मंगलवार, 30 अगस्त 2016

बारहवीं कड़ी -कनाडा डायरी के पन्ने


                                                     
                                                       

अली इस्माएल अब्बास

सुधा भार्गव 


25/4/2003
      इन दिनों सत्ता वैभव की उत्कंठा से रचे अमरीका –ईराक के चर्चे हर जबान पर हैं। युद्ध विरोधी प्रदर्शनों के होते हुए भी ब्रुश –ब्लेयर जोड़ी ईराक पर तबाही बरसाने की खूनी प्यास को नहीं रोक सकी । आज टी.वी. में सुना कि ईराक में पुन:निर्माण का शुभारंभ हो चुका है। बिजली व्यवस्था ,टेलीफोन व्यवस्था ,दूरदर्शन व्यवस्था ,आवास व्यवस्था न जाने कितनी व्यवस्थाएं पुन: पुन: होंगी । यही नहीं अपितु अंधे को आँख,लूले को हाथ,लँगड़े को पाँव मिलेगा। युद्ध की भीषण लपटों में झुलसे ईराक में न कोई अपाहिज रहेगा और न ही अनाथ। अस्पताल में रातों रात योग्य डॉक्टर ,सुप्रबंधित आपरेशन थियेटर ,आधुनिक जंतर मंत्र की भरमार हो गई हैं।  ऊँह बड़े लोगों की बड़ी बातें ।असंभव को भी संभव करने का लंबा –चौड़ा प्रचार सुनकर मेरे माथे पर बल पड़ गए और निरर्थक –बेसिरपैर की बातों के प्रसारण के समय मैंने कंधे झटक दिए।
      संसार इस बात का गवाह है कि ईराकी नागरिकों पर खुले दिल से बम बौछार करने के परिणामस्वरूप न जाने कितने ईश्वर को प्यारे हो गए। । कुवैत के अस्पताल में एक बच्चे को देखकर सर्जन ने कहा-तुम तकदीर के बली हो ,तुम बच गए।
--क्या नाम है तुम्हारा?
-नूर अली।
-उम्र?
-बारह । मेरे हाथ----!तभी दिल दहलाने वाली एक चीख निकली।
-अमेरिका की फौज जब तुम्हारे शहर पर मिसाइल से बम बरसा रही थी तब तुमने अपने हाथ खो दिए।
-और मैंने क्या क्या खोया?
-माँ-बाप ,भाई ,चची और तीनों चचेरे भाई। सबको हमेशा के लिए खो दिया।
बच्चा शून्य में ताकता रहा,सुनता रहा।
-घबराओ नहीं,हम आशावादी हैं। हम तुम्हारे अच्छी से अच्छी  किस्म के अंग लगवा देंगे।
-और क्या करवा दोगे ?
-तुम्हारे घाव भर देंगे,जलने के निशान मिटा देंगे।
-और क्या दोगे?
-और क्या चाहिए?
-बहुत कुछ चाहिए। क्या दे  सकोगे मेरे अब्बा और अम्मी। प्यारे-प्यारे भाई जान जिनको देखते  ही मैं अपना सारा दुख भूल जाता था। उनके बिना मैं कैसे रहूँगा?
मेरा सब कुछ तो छीन लिया। अली अपने माँ –बाप की याद में बिलख बिलख कर रोने लगा।
     सर्जन निरुपाय सा बालक की ओर देखता रह गया जो रिश्तों की डोर के बिना कटी पतंग की तरह पड़ा था।  
      बाद में इस किशोर के कृत्रिम अंग लगवा दिए गए और इसके इलाज का खर्च कुवैत सरकार ने उठाया। युद्ध के दौरान इस्माइल की तस्वीरें डेली मिरर आदि अखबारों में खूब छ्पी। टी॰ वी॰ में डरी-सहमी आँखों वाले अली की पीड़ा ने मुझे रुला दिया। इस किशोर की दर्दनाक तस्वीरें अमेरिका-ईराक के संघर्ष में नागरिकों को पहुँच रही पीड़ाओं की प्रतीक बन गई हैं ।  
                 वाह री तांडव लीला !





                                  

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें