाग्य अभी तक प्राप्त नहीं हुआ था।
    आस्ट्रेलिया से आए मेरे एक मित्र ने बताया था कि बसंत के पदापर्ण करते ही आस्ट्रेलिया मेँ फूल उत्सवों की बाढ़ आ जाती है। सभी उसकी निर्मल धारा में बह आनंद प्राप्ति करते हैं। उनके सौंदर्य से धरा भी निखर उठती है। दस दिनों तक बोउरल ट्यूलिप टाइम फेस्टिवल का आयोजन होता है जो आस्ट्रेलिया की राजधानी कैनबरा में सितंबर से अक्तूबर तक एक माह चलता है। इतना लंबा होता है यह अद्भुत आस्ट्रेलिया का पुष्प त्यौहार। उनकी ये बातें सुन ट्यूलिप को देखने के लिए और अधीर हो उठती।
    बेटे ने जब बताया कि ओटावा में भी वसंत के आगमन की खुशी में ट्यूलिप पर्व मनाया जाता है। मैं बालिका की तरह उछल पड़ी और अपने से ही वायदा कर बैठी कि बिना इस अलबेले फूल से मिले भारत नहीं जाऊँगी। ट्यूलिप उत्सव मेँ तो जाने का अवसर बहुत बाद मेँ मिला। तब तक मेरे दिमाग मेँ खलबली मचती ही रही और मैंने इधर- उधर से इसके बारे मेँ जानकारियाँ लेनी शुरू कर दीं।
    यह जानकर मैं अचंभित रह गई कि ट्यूलिप अंतर्राष्ट्रीय मैत्री का प्रतीक है। इसके पीछे भी एक कहानी है। दूसरे विश्व महायुद्ध के समय डच राजपरिवार को कनाडा ने आश्रय दिया था। जर्मन आक्रमण के कारण प्रिंसेस जूलियन को अपने दो बच्चों के साथ नीदरलैंड छोडना पड़ा और तीसरा बच्चा राजकुमारी मारग्रेट का जन्म कनेडियन सिविक अस्पताल में हुआ। नीदरलैंड को आजाद कराने में कनेडियन सिपाहियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
    1945 में धन्यवाद देते हुए डच परिवार ने ओटावा में  1,00000 ट्यूलिप बल्ब भेज अपनी कृतज्ञता प्रकट की।यह उपहार हॉलैंड राजपरिवार से कनाडावासियों को मिला। इन फूलों के सौरभ से कनाडा महका पड़ रहा है। आजतक यह प्रेमपूर्ण मैत्री भाव का सिलसिला अनवरत चल रहा है। हर साल हॉलैंड से 30लाख ट्यूलिप बल्ब आते हैं। इस प्रेम और शांति के पर्व को देखने दुनिया के कोने कोने से पर्यटक उमड़ पड़ते हैं और कुसुमावलि सी  कोमल यादें अपने साथ ले जाते हैं।
     दुनिया का सबसे बड़ा ट्यूलिप उत्सव देख हम फूले नहीं समा रहे थे।एक तरफ लाइन से विभिन्न देशों के पविलियन भी बने हुए थे जो अपनी संस्कृति- कला और भोजन प्रस्तुत करते नजर आ रहे थे। संगीत कार्यक्रमों का भी ज़ोर -शोर था जिनको मुफ्त में बैठकर सुना जा सकता था।
घूमते -घूमते वहाँ मेरे बेटे के एक मित्र मिल गए जो हाल ही में एम्सटर्डम होकर आए थे। उससे पता लगा कि ट्यूलिप तो नीदरलैंड का राष्ट्रीय फूल है। उसकी राजधानी एम्सटर्ड्म में तो सबेरे -सवेरे फूलों से लदी गाड़ियों की कतारें लग जाती है। शहरवासी फूलों के बड़े शौकीन हैं। थोक में खरीदकर अपने घर सजाते हैं। वेलेंटाइन दिवस पर लाल ट्यूलिप का गुलदस्ता बड़े प्यार से देते है। नई दुलहनें सफेद ट्यूलिप को ज्यादा पसंद करती हैं । उनको उसमें अपनी सी कोमलता का आभास होता है।
