बुधवार, 12 जून 2024

सफर में सफर जैसा जिया वैसा कहा

 

अगली कड़ी 4

 बड़े कंधों का शहर शिकागो की  क्रूस यात्रा 

शिकागो  में हमारे पास  केवल 7दिन थे। इतने कम समय में ज्यादा से ज्यादा  शहर का इतिहास जानना चाहते थे। शिकागो  विशाल लेक मिशिगन एवं मिसिसिपी नदी के बीच बसा है।  लेक के पास ही हमारा घर! सो पैदल ही पैदल बड़े से पार्क को  पार करते  लेक  के किनारे पहुंच गए। धूप का चश्मा ,टोपी ,जाकेट और पानी ले जाना न भूले। न जाने मौसम का कब मिजाज बदल जाये। 

प्राकृतिक सुषमा को निहारते कुछ देर तक लेक का चक्कर लगाया।

एक मूर्ति  को देख रुक गए। कुछ देर उसके शिल्प को देखती रही जो मुझे मुग्ध किए बिना न रहा।  कौतूहल वश उस पर जड़ी पीतल की पट्टी पर लिखा पढ़ा और कैमरे में कैद कर लिया। 




CAPTAIN ON THE HELM

They mark our passage as a race of men,Earth will not see such ships as those agen."

JOHN MASEFIELD

DEDICATED THIS 19TH DAY OF MAY,IN THE YEAR 2000

TO THOSE COURAGEOUS MARINES WHO GUIDED THEIR SHIPS

THROUGH PERILIOUS WATERS,CARRING CARGO AND PEOPLE. THEIR CONTRIBUTIONS

 

INTERNATIONAL SHIPMASTERS'ASSOCIATION.CHICHGO LODGE NO.3

SCULPTURE:Michael Martino

     झील के किनारे  सफेद ,नीली वाटर टैक्सियाँ  सैलानियों को लुभाने में लगी थीं।मैं अपने बेटे के साथ वाटर बोट टैक्सी में बैठकर शिकागो नदी के किनारे पहुँच गई।  । शिकागो नदी का इतिहास तो पूरे शहर का इतिहास है। यह नदी शिकागो शहर से ही गुजरती है।इसी  इतिहास को जानने के लिए हमने क्रूज में बैठने का इरादा किया । टिकट  लेने के लिए पूंछते  -पांछते उस जगह रुक गए जहां एक बोर्ड टंगा था । लिखा था ….

Shore  line sight seeing 

     फट से टिकट ले ,लहरों के साथ हिलते- झूमते क्रूस पर हम  चढ़ गए। नीली -चमकीली लहरों को छूती हवाएँ ठंडी व तेज थी। हमारे एक साथी की तो टोपी ही उड़ गई और २१ फ़िट गहरी नदी  में खेलने लगी लहरों के साथ।  हमने तो अपनी टोपी कस कर पकड़ ली  और काला  चश्मा नाक पर ज़ोर देकर बैठा  लिया।   कहने को तो नदी का  रंग नीला है पर सेंट पैट्रिक दिवस पर इसे हरे रंग से रंग देते हैं। 

    इसमें बैठते ही जलमार्ग की भव्य उपस्थिति पूरे शहर में महसूस होने लगीं।

 

दोनों तरफ गगनचुम्बी इमारतों को देख ठगे से रह गए। जो समृद्ध वास्तु शिल्प का इतिहास बताने में सक्षम हैं। शिकागो दुनिया की पहली गगनचुंबी इमारत का घर है। सबसे पहले विलियम लेबरन जेनी शिकागो वास्तुकार ने नौ मंजिल ऊंची होम लाइफ इंश्योरेंस बिल्डिंग बनाई जिसका बाहरी दीवारों सहित पूरा वजन  लोहे के फ्रेम पर रखा गया था।

    गाइड ने यह कहकर हमें हैरत में डाल दिया कि 500 से ज्यादा गगनचुम्बी इमारतें मिट्टी से बनी हैं। इन पर न पानी  का असर होता है और न आँधी -तूफान का। कुछ इमारतें तो सैकड़ों  वर्ष पुरानी लगीं।  लेकिन बड़ी शान से खड़ी अपने अतीत की गाथा कह रही थीं।    

    बातों ही बातों में क्रूस मेँ बैठे  एक बुजुर्ग  ने बताया -“शिकागो जमीन से ऊपर उठाया शहर है।”

हम तो चौंक पड़े पर पास ही खड़ा एक लड़का चहक उठा-“तब तो अंकल, शिकागो शहर के  हवाईजहाज़ की तरह पहिये लगे होंगे ।तभी तो यह ऊपर उठ गया।”

उसकी भोली बात से चेहरों पर हंसी मुखर हो उठी। 

एक अन्य किशोर भी वाचाल हो उठा -“मुझे तो लगता है पूरे शहर को जैक लगाकर अपलिफ्ट किया है।”  

ये सज्जन ठीक ही बोल रहे हैं। शिकागो असल में  दलदल वाली जमीन पर बसा है। एक बार हैजे ,टाइफाइड जैसी बीमारियों ने ज़ोर पकड़ा  तो सैंकड़ों की संख्या में लोग मरने लगे जी।  बाद में पता लगा कि मिशिगन झील और शहर की ऊंचाई एक होने के कारण जमीन दलदली हो गई है।” गाइड बोला। 

