शनिवार, 29 फ़रवरी 2020

कनाडा डायरी कड़ी -40


कनाडा डायरी के पन्ने
प्रकाशित 


काव्य गोष्ठी

सुधा भार्गव 

26 8 2003
       शाम को 8 बजे रश्मि जी के निवास स्थान पर पहुँचने के लिए बेटे के साथ निकली। ओह,कितनी तेज बारिश! कार चलाना भी मुश्किल। पर चाँद ने उफ तक न की बल्कि मेरे लिए खुश था--- माँ का कुछ  साहित्यकारों से परिचय होगा,कविता सुनने- सुनाने का मौका मिलेगा। मैं भी बहुत उत्तेजित थी। रास्ते से संतोष जी को भी लेना था। मूसलाधार बरसते पानी में बेटे का कार चलाना मुझे अच्छा नहीं लग रहा था। मेरे मुंह से निकल पड़ा- मैं तुझे बहुत तंग कर रही हूँ। पानी को भी अभी बरसना था। मैंने कितना परेशानी में डाल दिया तुझे बच्चे।’’
        “माँ बारिश तो कनाडा में बिन बुलाये मेहमान की तरह चाहे जब आन धमकती है। यहाँ रहकर मुझे आदत पड़ गई है । बस आप इसी तरह अपने को व्यस्त रखना। इस प्रकार आपका कुछ न कुछ करते रहना मुझे अच्छा लगता है।’’ उसकी आँखों में चमक थी । कैनवास के ब्रुश ,लेखनी और रैकी हीलिंग आर्ट  मेरे इर्द-गिर्द गिर्द चक्कर काटते प्रतीत हुए मानो कह रहे हो –हमें भूल न  जाना। । मैं अपने भावी जीवन के बारे में सोचने के लिए मजबूर हो गई।
      संतोष जी के दरवाजे पर कार रुकी। वे इंतजार कर ही रही थीं। उनका चेहरा मुझे परिचित सा लगा। उन्होंने मुझे देखते ही पूछा –“क्या आप ऋचा संस्था की सदस्य हैं?”
     “हाँ जी।”
      “मुझे आपने कुछ लेख व कहानी दी थीं। कहानी तो रिचा पत्रिका में छप चुकी है। लेख आगामी अंक के लिए है।
      “ओह आप हैं!” एकदम मेरे दिमाग में संतोष जी का चेहरा घूम गया जिनसे दिल्ली में मिल चुकी थी और अब वे अपने बेटे से कनाडा मिलने आई थीं।
       कार में बैठ गए मगर वार्तालाप ने बंद होने का नाम ही नहीं लिया।  “देखिए दुनिया कितनी छोटी हैं। हम आपके पीछे -पीछे चले ही आए। भारत में इतनी देर का साथ कभी न मिल पाया जितना यहाँ नसीब होगा।’’
      “आप ठीक फरमा रही हैं। मैं हर वर्ष छुट्टियों में आती हूँ। बहू-बेटे दोनों डॉक्टर हैं। हर जगह अकेले जाने की हिम्मत नहीं होती। इसीलिए आपके बेटे से मुझे घर से ले जाने को कहा। कोई परेशानी तो नहीं हुई?”
      “नहीं आंटी ,कोई परेशानी नहीं हुई। शीतल भी आपसे मिलना चाहती थी मगर वह अवनि के कारण नहीं आ पाई। अभी वह बहुत छोटी है। आपने उसे मिरान्डा हाउस में पढ़ाया है।”
       “हाँ,उससे एक बार फोन पर बातें हुई थीं। अभी तो मैं यहाँ 15 सितंबर तक हूँ। मिलेंगे।’’
     “अवश्य आंटी!’’ 
      रश्मि जी के घर में घुसे। वे चाँद से पहले ही मिल चुकी थी। देखते ही बोलीं-“तुमने हमें अपनी मम्मी से और पहले क्यों नहीं मिलवाया। तुम तो हमें जानते थे।
      “हाँ आंटी,बस भूलभुलइया में रह गए।”
      चाँद तुम्हें दुबारा आने की जरूरत नहीं। मैंने अपने बेटे से कह दिया है कि वह हमें 11 बजे लेने आ जाये। तुम्हारी मम्मी को भी पहुंचा देंगे। किसी बात की चिंता नहीं करना।’’
     उनकी समझदारी ने हमें उबार लिया । वरना मेरी ममता सोच- सोचकर अधमरी हुई जा रही थी --- रात में मेरे बेटे को फिर 15 किलोमीटर आना और 15 किलोमीटर जाना पड़ेगा जबकि मौसम का मिजाज निहायत बिगड़ा हुआ है।कहीं बीमार न पड़ जाये।  
        रश्मि जी के ड्राइंग रूम में कदम रखते ही भारतीय संगीत वाद्य उपकरणों पर नजर टिकी तो टिकी ही रह गई। हारमोनियम-तबला,ढोलक - मजीरे भगवान कृष्ण की मूर्ति एक चौकी पर विराजमान थी । उसके समक्ष कालीन पर हारमोनियम-तबला,ढोलक - मजीरे रखे थे जो भारतीय संस्कृति में रंगी रश्मि जी के व्यक्तित्व व हुनर का परिचय दे रहे थे। पिछले 30 वर्षों से कनाडा में रहते हुए भी अपनी जड़ों को सुरक्षित रख छोड़ा था।वे बड़ी आत्मीयता से मिलीं। अपने बेटे से हमारा परिचय कराया। हाथ जोड़कर उसने नम्रता से नमस्कार किया। हाथ क्या जुड़े दिल जुड़ गए।
     गायन विदद्या में निपुण कवयित्री सपना जी वहाँ पहले से ही आ चुकी थी। एक दूसरे से परिचित होने के बाद चाय के साथ भरपेट भारतीय व्यंजनों का स्वाद लिया। छोटी बड़ी कविताओं व शेरो शायरी के दौर चले। साथ ही पूरबी - पश्चिमी सभ्यता को टटोलते रहे। उन सबका हृदय देश प्रेम से ओतप्रोत था चाहे शरीर उनका कहीं भी हो।
      महादेवी वर्मा,सुमित्रानंदन पंत –बच्चन जी की काव्य रचना पर चर्चा होती रही। रश्मि जी की कविताओं पर छायावाद की छाप थी। सपना जी ने बड़े मधुर स्वर में कविता पाठ किया जिसमें सुरों की तालमतेल था। कविताएं पौराणिक कथाओं पर आधारित थी। सीता,राम और रावण के चरित्र लेकर उन्होंने अपने मनोभावों की अभिव्यक्ति बहुत सुंदर ढंग से की थी। मन का आक्रोश फूट फूट पड़ता था। हमने भी अपने देश की महानता को लेकर कविता पाठ किया।
       अंत में हमने मिष्ठान खाया। डिनर के बाद बिना मिठाई खाए तो  हम भारतीयों को संतोष होता ही  नहीं हैं। दुनिया के किसी भी कोने में चले जाएँ अपनी आदतें अपने साथ ले जाते हैं।जीवन का माधुर्य और मित्रत्व  की भावना को समेटे हम अपने घरों की ओर चल दिए। अगले दिन मैंने रश्मि जी का धन्यवाद किया जिन्होंने  मुझे अपना अमूल्य समय व सहयोग दिया। 

