गुरुवार, 7 फ़रवरी 2013

सुविख्यात लघुकथाकार बलराम अग्रवाल व मीरा जी के साथ बिताये पल

बैंगलोर का वह ख़ास दिन 

4फरवरी 2013

उल्लास ,उमंग व आशाओं से भरे नए वर्ष के आरम्भ होते ही जनवरी  से बलराम अग्रवाल व् मीरा जी दिल्ली से बैंगलोर आये हुए हैं और अपने बच्चों के संसर्ग में रहकर बैंगलोरी मौसम की खुश मिजाजी का आनंद उठाने में व्यस्त हैं |




मेरा कलकत्ते जाने का प्रोग्राम बन चूका था  जब उनके आने की सूचना मिली। ,मन परेशान हो उठा कि कलकत्ते से लौटते -लौटते कही देर न हो जाये और उनसे मिलना ही न हो लेकिन जब आश्वासन मिला  कि वे 10 फरवरी को  वापस जायेंगे तब कहीं राहत मिली ।असल में राजेश उत्साही भी बैंगलोर से बाहर गए हुए हैं  ।वे   फरवरी में लौटने वाले थे और मैं 29 जनव्री को  ।इसलिए सबसे मिल मिलाकर  बलराम जी ने 10 फरवरी को  दिल्ली लौटना ठीक समझा ।


कलकत्ते से लौटते ही हमने एकदूसरे को फ़ोन और ई मेल खटखटाए और मिलने का समय निश्चित किया ।मैंने राजेश जी को भी फ़ोन किया था ताकि वे बलराम जी से मिल लें पर वे  10 फरवरी को आयेंगे ।

व्यक्ति गत रूप से तो मैं इनको पिछले तीन वर्षों से जानती हूँ ।वह भी रामेश्वर काम्बोज जी की बदौलत ।लघुकथा डॉट कॊम के जरिये तब तक मेरा उनसे परिचय हो चुका था और कविता की धरा छोड़ लघुकथा  लिखकर भेजने  लगी थी।
बलराम जी एकबार बैंगलोर आये थे ।उस समय उनहोंने काम्बोज जी से ही पूछा था -बैंगलोर में कौन -कौन हिन्दी साहित्यप्रेमी हैं ?उन्होंने उनको मेरा और मुझे उनका सम्पर्क सूत्र पकड़ा दिया ।आगामी वर्ष काम्बोज जी ने उन्हें राजेश उत्साही का संपर्क सूत्र पकडाया जो मुझे दे दिया गया ।क्या इत्तफाक है !
लेकिन ----अग्रवाल जी के  रचना संसार से  मैं पहले से ही अवगत थी ।
कैसे ?
इसके पीछे  भी एक लघुकथा है ।

2007 में जब तीन मास को लन्दन आई तो मेरे सामने प्रश्न था किस तरह समय खूबसूरती से बिताया जाय ।इसी तलाश में हौंसलो लाइब्रेरी(treaty centre) गई ।वहां बलराम के कई लघुकथा संग्रह देखे ।बीसवीं सदी की लघुकथाएं पढीं ।पढने में बड़ा आनंद आया ।दो मिनट में चटपट ख़तम और सोचने के लिए बहुत कुछ । कुछ तो हमेशा के लिए मास्तिष्क पटल पर अपनी छाप छोड़ गईं जैसे सर्वोत्तम चाय ,नागपूजा आदि ।इन्हें तो मौके के अनुसार सुनाने से नहीं चूकती ।तभी से साहित्य की इस विधा से ऎसी जुड़ी की अधिक से अधिक लघुकथाएं पढ़ने लगी मनभावन लघुकथाओं को उनके लेखकों सहित डायरी में नोट कर लेती ।इस अंतराल मैंने जाना कि बलराम अग्रवाल जी लघुकथा जगत के ऐसे हस्ताक्षर हैं जो कलम  के धनी होने के साथ -साथ लघुकथा की परख -समझ ही नहीं रखते अपितु ब्लॉगस ,अनुवाद ,सम्पादन व् महत्वपूर्ण लेखों ,-वार्ताओं द्वारा साहित्य की इस विधा को बहुत कुछ दिया है ।