अब तो दलदली नहीं लगती ।  पानी कैसे सुखा दिया?” मैंने पूछा। 

मिट्टी का भीगना तो अपने आप ही बंद हो गया जी ,जब शहर को थोड़ा ऊपर उठा दिया।” 

ऐं, तुम भी वही बात कर रहे हो जो असंभव है।” 

ठीक ही कह रहा हूँ।  एक तरह से शहर को फिर से बनाया। दलदली जमीन,फुटपाथ,नालियों को मिट्टी से पाटा । पुरानी इमारतों  को ऊपर उठाया। नई इमारतों को ऊंचाई पर बनाया।” 

बड़ी मेहनत और सूझबूझ का काम है यह तो ।मान  गए मिट्टी के शहर का लोहा।”

    बातों का बाज़ार गर्म था पर निगाहें सामने ही बढ़ते क्रूज़ पर जमी थी ।  दोनों तरफ  बिल्डिंग को छूता पानी --टकराती लहरें मीठा सा संगीत पैदा कर रही थीं। बीच में शहर के दो बिंदुओं को   जोड़ते छोटे -छोटे ब्रिज बने थे जिन पर स्ट्रीट के नाम लिखे थे- जैसे मेडिसन स्ट्रीट ,लेक स्ट्रीट ,क्लार्क स्ट्रीटहेरिसन स्ट्रीट।। इन पुलों के कारण जल जीवन भी सामान्य था और   शहर के दूसरे हिस्से में पैदल प्रवेश भी  सुविधाजनक था। न ट्रैफ़िक न प्रदूषण। मैं तो इन्हें देखती ही रह गई। क्या अद्भुत संरचना! कुछ ही देर मेँ  बैंक , विशाल रंगीन कांच और अल्मुनियम के भवन ,होटल ,संग्रहालय , क्लब हाई टावर ,शिकागो यूनिवर्सिटी सहित  चमकती दुनिया को भी देख लिया।

    यहाँ की श्रम प्रवृति , उन्नतशील औद्योगिक गतिविधियाँ तथा परिवहन व्यवस्था  को देख ऐसा लगा जैसे यह बड़े कंधों का शहर हो। 

सोमवार, 10 जून 2024

सफर में सफर जैसा जिया वैसा कहा

 3-शिकागो ग्रांट पार्क में अगोरा बिग फीट  


अभी तक तो यही सुना -पढ़ा  था कि शिकागो बिंडी सिटी कहलाता है।  लेकिन आज यह भी देख लिया कि विंडी सिटी होता क्या है। घर से तो बहू के साथ थोड़ा घूमने के लिए ही पैदल निकल पड़ी थी। साथ में नन्ही परी को भी ले गएा। वह प्रेंबुलेटर में बैठी थी।   दूर से हरे -भरे पेड़ों का झुरमुट दिखाई दिया। मुदित मन उसी ओर  मुड़ गए। मिशिगन एवेन्यू से करीब आधे किलोमीटर चले होंगे कि  ग्रांट पार्क पहुंच गए। 

घर  से चले तो अच्छी खासी धूप थी । हल्का सा बस एक स्वेटर पहन लिया था। अचानक बदली छा गई। पानी बरसने के आसार नज़र आने  लगे। हमारे दिल की धड़कनें तो तेज हो गईं। परंतु ईश्वर की लीला !कुछ देर में ही  धूप निकल आई। जन में जान आई लेकिन   साथ ही  हवा के झोंके भी ले आई।  कुछ ही मिनटों में  हवा इतनी तेज हो गई कि लगा  हमें उड़ा कर ही दम लेगी ।


शांत वातावरण में हलचल  पैदा हो गई।  मैंने बहू की बांह   कसकर पकड़ ली । मानो मै एक बच्ची होऊँ और हवा के हल्के से धक्के से लुढ़क जाऊँगी।   पैर जमाते हुए  एक -एक इंच आगे बढ्ने लगी। लेकिन  चारों  तरफ का दृश्य आँखों में भरने को भी आतुर थी।  । 

 अचानक एक तरफ बनी ऊंची -ऊंची बिना सिर वाली आकृतियों की भीड़ को  देख  ठिठक गई।



हवाई तेज झोंकों को तो भूल गई !आकृतियों की ओर द्रुत गति से  अपने को संभालती - बढ्ने लगी।  गगन चुम्बी इमारतों की तरह आकृतियाँ भी बड़ी -बड़ी! कम से कम 9-10 फीट की तो होगी।खूब चमक रही थी। जरूर लोहे में कास्य और स्टील मिलाया होगा। पास आने पर मैं तो उनके लंबे -लंबे पैरों को ही देखती रह गई । खड़ी एक जगह थीं  पर लगता था चारों तरफ उनके कदम बढ़ रहे हैं।   मुझे तो  वे सिर विहीन मूर्तिया बहादुर सिपाही नजर आ रहे थे जो जरूर अपनी जान पर खेल गए होंगे। बस अत्याचारियों ने सजाये तौर पर उनके सिर धड़ से अलग करने का हुकुम सुना दिया। । देखने से साफ पता लग रहा था कि जिनके संदर्भ में भी ये सिर कटी  आकृतियाँ  बनाई गईं वे दुखी और   सताये लोगों का प्रतीक हैं।  । मेरे  अंदर तो   एक पीड़ा  सी उभर आई। । लेकिन जिसने भी इनको बनाया उसकी कलाकारिता की दाद दिये बिना न रही।







