शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

किशोर की डायरी



दूसरा पन्ना  /किशोर  डायरी 

(गूगल से साभार )


मैं एक -एक दिन उँगलियों पर गिनता रहता हूँ -सोमवार ,मंगल -- ,बृहस्पत ,शुक्र ।शनिवार पर आकर रुक जाता हूँ ।शनिवार को आपकी छुट्टी होती है ।आज भी तो शनिवार है -आपके साथ घूमने जाऊँगा  ,अपनी मनपसंद आइसक्रीम खाऊंगा ।खुशी के मारे हवा में उड़ा  जा रहा हूँ ।ओह ,यह क्या हुआ !आपकी तो किटटी पार्टी निकल आई --आपको तो जाना ही पड़ेगा लेकिन --पार्टी तो 3 बजे से शुरू है ।आप कहाँ हो ?--माँ --माँ ।

दिव्या हमारे घर की नौकरानी है ।उससे मालूम हुआ आप  बाजार गई हो साड़ी  खरीदने ।साड़ी ---साड़ी से तो आपकी दो अलमारियाँ  भरी पड़ी हैं ।पापा ने तो एक बार टोका भी था ---जब भी कहीं जाती हो  नई साड़ी खरीदती ही ।एक साड़ी  दो बार नहीं पहनी जा सकती क्या !आपने छूटते ही कहा --आप नहीं समझेंगे ,यह मेरी शान का सवाल है ।फिर मैं कमाती हूँ तो अपने ऊपर खर्च भी कर सकती हूँ।आपको बुरा क्यों लगने लगा ।
पापा आपके मामले में बहुत कम बोलते हैं ,यदि बोलते भी हैं तो आप उन्हें इसी तरह चुप करा देती हो ।
माँ पापा भी तो धन कमाँ  कर लाते हैं ।वे तो अपने ऊपर इतना खर्च कभी नहीं करते ।वे सबका ध्यान रखते हैं आप केवल अपना ।

आप दोपहर के  2 बजे बाजार से लौट कर आईं ।जल्दी -जल्दी तैयार होकर बोलीं --तुम्हें मिसेज सिन्हा के घर छोड़ देती हूँ ।लौटते समय ले लूंगी ।
-माँ मैंने खाना भी नहीं खाया है ।
-क्यों नहीं खाया !घर क्या मैं अपने साथ बाँध कर ले गई थी ।एक दिन अपने आप खा लेता तो क्या हो जाता ।दिव्या से ले लेता ।अब तो वह चली गई ।मुझे देर हो रही है ---ऐसा कर ,बिस्कुट का पैकिट ले और इसे आंटी के घर खा लेना ।आलू चिप्स भी हैं ,पेट तो भर ही जाएगा ।

सिन्हा आंटी ने गर्म -गर्म फुल्का बनाकर दिया। मैंने पेट भर कर खाया ।वे बोलीं -खाने के समय बिस्कुट नहीं खाओ ,बाद में खा लेना ।उनकी बात ठीक लगी ।मैं सो गया ।सोकर उठा तो देखा -आंटी दूध का गिलास लिए खडी हैं ।उनके प्यार में मैं नहा गया  और दूध गटागट  पी गया ।

मैंने एकबार भी आपको याद नहीं किया ।जब तक आप नहीं आईं पप्पू के साथ खेलता रहा ।वह सिन्हा आंटी का बेटा है ।आप मुझे लेने  आईं तो मैंने सोचा --क्यों आ गईं ,देर से आतीं तो अच्छा होता ।

घर पहूँचकर आपने मुझे दूध दिया ।मेरे पेट में जगह ही नहीं थी ।बड़े  आश्चर्य से बोलीं --बिस्कुट खाने के बाद भूख नहीं लगी --।
--आंटी बहुत अच्छी हैं ।उन्होंने दाल -रोटी खिलाई और दूध भी पिला दिया ।
-नदीदा कहीं का ---तुझे तो हम कूछ खाने को  देते नहीं  ,टूट पडा भुक्कड़ की तरह सुखी रोटी पर ।खाया तो खाया ,दूध पीकर भी आ गया ।मिसेज सिन्हा भी क्या सोचती होंगी हम तेरा ध्यान नहीं रखते ।

तुमने जितनी दुनिया देखी माँ ,मैंने उतनी नहीं ।आप क्या सोचती हैं --दूसरा क्या सोचता है --मैं नहीं जानता । जो  मेरा मन कहता है वह  मैं कर लेता हूँ ।मुझे अपनी इच्छा के 
बारे में पहले से बता दिया करो ।मैं वही कर लिया करूंगा।आपके गुस्से से  मेरा दिल कांपने लगता है ।
 मुझसे  प्यार से बोलोगी तो अच्छा  लगेगा ।

क्रमश :
** * * * *                    

6 टिप्‍पणियां:

  1. दोनों की कड़ियाँ लाजबाब ...आगे की कड़ी का इंतज़ार रहेगा

    एक बेहतरीन कोशिश ...आपकी इस कोशिश से बहुत कुछ सिखने को मिलेगा .....सादर

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    1. आप जैसे सुधि पाठकों की टिप्पणी ने ही मेरा उत्साह बढ़ाया है ।शीघ्र ही तीसरी कड़ी आपके सामने होगी ।धन्यवाद ।

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  2. कुछ प्रश्‍नों का जबाब नहीं होता ..
    बहुत बढिया लिखा आपने

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