वे जहाँ ठहरे हुए हैं वह जगह मेरे निवास स्थल सर्जापुर रोड  से काफी दूर है पर वे कष्ट उठाकर पिछले सोमवार (4फरवरी ) को मीरा जी सहित मुझसे मिलने आये ।
घर पर उनका दूसरा ही रूप था -मिलनसार ,मैत्रीपूर्ण व् भ्रातृत्व भावना से ओतप्रोत सहजता सरलता ।

     जैसी सोच वैसे विचार ,जैसे विचार वैसा ही लेखन -यह कथन उनके एकांकी नाटक शिवाजी की बहन  पर खरा उतरता है ।आज ऐसे ही 
  
 नाटकों के  लिखने और मंचन कीआवश्यकता है जो बच्चों में स्नेह की गंगा बहा सके और देश के प्रति उन्हें अपने कर्तव्य की याद दिलाये।
मैंने तो इनका यही एकांकी पढ़ा है जो हाल  में बालवाटिका पत्रिका में प्रकाशित हुआ है ।अवसर मिलने पर इनके अन्य  एकांकी भी पढ़ डालूंगी |

लंच के बाद हम आराम से साहित्य चर्चा करने बैठ गए ।


 कलकत्ते से निकलने वाली साहित्यिकी हस्तलिखित पत्रिका    के लघुकथा विशेषांक पर बलराम जी ने अपने अमूल्य विचार व्यक्त किये थे ।इसके लिए इस पत्रिका के सब सदस्य बहुत आभारी हैं ।आगामी अंक -व्यस्तता के बीच अकेलापन -में उनके विचार  प्रकाशित होंगे ।

कलकत्ते से चलते समय विद्या भंडारी ने अपना लघुकथा संग्रह मुझे दिया था ताकि वरिष्ठ लघुकथाकारों से इसके बारे में सुझाव या उपयुक्त दिशा पा सकूँ ।उस पर भी बातें हूई।

पिछली बार जब बलराम जी से मुलाक़ात हुई थी तो  सुझाव दे गए थे  -वर्ल्ड आफ चिल्ड्रनस लिटरेचर  के सदस्य बन जाओ ।सच में इस सदस्यता से मुझे बहुत लाभ हुआ और अनेक बालसाहित्यकारों की जानकारी मिली ।
इस बार भी सोचा कुछ ऐसा ही मन्त्र हाथ लगेगा  उनकी संगत में ,पर कुछ याद नहीं पड़ रहा ।हाँ !फैमिली ट्री  बनाना जरूर सिखा  गए हैं ।सोच रही हूँ इसका भी उपयोग किया जाय।ज़रा फैमिली ट्री  ख़तम कर लूँ फिर फ्रेंड्स ट्री  बनाऊँगी ।

मीरा जी  ने रसोईघर में मेरा हाथ बँटाया ।घंटों का काम मिनटों में हो गया । इतना अपनापन व् आत्मीयता का संगम था कि मुझे ज़रा भी आभास नहीं हुआ कि वे मेहमान हैं ।प्रतीत हुआ घर के सदस्यों से अनुराग भरी नि:संकोचता की डोर से बंध  गई हूँ ।

मैंने एक बात महसूस की जिससे मुझे बहुत खुशी मिली ।मीराजी  अपने पति के लेखन संसार से पूर्णतया परिचित हैं और वे उनके सृजन में रूचि लेती हुई भरसक सहयोग देने की कोशिश करती हैं ।इस नजरिये से बलराम जी बहुत भाग्यवान हैं ।

हँसते- खिलखिलाते .साहित्य की गहराई में डूबते -उतराते काफी समय बीत  गया ।बलरामजी चलने के लए उठ खड़े हुए ।आते तो सब अच्छे लगते हैं पर जाते हुए कॊई नहीं ।इसीकारण उन्हें   रोकने  की कोशिश में बोली -कुछ फोटोग्राफी हो जाय और एक -एक कप चाय ।
चाय का सिप लेते समय स्वर्गीय  इंदु जैन का एक वाक्य  रह -रहकर घुमड़  रहा था  -भागदौड़ की जिन्दगी में सुकून पाने के लिये  इतना समय जरूर होना चाहिए कि दोस्तों के साथ बैठकर एक कप चाय पी ली जाय ।

