मंगलवार, 15 जनवरी 2019

कनाडा डायरी की छब्बीसवीं कड़ी



साहित्यकुंज में प्रकाशित 
अंक  जनवरी  2019


डायरी के पन्ने 


अबूझ पहेली
सुधा भार्गव  

दिनांक 23:6:2003 

    हम जब से ओटावा आए है,बेटा शाम को ऑफिस से घर जल्दी आने की कोशिश में रहता है। ऑफिस में समय से पाँच मिनट  भी ज्यादा रहना उसे अखरता है। एक दिन उसके बॉस ने उसकी इस जल्दबाज़ी को भाँप लिया। अवसर मिलते ही उसने निशाना लगा दिया-“चाँद ,तुमको आजकल हमारे साथ बात करने का भी समय नहीं रहता!”
    “इंडिया से मेरे माता- पिता आए हुए हैं।”
    “कब तक रहेंगे? 
    “तीन माह।”
    “ती---न माह ! क्यों?
    “क्योंकि वे मुझसे मिलने ही तो यहाँ आए हैं।”
    “मेरे माता-पिता तो मुश्किल से मेरे पास दस दिन रह पाते हैं। एक हफ्ते बाद ही मेरी माँ का पत्नी से झगड़ा होने लगता है।”
    “मेरा तो यहाँ कोई भाई-बहन भी नहीं है। मुझे उनकी याद बहुत सताती है। घर –गृहस्थी की जिम्मेदारियों के कारण वे मेरे पास जल्दी-जल्दी नहीं आ सकते। करीब तीन वर्ष के बाद आए हैं। मैं तो  पल-पल उनके साथ रहना चाहता हूँ। उनके आने से लग रहा है मानो मेरा बचपन लौट आया है।”
    बॉस अवाक होकर चाँद की बात सुनता रहा। फिर उसने किसी दिन उसे नहीं टोका। उसके लिए चाँद की माता -पिता के प्रति आसक्ति अबूझ पहेली थी।
क्रमश :


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