क्रमश:  



शनिवार, 21 सितंबर 2019

कनाडा डायरी कड़ी । । 39। ।


कनाडा डायरी के पन्ने
प्रकाशित 
अंतर्जाल पत्रिका कनाडा साहित्य कुंज 


चित्रकार का आकाश
सुधा भार्गव 
24 8 2003
      
       इस  विराट आकाश के नीचे जहां-तहां अद्भुत रंगों की झलक देखते ही उस ओर खींची चली जाती हूँ। कनाडा में तो रंग-बिरंगे फूलों ने मेरा मन ही मोह लिया।मॉल(shopping centre) में अनोखी आभा से दमकते हुए  प्रसून –गुच्छे  के गुच्छे  लटके देख उनकी खुशबू में नहाने के लिए पास ही जाकर खड़ी हो गई। ज़ोर से सांस ली पर पर महकती हवा का जरा एहसास नहीं हुआ। छूकर देख भी नहीं सकती थी कि ये नकली है या असली क्योंकि उनपर प्लास्टिक कवर था। दूसरे वहीं एक तख्ती लगी थी-लिखा था Don’t touch’।  
        बेटा-“ लगता है ये फूल नकली हैं?” मैंने अपना संदेह निवारण करना चाहा।
       नहीं माँ-- ये असली ही हैं। इनमें केमिकल्स लगाकर असंक्रामक बनाया जाता है। इसी चक्कर में वे अपनी प्रकृति प्रदत्त सुगंध खो बैठते हैं। उन्हीं को घरों में ले जाकर लगाते हैं और उनसे बने गुलदस्ते भेंट में देते हैं।’’
      “ ऊँह! बिना खुशबू के फूल किस काम के! फूलों की महक तो यहाँ के निवासियों को भी बहुत अच्छी लगती है और पुष्पों से प्यार भी है। तभी तो समय मिलते ही पूरा का पूरा परिवार मिट्टी खोदता,फूलों के बीज डालता ,पानी देता या जंगली घास उखाड़ता नजर आता है। इस मेहनत से जल्दी ही हर छोटे से  बगीचे में नन्हें- नन्हें फूल हँसते हुए  खुशबू फैलाने लगते हैं। ताज्जुब! इनकी खूबसूरती व मन को गुलजार कर देने वाली गंध का घर में प्रवेश निषेध है। लोग न इन्हें सूंघ सकते हैं और न उनकी माला बनाकर भगवान को पहना सकते हैं। फिर तो अपने जूड़े या चोटी में  इन फूलों को लगाने की महिलाएं कल्पना भी नहीं कर सकतीं।
      “माँ ठीक कह रही हो। सब डरे हुये है कि सूंघने से उनमें बैठे सूक्ष्म कीड़े नाक से अंदर प्रवेशकर कोई बीमारी न फैला दें।
      “सब  मन का बहम है। हमारे यहाँ तो पौराणिक कथाओं के अनुसार देवी-देवता श्रंगार फूलों से ही करते थे। पूजा हो या विवाहोत्सव,फूलों के सौंदर्य व उनकी मदमाती सुगंध के बिना सब अधूरा और फीका फीका लगता है।’’
       “माँ विज्ञान  के अनुसार फूलों के बारे में कनेडियन्स के विचार सारयुक्त ही प्रतीत होते  हैं। फिर अपनी सोच हम दूसरों पर थोप भी तो नहीं सकते ’’
       यहाँ फूलों से आच्छदित जितनी रंगीन धरा है उतनी ही संध्या समय आकाश में  बादलों की छटा अद्भुत है।रोज शाम को दरवाजे पर बैठकर ठहरे ,फुदकते रंग-बिरंगे बादलों को निहारते थकती नहीं। सच में सृष्टि रचने वाले की चित्रकारी का कोई मुकाबला नहीं।
        खरगोशिया से नन्हें बादल और हंसिका से उड़ते-घुमड़ते बादलों की टुकड़ियों को क्या कभी मैं विस्मृत कर पाऊँगी। मुझ पर छाया विविध फूलों के रंगरूप का नशा क्या कभी उतर पाएगा! नहीं ---कभी नहीं। इसीलिए मैंने निश्चय कर लिया  कि इन्हें कैनवास पर जरूर उतारूंगी।साथ ही उस महान चित्रकार का दिल से धन्यवाद किया जिसके कारण मेरी सोई उँगलियाँ ब्रुश थामने के लिए पुन: जाग उठीं। 
        इस काम मे सहयोग देने वाले मेरे दो साथी हैं । बुक शॉप चैप्टर और सेंट्रल लाइब्रेरी। इस सेंट्रल लाइब्रेरी में एक बार में दस दस किताबें मिलती हैं। किताब की अवधि समाप्त होने पर ई मेल द्वारा उसे बढ़ाया जा सकता है। इतनी सुविधा! घर बैठे बिठाये ही काम पूरा। मन खुश हो गया। लेकिन किताबें लौटाने में  एक दिन की भी देरी होने पर जुर्माने की काफी राशि का भुगतान करना पड़ता है। अनुशासन की दृष्टि से यह ठीक भी है। ग्राहक इससे सावधान भी रहता है।
        मेरा बेटा सेंट्रल लाइब्रेरी का सदस्य था। इसलिए उसके कार्ड पर बहुत सी किताबें निकलवा लेती थी। कम समय में ही  किताबों के जरिये हिन्दी कहानियों और चित्रकारों से मुलाक़ात हुई। ऐक्रलिक,ऑयल पेंटिंग,वाटर कलर और स्केचिंग की किताबों की तो यहाँ  भरमार है। घर में किचिन गार्डन में बड़ी सी  प्लास्टिक की मेज व कुरसियाँ पड़ी हैं । वहीं अकसर पेड़ों की छाँह में गुनगुनी  घूप का मजा लेती हुई ब्रुश थामे बैठ  जाती हूँ और रंगों से करने लगती हूँ खिलवाड़।    
       चैप्टर बुक शॉप हमारे घर के पास ही है । मैं भार्गव जी के साथ ऊपर से नीचे तक गरम कपड़ों से लदी पैदल ही चल देती हूँ । इस बहाने कुछ घूमना भी हो जाता और खाना भी हजम हो जाता ।ज़्यादातर लंच के बाद 1 बजे के करीब ही निकलते हैं ।3-4 घंटे के बाद बहू को फोन करना पड़ता है  ताकि वह हमें लेने आ जाए।हमें तो कार चलानी आती नहीं है। 
      चैप्टर बुक शॉप में मुझे बड़ा आनंद आता है। कोई ऐसा विषय नहीं जिस पर किताब न मिलती हो।घंटों मन चाहे विषय पर किताब चुनकर उसके पन्ने पलटती रहती हूँ। सामने ही बिछे आरामदायक सोफे पर बैठकर नोटस भी ले लिए हैं। ताजगी के लिए हम दोनों कॉफी पीने बैठ जाते हैं। यह कॉफी डे, ‘CHAPTER’ का ही एक हिस्सा है।
       असल में सेंट्रल लाइब्रेरी और चैप्टर बुक शॉप  का उद्देश्य लोगों में पढ़ने की आदत डालना है। पर चैप्टर बुक शॉप  में घंटों बैठे किताबों को पढ़ा भी जा सकता है और पसंद आने पर किताब खरीदी भी जा सकती है। जगह -जगह रिसर्च स्कॉलर किताबों के ढेर में अपना सिर खपाते नजर आ जाते हैं। जो पुस्तकों को अपना मित्र समझता है वह किताब खरीदे बिना भी नहीं रहता। सेल में किताब सस्ती मिल जाती हैं। मैंने दो किताबें खरीदीं। एक –वैन गोघ(Van Gogh)की पेंटिंग्स बुक दूसरी में फूलों की पेंटिंग्स ही पेंटिंग्स हैं जिसका सम्पादन रेचल रूबिन बुल्फ (रेचल Rubin Wolf)ने किया है।
       मैंने इन किताबों  में से देखकर कैनवास पेपर पर फार्म यार्ड के कुछ दृश्य व आकृतियाँ उभारी हैं।  चाहती हूँ - बेटा किचिन गार्डन में बारवैक्यू के पास लगाए। शीतल ने उन्हें फ्रेम में जड़कर उनकी सुंदरता  दुगुन कर दी है । मैं कोई बड़ी चित्रकार तो नहीं ,पर पल-पल खूबसूरती से गुजारने व मन बहलाने के लिए यह एक बहुत अच्छा साधन है। बच्चे जब भी मेरे तैलीय चित्रों को प्रशंसा भरी नजरों से देखते हैं तो रोम-रोम जगरमगर करने लगता है।