अब अग्रवाल दम्पति का और रुकना नामुमकिन था ।काफी लंबा सफर तय करने के बाद उन्हें अपने गंतव्य स्थान पर  भी पहुँचना था ।
उनके जाने के बाद कम्प्यूटर से स्काई पी ,,ईमेल ,फेसबुक और ब्लोग्स झाँक -झाँककर मोबाइल फ़ोन से कहने लगे -भइये ,हमने मिलकर दुनिया बड़ी छोटी कर दी है ।न जाने कौन -कहाँ -किस्से टकरा जाये इसलिए बस एक सूत्र में बंधे  रहो ।




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मंगलवार, 5 फ़रवरी 2013

मेरा कलकत्ता -- मेरे दोस्त

  
 यादों के नए परिधान

नए साल  2013 ने जैसे ही धरती पर अपने   कदम  बढ़ाये मैंने अपने से वायदा किया कि  यादों के शहर में जरूर  जाऊँगी  जहाँ जिन्दगी के सबसे अनमोल चालीस साल बिताये ।वह है कोलकता शहर जहाँ के  खट्टी मीठे अनुभवों का गुच्छा सदैव अपने साथ रखती हूँ ।






14 जनवरी को  वहां पहुँचते ही फ़ोन खटखटाने शुरू कर दिए ताकि ज्यादा से ज्यादा मित्रों से मिला जा सके ।इस में मेरी सहेली जयश्री दास गुप्ता ने मेरी  बहुत मदद की ।कहते हैं --अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता --अगर वह नहीं होती तो मेरी यात्रा सफल न हो पाती ।मैं उसी के  निवास स्थान पर रुकी थी ।



मैंने उसके साथ बिरला हाई स्कूल में 22 वर्षों तक साथ -साथ पढ़ाया ।22वर्षों में इतनी बातें नहीं हुई होंगी जितनी दो हफ्ते में हम दिल खोल बैठे ।हर पल छाया की तरह मेरे साथ रहती ।मजाल है कहीं अकेली तो चली जाऊं ।कौन कहता है रिश्ते जन्म से होते हैं ,रिश्ते तो बनाये जाते हैं जिसकी धुरी केवल निश्छल प्रेम ही होती है ।और हाँ उसने मुझे खूब सन्देश और मिष्टी दही खिलाया ।




कभी -कभी तो चिंता में पड़  जाती थी कि कहीं कमर कमरा न हो जाए पर यही सोचकर --चार  दिन की चांदनी फिर अँधेरी  रात --पटापट खा जाती  ।यही नहीं --जिस मित्र  के जाती वहां भी सन्देश खाने को मिलता ।

कितने समझदार हैं मेरे मित्र --!जानते हैं जबसे मेरा कलकत्ता छूटा सन्देश के नाम से ही भूखे ब्राह्मण की तरह लार टपकने लगती हूँ ।

सबसे पहले सत्यवती तिवारी जी से  मैंने मिलना चाहा ।वे बिरला हाई  स्कूल में मेरी सीनियर रह चुकी हैं। हम दोनों ही हिन्दी पढ़ाते  थे पर मैंने अध्यापन के दौरान उनसे बहुत कुछ सीखा ।  ।जयश्री रासबिहारी एवेन्यू में रहती है और सत्यवती जी टालीगंज में ।उनके घर जाना हमें कठिन लगा ,हम बड़ी दुविधा में पड़े थे पर सत्यवती  जी ने हमें उबार लिया ।निश्चय हुआ कि  वे हमें लेने आ जायेंगी ।

वे समय पर लेने आ गईं पर कार टालीगंज की तरफ न मुड़कर मिन्टोपार्क की ओर मुड़  गई और बिरला हाई स्कूल दिखाई दिया  |



लगा अभी नटखट -मासूम बच्चे दौड़कर आयेंगे और चिल्ला उठेंगे --हिन्दी मिस --हिन्दी मिस ।


