गुरुवार, 27 सितंबर 2018

॥ 3॥ बोलता कल


स्मृतियों की सन्दूकची 
  

 नीमराना ग्लास हाउस
 का  
  बोलता कल 

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       उत्तरांचल जिला टहरी गढ़वाल में एक गाँव है –गुलार डोंगी । यह ऋषिकेश से 23 किलोमीटर दूर बद्रीनाथ रोड पर स्थित है । हरिद्वार की यात्रा के दौरान मैं वहाँ अपने  परिवार सहित पहुंची । वहाँ  मंद –मंद मुसकाती –बहती गंगा सैलानियों को सहज भाव से  अपनी ओर आकर्षित कर लेती है । इसके किनारे भारतीय परिवेश का रक्षक नीमराना ग्लास हाउस होटल बड़े गर्व से भव्य रूप में खड़ा है। सन् 2005 में हम इसी होटल में ठहरे थे। 
       इसमें प्रवेश करते ही अनुभव हुआ मानो हम चौदहवीं से इक्कीसवीं सदी के बीच विचरण कर रहे हैं । अदृश्य रूप में आत्माएँ आ –जा रही हैं ,हमसे टकरा रही हैं । अचानक मुझे किसी की उपस्थिति का एहसास हुआ जो मुझसे सटते हुए बोली-आधुनिकी बाना धरण किए तुम जैसे लोगों को भी मैं अपनी बस्ती में खींच लाई। यह नगरी पुरानी जरूर है पर एक बार तुम्हारे दिल में पैठ गई तो मुझे विस्मृत करना कठिन है।
      ग्लास हाउस में जरा आगे बढ़े तो कदम ड्राइंग रूम में कदम पड़े । चूंकि उसकी दीवारें शीशे की हैं इसलिए उसके पार दिखाई देने वाली पर्वतों की श्रंखलाओं ,उन पर छिटकती हरियाली , गंगा की लगातार उठती –गिरती चमकती लहरों ने मन भिगोकर रख दिया ।




       एक कोने पर नजर पड़ी तो देखा – पत्थरों को एक दूसरे पर रखकर कैलाश परवत बनाने का सफल प्रयास हुआ है । उसके मध्य प्रतिष्ठित है हर –हर महादेव की विराट मूर्ति । हठात रसखान की पंक्तियाँ गुनगुनाने लगी –
     
     भाल में चंद्र बिराजि रहौ,ओ जटान  में देवी धुनि लहरै ।
     हाथ सुशोभित त्यौं तिरसूल ,गरे बीच नाग परे फहरै।।

