रविवार, 22 अक्तूबर 2017

कनाडा डायरी की 22वीं कड़ी



डायरी के पन्ने         
        

सुधा भार्गव

साहित्यकुंज में प्रकाशित
10.12॰2017
http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/S/SudhaBhargava/22_King.htm/


25.5.2003
किंग 

     कनाडा पहुँचने से पहले ही बेटे ने एक किंग खरीदा था। था। देखने में बड़ा सुंदर और शक्तिशाली!। जैसा नाम वैसा ही काम---–इतना मजबूत कि 10 मोटे –ताजे  भी उस पर चढ़  जाएँ तो थकने का नाम नहीं। आप बड़े असमंजस में होंगे कि यह कैसा किंग है! चलिए राज की बात बता ही दूँ। असल में यह एक किंग साइज पलंग है। यह मुझे बेहद पसंद है। इसलिए नहीं कि उसका मूल्य  डेढ़ लाख है  बल्कि इसलिए कि मोटे मोटे डबल गद्दे वाले पलंग पर मेचिंग  तकिये,लिहाफ चादर –कुल मिलाकर राजसी छ्टा  बिखरी पड़ती है ।
     चाँद का  दोस्त तुषार भी पलंग की तलाश में था । खरीद्ने से पहले उसने इस किंग से मिलना ठीक समझा और एक दिन अपनी माँ के साथ हमारे घर आन पहुंचा । वे तो उस भव्य पलंग की शान देख निहाल हो गईं और बोली-बेटा, तू तो आँख मींचकर ऐसा ही पलंग खरीद ले । कम से कम आखिरी दिनों में तो मेरे दिल की एकमात्र इच्छा पूरी हो जाए।
     “माँ इतना उतावलापन ठीक नहीं । मुझे सोचने –समझने का मौका तो दो।”
    “अरे क्या सोचना ?तेरे डैडी ने तो कभी मेरी  इच्छा के बारे में सोचा ही नहीं और तू, तू भी बस सोचता ही रह जाएगा।”
    तुषार से कुछ कहते नहीं बन रहा था। ऐसी नाजुक स्थिति से उसे बचाने के लिए मैं उसकी माँ को लेकर डाइनिंग रूम में ले गई।एकांत पाकर वे तो पूरी तरह बिखर ही पड़ीं। ऐसा लगा बहुत दिनों का दबा लावा फूटकर बाहर आना चाहता है।
   “बहन जी,रिटायरमेंट के बाद इन्होंने नया घर खरीदा और मेरी  दिली इच्छा थी कि गृह प्रवेश से पहले एक खूबसूरत पलंग खरीदकर कमरे को सजाऊँ पर तकदीर की मारी –मेरे घर में दाखिल होने से पहले ही राक्षसनुमा  पलंग ने आसान जमा लिया था । इनका कोई दोस्त उसे बेचकर अमेरिका जा रहा था और उनको वह पसंद आ गया। बोले –इसकी लकड़ी बहुत अच्छी है । बाजार खरीदने जाओ तो दुगुने दाम  में पड़ेगा।मैं इसे खरीद लेता हूँ ।  मैं मन मसोस कर रह गई।
    इस बात को तीन साल हो गए लेकिन आज भी जब तब महसूस होता है कि कोई इस पर करवटें बदल रहा है। कभी खिल्ली उड़ाने की आवाजें आती हैं—हा—हा—हमारे इस्तेमाल किए पलंग पर सो रहे हो। तुम दोयम दर्जे के हो ----दोयम दर्जे के।  हा—हा-।  
   यह आवाज मेरे कानों में शीशा सा पिघला देती है जिसकी यंत्रणा का कोई अंत नहीं। हर रात अतीत की ढेरी से एक चिंगारी निकलकर मुझे अंदर से झुलस जाती है। एक ही बात उस समय जेहन में आती है –इस पलंग को बदलना है । कभी-कभी अपने भीतर उमड़ते तूफान से विचलित हो दूसरे कमरे में सोने का उपक्रम करती हूँ लेकिन क्या सो पाती हूँ? एक बार मेरे पति ने इस चहलकदमी का कारण पूछा। समझाने पर भी मेरी अनुभूतियों की गहराई में न उतर सके।”
   भावुक दिल की भंडास निकाल कर वे कुछ शांत हुईं पर उनकी आँखें आंसुओं से लवालव थीं जो पनपते विक्षोभ को सम्हाले हुए थीं।
   “आप अपने को संभालिए। ज़िंदगी कभी -कभी ऐसे गुल खिलाती है कि उस पर हमारा वश नहीं।” मैंने उन्हें सांत्वना देने की कोशिश की।
   “क्या मेरे जैसे दोयम दर्जे के और लोग भी हैं या मेरे साथ ही ऐसा होता है।’’ आहत सी बोलीं।
“ऐसी बात नहीं,किसी के साथ भी ऐसा घट सकता है। मेरी यादों में एक किस्सा उभर कर आ रहा है। हाँ याद आया—मैंने वह  किस्सा अपनी  चाची से  सुना था। 
     वे कहा करती थीं –हमारे पड़ोस में एक लड़की लीला रहती थी। उसकी माँ के मरने के बाद पिता ने दूसरी शादी कर ली। कुछ समय बाद ही लीला की नई माँ दो बच्चों की माँ बन गई । काम के बोझ के कारण लीला की उसने पढ़ाई छुड़वादी और रात दिन उसे घर के काम में जोत दिया। मुसीबतों और कष्टों की भरमार ने उसे समय से पहले ही बड़ा कर दिया।
    छोटी बहन की शादी हो गई पर लीला की शादी माँ ने नहीं होने दी। उसकी शादी करने से मुफ्त की नौकरानी हाथ से जो निकल जाती। पर शादी के दो साल के बाद ही छोटी बहन की मृत्यु हो गई। उसके 6 मास के दूधमुंहे बच्चे को लीला सीने से चिपकाए रहती। अचानक सौतेली माँ की जीभ से कंटीली झाड़ियाँ न जाने कहाँ गायब हो गईं और उससे फूल झरने लगे। लीला के खान-पान और आराम का ध्यान रखा जाने लगा। एक दिन सुनने में आया उसकी शादी उसकी मृत बहन के पति से होने वाली है। ताकि घर का जमाई, जमाई ही बना रहे और एक बच्चे को माँ मिल जाए। यहाँ भी उसे बहन की उतरन ही मिल रही थी। यह लीला की बर्दाश्त से बाहर था। उसने उसी रात घर छोड़ दिया।”
   “लीला किस्मत वाली थी जो उसे बहन की उतरन से छुटकारा मिल गया।मेरे तो दूसरे का  इस्तेमाल किया पलंग अभी तक चिपका हुआ है। होगा एक समय जब वह किंग साइज पलंग किंग सा लगता होगा पर अब तो लुंजू –पुंजू थका- थका सा हो गया है। उस पर बैठते ही मेरी उम्र में 10 साल जुड़ जाते हैं और उसी की तरह  जीर्ण –शीर्ण थरथराता कंपायमान मेरे अंग अंग में समा जाता है।’’
    अपनी वेदना व्यक्त कर वे तो हलकापन महसूस करने लगीं पर उसका हलाहल मेरे गले से न उतर सका।

नोट-रंगबिरंगे किंग पर क्लिक करते ही आप इसे साहित्य कुंज अंतर्जाल पत्रिका में भी पढ़ सकते हैं। 
क्रमश:
    


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