    धूप खुशनुमा थी सो काफी देर तक फूलों की गलियों में हमारे कदम धीरे–धीरे बढ़ते रहे। फूलों को पास से देखने का मौका मिला।ट्यूलिप कौफ मैनियाना(Tulipa Kauf maniana Regal)लाली लिए पीला फूल बड़ा मन मोहने वाला था। उसकी ओर हम खींचते चले गए। लेकिन ट्यूलिप क्लूसियाना वेंट(Tulipa Clusiana Vent) मुझे सबसे ज्यादा सुंदर लगा। इसके फूल सफेद मोती की तरह चमचमा रहे थे। उसकी पंखुड़ियों के बाहरी तरफ गुलाबी -बैगनी रंग की धारियाँ प्रकृति के कुशल हाथों सँवारी गई थीं। ट्यूलिप आइच्लेरी रीगल(Tulipa Eichleri Regal) गहरे लाल रंग के थे। इनका आकार दूसरे फूलों की अपेक्षा बड़ा था,सुंदर में दूसरों से कम नहीं थे।
    फूलों का रूप निहारते निहारते जी नहीं भरा था। पर पेट की पुकार सुन रुकना पड़ा। छायादार पेड़ के नीचे हमने पड़ाव डाल लिया। बहू शीतल ने बहुत देर बाद अवनी को गोद में लिया। अपना सारा प्यार उस पर उड़ेल देना चाहती थी। मेरे पैर थकान मान रहे थे सो उन्हें संभालते हुए मखमली घास पर बैठ गई।मेरे पति , बेटे के साथ अभी आए कहकर चले गए। लौटे तो हाथ में बडे- बड़े समोसे का पैकिट—मुंह में पानी भर आया। -- यहाँ भी समोसे-- वाह1मजा आ गया।एक ही समोसे से मचलता पेट काफी चुप हो गया।मैंने भार्गव जी से उसके दाम पूछे तो चुप लगा गए। अच्छा हुआ जो नहीं बताया वरना मेरे मुंह का स्वाद कड़वा हो जाता।उसके दाम तो डॉलर में थे और मैं तुलना करने लगती उसकी रुपए से। घर से लाई कॉफी व जूस पी कर थकान उतारी। बहुत देर तक फूलों की मादक खुशबू में सांसें लेते रहे।उठने को मन ही नहीं कर रहा था पर जाना तो था ही। कुछ छवियाँ कैमरे में कैद कर संतुष्ट हो गए कि हम यहाँ नहीं तो ट्यूलिप्स तो हमारे साथ हमारी यादों में रहेंगे।   धूप का ताप कम होने से ठंडी हवा का झोंका सिहरन देने लगा।इसलिए हमने उठ जाना ही ठीक स मझा। हँसते- खिलते ट्यूलिपस को अलविदा कहते हम वहाँ से चल दिए।
    घर पहुँचकर शीतल तो बच्चे में व्यस्त हो गई और हम रात के भोजन की तैयारी में जुट गए। बेटे ने मौका पाते ही कैमरे में कैद की तसवीरों को मुक्त कर दिया है और वे एक एक करके दूरदर्शन के स्क्रीन पर आ रही है। आह!फूलों के बीच में खड़े हम कितने खुश है। अब संगत का असर तो होता ही हैं।फूल हमेशा हँसते नजर आते हैं तो उनका हमपर भी रंग चढ़ गया और यह रंग आज तक नहीं उतरा है।

