शनिवार, 24 जून 2017

2017 :लंदन डायरी -दूसरा पन्ना

लंदन डायरी
2017
21/6/2017
सूर्यदेव का रौद्र रूप
    मैं बैंगलोर से चली,बड़ी खुश। आह !लंदन जा रही हूँ। मिलने वालों ने भी मेरे भाग्य की सराहना की। यहाँ की जमीन पर पैर रखे तो तापमान 32 डिग्री। चेहरे पर हवाइयाँ उड़ चलीं। अफसोस कर बैठे बैंगलोर में शिमला जैसी टकराती  ठंडी हवाओं को छोड़ कहाँ आन फंसे! चार दिन बीत गए पर अभी तक मौसम का पारा उतरा नहीं है।
   



यहाँ घर वातानुकूल तो हैं ही नहीं। छत से पंखे भी लटके नजर न
हीं आते। हाँ,इक्के-दुक्के घरों में टेबिल फैन चलते जरूर दिखाई दे जाते हैं। वह भी हर कमरे में नहीं बल्कि घर में इकलौता। दिन में धूप में निकलना कठिन –कार ओवेन की तरह जलती है। जब तक वह ठंडी होती है तब तक गंतव्य स्थान पर पहुँच ही जाते हैं। उस दिन की ही बात ले लो जब हम  शेरेटन होटल  गए –इतना बड़ा होटल- - - पर भरी दोपहरी में कहीं  कोई  पंखा नहीं चल रहा था। एयर कंडीशन की तो बात करना ही बेकार है। न जाने यहाँ के लोग कैसे रहते हैं!
    हमारे बाहर के काम गर्मी से रुक जाते हैं। सोच में पड़ जाते हैं –घर से बाहर निकलने पर चिलचिलाती धूप में कहीं खोपड़ी गरम न हो जाए ,पानी ले जाना पड़ेगा आदि-आदि। पर यहाँ  के निवासियों को कोई फर्क नहीं पड़ता। कहते हैं –हम तो धूप के लिए तरसते हैं। यही तो समय है जब ठंड की  ठिठुरन से छुटकारा मिलता है और शरीर पर चढ़ी कपड़ों की परतें गायब होती हैं।

    कुछ भी हो हमारा दिमाग तो इतनी गर्मी में काम करता नहीं। लोग कहते हैं 25 साल में इतनी गर्मी पड़ रही है। अगले हफ्ते वर्षा रानी जरूर आएगी। इसी भरोसे समय कट रहा है --- शायद रिमझिम- रिमझिम बारिश शुरू हो जाय और सूर्य महाराज उसके सामने हथियार डाल दें।
क्रमश:

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