क्रमश:  

कनाडा डायरी कड़ी ।। 38 ।।


कनाडा डायरी के पन्ने 
प्रकाशित 
अंतर्जाल पत्रिका साहित्य कुंज

साहित्य चर्चा 
सुधा भार्गव 

23 8 2008
      
     कनाडा में भी हिन्दी प्रेमियों की कमी नहीं। ओटावा में रहते हुए मैंने काफी प्रयास किया कि यहाँ के कुछ वरिष्ठ प्रेमियों से मुलाक़ात हो जाए पर निराशा ही हाथ लगी। असल में मैंने यह प्रयास देर से शुरू किया दूसरे मैं भागीरथ महाराज के चक्कर में फंस गई।  पिछले माह उन्होंने बहुत से कवियों और लेखकों  के नाम गिनाकर हमें बहुत प्रभावित कर दिया था साथ ही वायदा भी किया कि आगामी कवि सम्मेलन में मुझे अवश्य बुलाकर ओटावा की कवि मंडली से परिचय कराएंगे। साथ ही कविता पाठ करने का मौका देंगे। सुनते ही हम तो गदगद हो गए और  अपना  कविता संग्रह रोशनी की तलाश में तुरंत उन्हें भेंट किया। कुछ ज्यादा ही  मीठी जबान में उनसे बातें करते रहे जब तक वे हमारे घर रहे। बड़ी ही बेसब्री से इनके आमंत्रण की प्रतीक्षा करने लगे पर वह दिन आया कभी नहीं। एक लंबी सी सांस खींचकर रह गए।
      सविता जी से जो शीतल से परिचित है  पता लगा कि 28 जून को तो वह कवि सम्मेलन हो भी चुका है जिसकी चर्चा मि॰भागीरथ ने की थी। उस कवि सम्मेलन के संगठनकर्ता पूरा तरह से वे ही थे। अब हम क्या करते?हाथ ही मलते रह गए। लेकिन हमसे इतनी नाराजगी! कारण कुछ समझ नहीं आया। कम से कम सूचना तो दे देते । हम इंतजार की गलियों में तो न भटकते।
सविता जी के कारण रश्मि जी से फोन पर मेरा परिचय हुआ।वे साहित्यिक गतिविधियों में बहुत गतिशील रहती हैं। उनके प्रयास से निश्चित हुआ कि 25 अप्रैल को सेंटर लाइब्रेरी के ओडोटोरियम में होने वाले कवि सम्मेलन में मुझे भाग लेने का मौका मिलेगा। दुर्भाग्य से यह कार्यक्रम नहीं होने पाया क्योंकि उस दिन ओटावा के अधिकांश भागों में बिजली चले जाने के कारण सभागार बंद कर दिया गया। ताकि बिजली की खपत कम से कम हो। ओफिस  भी 3-4 दिनों को बंद कर दिए गए ताकि एयरकंडीशन ,कंप्यूटर के चलने से बिजली कम खर्च हो । घरों में बिजली न होने से जन जीवन मुश्किल में पड़ गया। 25 अगस्त का कार्यक्रम 2 सितंबर तक  स्थगित कर दिया गया। हम तो 28 अगस्त को ही भारत आने वाले थे। अब क्या करें?समझ नहीं आ रहा था। ऐसे समय रश्मि जी ने हमें उबार लिया।
       उन्होंने 26 अगस्त की शाम को एक छोटी  सी काव्यगोष्ठी का  अपने ही घर पर आयोजना किया । देखा तो न था उन्हें अब तक पर उनकी मिलनसार प्रकृति सर चढ़कर बोलने लगी।
      फोन पर ही उन्होंने बताया –भारत से संतोष गोयल भी आई हैं। मिलने पर शिकायत भरे स्वर में उन्होंने मीठा सा उलाहना दिया-“आप इतने दिनों से आईं ,हम से बातें भी नहीं कीं। 2-3 कार्यक्रम रखते ,दूसरों से आपको मिलवाते। वैसे भी भारत से आए कलाकारो और साहित्यकारों का हम सम्मान करते हैं।” सुनकर हर्ष हुआ और संतोष कर लिया कि चलो 4-5 लोगों से तो मिल ही लेंगे।
      असल में हमने ही वहाँ की साहित्य मंडली में शामिल होने का समय गंवा दिया। पोती के जन्म  की खुशी में कुछ दिनों को  हम अपने को ही भूल गए। वह जब तीन माह की हो गई तब पेंटिंग या कविता जैसे शौक़ों को खँगालने का मौका मिला। वह नन्ही सी जान तो खुद एक कविता है। यह कविता मैंने जब-जब पढ़ी। जीवन के रंग और भी चटकीले हो गए।
क्रमश:  