क्रमश:



रविवार, 1 अक्टूबर 2017

कनाडा डायरी की 20 वीं कड़ी


  डायरी के पन्ने 
                छुट्टी का आनंद                       hut काआनंद 
सुधा भार्गव
साहित्य कुंज में प्रकाशित 
http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/S/SudhaBhargava/20_ChhuTTi_kaa                              _anand.htm                                    

17.5.2013 
छुट्टी का आनंद 
    यह तो मानना ही पड़ेगा की यहाँ के लोग स्वावलंबी हैं। समय को अपनी मुट्ठी में बंद करना अच्छी तरह जानते हैं। मजाल है अनावश्यक रूप से जरा भी समय फिसल कर धूल में मिल जाए ।
    छुट्टी होने पर भी समय का दुरुपयोग इन्हें गंवारा नहीं। उस दिन सभी पुरुष- औरतें घर की साज-संवार में लग जाते हैं। कोई दरवाजों पर पोलिश कर रहा है तो कोई गैराज खोलकर फर्नीचर बनाने में मशगूल है। बढ़ईगीरि के समस्त औज़ार  घर में रहते हैं। यहाँ  मजदूरी बहुत महंगी है। खुद काम करके पैसा बचाया जा सकता है। पैसा होने पर भी जो काम खुद किया जा सकता है उसे करने में वे न हिचकते हैं और न उन्हें अपनी इज्जत जाती नजर आती है। कुछ फर्नीचर के भाग अलग -अलग मिलते हैं जो मशीन से बनते हैं। बस घर में आकर उनके पेच फिट करने होते हैं और देखते ही देखते चंद पलों में मेज-कुर्सी खड़ी नजर आने लगती हैं।
    भारत का कलात्मक व नक्काशीदार फर्नीचर अब्बल तो यहाँ मिलता नहीं और यदि मिलता भी है तो बहुत ऊंचे दामों पर।  भारत की हस्तनिर्मित कला का भला यहाँ क्या मुक़ाबला! पर मशीनी उत्पादन ने यहाँ के जीवन को सरल व सुविधा जनक  बना दिया है।
    छुट्टी के दिन घर से फुर्सत मिलती है तो कनेडियन एकल परिवार ख़रीदारी करता नजर आता है।
    एक रविवार को  मैं भी अपने बेटे के साथ ख़रीदारी के लिए वॉल माट(wall maat Store)गई। 15 दिन की अवनि और उसकी माँ घर पर ही थीं। वहाँ घुसते ही  मैं तो चकित सी रह गई। छोटे छोटे सफेद गुलाबी  चेहरे प्रेंबुलेटर में लेटे नजर आ रहे थे।और उनकी मम्मियाँ मजे से ख़रीदारी कर रही थीं। हमारे यहाँ तो नवजात शिशु को घर से बाहर ले जाने की कल्पना भी नहीं की जा सकती।हम तो सोचते ही रह जाते हैं बच्चे को कैसे ले जाएँ—गर्मी का असर  हो जाएगा—किसी की छूत लग जाएगी। इस धमाचौकड़ी में बच्चे और उसकी माँ को कम से कम घर में सवा महीने तो बंद रखते ही हैं। चाहें देश में हों या विदेश में इस मानसिकता को हम अपने से चिपटाए ही रहते हैं।
    जहां तक भारत की बात है—समझ में आती है वहाँ  की धूल धूसरित सड़कें ,शोर शराबा —चीं—पीं--पीं जैसा वातावरण शिशु के स्वास्थ्य की दृष्टि से ठीक नहीं।पर कनाडा में तो  वातानुकूलित कारें हैं और बाजार भी वातानुकूलित। न शीत का प्रकोप न गरम हवा के थपेड़े । घर तो हैं ही पूर्ण आधुनिक। इस कारण उनको घर से निकालने में क्या हर्ज है।
    कुछ भी हो भारतीय समाज में सवा माह तक तो बच्चा और माँ दोनों को कमजोर और नाजुक ही समझते हैं। जिसका इलाज है केवल खाओ-पीओ और चादर तान सो जाओ। तभी माँ बनने के बाद  अधिकतर भारतीय महिलाओं की सेहत कुछ ज्यादा ही अच्छी हो जाती है।
    मैं भी यही सोचती थी कि बहू को कम से कम सवा ढेढ माह तक घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए पर वॉल माट जाने पर मेरी आँखें खुल गईं और अपनी गलती का एहसास हुआ।
    हमने भी निश्चय किया कि अगली छुट्टी पर सब साथ- साथ जाएँगे। पर अवनि को गोदी में लेकर नहीं बैठ सकते थे। उसके लिए कुर्सीयान की व्यवस्था करनी जरूरी थी। यह कार में पीछे की सीट पर रखी होती है। 9किलो तक के शिशु को टोडलर कार चेयर में पेटी से कसकर बैठाया जाता है।यह पेटी विशेष प्रकार की होती है ताकि बच्चे की गरदन और कमर सीट के पिछले भाग से सटी  रहे और किसी अंग को झटका न लगे। टोडलर चेयर न होने पर जुर्माना भुगतना पड़ता है। जुर्माने के झंझट में कौन पड़े यह सोच बेटा पहले बच्ची के लिए यह खास चेयर खरीदकर लाया।
बस मौका देखते ही बड़े शौक से नन्ही सी अवनि और उसकी माँ के साथ बेशोर मॉल चल दिए । दो घंटे खूब आराम से घूमे। सपरिवार घूमने का मजा कुछ और ही है। चाँदनी ने घर की जरूरत का सामान खरीदा। घर में रहते –रहते उसे भी घुटन हो रही थी। 
    यहाँ आकर मुझे आइसक्रीम खाने की बुरी लत पड़ गई है। फ्रिज में तो रहती ही है। बाजार में भी खाना नहीं छोडती।फिर आज तो सब छुट्टी मनाने के मूड में थे तब भला मैं कैसे पीछे रहती। मैंने डिनर की तो छुट्टीकर दी और उसके बदले डेरी कुइन के आगे खड़े होकर खूब आइसक्रीम पेट में उतार ली।
    अवनि के कुलबुलाते ही हम चल दिए। दो घंटे तक बच्ची सोती रही यही हमारे लिए बहुत बड़ा वरदान था।
*
    