इन बिग फीट आकृतियों के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानने का मोह न छोड़ सकी। तीखी -ठंडी हवाओं के तीरों का सामना करते हुए सूचनात्मक पट्टिका खोजने में जुट गई। आखिर सफल हो ही गई। उस पर  लिखा था--

ये  106 आकृतियाँ   पोलैंड की  कलाकार  मैग्डेलेना अबकानोविक्ज़ ने बनाया है।ये  शिकागो को पॉलिश संस्कृति मंत्रालय से उपहार स्वरूप मिलीं   । 





   वारसॉ के बाहर एक कुलीन परिवार में जन्मी मैग्डेलेना अबकानोविक्ज़  द्वितीय विश्व युद्ध और उसके बाद के पैंतालीस वर्षों के सोवियत वर्चस्व से बहुत प्रभावित थीं।वे कलाकार होने के साथ एक लेखिका भी थीं। एक जगह  वे लिखती हैं-"उन्हें   सामूहिक घृणा और सामूहिक प्रशंसा के विभिन्न रूपों से पाला पड़ा। जुलूस और परेड में अच्छे नेताओं की पूजा की जाती थी पर वे जल्द ही सामूहिक हत्यारे बन गए।"

अबकानोविक्ज़ ने पहली बार 1970  में मानव रूप से प्रेरित और अपनी भावनाओं के वशीभूत   मूर्तियाँ बनाई

और दुनिया भर में इसी तरह के प्रतिष्ठान बनाए गए हैं, लेकिन अगोरा बिग फीट सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण  है। 

बिग फीट की बात तो समझ गई पर अगोरा !इसका मतलब !दिमाग में खलबली मच गई।  एक माली को देख उसके पास गई और अगोरा के बारे में पूछ बैठी। उसने बताया -"बहुत पहले गाँव -शहर में एक स्थान पर लोग मिलने जुलने के लिए इकट्ठे होते थे। उसे  अगोरा कहते थे। " गुत्थी सुलझ गई---यहाँ भी तो एक जगह पर ही  106 सिर कटी आकृतियाँ साथ -साथ खड़ी हैं ।  

  

हवाई मौसम अब भी तीखा था। लेकिन तब भी खुश थी ---चलो आज कुछ नया जानने को मिला।


शुक्रवार, 7 जून 2024

सफर में सफर जैसा जिया वैसा कहा

 

कड़ी 2

3 जून

विंडी सिटी शिकागो एयरपोर्ट से घर 





 

3 जून ,सुबह 10 बजे हम  माँ-बेटे शिकागो एयरपोर्ट पर पहुँच ही गए। टाटा एयरलाइंस में हमें शाकाहारी भोजन बहुत अच्छा दिया गया। साथ ही कर्मचारियों का व्यवहार बड़ा मृदुल था। इस समय मैं व्हील चेयर पर बैठी हूँ। मेरी व्हील चेयर खींचने वाला  छात्र जॉन है । शिकागो  एयरपोर्ट पर विद्यार्थियों का जाल  सा फैला हुआ है । यह काम करते हैं और पढ़ने के लिए पैसा भी कमाते हैं ।मुझे यह नियम बहुत अच्छा लगा। यहां न व्हीलचेयर की कमी  है। न ही उन्हें ले जाने वालों की।  व्हील चेयर सेवा विद्यार्थी ही कर रहे हैं! चाहे वह लड़का हो चाहे लड़की। इसमें पैसा तो मिलता ही है साथ ही  सेवा की भावना भी  उत्पन्न होती है।  बहुत ही  जिम्मेदारी का काम कर रहे हैं । साथ ही बहुत शिष्ट हैं।  हमारे देश में हुए विद्यार्थियों को छुट्टियों का मतलब है आराम या सैर -सपाटे। इन छुट्टियों का सदुपयोग आत्मनिर्भर बनने में किया जा सकता है।इससे वे पैसे की कीमत समझेंगे। आए दिन  सुनने में आता  हैं  --कक्षा छोड़कर मस्ती को निकल गए, फीस जमा न करके वह रकम  शराब पीने या ड्रग लेने में उड़ा दी।  पसीने की कमाई होने पर कुराफत करने से पहले एक बार तो सोचेंगे।


महिला गेराज काउंटर के सामने बैठी मैं उकता गई हूँ।  बेटा सामान खोजने की कोशिश कर रहा है।भारी  अटैचियों  का चक्का गोल -गोल घूम रहा है।  यात्री कितनी भारी अटैचियां उठाकर ट्रॉली पर रख रहे हैं जबकि अपने देश में एक किलो सामान उठाने में भी बेज्जती का अनुभव करते हैं ।नौकर की पुकार मचने  लगती है। अभी मेरे पास से  एक पुलिस महिला ऑफिसर कुत्ते को लेकर निकलीहै  जो लोगों का सामान सूंघ रहा है। इधर -उधर देखता  बड़ा  सतर्क है। सुरक्षा का यह अच्छा तरीका है। स्क्रीन पर आ रहा है Working dogs---Don't touch 


छात्र जॉन मेरे पास ही खड़ा रहा। सामान मिलने पर वह जल्दी से ट्रॉली खींचकर लाया और समान उसमें रखने में बेटे की मदद करने लगा। जॉन कुछ ज्यादा ही भावुक था। सामान मिलने में देरी हो रही थी तब मुझसे पूछने लगा -Will you take water or coffe? I can bring for  you .You should not be hungry for a long time. 