     महाराज भागीरथ ने तो अपने पूर्वजों का उद्धार करने के लिए शिव आराधना की थी पर लगता है भूतलवासी भी तर गए । शायद तभी से मृत्यु के बाद राख़ और अवशेष गंगा में प्रवाहित करने की परंपरा ने जन्म लिया । ।
     एक दीवार पर करीब 10 -12 पेंटिंग्स शीशे में जड़ित थीं जिनमें सूर्य पूजा ,विष्णु पूजा ,अग्नि पूजा ,महादेव पूजा ,पवन पूजा ,गायत्री मंत्र और गौ पूजा के विभिन्न स्वरूप अति कुशलता से चित्रित किए गए थे । एक चित्र में ब्राहमन सूर्य की अर्घ्य  दे रहा था दूसरे में वह गाय के पास खड़ा था । इसका कारण हमारी समझ में न आया । पुस्तकाध्यक्ष ने बताया –ब्राहमन और गाय एक ही कुल के दो भाग हैं। ब्राहमण के हृदय में वेदमंत्र निवास करते हैं तो गौ के हृदय में हवि(आहुति देने की वस्तु )रहती है । गाय से ही यज्ञ प्रवृत्त होते हैं । 
     उन्होंने एक दिलचस्प बात और बताई की गौ में सभी देव प्रतिष्ठित् हैं  । चित्र में भी  सींगों की जड़ों में ब्रह्मा –विष्णु और बीच में महादेव थे । गौ के ललाट में पार्वती ,नेत्रों में सूर्य –चंद्रमा का निवास था ।
     ब्रह्म पूजा वाले चित्र में ब्रहमा के चार मुख थे जिनसे चारों वेद झर रहे थे । चित्र को देखने वाले दर्शक आपस में बातें कर रहे थे और मैंने उनमें से एक को कहते सुना –ब्रह्मा के मल से रुद्रका और वक्ष से विष्णु का आविर्भाव हुआ । प्रलय के बाद सृष्टि की रचना ब्रह्मा ने की ,इसलिए वे सर्वश्रेष्ठ हैं ।
     शहरी आबोहवा में मैं ऋषि –मुनियों की वाणी को भूल ही गई थी । यहाँ आना सार्थक हो गया था । मैंने कहीं पढ़ा था –ब्रह्मा को तरह –तरह से स्नान कराया जाता है पर क्यों ?मेरी यह गुत्थी उलझी हुई थी । मैंने यहीं इसे सुलझाना चाहा ,फिर मौका मिले या न मिले  । सामने सोफे पर गेरुआ वस्त्र धारी जटाओं वाले संत  बड़ी गंभीर मुद्रा में बैठे कल्याण पत्रिका के पन्ने उलट रहे थे । मैंने  ज्ञान मूर्ति समझ अपना कुलबुलाता प्रश्न उनके सामने रख दिया । चेहरे पर हंसी लाते हुए बोले –तुमने ठीक ही सुना है । दूध से ब्रहमा को स्नान करने से मरने के बाद ब्रहमलोक जाते हैं । दही से स्नान कराने से विष्णुलोक की प्राप्ति होती है । शहद स्नान से तो इंद्रलोक मिल जाता है । ईख के रस में उन्हें डुबोने से सूर्य लोक गमन होता है । गायत्री मंत्र के साथ ब्रहमा की स्तुति की जाए तो लगता है मानों ब्रहमलोक में ही खड़े हैं । उनकी बातें सुनकर प्राचीन धर्म समन्वित अध्यात्म के दर्शन हुए ।
     अध्यात्म दर्शन का श्रेय अमनदास जी को जाता है जो एक कवि ,शिल्पकार और कलाकार हैं । ये पुरानी इमारतों को खरीदकर उन्हें नया रूप देते हैं पर कलेवर वही वर्षों  पुराना होता है । ग्लास हाउस भी एक समय गढ़वाल के महाराजा का हंटिंग लॉज था । उसे कुशल कारीगरी का दस्तावेज़ बनाकर भारतीय संस्कृति का अनुपम उदाहरण पेश किया गया  है ।
     थोड़ी देर आराम फरमाने को हम कमरे की ओर चल दिये । लेकिन आराम कहाँ –वहाँ तो जिज्ञासा सिर उठाये खड़ी थी  । वहाँ बिताया एक एक पल जीवंत होता जा रहा  है ।  
मेरे  कमरे का नाम नर्मदा है ,बेटे के कमरे का नाम  गोदावरी और  उसके सास-ससुर के कमरे का नाम है गोमती ।  वाह क्या कहने । उससे जुड़ा एक प्रसाधन  कक्ष है । अरे एक स्टोर नुमा कोठरी भी है । जरा देखूँ इसमें क्या है ?-- यह तो बंद है । जरूर राजा यहाँ खजाना रखता होगा या  उसकी रानियाँ लकड़ी की बकसिया में अपने गहने रखती होंगी । खुला होता तो जरूर ताक झांक करती । मन बहुत चंचल हो उठा है ।