शुक्रवार, 20 सितंबर 2019

कनाडा डायरी कड़ी।। 37।।

कनाडा डायरी के पन्ने 



प्रकाशित 
अंतर्जाल पत्रिका साहित्यकुंज कनाडा 


सुधा भार्गव 
20 8 2003
      समय बीतते देर नहीं लगती। एक दिन वह था जब हम यहाँ आए आए थे। कुछ दिनों तक तो बेटे की मित्रमंडली से भोज का निमंत्रण मिलता ही रहता था। स्वागत में वे आँखें बिछा देते। बेटे के दोस्तों का अनुराग देख हम उनकी प्रशंसा किए बिना न रहे।  वे मेरे बच्चों के समान ही हैं । मैं भी जब उनसे मिलने जाती एक न एक अपने हाथ से व्यंजन बनाकर उनके लिए ले जाती।
       अब फिर से जल्दी- जल्दी भोज के लिए हम  आमंत्रित किए जा रहे हैं।पर पहले जैसा उत्साह नहीं है। हमें लगता है लास्ट सपर हो रहा है। लौटते समय दर्द की हूक छिपाकर लाते हैं। उनके प्यार में डुबकियाँ भी लगाना अच्छा लगता है। बस एक ही अफसोस रहा:यहाँ पाँच माह रही पर किसी के लिए कोई भी पेंटिंग नहीं बना पाई। भारत से कुछ कलात्मक चीजें भी नहीं लाई कि उन्हें उपहार स्वरूप दे पाती। सभी तो भारतीय हस्तकलाओं व दस्तकारी के प्रेमी निकले। 
        इस मित्रमंडली के ज़्यादातर युवक आई ॰आई ॰टी के छात्र रह चुके हैं। कोई मद्रासी है तो कोई बंगाली, कोई गुजराती है तो कोई मारवाड़ी । पर अपनी संस्कृति व भाषा की पूरी तरह रक्षा किए हुए हैं।पिछली बार मैं सौम्य चटर्जी के गई थी। वह बंगाली में बातें कर रहा था। हम लोग अनेक वर्ष कलकत्ता रहे,बंगाली भाषा भी जानते हैं सो खूब पट रही थे। इतने में उसका दो वर्षीय लड़का बाबुली आँखें मलते हुए आया और  अपने पापा की गोद में बैठ करने लगा बंगाली में ही बातें। मैं हैरान—बोली –“अरे यह तो खूब अच्छी बंगाली बोलता है।”
      “हाँ आंटी,घर में हम इससे बंगाली में ही बोलते हैं। वरना अपनी भाषा कैसे सीखेगा?अँग्रेजी के लिए मोंटेसरी ही बहुत।”
      “तुम एकदम ठीक कह रहे हो।” मेरी आँखें मुसकाती उसकी तारीफ कर रही थीं।
      “आंटी ,इससे मिलिए –यह तारक है। अगले माह भारत लौट रहा है। रात –दिन इसे अपनी माँ की याद सताती है।”
      “सच में तारक तुम जा रहे हो –वह भी अपनी माँ के कारण ?”मेरे कान सुनी बात पर विश्वास न कर सके।
      “हाँ जी।बहुत पैसा कमा लिया। पैसा ही तो सब कुछ नहीं , मेरे माँ-बाप, मेरा देश मुझे बुला रहा है। अपने हुनर से अपने देश को बढ़ाऊंगा। पैसा तो कहीं भी कमा लूँगा। 10 नहीं तो 8 ही सही। भारत भी अब किसी से कम नहीं।”
       इतना आत्मविश्वास! आत्मसम्मान से सिर ऊंचा करके जीने की इतनी चाहत! इन नवयुवकों पर मुझे गर्व हो आया।
       भारत जाने के अब कुछ ही दिन शेष हैं। उन्हें अपनी उंगली पर गिनने लगी हूँ-एक -दो-तीन----।  मन करता है चाँद मेरे सामने ही बैठा घूमता रहे ताकि उसे देख सकूँ ताकि  अलगाव की कसक अभी से न घायल करने लगे।पोती को कसकर छाती से लगा लेती हूँ । सुना है स्पर्श में भावों के स्पंदन की अटूट शक्ति है। एक साल के बाद बहू-बेटे का भारत आने का प्रोग्राम है। क्या वह मुझे याद रख पाएगी?कोई उसे मेरी याद दिलाएगा भी या नहीं । बस ऐसी ही उलझनों में उलझ कर रह जाती हूँ।
       आज मैंने काफी सामान बांध लिया है। कुछ अपने लिए कुछ बड़ी बहू व बेटी के लिए। लगता है सब समान मैं ही रख लूँ। इसलिए नहीं कि मुझे चाहिए बल्कि इस लिए कि वह सब मेरे बेटे की कमाई का है। भूल जाती हूँ कि मेरे बेटे-बेटी उसके भाई-बहन भी हैं। मैं –मेरे के चक्कर में माँ होकर भी कभी-कभी इतनी स्वार्थी कैसे हो जाती हूँ—बड़ा ताज्जुब होता है।