No--no !Thank you my son . मेरे मुंह से निकल पड़ा। अनजानी जगह में एक अंजान से मैं  जुड़ गई। वह मुस्करा दिया। मुझे उसके बोल बहुत प्यारे  लगे ठीक वैसे ही जैसे  उसका चेहरा था। 

दूसरे ही क्षण गंभीर हो गया। बातों ही बातों में उसने बताया--- मेरे मम्मी पापा का डाइवोर्स हो गया है।  मेरी दूसरी मां  ग्रैंड मदर का एकदम ध्यान नहीं रखती । बाहर होने पर मुझे हमेशा उनकी चिंता सताए रहती है। आपको देखकर मुझे अपनी दादी की याद आ गई। आपके बेटे कितने अच्छे हैं जो आपका इतना ध्यान रखते हैं। एक मेरे पिता है । एक महीना में एक बार भी दादी मां से बात करने का समय नहीं मिलता। उसकी बात सुनकर मैं गहरी सांस लेकर रह गई क्योंकि अब बुजुर्गों के प्रति उपेक्षा  का भाव तो हमारे देश में भी मामूली बात हो गई है। 

जॉन मुझे   एयरपोर्ट के बाहर टैक्सी तक छोड़ने आया। मेरा हाथ पकड़ कर के टैक्सी में बैठाया ,फिर बोला  --"Don't forget your stick." टैक्सी स्टार्ट होने तक मैं उसको देखती रही । काश !कुछ समय और उसके साथ बिता पाती।

पोती के घर पहुंचने से पहले ही आकाश  से बातें करती इमारतें दिखाई देने लगी।  मैंने मजाक में कहा-" हमारे देश में तो एक ही ऊंची मीनार है , इतनी सारी कुतुबमीनार यहाँ कहां से आ गईं?  

बेटे ने भी हंसते हुए जवाब दिया --" मां ,यहाँ की कुतुब मीनार अकेली नहीं !अपने पूरे कुनबे के साथ है। एक 70  मंजिली मीनार में तो आपकी पोती भी रहती है।" 

शिकागो झील के पास ही एक गगन चुम्बी इमारत के सामने हमारी टॅक्सी रुकी। जैसे-जैसे मिशीगन लेक के पास आते गए इमारतों का आकार बड़ा होता गया। टैक्सी से उतर कर लगा उस इमारत के सामने तो हम चींटियों के समान हैं। चमचमाती 40 वीं  मंजिल पर हम आए। 

एक नई ऊर्जा के साथ घर में घुसी । कभी सोचा न था कि पोती के घर आऊँगी। वह भी शिकागो जैसी जगह पर । पर उसका प्यार खींच लाया। उसने पिछले वर्ष मुझे परनानी  बनाकर मेरी झोली में अनगिनत खुशियाँ डाल दीं। और संयोग देखो! मेरे और मेरी पड़पोती का जन्मदिन  8मार्च हीहै।जब भी मैंने कहा -बेटा इतनी दूर आने की --इतना लंबा सफर करने की हिम्मत नहीं होती। तो चिढ़ जाती -अम्मा आपको क्या हुआ है ?ठीक ठाक तो हो।बच्चों का इतना स्नेह !अभिभूत हो उठती हूँ। सबसे मिलकर मैंने पूरे घर में चहलकदमी शुरू कर दी। जिज्ञासा ने पंख फैलाने शुरू कर दिये।  शीशे की दीवारों से नीचे झाँककर  देखा --रंग बिरंगे घर एक कतार मेँ बड़े छोटे और मनमोहक बौने से लग रहे थे। कारें चुहिया की तरह फुदकती नजर  आ रही थीं। उनके पीछे ऊंची इमारतों के कतारे। बड़ा भव्य दृश्य !आराम कुर्सी खींचकर बैठ गई।  उसे देखते हुए चाय की चुसकियों सहित थकान मिटाने लगी। 


   पोती ने बड़े शौक व मेहनत से मेरा मन पसंद सब्जियाँ बनाईं । खाने बैठी तो बोली-”अम्मा अभी गरम गरम रोटी बनाती हूँ।” 


“न बेटा !चावल ही खा लूँगी। रोटी बनाएगी -गंदगी होगी,चार बर्तन ज्यादा होएंगे ,फिर उन्हें धोएगी!बड़ा झमेला है!”

मैं तो अपना राग ही अलापती  रही---- उसने घी की सौंधी -सौंधी खुशबू भरी रोटी  मेरी थाली मेँ भी रख दी। 

“ऐन!तेरा गैस चूल्हा तो बंद है। रोटी कैसे बनी!"