यह वही विद्या का मंदिर है जहाँ योग्य शिक्षक- शिक्षिकाओं  के प्रयास से मेरे दोनों बेटे  रवि -रजत उन्नत पथ पर अग्रसर हुए रजत  सीनियर स्कूल में कक्षा ,6,7,8,में लगातार प्रथम पोजीशन लाया  और मुझे विशेष अतिथि बनने  का सुअवसर मिला ।मैंने उस वर्ष के मेधावी छात्रों को इनाम वितरित किये ।



जड़ें तो उनकी जूनियर हाई स्कूल में ही जम चुकी थीं और उन दिनों  वहां की प्रिंसपल मिसेज एन . बाली थीं जो सर्वगुण संपन्न .कर्तव्यनिष्ठ व् साहसी महिला हैं |



वे दिन उमड़ घुमड़कर शीतल बूंदों की बरखा करने लगे जब  हम हर क्षेत्र में कूद पड़ते थे  ---
चाहें वह खेल का मैदान हो 




चाहें मंच हो




और चाहे साथियों  के स्वागत का समय हो या उनकी विदायगी का ।




 कार आगे बढ़ गई ।खरगोश से फुदकते ख्याल पीछे ही छूट गए ।
दो मिनट के बाद ही गोविन्द रेस्टोरेंट के आगे कार रुक गई ।

-अरे हम यहाँ कहाँ ?मैं आश्चर्य में थी ।
-यह सेंटर प्लेस हैं और मेरा घर एक कोने में पड़  जाता है ।यहाँ अन्य   सहेलियाँ   भी मिलने आ सकेंगी ।स्कूल में हमारे समय की  कुछ ही शिक्षिकाएं  हैं ।फ्री पीरियड होने पर वे भी यहाँ तक पहुंच सकेंगी  ।फ़ोन से उन लोगों को  सूचना  दे दी गई  है ।सत्यवती जी बोलीं ।
मुझे उनकी बुद्धि की दाद देनी पड़ी ।मेरी खोपड़ी में यह विचार आया ही नहीं  ।असल में सीनियर सीनियर ही रहते हैं । 

गोविन्द रेस्टोरेंट पहुँचते ही सविता महरोत्रा दिखाई दीं । चहरे पर प्रशासकीय गरिमा की छाप थी ।वे अब भी स्कूल में प्रशासकीय विभाग में अति मुस्तैदी से अपना कर्तव्य पूर्ण कर रही  हैं ।

कुछ ही देरी में सुमन महेश्वरी व् रीता  कपूर भी  स्कूल से आ गये। पहले जी  भर गले मिले ।चेहरे से खुशी टपकी पड़ती थी ।दिल की धडकनें उसकी गवाह थीं ।रीता  तो जल्दी चली गई क्योंकि उसे क्लास लेनी थी पर कुछ ही देर में बहुत कुछ दे गई अपना असीमित स्नेह

लंच करते -करते दो2-3घंटे कैसे गुजर गए पता ही नहीं लगा ।सब एक दूसरे के परिवार की खुशहाली व् वृद्धि के बारे में जानने  को उत्सुक थे ।पता लगा  हम सबको कई उपाधियाँ  मिल गई हैं ।कोई दादी माँ बन गया है तो कोई  नानी माँ --कोई  बड़ी माँ  बनने  का सपना संजो रहा है ।

विभिन्न विचार ,विभिन्न व्यक्तित्व के होते हुए भी समरसता का अभाव  न था ।.
पुरानी यादों को एक नया अम्बर मिल चुका था ।सदैव जुड़े रहने के लिए ईमेलआई डी ,मोबाइल न .का आदान प्रदान हुआ ।मीठी -मीठी  यादों पर समय की धूल न पड़ने का संकल्प करते हुए हम अपनी -अपनी दिशा  की ओर बढ़ गए

सपना मुखर्जी अस्वस्थ होने के कारण मिलने न आ सकी ।इंग्लिश पढ़ने वालों में उसका अच्छा -खासा नाम था। मैं और जयश्री उससे मिलने गए ।कोयल सी मीठी आवाज में उसने हमारा स्वागत किया ।हमें देखते ही उसके चेहरे पर हजार गुलाब खिल गए ।तबियत ठीक न होने पर भी उसने घर पर ही लंच बनाया ।आह !दही बड़े तो लाजवाब थे ।होते भी क्यों न !वे दही बड़े के अलावा और भी बहुत कुछ थे ।जबसे उससे जुदा हुई हूँ उसके स्वास्थ्य के लिए ईश्वर से दुआ करती हूँ ।