       आजकल मेरे ख्यालों में बेटा चाँद ही समाया रहता है। कभी-कभी चुपके से आकर गंभीरता से पूछता-“माँ यहाँ खुश तो रहीं। मुझसे या शीतल से कोई गलती तो नहीं हुई। गलती हो जाय तो बता देना –रहूँगा तो तुम्हारा छोटा बच्चा ही।” जी भर आता –बोलते कुछ न बनता
--- बस उसके सिर पर हाथ फेरने लगती।
        चाँद सामान तौलता तो छाती फटती है—30-30 किलो की बड़ी-बड़ी अटैचियाँ!दिल्ली से जब चली थी तो सोचा था भविष्य में कभी इतना समान लेकर नहीं चलूँगी। मगर बच्चों के मोह और मृग मारीचिका की जकड़न ने फिर अति का समान इखट्टा कर लिया। चाहती थी खाने का सामान वजन के अनुसार सबसे बाद में खरीदूँगी। मगर शीतल ने मनपसंद बिस्कुट,स्विस केक ,मुच्छी चिप्स,बादाम-पिस्ते न जाने क्या क्या खरीद लिया। ऐसा लग  रहा है मानो मैं माँ के घर से विदा होकर जा रही हूँ।
      पैकिंग के बाद चाँद बोला-माँ अभी जगह है ,चलो बाकी का समान खरीद कर ले आते हैं। चुटकियों में तैयार हो उसकी कार में जा बैठे और टोयटा केम्री शीघ्र ही हवा से बातें करने लगी। उसने बड़े चाव से अपने जीजाजी के लिए राई वाइन और वाइन ग्लास खरीदे । कॉफी का बड़ा सा मग हाथ में लिए जल्दी ही लौट आए।
       मेरे पास स्मृति वस्तुओं (souvenir collection)का अच्छा खासा संग्रह हो गया है  । जहां भी जाती हूँ यादगार के तौर पर एक चीज जरूर ले लेती हूँ ।प्रीति उपहार भी बहुत आकर्षक हैं । विचारों के फंदे  तो हमेशा से समय की सलाइयाँ बुनती चली आई हैं सो एक फंदा और तैयार होने लगा है -जिस प्यार व चाव से गिफ्ट दिये गए हैं और स्मृति पदार्थ खरीदे हैं,उन्हें शौक से अपने घर में सजाऊँगी।”
      26 जनवरी को अवनि के नाना-नानी एडमिंटन से आने वाले हैं । इसलिए आज ही ऊपर का कमरा छोड़कर नीचे सामान ले आए। सोने ऊपर ही चले जाते हैं पर 26 ता: से दूसरे कमरे में सोना पड़ेगा। दो दिन की ही तो बात है फिर तो भारत चले ही जाएँगे। चार दिन को आए पर ऊपर वाला कमरा अपना लगने लगा।उसे छोड़ते समय मन खिन्न था। सच कहूँ –मैंने महसूस किया कि अधिकार खोना कितना खराब लगता है! भूल गई कि परिवर्तन प्रकृति का नियम है। थोड़ी देर के लिए अतीत की भूलभुलैया में खो गई।
      फरीदाबाद में माँ छोटे भाई के साथ रहती थी। उनका कमरा अलग व आधुनिक उपकरणों से सुसज्जित था।ज्यादातर मैं कलकत्ते से आकर उन्हीं  के पास सोती थी ,उनका ज्यादा से ज्यादा साथ चाहती थी। बदकिस्मती से हार्ट अटैक के कारण उनकी अचानक मृत्यु हो गईं। अंतिम क्रिया के बाद दुबारा भाई से मिलने गई । चुंबक की तरह पैर माँ के कमरे की ओर बढ़ गए। सोचा-माँ नहीं तो क्या हुआ!अलमारी में टंगे उनके कपड़े,मेज पर रखी दवाइयाँ, पूजा की माला देखकर ही संतुष्ट हो जाऊँगी। उनकी उपस्थिति का कुछ तो अहसास होगा। पर यह क्या! दरवाजे पर पैर रखते ही बिजली का झटका सा लगा—जो दिखाई दे रहा था उस पर विश्वास करना मेरे बूते के बाहर था । वह कमरा भतीजे-भतीजी का अध्ययन कक्ष बन गया था।माँ का नामोनिशान मिट चुका था।  इस बदलाब को न मन मानने को तैयार था न आँखें ही अभ्यस्त थीं। तभी विवेक ने सिर उठाया- जो आया है वह जाएगा ही और उसके जाने के बाद अन्य उसकी जगह लेगा—यह तो प्रकृति का नियम है । इस कमरे में रहने वाली तुम्हारी माँ थी,अब भी रहने वाले तुम्हारे ही हैं। यहाँ तो अन्य कोई है ही नहीं फिर शिलागिलवा कैसा! इस सोच ने मुझे स्थिरता दी,तब कहीं जाकर चित्त शांत हुआ। 
क्रमश:  
 




कनाडा डायरी कड़ी ।। 36।।




कनाडा डायरी के पन्ने 
प्रकाशित 
अंतर्जाल पत्रिका कनाडा साहित्य कुंज  

शिशुओं की मेल -मुलाकत
http://sahityakunj.net/entries/view/36-shidhuon-ki-mel-mulaqat
सुधा भार्गव 