"अम्मा यह सब रोटी मेटिकरोटी  रोबो का कमाल है। उसे पानी, आटा और घी दे दो । अपने आप आटा गीला करके फुल्ली रोटी बना देगा।"

मैंने भरपेट खाया तो बस आँखें बोझिल होने लगीं।  कल रात  जागने की इच्छा होते हुए भी अपने को जगा कर नहीं रख पाई।  अपने देश का चुनावी धमाका देखना था। मन मार कर सो गई लेकिन लगता है कि रात भर मुझे चुनावी  दुनिया के सपने आते रहे। 


 



सफर में सफर --जैसा जिया वैसा कहा (शिकागो यात्रा )

बैंगलोर से शिकागो यात्रा की शुरुआत 

लो मेरी यह यात्रा  2जून को शुरू हो गई ।  बैंगलोर एयरपोर्ट के शानदार लॉज में मैं अपने बेटे के साथ बैठे कुछ खा पी रही हूं। साथ ही इंडियन एयरलाइंस का इंतजार किया जा रहा हैजो हमें दिल्ली लेकर उड़ेगी।पिछले वर्ष कैलिफोर्निया क्यूपरटीनों तो गई थी। पर बड़ी पोती के पास ठंड के कारण न जा सकी । जब से उसने मुझे परदादी बनाया है तबसे उसके पास जाने की लालसा बढ़ती ही गई । मेरी पड़पोती भी बहुत प्यारी और सुंदर परी सी है। संयोग की बात --उसका मेरा जन्मदिन एक ही है 8मार्च। वास उसकी तरफ खिंची चली जा रही हूँ।






मंगलवार, 22 फ़रवरी 2022

रोटेरी त्वचा दान निबंध प्रतियोगिता


विषय -त्वचा दान ,संक्षिप्त परिचय एवं उसका महत्व

 सुधा भार्गव

त्वचा दान की अवधारणा एवं उसकी जागरूकता 


 


    ईश्वर ने हर जीव को एक सुरक्षा कवच के साथ इस दुनिया में भेजा है और वह है त्वचा। यह प्रदूषण ,बदलते परिवेश में रासायनिक तत्वों और कीटाणुओं से उसके शरीर की  रक्षा करता है। लेकिन आजकल इसके क्षत -विक्षत होने में देर नहीं लगती। आए दिन सड़क दुर्घटनाएँ , जलने-जलाने,आग से झुलसने -झुलसाने की आकस्मिक घटनाओं ने इंसान का जीना दूभर कर दिया है। तेजाब फेंककर किसी का जीवन बर्बाद करने की वीभत्स जानलेवा लीला और शुरू हो गई हैं। चोटों और जलने के छोटे घाव पर तो रोगी के बिना जले हिस्से से त्वचा को काट कर डाल दिया जाता है। पर 60-80%शरीर के जल जाने पर रोगी की त्वचा का उपयोग नहीं हो सकता  । ऐसे में दान की त्वचा वरदान सिद्ध होती है। जो छ्ह घंटे के अंदर मृतक शरीर के पीठ,पेट या जांघ-पैर से निकालकर त्वचा बैंक में सुरक्षित कर दी जाती है।  वैसे तो त्वचा की आठ परतें होती है पर सिर्फ ऊपर की परत ही निकाली जाती है। कैडेवर त्वचा संक्रमण को रोकने, यंत्रणा  को कम करने,  घावों या जले  भाग की चिकित्सा में अद्भुत मददगार  है।  हालांकि मृत व्यक्ति की  त्वचा से की गई अस्थाई ड्रेसिंग विकल्प के रूप में ही कार्य करती है, लेकिन रोगी की त्वचा के उत्थान में यह एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसी मनोदृष्टि से त्वचा दान की अवधारणा विकसित हुई । पर जागरूकता की कमी के कारण यह अपने विकास की प्रथम सीढ़ी पर ही प्रतीत होती है।

    कुछ दिनों पूर्व मुझे ही नहीं पता था कि त्वचा  दान  क्या है? इसके बारे में अपने मित्रों से बातें कीं  तो जाना, शहरी शिक्षित वर्ग भी मेरी तरह अंजान है। डॉक्टर रिश्तेदारों को खखोड़ा। उन तक को नहीं मालूम त्वचादान किस चिड़िया का नाम है। पर मैंने उनके दिमागी दरवाजे पर दस्तक दे ही दी । उन्होंने अपने परिवार में चर्चा की,मित्रों से बातें की।एक दूसरे के विचार  मेरे साथ साझा हुये । कहने का अभिप्राय केवल इतना है कि त्वचा दान के प्रति दूसरों में जागरूकता फैलाने से पहले यह अभियान हम अपने से ही क्यों न शुरू करें।कड़ियाँ तो उसमें स्वमेव ही जुड़ती चली जाएंगी।   

   हमारा देश विविधता का देश है। धार्मिक कट्टरपंथी और अंधविश्वासी आत्मा-परमात्मा ,पाप -मोक्ष के कुंड में स्नान करते रहते हैं । अगले जन्म से जुड़े अंतिम अनुष्ठानों से हर भारतीय का अटूट संबंध है । उन्हें समझना -समझाना दहकते अंगारों पर लोटने से कम नहीं।  

    ऐसी परिस्थिति में त्वचा दान कहने की बात बहुत भारी पड़ती है। हम भारतीय जानते हैं मरने के बाद शरीर नश्वर  है पर तब भी भावनाओं -संवेदनाओं के वशीभूत अधिकांशतया मृतक शरीर के छिन्न -भिन्न होने की कल्पना से ही सिहर जाते हैं ।