      पलंग तो चमकता हुआ बेंत का है जिसका सिरहाना अर्ध चंद्राकार है । इतना बड़ा कि चार आराम से पैर फैला लें । एक तरफ सोफा मेरे बाबा के समय का है पर लगता बड़ा मजबूत है । पलंग के दोनों ओर हाथरस की बुनी दरियाँ गलीचे की तरह बिछी हैं । सामने की दीवार मे आतिशदान है ताकि कोयले जलाकर कमरा गरम किया जा सके । दीवार में बनी लकड़ी की नक्काशीदार अलमारी इस बात का सबूत है कि यहाँ रहने वाला धनी व शौकीन मिजाज का होगा ।  फर्श वर्षों पुराना लाल रंग का पर चमक में कोई कमी नहीं  ।
      मेज पर एक कोने में चिमनी है शीशे की । उसके नीचे मोमबत्ती रखी है जिससे साफ पता लग रहा है कि उन दिनों मिट्टी के लैंप जला करते थे । मैंने खुद अपने पिता जी को शीशे की चिमनी को मुलायम कपड़े से साफ करते देखा है । यहाँ आकार बचपन के कई सुप्त कोने जी उठे ।       मोमबत्ती के ऊपर चिमनी रखकर सजावट का एक नया नमूना पेश किया है। बिजली के लट्टुओं के सामने चिमनी वाले लैंप की रोशनी कुछ नहीं  पर प्राचीन परंपरा व रीति रिवाजों से पर्दा उठते देख अति सुखद अनुभूति होती है । कमरे के दरवाजे और खिड़कियाँ सब शीशे के हैं । और तो और मेरे सामने जो मेज रखी है –बड़ी खास है । बस पत्थर पर भारी सा एक शीशा रख दिया है ।
काफी समय से स्नानागार जाने से जी चुरा रही थी कि होगा गंदा -संदा पर कब तक बचती । आशा के विपरीत देखा -फर्श पर टाइल्स लगी हैं । नल के नीचे अवश्य लकड़ी का पट्टा पट्टियों वाला रखा हुआ है । मेरी पोती उसे हटाने लगी । उसको बड़ा अजीब सा लगा । मैंने उसे समझाया –"बेटा ,पुराने समय इसी पर बैठकर नहाते थे।''
     "क्या दादी माँ आप भी इस पर नहाई हो ?"
     "घर में तो नहीं देखा पर धर्मशाला में नहाने की जगह ऐसा पट्टा रखा रहता था । अब तुम पूछोगी –धर्मशाला किसे कहते हैं ?मेरी बच्ची छुटपन में जब मैं अपनी माँ और पिताजी के साथ घूमने जाती थी तो होटल में नहीं धर्मशाला में ठहरती थी।''
    मैं  पट्टे पर नहाने बैठी । न जाने उस पर कितने राजा रानी नहाये होंगे । वे तो चले गए पर उनकी रूह मुझसे कुछ कहना चाह रही  थी  ,बड़े रोमांचकारी क्षण थे । तौलिया लेने को हाथ बढ़ाया जो लकड़ी की खुनटियों के सहारे लटका हुआ था । ऐसा स्टैंड मैंने कनाडा में भी देखा था पर उसे जमीन पर टिकाकर बयर –व्हिस्की की बोतलें रखी थीं । वैसे भी भारतीय शिल्पकला का तो पूरा विश्व कायल है ।
      कमरे में ज्यादा देर तक बैठना मेरा मुश्किल हो गया । न यहाँ कोई टेलीफोन न ही दूरदर्शन। असल मैं यह कोई विलास स्थल नहीं,विभिन्न संस्कृतियों के मेल मिलाप का शांतिस्थल है । पहली मंजिल की बालकनी से झांक कर देखा –ड्राइंगरूम में अनेक धरमालम्बी एकत्र हो गए हैं और उनमें कोई बहस छिड़ी है ।
       कोई ताश खेल रहा है तो कोई गजलें सुन रहा है । इतना होते हुए भी चुप्पी का आभास होता था ।
      हम भी नीचे उतर आए ।ड्राइंग रूम में बैठे भी पर्यटक उचक उचककर बाहर की छटा देखना चाहते थे । संध्या सुंदरी धीरे –धीरे अपने पग धरती पर रख रही थी  । उसके मनमोहक रंगों पर मोहित हो  गंगा की लहरे डूबती उतराती चंचल हो उठी थी । गगन चुम्बी पर्वत वात्सल्यभाव से पुत्री गंगा को निहार पुलकायमान प्रतीत होता था । 