16.8.2003
       
  चौंक गए न आप---- शिशुओं की मेलमुलाकात ! वह भी 2-3 माह के शिशु !न वे बोल सकते हैं न बैठ सकते हैं फिर भी मुलाक़ात! असल में 8 नवजात शिशुओं के माँ- बाप ने आपस में मिलने का कार्यक्रम बनाया। ये वे ही हैं जिनकी बच्चों के जन्म से पहले ही चाइल्ड केयर क्लास में मुलाक़ात हुई थी। अब वे एक दूसरे के बच्चों के बारे में जानने को उत्सुक थे साथ ही माता-पिता बनने के बाद अपने खट्टे-मीठे अनुभव भी बांटना चाहते थे। आज बहू-बेटे को नन्ही सी पोती के साथ वहीं जाना  है।सारे परिवार अपना -अपना खाना बनाकर एक स्थल पर एकत्र होंगे पर एक व्यंजन ऐसा भी बनाना होगा जिसे सब में बांटकर खाया जा सके। शीतल तो केक बनाने में कुशल है ही। सो केक का सामान जुटाने में लगी है। 
      सुबह से ही सब व्यस्त नजर आ रहे हैं। मेरा समय नाजुक सी पोती ने ले रखा है। लो मैंने उसे गुलाबी फ्रॉक भी पहना दिया। एकदम गुलब्बो परी लग रही है। बेटे ने अवनी को सँभाला और शीतल बैग लिए उसके साथ चल दी –मैंने हाथ हिला दिया –बाई—बाई बाई –बाजी जीत कर आना।
      शाम को घर में कदम रखते ही शीतल चहकने लगी-“मम्मी जी ,अवनि बच्चों के बीच खूब हंस रही थी। हूँ –हूँ करके अजीब आवाजें निकाल रही थी। कोई उसे चुस्त कह रहा था तो कोई मस्त। इसने जब पैर का अंगूठा मुंह में दिया तो एक माँ ने कह ही दिया-अवनि तो सब बच्चों में आगे है।”यह सुनकर मेरे मन में तो जलतरंग बजने लगी। मेरे कहना सच हो गया –उसने बाजी मर ली थी।
      संध्या होते ही अवनि बेचैन नजर आने लगी।  मैंने उसे बहुत सँभलने की कोशिश की पर एँ –यह क्या –वह तो पसर पड़ी। मेरे ललाट पर पसीने की बूंदें छ्लछ्ला आईं। बहू का सहारा लेने की गरज से बोली –“बेटा ,अवनि को कुछ समय के लिए ले लो।” पर उसकी नाक पर तो गुस्सा आकर बैठ गया-“इसे सँभालू या घर।” उसका नीला –पीला होना एक हद तक ठीक था क्योंकि चाँद का दोस्त विपिन अपने माता पिता के साथ डिनर पर आने वाला था। मुझे  बेटे पर झूँझल आए बिना न रही—बड़बड़ करती रही –करती रही -“आज ही क्यों बुला लिया। टाला भी तो जा सकता था। शीतल इतना थकी आई है। वह तो मजबूरन काम मेँ लग गई पर अवनि  तो कोमल सी बच्ची है । थकान से आँखें झपझपा रही थी । उसे भी तो माँ की गोद चाहिए। बच्चे के साथ इतना तामझाम चलता है क्या!” पर किसी को मुझे समझने या मेरी बात सुनने की फुर्सत न थी। झक मारकर चुप हो गई। 
    उसे बहलाने के लिए पास के  पार्क में घुमाने ले गई। कुछ चुप तो हुई पर ठंडी हवा के झोंकों का आनंद नहीं ले रही थी। मेरे दिमाग में तो यह बात जम गई कि किसी कलमुँही की नजर लग गई है।अब कैसे उतारूँ नजर! यही चिंता खाने लगी। अगर भारत में होती तो आनन-फानन में फिटकरी को उस पर सात बार फिराकर टुकड़े को अग्नि के हवाले कर  देती। फिटकरी पिघलकर उसका आकार ले लेती है जिसकी कुदृष्टि बच्चे पर पड़ती है। मैंने तो शुरू से ऐसे ही नजर उतारी । मेरी  माँ भी यही करती थीं । अब यहाँ बिजली के चूल्हे में फिटकरी कैसे डालूँ! मन की बात  किसी से कह भी तो नहीं सकती! बेटा तो छूटते ही कहेगा-अरे अम्मा!कौन सी सदी की बातें कर रही हो?—ये सब तो फालतू की बातें हैं।” मानो या न मानो पर बुरी भावना का असर जरूर होता है। हमारे बड़े-बूढ़ों ने भी कहा है –स्त्री धन ,गौ धन,संतान धन और विदद्या धन को तेजाबी नजर से  बचाकर रखना चाहिए।
      रात को अवनि ने  बड़ा परेशान किया । मेहमानों के आने पर उसने जो रोना शुरू हुआ थमा ही नहीं । वैसे तो किसी के आने पर जब माँ की गोदी नहीं मिलती थी तो थपथपाने और लॉरी सुनाने पर मेरी  बाँहों में सो जाती थी लेकिन उस दिन तो मैं फेल हो गई। आखिर में तुम्हारा पापा आया और उसकी गोदी में एक मिनट में ही सो गई। मान गए  पापा का प्यार जीत गया।
क्रमश:  