    लोगों की सोच तो लेकिन बदलनी होगी। उन्मादी इंसान के अमानवीय कृत्यों के परिणामस्वरूप 60%से 80 %जले लोगों को बचाने के लिए मृतक की त्वचा  सुरक्षित करनी  ही होगी  वृहद पैमाने पर लोगों में चेतना  लानी होगी । इसके लिए उनके दिमाग में उठने वाले हर प्रश्न का उत्तर देना होगा। जैसे  त्वचा दान की आवश्यकता क्यों है  ?त्वचा कब  कैसे और किसकी  ली जाती है ? त्वचा  सुरक्षित कहाँ रखी जाती है? इससे किस तरह से लोगों की जान बचाई जा सकती है?आदिआदि। मानसिक तौर से पूर्ण संतुष्ट होने पर ही लोग त्वचा दान की ओर कदम बढ़ाएँगे।

   इन सब प्रश्नों का उत्तर वही दे सकता है जिसको त्वचा और त्वचा दान से संबन्धित पूरा पूरा ज्ञान हो। इसके लिए अनेक महत्वपूर्ण कदम उठाने होंगे।

    मेडिकल स्नातक के पाठ्यक्रम में त्वचा बैंक ,त्वचा दान जैसे विषय भी शामिल होने चाहिए। उसके बाद लेखक प्रकाशक व स्नातक के सहयोग से ऐसी पुस्तकें प्रकाशित होनी चाहिए जिनमें शरीर रचना विज्ञान और सर्जरी को त्वचादान से जोड़ दिया जाय। 80%जले हुए लोगों के पुन :जीवन दान में त्वचादान के महत्व का उल्लेख हो।  त्वचा विशेषज्ञ डॉक्टर्स किताबें लिखें। वे  अपने सकारात्मक प्रेरक अनुभव बताकर लोगों की सोच बदलने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं । मेडिकल स्नातक छुट्टी के दिन स्वयंसेवक के रूप में जन संपर्क द्वारा त्वचा दान के महत्व को उजागर कर लोगों का  ध्यान इस ओर आकर्षित  करने में सफल रहेंगे।

     त्वचा दान जैसे गंभीर विषय को बाल साहित्य व किशोर साहित्य से भी जोड़ सकते हैं। कहानी -कविता  द्वारा खेल खेल में अति दिलचस्प तरीके से त्वचा दान की जरूरत व महत्व पर प्रकाश डाला जा सकता है । इससे यथार्थता की भूमि पर पैर टिकाये इस विषय से वे एकदम अनभिज्ञ न रहेंगे।

    तेजाब हमले से पीड़ित लक्ष्मी अग्रवाल के जीवन पर आधारित मूवी छपाक देख इंसान दर्द से कराह उठता है । जनता का बहुत बड़ा वर्ग एसिड अटैक के खिलाफ उठ खड़ा हुआ है । जलने -जलाने की घटनाओं पर शॉर्ट मूवीज बनाकर फिल्म इंडस्ट्री अहम भूमिका निभा सकती है।

     त्वचा दान द्वारा स्वस्थ हुये रोगियों की कहानियों का प्रचार किया जाना चाहिए फिल्में, वृत्तचित्र ,मीडिया इस के प्रसार में मदद करेंगे।  त्वचा बैंक के लाभार्थी भी जोरदार अभियान चलाकर लोगों को प्रेरित कर महसूस करा सकते हैं कि जीवन समाप्त होने के बाद भी समाज को कुछ देना है ।

     अंगदान के नाम से ही लोग डरते हैं । डॉक्टर्स तक किडनीदान ,नेत्रदान के लिए आगे नहीं आते हैं। फिर गैर चिकित्सा व्यक्ति से उम्मेद लगाना बेईमानी सी लगती है। डर दूर करने के लिए उन लोगों से  संपर्क किया जाय जिनके रिशतेदारों ने मृत्यु पर्यंत त्वचा का दान किया  या जिन्होंने त्वचा के दान का मन बना लिया है।उनके अनुभव से अवश्य भय को  राहत मिलेगी।  

    फौलादी इरादों वाली असहनीय यंत्रणा भोगी लक्ष्मी अग्रवाल ,एसिड अटैक सरवाइवर प्रज्ञा प्रसून जैसे लोगों को विशेष कार्यक्रमों में  निमंत्रित कर जनता से साक्षात कराया जाए तो उनकी कही-अनकही व्यथा वास्तविकता के कपाट खोले बिना न रहेगी ।

    त्वचा को सुरक्षित रखने के लिए त्वचा बैंकों की संख्या भी बढ़ानी पड़ेगी । डॉक्टर्स को बर्न विशेषज्ञ बनने के लिए उत्साहित करना होगा। तभी तो जागरूकता के परिणाम अच्छे  होंगे।

   माना त्वचा दान की प्रक्रिया अभी शैशव अवस्था में है, प्रौढ़ता तक पहुँचने में उसे वर्षों लग जाएँगे। पर अंधेरे में बैठने से तो अच्छा है उम्मीद का एक दिया जलायें! क्या जाने उसकी रोशनी में अनगिनत दिये झिलमिला उठें और हजारों बिलखते- तड़पते लोगों को जिंदगियाँ मुस्करा उठें।



