गुरुवार, 5 अक्तूबर 2017

कनाडा डायरी की 21वीं कड़ी


डायरी के पन्ने 
सुधा भार्गव 
साहित्य कुंज में प्रकाशित
09॰07॰2017 
http://sahityakunj.net/LEKHAK/S/SudhaBhargava/21_tulip_utsav.htm
ट्यूलिप अंतर्रराष्ट्रीय एकता का प्रतीक 


19.5॰2003
ट्यूलिप उत्सव 

     अवनि ने वॉल माट बाजार में तंग नहीं किया , इसलिए हमारी हिम्मत बढ्ने लगी और 21 दिन की नाजुक सी बच्ची के साथ ट्यूलिप उत्सव जाने का विचार किया।
    यह उत्सव कनाडा की राजधानी ओटवा में  हर वर्ष 1-19मई तक मनाया जाता है। कनाडा प्रवास के समय बड़ी इच्छा थी कि इसे देखा जाय पर हिम्मत नहीं हो रही कि छोटी सी पोती को लेकर जाएँ।  19 तारीख उत्सव का अंतिम दिन--- बेचैनी होने लगी । आज भी नहीं गए तो न जाने भविष्य में फिर मौका मिले या न मिले।
    बड़े साहस औए सोचा विचारी के बाद आखिर 19 मई को 12 बजे निकल ही पड़े और हमारी कार कमिशनर्स पार्क की ओर दौड़ने लगी। बेबी सीट पर सोती हुई अवनि को कस दिया । हमने भी अपनी -अपनी पेटियाँ बांध लीं। यहाँ तो हरएक को कार यात्रा के समय पेटी बांधना अनिवार्य है।
    कुछ ही देर में अवनि जाग गई।उसने हाथ पैर चलाने चाहे पर खुद को बंधा महसूस कर रोने लगी। उसे रोता देख उठाने के लिए मेरे हाथ कुलबुलाने लगे। पर चलती कार में गोदी में लेकर उसे दुलार नहीं सकती थी।इस मजबूरी से मुझे घुटन होने लगी। वह तो ईश्वर की बड़ी कृपा रही कि कार के हिचकोलों ने थपकी दे उसे जल्दी ही फिर सुला दिया। एक पल तो मुझे ऐसा लगा मानो कैदी को जंजीरों से बांध दिया हो।पर सुरक्षा की दृष्टि से यह नियम भी उचित जान पड़ा।
     पार्क में घुसते ही रंग -बिरंगे ट्यूलिप फूलों की बहार देख मुझे लगा सजे –धजे चमकते परिधान पहने बाराती बगीचे में टोली बनाए मुस्कुरा रहे हैं और दर्शक उनको निहारते-स्वागत करते थक नहीं रहे। मैंने तब तक कोई फूल इतने रंगों में नहीं देखा था। 
    यहाँ  तो पीले,नारंगी,सफेद,महरून, लाल-गुलाबी—कोई रंग तो नहीं छूटा था। इतने मनमोहक रंगों की छटा ने बरबस हमें अपनी ओर खींच लिया।
    पढ़ –सुन रखा था कि हमारे देश में  श्रीनगर डलझील के किनारे पहाड़ियों की चोटियों पर बना इंदिरा गांधी मेमोरियल ट्यूलिप उद्यान है।जहां 70 किस्म के ट्यूलिप करीब 13लाख से भी ज्यादा हैं। यहाँ अप्रैल के पहले हफ्ते में बड़ी शान व उत्साह से ट्यूलिप समारोह मनाया जाता है। इस बाग में भी फूल होलेण्ड से ही आए हैं इसके देखने का सौभाग्य अभी तक प्राप्त नहीं हुआ था।
    आस्ट्रेलिया से आए मेरे एक मित्र ने बताया था कि बसंत के पदापर्ण करते ही आस्ट्रेलिया मेँ फूल उत्सवों की बाढ़ आ जाती है। सभी उसकी निर्मल धारा में बह आनंद प्राप्ति करते हैं। उनके सौंदर्य से धरा भी निखर उठती है। दस दिनों तक बोउरल ट्यूलिप टाइम फेस्टिवल का आयोजन होता है जो आस्ट्रेलिया की राजधानी कैनबरा में सितंबर से अक्तूबर तक एक माह चलता है। इतना लंबा होता है यह अद्भुत आस्ट्रेलिया का पुष्प त्यौहार। उनकी ये बातें सुन ट्यूलिप को देखने के लिए और अधीर हो उठती।
    बेटे ने जब बताया कि ओटावा में भी वसंत के आगमन की खुशी में ट्यूलिप पर्व मनाया जाता है। मैं बालिका की तरह उछल पड़ी और अपने से ही वायदा कर बैठी कि बिना इस अलबेले फूल से मिले भारत नहीं जाऊँगी। ट्यूलिप उत्सव मेँ तो जाने का अवसर बहुत बाद मेँ मिला। तब तक मेरे दिमाग मेँ खलबली मचती ही रही और मैंने इधर- उधर से इसके बारे मेँ जानकारियाँ लेनी शुरू कर दीं।
    यह जानकर मैं अचंभित रह गई कि ट्यूलिप अंतर्राष्ट्रीय मैत्री का प्रतीक है। इसके पीछे भी एक कहानी है। दूसरे विश्व महायुद्ध के समय डच राजपरिवार को कनाडा ने आश्रय दिया था। जर्मन आक्रमण के कारण प्रिंसेस जूलियन को अपने दो बच्चों के साथ नीदरलैंड छोडना पड़ा और तीसरा बच्चा राजकुमारी मारग्रेट का जन्म कनेडियन सिविक अस्पताल में हुआ। नीदरलैंड को आजाद कराने में कनेडियन सिपाहियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