घर में घुसते ही मैंने रसोई का मोर्चा सँभाला।  
    कुछ देर में बेटा भी आकर मेरा हाथ बंटाने लगा। काबुली चने ,राजमा अच्छे बना लेता है। मसाल मूढ़ी बनाने में तो उस्ताद है। कनाडा आकर खाना बनाना उसने खूब सीख लिया है। यहाँ के पानी में आत्मनिर्भरता घुली  हुई है।
कुछ देर बाद मैंने कहा –खरीदे समान की जांच-पड़ताल तो कर लो। पता लगा पिस्ते का पैकिट हम उस  काउंटर से उठाना भूल गए जहां सामान के दाम चुकाए थे। सोना बिल लेकर भागा गया।पैकिट लेकर घर में घुसा तब चैन मिला।
    "मुझे तो मिलने की आशा न थी । कोई भी वहाँ से ले जा सकता था।" मैंने कहा।
    "माँ,यहाँ ऐसा नहीं होता। कनाडा ईमानदारी के लिए प्रसिद्ध है। कनेडियन मेहनत की कमाई खाते हैं।"
    "तूने ठीक ही कहा। मेहनत का रंग तो मैं छुट्टी के दिन भी देख रही थी। चलो खा पीकर थोड़ा आराम कर लिया जाए।"  
    दरवाजा खुला हुआ था । मैं बंद करने उठी तो देखा- पड़ोसी अपनी बड़ी सी वैन निकाल रहे हैं। शायद वह टोयटा थी। उसके पीछे लकड़ी की नाव और चप्पू बंधे हुए हैं। 2-3 साइकिलें भी अंदर की ओर रखी हुई है।
    मैं आश्चर्य से बोली-"सुबह से तुम्हारे पड़ोसी को काम करते देख रही हूँ। कभी कार साफ कर रहे हैं तो कभी अपना बगीचा। अब दोपहर को कहाँ चल दिए?"
    "माँ,अब यह पूरा परिवार समुद्र के किनारे पिकनिक मनाने जा रहा है। सैर सपाटे के साथ सेहत भी बनाएँगे।  साइकलिंग करेंगे,तैरेंगे और नाव चलाएँगे।यह भी तो स्वास्थ्य के लिए जरूरी है।'
    "खाएँगे कब –समय तो बहुत हो गया!"
    "समुद्र तट पर ही खाएँगे-पकाएंगे। वह देखो बारबेक्यू और गैस स्लेंडर  बेटा ला रहा है।"
    "बाप रे इतना भारी -भारी समान! पूरी उठा पटक है।"
    :इनका शरीर बोझा उठाने,मीलों पैदल चलने और निरंतर काम करने का आदी होता है। शुरू से बच्चों का पालन पोषण इसी प्रकार किया जाता है कि आगे चलकर वे एक जिम्मेदार नागरिक बनें।:"      
    सच में छुट्टी का आनंद उठाना तो यहाँ की संस्कृति में पलने वाले लोग जानते हैं। उनकी इस मनोवृति ने मेरी विचारधारा छुट्टी का मतलब –न काम न धाम ,बस आराम ही आराम को बदलकर रख दिया।

क्रमश :