**

 

  

रविवार, 23 जनवरी 2022

निबंध -प्रकाश प्रदूषण

 प्रकाश प्रदूषण 

सुधा भार्गव 

    स्वस्थ जीवन के लिए स्वस्थ वातावरण की आवश्यकता है। प्राकृतिक व्यवस्था को अव्यवस्थित करने की चेष्टा में पर्यावरण दूषित होने लगता है, तब प्रदूषण की समस्या उत्पन्न होती है। यह आधुनिक औद्योगिक शहरी सभ्यता की देन है।

IMG_0203.JPG

दिन की जगमगाहट 



प्रकाश प्रदूषण पर्यावरण को बहुत कुछ प्रभावित करता है। बिजली के आविष्कार से जन जीवन आरामदायक तो हो गया पर जब इस कृत्रिम रोशनी का दिन -रात जरूरत से ज्यादा उपयोग होने लगा तो प्रकाश प्रदूषण की समस्या उत्पन्न हो गई। 


IMG_5244.JPG

रात की चकाचौंध 

     पृथ्वी का वातावरण ग्रीन हाउस की सतह के रूप में काम करता है और यह पृथ्वी की सतह को गरम रखने में सहायक है ।वरना ठंड के कारण जीवन दूभर हो जाता। सूर्य की ओर से आने वाली ऊर्जा, प्रकाश किरणों के रूप में एक सतह को पार कर ग्रीनहाउस  तक आती है। ग्रीनहाउस में कार्बनडाय आक्साइड ,नाइट्रस ऑक्साइड आदि होती हैं जिससे धरती का तापमान बढ़ जाता है। कृत्रिम रोशनी के कारण इन गैसों की मात्रा में वृद्धि होती है और पर्यावरण प्रदूषण को बढ़ावा मिलता है। जलवायु में बदलाब आ जाते हैं। ग्लोवल वार्मिंग का यह मुख्य कारण है।  

    आधुनिक प्रकाश व्यवस्था में दुनिया की एक चौथाई बिजली नष्ट हो जाती है,मनों टन कोयला फूँक जाता है। यदि हम चाहे तो इसको अपनी कुशलता से बहुत हद तक  रोक सकते हैं। प्रदूषण से भी मुक्ति मिलेगी और  बिजली भी बचेगी। इस बची बिजली से न जाने कितने घर रोशन हो जाएँगे,कितने ही उद्योग पनप सकते हैं। 

    शहरी सड़कों की जगमगाहट और सिनेमा हॉल ,रेस्टोरेन्ट ,मॉल विज्ञापन ,कार्यालय और उत्सवों में फील्ड लाइट,ट्यूब लाइट  का ऐसा चलन हुआ है कि बाहर तो यह आँखों को चकाचौंध करती ही है, 

FullSizeRender (4).jpgFullSizeRender (3).jpg

रेस्टोरेन्ट-उत्सव 

खिड़कियों और दरवाजों से घुसकर घरों में भी आसान जमाये है। कोठियों और इमारतों में रात को सुरक्षा की दृष्टि से होने वाली रोशनी से प्रदूषण बढ़ता है। यह रात में साफ दिखाई देता है। रात के वक्त आकाश की चमक-दमक पर दृष्टि डालें तो उसमें मध्यम रोशनी की धुंध भी नजर आएगी। यही प्रदूषण हैं। 

images.jpg

प्रकाश प्रदूषण

 इस प्रदूषण से पूरा भूमंडल खतरे में है। पौधों को अंधेरा और रोशनी दोनों की जरूरत है।  अंधेरा बीज को फूल में बदलने और रोशनी पौधों को ज़िंदगी देने में मदद करती है।रात की कृत्रिम रोशनी के कारण वे खिलने से पहले ही मुरझा जाते हैं। कुछ पौधों की तो प्रजाति ही लुप्त हो रही है। 

     ऊंची जगरमगर करती इमारतों के कारण प्रवासी पक्षी अपने रास्ते से भटक जाते हैं। न जाने कितने रोशनी से आकर्षित होने के कारण इनसे टकराकर मरते  हैं। पक्षी -अंधेरा होते ही अपने घोंसलों में बच्चों के साथ विश्राम करते हैं पर रात में भी रोशनी देख उलझन में पड़ जाते हैं कि यह दिन है या रात। उनकी नींद में खलल पड़ता है। परेशान से एकांत जगह में पलायन करने की कोशिश में लग जाते हैं। कुछ की तो दिनचर्या ही अंधेरे से शुरू होता है। 

उल्लू को भूख लगी तो शिकार की तलाश में असमंजस सा निकाल पड़ता है क्योंकि प्रकाश प्रदूषण के कारण उसे तारे ही नहीं दिखाई पड़ते। कृत्रिम रोशनी उसकी दृश्य शक्ति को कम कर देती है।

रात में स्पष्ट दिखाई देने के कारण चमगादड़,हिरण आदि  गतिशील रहते है पर उनकी भी दृष्टि बाधित होती है । न ठीक से पेट भर पाते हैं और न उड़कर या चौकड़ी भरते दूर जा पाते हैं। कछुए और मेढक की तो  एकांत व अंधेरे में ही प्रजनन क्रिया व यौन संबंध संभव है।रोशनी से उनकी एकाग्रता में बाधा पड़ती है। 