    1945 में धन्यवाद देते हुए डच परिवार ने ओटावा में  1,00000 ट्यूलिप बल्ब भेज अपनी कृतज्ञता प्रकट की।यह उपहार हॉलैंड राजपरिवार से कनाडावासियों को मिला। इन फूलों के सौरभ से कनाडा महका पड़ रहा है। आजतक यह प्रेमपूर्ण मैत्री भाव का सिलसिला अनवरत चल रहा है। हर साल हॉलैंड से 30लाख ट्यूलिप बल्ब आते हैं। इस प्रेम और शांति के पर्व को देखने दुनिया के कोने कोने से पर्यटक उमड़ पड़ते हैं और कुसुमावलि सी  कोमल यादें अपने साथ ले जाते हैं।
     दुनिया का सबसे बड़ा ट्यूलिप उत्सव देख हम फूले नहीं समा रहे थे।एक तरफ लाइन से विभिन्न देशों के पविलियन भी बने हुए थे जो अपनी संस्कृति- कला और भोजन प्रस्तुत करते नजर आ रहे थे। संगीत कार्यक्रमों का भी ज़ोर -शोर था जिनको मुफ्त में बैठकर सुना जा सकता था।
घूमते -घूमते वहाँ मेरे बेटे के एक मित्र मिल गए जो हाल ही में एम्सटर्डम होकर आए थे। उससे पता लगा कि ट्यूलिप तो नीदरलैंड का राष्ट्रीय फूल है। उसकी राजधानी एम्सटर्ड्म में तो सबेरे -सवेरे फूलों से लदी गाड़ियों की कतारें लग जाती है। शहरवासी फूलों के बड़े शौकीन हैं। थोक में खरीदकर अपने घर सजाते हैं। वेलेंटाइन दिवस पर लाल ट्यूलिप का गुलदस्ता बड़े प्यार से देते है। नई दुलहनें सफेद ट्यूलिप को ज्यादा पसंद करती हैं । उनको उसमें अपनी सी कोमलता का आभास होता है।
    धूप खुशनुमा थी सो काफी देर तक फूलों की गलियों में हमारे कदम धीरे–धीरे बढ़ते रहे। फूलों को पास से देखने का मौका मिला।ट्यूलिप कौफ मैनियाना(Tulipa Kauf maniana Regal)लाली लिए पीला फूल बड़ा मन मोहने वाला था। उसकी ओर हम खींचते चले गए। लेकिन ट्यूलिप क्लूसियाना वेंट(Tulipa Clusiana Vent) मुझे सबसे ज्यादा सुंदर लगा। इसके फूल सफेद मोती की तरह चमचमा रहे थे। उसकी पंखुड़ियों के बाहरी तरफ गुलाबी -बैगनी रंग की धारियाँ प्रकृति के कुशल हाथों सँवारी गई थीं। ट्यूलिप आइच्लेरी रीगल(Tulipa Eichleri Regal) गहरे लाल रंग के थे। इनका आकार दूसरे फूलों की अपेक्षा बड़ा था,सुंदर में दूसरों से कम नहीं थे।
    फूलों का रूप निहारते निहारते जी नहीं भरा था। पर पेट की पुकार सुन रुकना पड़ा। छायादार पेड़ के नीचे हमने पड़ाव डाल लिया। बहू शीतल ने बहुत देर बाद अवनी को गोद में लिया। अपना सारा प्यार उस पर उड़ेल देना चाहती थी। मेरे पैर थकान मान रहे थे सो उन्हें संभालते हुए मखमली घास पर बैठ गई।मेरे पति , बेटे के साथ अभी आए कहकर चले गए। लौटे तो हाथ में बडे- बड़े समोसे का पैकिट—मुंह में पानी भर आया। -- यहाँ भी समोसे-- वाह1मजा आ गया।एक ही समोसे से मचलता पेट काफी चुप हो गया।मैंने भार्गव जी से उसके दाम पूछे तो चुप लगा गए। अच्छा हुआ जो नहीं बताया वरना मेरे मुंह का स्वाद कड़वा हो जाता।उसके दाम तो डॉलर में थे और मैं तुलना करने लगती उसकी रुपए से। घर से लाई कॉफी व जूस पी कर थकान उतारी। बहुत देर तक फूलों की मादक खुशबू में सांसें लेते रहे।उठने को मन ही नहीं कर रहा था पर जाना तो था ही। कुछ छवियाँ कैमरे में कैद कर संतुष्ट हो गए कि हम यहाँ नहीं तो ट्यूलिप्स तो हमारे साथ हमारी यादों में रहेंगे।   धूप का ताप कम होने से ठंडी हवा का झोंका सिहरन देने लगा।इसलिए हमने उठ जाना ही ठीक स मझा। हँसते- खिलते ट्यूलिपस को अलविदा कहते हम वहाँ से चल दिए।
    घर पहुँचकर शीतल तो बच्चे में व्यस्त हो गई और हम रात के भोजन की तैयारी में जुट गए। बेटे ने मौका पाते ही कैमरे में कैद की तसवीरों को मुक्त कर दिया है और वे एक एक करके दूरदर्शन के स्क्रीन पर आ रही है। आह!फूलों के बीच में खड़े हम कितने खुश है। अब संगत का असर तो होता ही हैं।फूल हमेशा हँसते नजर आते हैं तो उनका हमपर भी रंग चढ़ गया और यह रंग आज तक नहीं उतरा है।

क्रमश:



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