शनिवार, 7 सितंबर 2019

कनाडा डायरी ।। कड़ी 35।।


कनाडा डायरी के पन्ने 

प्रकाशित 
अंतर्जाल पत्रिका साहित्य कुंज 

न्यूयार्क के दर्शनीय स्थल

तथा

कनाडा प्रस्थान
http://sahityakunj.net/entries/view/35-new-york-kee-sair-bhag-4

भाग4

27 जुलाई 2003


ग्राउंड 0


एम्पायर स्टेट बिल्डिंग की गहन ऊंचाई से शीशाकार महल में खड़े होकर ग्राउंड 0 की झलक तो देख ली थी मगर संतुष्ट न हो सके। अत:निश्चित हुआ कि ध्वंसात्मक लीला के अवशेष देखने के बाद आजादी के दर्शन करेंगे। सो 27 जुलाई को सुबह पहुँच गए गगनचुंबी ऐतिहासिक इमारतों के इर्दगिर्द।
      4अप्रैल 1973 को न्यूयार्क के ठीक बीचों -बीच ट्रेड सेंटर दी बिल्डिंग बनकर तैयार हुई थी। इसमें दो-दो मीनारें थीं। ये 1368 फुट और1362 फुट दुनिया की सबसे ऊंची इमारतें 60 तल्लेवाली थीं। 11सितंबर 2001 को अलकायदा के आत्मघाती आतंकियों ने दो अपह्रत यात्री विमानों से इनपर विनाशकारी हमला किया। पल में 4000 लोग जान से हाथ धो बैठे। 4,27000 करोड़ रुपए की संपति धूल में मिल गई। अमेरिका की आर्थिक ऐश्वर्यता की प्रतीक बिल्डिंग को दिन दहाड़े गिरा दिया और वह अकथनीय दहशत से भर गया। जिन दिनों सद्दाम हुसैन के तानाशाही राज्य के  खिलाफ जंग छिड़ चुकी थी उन्हीं दिनों आतंकवाद का दौर शुरू हो गया। यही दुर्घटना स्थल ग्राउंड0 कहलाता है।
      अमेरिका ने कभी सोचा भी न था कि उसको कोई नुकसान भी पहुंचा सकता है।असीमित सुरक्षा के होते हुए कोई उसका कवच भेद पाएगा। लेकिन अमेरिका की हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी। उसने भी कमर कस ली है कि जो इमारत नष्ट हो गई है उससे भी ऊंची इमारत बनाकर वह संसार को दिखला देगा । यही दृढ़ता ,लगन और देश की शक्ति को बनाए रखने का संकल्प अमेरिका की ताकत का राज है।
      हम सब 0ग्राउंड पहुंचे। उस समय कड़ी सुरक्षा में इमारत का पुन:निर्माण कार्य चल रहा था। उस स्थल के चारों तरफ लोहे के तार की मजबूत जाली लगी हुई थी। अंदर एक दीवार पर पोस्टर लगा था जिसमें ओसामा बिन लादेन के दूतों की विध्वंसात्मक लीला का जिक्र करते हुए मृतकों की आत्मा को शांति मिलने की कामना की गई थी।
     बिल्डिंग के अहाते में दीवार से सटा एक चबूतरा बनवा दिया गया था।  दीवार पर महाप्रयाण करने वालों के चित्र लगे हुए थे। चबूतरे पर उनकी याद में किए अर्पित फूल भी बड़े उदास लग रहे थे। मृतकों के मित्रों और रिश्तेदारों ने इस वहशीपने का विरोध करते हुए अपने आत्मीय जनों की स्मृति में यहाँ आकर आँसू बहाए। अपने हृदय की मर्मस्पर्शी भावनाओं की अभिव्यक्ति निर्जीव कागज के टुकड़ों पर करके उन्हें जीवंत बना दिया था ।

स्वतन्त्रता की देवी (goddess of liberty)
         
रह-रहकर हमारा मन समुद्र की लहरों के बीच आजादी की देवी की प्रतिमा को  देखने मचल रहा  था । इसलिए शोक स्थल ग्राउंड o से जल्दी ही विदा ली।  न्यूयार्क  बन्दरगाह पर  फेयरी बोट के 10डॉलर प्रति व्यक्ति के हिसाब से 2 टिकट हमारे लिए टूर के संचालक ने पहले से ही खरीद लिए थे। हम शीघ्र ही सुंदर सी बोट में चढ़ गए। उत्तेजना में बच्चों की तरह कभी बोट के किनारे की ओर भागते तो कभी जहाज के नीचे की मंजिल पर । असल में सीमित समय में नील समुंदर का असीमित सौंदर्य पलकों में भरना चाहते थे। 
कॉफी के बड़े- बड़े गिलास लेकर खिड़की के पास बैठ गए। पास से कोई छोटा-बड़ा जहाज गुजरता तो उसे कैमरे मेँ कैद करने की इच्छा होती। बलखाती लहरों के साथ झूमने को मन करता। समुद्र के किनारे खड़ी गगनचुंबी इमारतें न्यूयार्क की यश गाथा कहती प्रतीत होतीं। 
     दूर से ही आजादी की देवी नजर आने लगी। गाइड उसके बारे मेँ अनेक दिलचस्प बातें बताने लगा कि यह विशाल प्रतिमा फ्रांस मेँ बनाई गई है। जिसे एक फ्रांसीसी मूर्तिकार ने अनेक मजदूरों के साथ 10 घंटे प्रतिदिन श्रम करके नौ साल मेँ इसे पूर्ण किया। 4 जुलाई 1884 को यह 47 मीटर ऊंची मूर्ति अमेरिका को भेंट कर दी गई।
     “इसके हाथ मेँ मशाल क्यों है?”मैंने पूछा ।
“इसका असली नाम है –“liberty enlightening the world” और इसके सिर पर ताज भी है जो हमेशा चमकता रहता है। क्योंकि उसमें एक टॉर्च हमेशा जलती रहती है।
     मूर्ति को देखते ही कुछ लोग जोश में अपने दोनों बाजुएँ उठाकर चिल्लाये “देखो—देखो हाथ मेँ मशाल लिए यह विश्व को स्वतन्त्रता की ज्योति जलाए रखने का संदेश दे रही है। खुद भी स्वतंत्र रहो और दूसरों को भी स्वतंत्र रहने दो।” सुनकर मैं कुढ़ सी गई। मन ही मन बड़बड़ाई –“ऊँह , कौन सुनता-समझता है इस संदेश को?”
     जैसे-जैसे हम लिबर्टी टापू के पास आते गए आश्चर्य में डूबने लगे।  दूर से तो आजादी की देवी का आकार छोटा लगता था ,नजदीक से वह विशाल और भारी-भरकम दिखाई देने लगी।   
      “इस ताँबे की मूर्ति का वजन क्या होगा?”हमारे ही एक सहयात्री ने पूछा।
      “वजन तो बहुत है। करीब 20,41000किलो तो है ही। गाइड ने कहा।
      ‘बाप रे –।’अस्फुट ध्वनियाँ गूंज उठी। साथ ही अनगिनत प्रश्नोत्तर का कोलाहल फूट पड़ा।  
     “इसने जो ताज पहन रखा है ,उस तक क्या हम पहुँच सकते है?
      “वहाँ तक पहुँचने के लिए करीब 354 सीढ़ियाँ हैं। चढ़ते-चढ़ते साँस फूल जाएगा। लेकिन बीच- बीच में रोशनदान हैं ताकि सीढ़ियों पर उजाला रहे और हवा भी आती रहे।”
     यह सुनकर मुझे दिल्ली की कुतुबमीनार याद आ गई थी। विध्यार्थी जीवन में उसे एक बार देखने गए थे और ऊपर की मंजिल तक चढ़ गए थे।  वहाँ भी बहुत सीढ़ियाँ हैं और बीच बीच में रोशनदान बने हुए हैं। लगता हैं पुराने समय में बहुमंज़िली इमारतों में चढ़ने के लिए इसी प्रकार का चलन था।  
      “कुछ भी हो  हम ताज तक जरूर जाएँगे। ऐसा मौका फिर कब मिलेगा! इतनी ऊंचाई से नीचे का अद्भुत नजारा देखना ही है।” कुछ युवक जिद करने लगे।
     “दोस्तों मुझे बड़ा खेद है कि तुम्हारी यह इच्छा पूरी नहीं हो सकती।  वर्ल्ड सेंटर पर हमले के बाद सुरक्षा की दृष्टि से ताज तक जाने पर रोक लगा दी है। हमारी बोट लिबर्टी टापू पर रुकेगी भी नहीं।” गाइड ने हमें समझाया।
     आगे कहने को कुछ बचा ही न था। सभी मन मार कर रह गए। लिबर्टी टापू के पास जाने से एलिस टापू भी दिखाई दे रहा था। । अमेरिका भूमि पर बसने की शुरुआत इसी द्वीप से हुई थी। खैर!आजादी की देवी के अंदर से दर्शन न हो सके। समुद्री किनारों पर नजर डालते हुए  निराश लौट आए। बाद मेँ मेरे दिमाग मेँ बबूला उठा-“इतनी उदासी क्यों?अब इस  मूर्ति की सार्थकता कहाँ !”
     मन अजीब वितृष्णा से भर गया। । विचारों के द्वंद में फंसी बहुत दूर निकल गई। अफगानिस्तान –ईराक—वियतनाम के खून भरे छींटें मेरे शरीर में अनगिनत सुइयाँ चुभाने लगे। मानवीय संवेदनाओं के अभाव में बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओं के दैत्याकार घेरे,रॉकेट–युद्धपोत जैसे संतरी क्या रोक सके स्वार्थ और हिंसा की बयार!