रीता खंडेलवाल से भी मिलना हुआ ।पिछले माह ही रिटायर हुई है पर वही हँसमुख गोल -गोल चेहरा ----।हँसे तो लगे चारों ओर  चांदनी छिटक गई है ।हम पहुंचे तो उसकी  प्यारी सी पोती ने शर्माते हुए  नमस्ते की ।उसकी हिचकिचाहट  दूर करने के उद्देश्य से  मैंने उसके खेल खिलौनों व् कहानी की पस्तक के बारे में बातें करनी शुरू का कर दीं ।उसने मुझे अपनी ड्राइंग भी दिखाई ।फिर तो मैं उसकी अच्छी दादी बन गई  ।उसके हाथ की बनी चाट और घुघनी  खाने का मन बहुत था ।स्कूल में अक्सर वह बनाकर लाती थी और हम सबको बड़े शौक से खिलाती ।समय अभाव्  के कारण मेरे कहने की हिम्मत नहीं पड़ी ।

हँसी -मजाक ,सुखद -दुखद घटनाओं की बयार ऐसी चली की 3-4 घंटे फुर्र से उड़ गए ।
शाम की चाय के साथ उसने घर में ही बहुत स्वादिष्ट व्यंजन बनाए थे ।इसमें उसकी  बहूरानी का भी हाथ था , इसलिए   ज्यादा ही स्वाद   आया ।छोटे  जब  बड़ों  को  कुछ बनाकर  खिलाते है तो उसकी कुछ और ही बात होती है ।  
हमने स्वाद ले-लेकर खाया और स्वत :ही प्रशंसा के बोल फूट पड़े ।भविष्य से अनजान होते हुए भी हमने - बार -बार मिलने का वायदा  किया और  साँसों में घुली माधुर्यता  का अह्सास करते चल पड़े

 बिरला हाई स्कूल के कुछ मित्र साल्ट लेक में बस गए थे ।उनसे न मिलना का मलाल अंत तक रहा ।कुछ दूरी थी कुछ मजबूरीथी और कुछ महानगरी की माया थी ।हाँ फ़ोन से जरूर मिलन का साज सजाते रहे ।

चित्रा भास्कर का फ़ोन आया था  -मिसेज भार्गव आप कलकत्ते हैं ---।मैं आपसे जरूर मिलती पर मिल नहीं  सकती ।यू. एस .ए आई हुई हूँ बेटे के पास ।मेरे लिए यही बहुत था ।भाग -दौड़ की इतनी व्यस्त जिन्दगी में उसने मुझे याद किया ।फेसबुक जिंदाबाद !उस पर तो इनसे मिलना हो ही जाता है ।

अतीत में नयेपन का खुमार इतना ज्यादा रहा कि  बैंगलौर आने के बाद कई दिनों तक मेरे मानस पटल पर वह छाया रहा और मैं उसे धूमिल भी नहीं होने देना चाहती क्योंकि जीवन में विविध रंग भरने के लिए दोस्तों का भी होना निहायत जरूरी  है ।   





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सोमवार, 3 दिसंबर 2012

बारहवाँ पन्ना (अंतिम)

किशोर की  डायरी / सुधा भार्गव 







माँ-----मैंने अपने मन की हलचल के बारे में आपको कभी नहीं बताया ।मेरे ह्रदय का हाहाकार आपने कभी नहीं सुना ।भावनाओं की भीड़ में मैं खो गया पर आपने  मुझे ढूंढने की कोशिश नहीं की ।मुझ में जो परिवर्तन हो रहे थे यदि आप चाहती तो मेरी आँखों में झांककर ही देख सकती थीं ,मेरे मनोभावों को पढ़ सकती थीं पर मेरी तो हमेशा अवहेलना की गई ,उपेक्षा की दीवार में जीतेजी चुन दिया ।बीच -बीच में व्यंग भरी तीरों से छेदते  रहे ।ऎसी उम्मीद न थी आपसे ।