   IMG_0212.JPGIMG_0213.JPG

    खगोलीय वेधशालाओं के कार्य भी सुचारुरूप से नहीं हो पाता है। याद आते हैं बचपन के वे गर्मियों के दिन जब रात को खाने के बाद छत पर चढ़ जाते थे।चमकते चंद्रमा और तारों की बारात देख ठंडक सी महसूस होती थी और मन खिल-खिल उठता था। हमारी नजरें पल में ही  सप्त ऋषि और चमचमाते ध्रुव तारे को खोज लेती थीं। बाबा बालक ध्रुव की कहानी सुनाया करते थे। आज के बच्चे प्रकृति की इस छटा से अछूते हैं।  महिलाएं अपने पति की दीर्घायु के लिए बड़े चाव से करवाचौथ का व्रत करती हैं। सारे दिन भूखी रहकर चंद्रमा के दर्शन करके ही उपवास तोड़ती हैं। पर उस दिन बेचारी आकाश में चंद-सितारे  खोजती ही रह जाती हैं। निकलने पर भी प्रदूषण के कारण वे देर से दिखाई देते हैं या दिखाई ही नहीं देते हैं। 

बिजली का प्रकाश सूर्य के प्रकाश से बराबरी नहीं कर सकता। सूरज की रोशनी से विटामिन डी मिलता है, और दिमाग अपना कार्य सुचारूरूप से करता है। सूर्य की रोशनी से दिमाग में सेरोटोनिन (serotonin)हारमोन रिलीज होता है जिससे मिजाज ठीक रहता है। चिड़चिड़ाहट उदासीनता कोसों दूर  भागती है। चित्त शांत होने से एकाग्रता में वृद्धि होती है। रोशनी के साथ-साथ तंदरुस्ती के लिए रात का अंधकार भी आवश्यक है। क्योंकि अंधेरे में मेलाटोनिन (melatonin)हारमोन रिलीज  होता है जिससे जीव नींद का अनुभव करता है। गहरी निद्रा से हमारी सारी थकान तनाव जाता रहता है। सुबह एक नई ताजगी और जोश लिए उठते है। दिन में बिजली के प्रकाश में घिरे रहने से कार्य क्षमता कम हो जाती है। साथ ही आलस और तनाव के शिकार होते हैं।

घरों में भी तो फ्लोरेन्स ट्यूब और शानशौकत के मारे तेज रोशनी का आलम रहता है। अनिद्रा, सिरदर्द ,माइग्रेन दर्द  हमारा पीछा करने लगते हैं। । तेज रोशनी आँखें बर्दाश्त नहीं कर पातीं। इससे  देखने की शक्ति कुम्हला उठती  है। बूढ़ी और कमजोर आँखें तो दर्द करने लगती है। 

IMG_0205.JPGIMG_0206.JPG


विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार –महिलाओं में स्तन कैंसर का एक कारण अति प्रकाश भी है। जहां तक हो सके अंधेरे में सोएँ और रात में घर के लैपटॉप ,दूरदर्शन भी बंद कर दें। खिड़की के पर्दे डाल लें ताकि सड़कों के प्रकाश से बचा जा सके। 

    मनुष्य की आँखों के रेटीना में फोटो सेनसिटिव सैल होते हैं जो मस्तिष्क की पिटयूटरी ग्लेण्ड से जुड़े रहते हैं । सूर्य की रोशनी से ही ये सेल उत्तेजित होते हैं।  

IMG_0210 (1).JPG

इसका प्रभावन केवल दिमाग पर ही नहीं बल्कि पूरे शरीर पर होता है। इससे रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ती है।  

    इस तरह से स्वास्थ्य  की दृष्टि से  सूर्य की रोशनी ही उत्तम है पर बिजली की रोशनी के बिना भी काम नहीं चलेगा। इसके प्रयोग में थोड़ा सावधान रहना पड़ेगा। 

    कृत्रिम रोशनी देने वाले उपकरणों की फिटिंग इस प्रकार की जाय  कि उससे निकलने वाली रोशनी ऊपर की ओर कम जाय। बल्ब,ट्यूब लाइट नीचे की तरफ झुकाकर लगाए जाएँ जिससे हमारे शरीर पर उनका प्रकाश कम पड़े और आँखों में चौंध न पैदा हो।सजावट विज्ञापन व उत्सवों में आवश्यकता के अनुसार ही बिजली का प्रयोग हो और सूर्य की प्रथम किरण के साथ ही बत्तियाँ गुल कर दी जाएँ । जन -जन को समझना होगा कि बिजली के दुरुपयोग से ऊर्जा ही खर्च नहीं होती अपितु धन का अपव्य भी होता है । उसे बचाकर हम देश के विकास में हाथ बंटा सकते हैं।  खुशी है रोशनी प्रदूषण के प्रति देशवासियों को सचेत किया जा रहा है। कल की ही तो बात हैं टी॰ वी॰ में बच्चे नारा लगा रहे थे- - - 

बिजली बचाओ,देश बढ़ाओ। 

इतनी सूझबूझ! उनके चार शब्दों में मेरे हजार शब्द समा गए। मुझे अपना कद छोटा नजर आने लगा।