उसे देख कवि दिनकर की पंक्तियाँ याद आने लगीं –

      मेरे नगपति !मेरे विशाल
     साकार दिव्य गौरव विराट
     पौरुष के पुंजीभूत ज्वाल
     मेरे भारत के दिव्य भाल ।

     दोपहरी का ताप शांत हो चुका था । हम पर्यटकों  ने  गंगा के किनारे –किनारे चलकर घाटों पर पहुँचने का निश्चय किया । बहता पवन शीतलता व नवजीवन प्रदान कर रहा था । अनेक देवी –देवताओं को प्रणाम करते हुए हम उस पक्के घाट पर पहुंचे जहां आरती आरंभ होने वाली थी । आशा के विपरीत वहाँ की सफाई व अनुशासन प्रशंसनीय था । तभी ढोलक –मजीरों की ध्वनि के साथ अनगिनत प्रदीप जल उठे । भजन –कीर्तन कानों में कूंकने लगे । करतल ध्वनि के लिए हाथ खुद उठ गए । ।जल में एक –एक  दीपक हमने भी जलाया और गंगा के नयनाभिराम दृश्य को पलमों में बंद करके जल्दी ही उठ गए ।
    चुल्लू भर –भर कर आनंद पीने की बेला में कुछ दूरी पर बुजुर्गों की एक टोली बैठी थी । उनको आरती से ज्यादा अपनी बातों में ज्यादा दिलचस्पी थी । उदास आँखें –बुझे चेहरे !लगता था उनका सब कुछ छिन  गया है । परिवार की उपेक्षा और प्यार के अभाव में वे ईशवर की नगरी में ही बसने को मजबूर हो गए थे ।
     लौटते समय हम थक कर चूर थे पर रात के  सन्नाटे में नींद मुझे अपने आगोश में न ले सकी ।  बिस्तर पर लेते –लेते जरा सी सरसराहट से चौंक पड़ती । लगता उस पर सोने वालों की सांसें अब भी वहाँ चल रही हैं ।
      पौं फटते ही शीशायघर  से पैर बाहर रखा । सामने ही बाग में चौकी पर बैठा एक युवक ध्यान लगा रहा था । पीतल की चौकी पर ताँबे के चमकते फूल ,पैर भी शेर के पंजों वाले थे ।   हाथ में  रूद्राक्ष की माला लिए उसे फेर रहा था । मैं अपने घर की 60 साल पुरानी संस्कृति में लौट गई ।
     याद आया आज तो महाकुंभ है । उसमें नहाने से उसकी तरह तन –मन निर्मल हो जाएगा । ऐसा सोचकर बड़े –बड़े तौलिये कंधों पर डालकर साँप सी बलखती सीढ़ियों से गंगा किनारे उतर पड़े । दोनों तरफ बड़े बड़े विशाल पत्थरों से टकराती पत्थरो का ढेर लगा था और सीढ़ीनुमा कटे पहाड़ को पार करते समय यमराज नजर आने लगे थे ।
विशाल लहरों से टकराती दूध सी लहरों में मन अटक अटक जाता । गीली बालू में पैर धसते ही 
लड़कपन हंसने लगा । धम्म से हम पति-पत्नी नीचे बैठ गए। पर बैठकर भी मुझे चैन न मिला और बनाने लगी रेत का घरौंदा । कुछ भूरे –पीले सूखे पत्ते फड़फड़ाते घरौंदे पर बैठ गए । किलक उठी आह !कितना  सुंदर ! 





बुदबुदाने लगी  ---

    एक मेरे सामने है ,एक मेरे पीछे
    एक बालुई घरौंदा है दूसरा शीश महल
    एक नाशवान है ,दूसरा अमर
    सच तो यह है
    स्वर्ण कण बिखरे पड़े हैं
    अंदर  –बाहर
    बस परखने को चाहिए
    जौहरी की सी आँखें ।

     आनंद के पलों के समेटे हम दिल्ली लौट पड़े पर एक बात रास्ते भर सालती रही की न जाने कहाँ –कहाँ उपेक्षित इतिहास ,नि: श्वास लेती संस्कृति दम तोड़ रही है । रक्षा का कवच पहनाना उसे बहुत जरूरी है। 

 समाप्त 

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