कल बीत गया पर मैं अपना कल नहीं भूला हूँ ।कैसे भूल जाऊं -----उमंगों पर छिडका तेजाब ,कल्पना की टूटी सुनहरी कमान ।  

मैंने जब भी फूल से  गीतों को गुनगुनाया ,आपने झटके से उनकी कोमलता छीन  ली ।ऐसा करने से मैं जगह -जगह से जख्मी हो गया हूँ ।यह  आपको और पापा को  दिखायी  देने वाला  नहीं ।जख्म  बाहर  नहीं --मेरे अन्दर ---मेरे दिल में हैं ।ये घाव जल्दी भरने वाले नहीं ।भर भी गए तो दुखन तो देते ही रहेंगे ।

मैंने तो पैदा होते ही सुना था --आप लोग बड़े हैं ।जब मैं बड़ा होने लगा तो सहा नहीं गया ।यह न समझना --आप हर हालत में मेरा प्यार पाने के अधिकारी हो ।यह कम भी हो सकता है --।पर मैं ऐसा होने नहीं दूंगा क्योंकि इसका नतीजा जानता हूँ । जिस तरह से बिना आपके प्यार के मैं तड़प रहा हूँ उसी प्रकार आप तड़पोगे और यह मैं देख नहीं सकता ।फिर एक बात और है जैसा आपने किया वैसा मैं भी करने लगूँ तो आपमें और मुझमें अंतर ही क्या रह जाएगा ।नहीं --नहीं मैं इतिहास नहीं दोहराऊँगा ।

जन्मदाता--- मैं घर छोड़ रहा हूँ ।सुना ---- आपने !मैं---जा रहा हूँ। बस एक बार कह दो --आज का दिन मंगलमय हो ।मेरे पंख निकल आये हैं ।हर दिशा में उडूँगा --उड़कर देखूँगा मेरी जीत कहाँ छिपी है ।छोटी हो या बड़ी अपनी लड़ाई स्वयं लडूँगा ।मुझे ,न रोकना न आँसू बहाना ।मुझे अपना रास्ता ढूँढने दो ।मैं बहती हवाओं को देखना ,छूना चाहता हूँ ।उनके इशारे समझना चाहता हूँ ।ऐसे में  संदेह और खौफ की खिचडी  दिमाग में पक सकती है ,खतरे की घंटियाँ नींद उड़ा सकती हैं ।
मुझे इन सबकी परवाह नहीं --मैं अपनी हँसी के लिए हँसूँगा ---अपनी खुशी के लिए नाचूँगा ।सोच रहे हो बहुत बोलता हूँ लेकिन बोलने दो ---।

मैं अपना संसार खोजने जा रहा हूँ ।बिखरे ---टूटे--- सपनों को भी बटोरना है ।जहाँ भी जाऊंगा आपकी यादें साथ रहेंगी ।उनसे निकलता प्रकाश ही मेरे लिए काफी है जो मेरे रास्ते के अँधेरे  को मिटाता चला जाएगा ।

विकास मंच की ओर कदम उठ रहे हैं ---बढ़ रहे हैं ।भूले से भी न टोकना न आवाज देना --थोड़ा संतोष  रखना ।एक दिन मैं लौटूँगा  अवश्य लेकिन कुछ बनकर जिससे आप गर्व से कह सकें --यह मेरा बेटा है |


समाप्त 

बुधवार, 14 नवंबर 2012

ग्यारहवाँ पन्ना



किशोर की डायरी /सुधा भार्गव 




पापा एक हफ्ते के बाद सिंगापुर  से आये हैं ।उनका हवाई जहाज  देर से आया ।माँ आपको डिनर  पार्टी में जाना था उनका इन्तजार नहीं कर सकीं ।
मैं ड्राइंग रूम में बैठकर घड़ी देखने लगा ----प्यारे पापा----- आते होंगे ---बस आते ही होंगे ।
पापा आ गए ।बड़े थके -थके लग रहे थे ।घर में घुसते ही उनकी निगाहें आपको ढूँढ़ रही थीं ।

माँ ,आपके बिना वे अकेले हैं ।मैं अकेलेपन का दर्द जानता हूँ ।वह तो अच्छा है कि मैं यहाँ हूँ  ।मैं ही उनका साथ दे दूँगा । 
पापा नहा -धोकर कुर्सी पर बैठने ही वाले थे कि  मैं चिल्लाया --पापा मेरे पास बैठो ।वे चेहरे पर एक जबरदस्ती मुस्कान लाये और मेरी पास वाली कुर्सी पर बैठ गए ।इससे  मुझे बड़ा  सुख मिला  ।

मुझे बहुत भूख लग रही थी ।सोचा  पापा को भी लग रही होगी ,सो मैंने पूछा -खाना लाऊँ !
-तुमने खा लिया बेटे ?
-नहीं पापा ।मेरी आँख का एक कोना गीला हो गया ।

-चलो दोनों मिलकर खाते हैं ।
हम मेज -कुर्सी पर पास -पास बैठ गए ।पापा ने पहले मेरी प्लेट लगाई फिर अपनी ।मैं खुश होकर खाने लगा मालूम है क्यों ?बहुत दिनों के बाद ऐसा मौक़ा आया  कि  पापा मेरे  साथ थे ।लेकिन पापा बना हिलेडुले बैठे ही रहे ।मैंने झुककर उनकी आँखों में झांका |पापा की आँखें गीली थीं ।अचानक  एक बूँद टप से उनके हाथ पर  चूँ पड़ी ।  मैं सिसक पड़ा --   नहीं पापा जी !मैंने लपककर उस बूंद को मिटा दिया ।

पापा ने मुझे अपने सीने से चिपका कर भींच लिया ।आज मुझे मालूम हुआ मेरी ही नहीं मेरे पापा की आँखें भी गीली रहती हैं मगर क्यों --समझ नहीं पा रहा हूँ  ।



शनिवार, 10 नवंबर 2012

दसवाँ पन्ना




किशोर डायरी /सुधा भार्गव  












इस बार लक्ष्य छुट्टियों में नही आ  रहा है ।चाचा जी अस्वस्थ हैं ।चाची उनको  अकेला छोड़ नहीं सकतीं और लक्ष्य बिना चाची के कहीं  रह नहीं   सकता ।



आपको जब यह मालूम हुआ तो खुशी -खुशी मुझे चाचाजी के पास भेजने का इरादा बना लिया वह भी एक माह को ।बिना मुझसे पूछे  मेरे बार में निर्णय ले लिया ।एक बार तो मुझसे पूछ लिया  होता ---।जानता  हूँ --बहुत अच्छी तरह से जानता हूँ --मेरे रहने से आपकी आजादी में खलल पड़ता है ।अब कुछ दिनों को तो बंधन मुक्त हो गईं ।मुझे भी आपकी याद नहीं सतायेगी ---आदत जो पड़  गई है बिना आपके रहने की ।

एक बात नहीं समझ सका ।जब कोई माँ अपने बच्चे की अंगुली पकडे सड़क पर जाती है या उसे दुलारती है ,जब  खूँटे से बंधी गाय अपने बच्चे को चूमती -चाटती है तो मेरे सीने में बेचैनी होने लगती है ।दोनों हथेलियों से मुंह ढाप कर जोर- जोर से रोने को मन करता है ।ऐसा मेरे साथ क्यों होता है---- ?

कोई  भूख लगने पर रोता है कोई माँ के न होने पर रोता है ,कोई मनपसंद खिलौना न मिलने पर आँसू  गिराता है ।मेरे पास तो यह सब कुछ है  फिर भी आँखें बार -बार गीली हो जाती हैं ।इसकी भाषा कोई नहीं जानता !


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शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

नौवाँ पन्ना


किशोर डायरी /सुधा भार्गव   






मेरा चचेरा भाई कक्षा 5 में पढता  है । उसका नाम लक्ष्य है ।ज्यादातर कक्षा में पहले या दूसरे नंबर  आता है ।गरमी की छुट्टियों में चाची हमेशा उसके साथ आती हैं ।चाची घर पर ही रहती हैं ।पेंटिंग का उन्हें बड़ा शौक है ।इतने सुन्दर रंग  लगाती हैं कि देखने वाला उसे खरीद ही ले ।चाचाजी काम के चक्कर में देश -विदेश जाते  रहते हैं ।उनके हिस्से का प्यार भी वे उस पर  उड़ेल देती हैं ।

वह बड़ा भाग्यवान है जो उसे चाची जैसी माँ मिली हैं ।स्कूल से आकर एक -एक बात उन्हें बताता है ।चाची धैर्य से सुनकर अपनी राय  देती हैं ।एक  अच्छे दोस्त की तरह हमेशा उसकी जरूरत पर उसके साथ खड़ी  रहती हैं ।उसको कोई  मास्टर पढ़ाने  नहीं आता ।चाची ही उसकी गुरू हैं ।

माँ ,आप हमेशा उससे बराबरी करती रहती हो ---देख तो कितने अच्छे नंबरों से पास हुआ है ।कुछ तो सीख उससे ।ऐसा कहकर आप हमेशा मुझे नीचा दिखाती हो ।मेरी आँखें आंसुओं से भर जाती हैं ।उन्हें टपकने से जबरदस्ती रोकता हूँ पर मन करता है दहाड़ मारकर रो पडूँ --शायद कोई मेरे अन्दर का दर्द समझ सके ।

हाँ ---हाँ मुझमे और लक्ष्य में अन्तर है -----ठीक उसी तरह --जैसे उसकी माँ और मेरी माँ में है ।अभी मुझमें इतना कहने का साहस नहीं है पर एक दिन साहस आ ही जाएगा और यह सच अवश्य कहूँगा  ।

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आठवाँ पन्ना



 किशोर डायरी /
सुधा भार्गव 


नौकरानी को सुबह आने में देर हो गई | घर में दूध - ब्रेड चाहिये थी ।पापा जैसे ही बाजार जाने को तैयार हुए ,मैंने कहा --मैं दूध ब्रेड लेकर आता हूँ ।
-तुम कहाँ जाओगे ।तुम्हारे हाथ से चोर -उचक्का रुपया छीन कर ले जा सकता  है ।

पापा आपने  मुझे एक पल में ही बता दिया कि  मैं किसी काम का नहीं ।माँ से थोड़ी उम्मीद थी   --पूछा 
--माँ ब्रेड ले आऊँ ।
-नहीं --नहीं,बासी ब्रेड ले आओगे ।सड़क भी ऊबड़ खाबड़ है --गिर पड़ोगे ।घर में ही बैठो ।
मन में उथल पुथल होने लगी --क्या मैं इतना बेबकूफ हूँ ।

थोड़ी देर में रसोई में पानी लेने पहुंचा ।पीछे -पीछे माँ ,आप जा पहुंची--
-क्या करना है ?
--फ्रिज से पानी लूंगा ।
--मैं देती हूँ ,तू  इसे खुला छोड़ देगा ।

छूट्टी  के दिन बस यही नाटक होता है ।जब आप आठ -आठ -घंटे घर से गायब रहती हैं तब भी तो नौकरानी गड़बड़ करती रहती है ।उससे कुछ नहीं कहतीं ।कहें भी कैसे ---ज़रा चूँ चपड़  की तो घर का काम छोड़कर चली जायेगी ।मैं तो घर छोड़कर जा भी नहीं सकता |आप दोनों मेरी मजबूरी का फायदा उठाते हैं ।

मुझे  आप कोई काम नहीं सिखाएंगी----बस डराती रहेंगी या डरती  रहेंगी । माँ--- इतना न डराओ वरना  मुझे कोई  काम ही नहीं आयेगा ।ऐसी जिन्दगी से मैं तंग आ चुका हूँ ।मुझे कायर बना कर रख देंगी ।शुरू में सबसे गलती होती है ।गलती नहीं करूंगा तो सीखूँगा कैसे ?अपने पर भरोसा कैसे होगा ।

क्या आप चाहती हैं --बात -बात पर आपका मुंह ताकता रहूं ,अपने पैरों पर न खड़ा होऊं ।

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