प्रस्थान:न्यूयार्क से कनाडा
        
दोपहर के 12 बजते-बजते बस मेँ बैठकर ओटावा की ओर चल दिये।न्यूयार्क दूर की अवधि समाप्त हो रही थी।  बस मेँ पिक्चर देखी,कई खेल भी खेले,इनाम भी जीते पर सब फीका -फीका लगा। न्यूयार्क के ऐतिहासिक व ऐश्वर्य युक्त स्थलों की ओर बार-बार मन उड़ा चला जाता। कुछ मीठे अनुभव हुए तो कुछ कड़वे। कुछ जबर्दस्ती भी पचाने पड़े। एक बात अच्छी तरह समझ गई कि उन्नत राष्ट्र की कल्पना तभी साकार हो सकती है जब सुरक्षात्मक दृष्टि से वह पूर्ण समर्थ हो और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर। 
क्रमश:  

कनाडा डायरी कड़ी ।। 34।।


कनाडा डायरी के पन्ने
प्रकाशित 
अंतर्जाल पत्रिका साहित्य कुंज 
न्यूयार्क शहर के दर्शनीय स्थल
भाग 3
http://sahityakunj.net/entries/view/34-new-york-kee-sair-bhag-3
सुधा भार्गव 
26 जुलाई 2003
      
पिछली रात सोते सोते 12 बज गए थे। घूमते घूमते पैरों में दर्द भी हो रहा था पर शहर घूमने की तमन्ना में सुबह 6 बजे ही नींद खुल गई। स्वादिष्ट जलपान कर खिलते चेहरे लिए हम टूरिस्ट बस में जा बैठे। एक अन्य गाइड टूरिस्ट बस में पहले से ही सवार हो गया था। उसे महत्वपूर्ण स्थलों की काफी जानकारी थी। उसका नाम जॉन था। मैं उससे खोद खोदकर पूछ रही थी कि समूह से बिछुड्ने पर उससे कैसे संपर्क किया जा सके और कहाँ पहुंचा जाए। अपने सीने से चिपके मोबाइल में सब नोट करती जा रही थी।विदेशी भूमि पर कुछ ज्यादा ही सतर्क थी। उसकी वजह -कड़वे अनुभव के कारण अतीत की दरार में मेरा एक पैर हमेशा फंसा रहता है । पिछले साल यूरोप जाते समय मैं मोबाइल नहीं ले गई थी जिसका खामियाजा मुझे भुगतना पड़ा।
      बात उन दिनों की है जब मैं भार्गव जी के साथ इटली गई थी। वहाँ के प्रसिद्ध शाही महल से कुछ दूरी पर बस खड़ी हो गई और हम यात्री गाइड के साथ पैदल ऊंचाई पर चढ़कर महल पहुंचे। छोटी छोटी दुकानों में रंगबिरंगे ,छोटे -बड़े मुखौटे बड़े ही लुभावने थे। उनको देखने और खरीदने में इतनी मशगूल हो गई कि भार्गव टूर के साथ गाइड की बात सुनते सुनते  कब आगे बढ़ गए पता ही नहीं चला।मुखौटों का सम्मोहन कम हुआ तो मैंने इधर उधर नजर दौड़ाई। कोई सहयात्री नजर नहीं आया। मेरे तो होश उड़ गए। अब मैं क्या करूं?रास्ता पूंछू तो कैसे पूंछू?वहाँ 99%फ्रेंच बोली जाती है। अँग्रेजी के भी ज्यादा जानकार नहीं फिर हिन्दी बोलने –समझने का तो प्रश्न ही नहीं उठता।
     डेढ़ घंटे तक कोई मुझे खोजने नहीं आया ।सोच रहे होंगे ,अभी तो समय है आ जाएगी। दुकानों के आगे खड़ी -खड़ी अनजानी जगह मेरी हिम्मत जबाब देने लगी। वैसे जिस होटल में हम ठहरे थे उसका और भार्गव जी का फोन नंबर मेरे पास था पर मोबाइल नहीं था। फोन बूथ के लिए मैंने कई लोगों से इंगलिश में पूछा –ताज्जुब!न बात समझे न इशारे समझे। अगर फोन के चक्कर में वहाँ से चल भी देती तो लौटकर वहाँ आ पाती या नहीं। मैं उस जगह को छोड़कर जाना भी नहीं चाहती थी क्योंकि वहीं से मैं ग्रुप से अलग हुई थी।  विश्वास था कि कोई तो खुदा का बंदा मुझपर रहम करेगा और ढूँढने आएगा। इसी बीच मैंने ग्रुप के कुछ लोगों को जाते देखा बस हो ली उनके साथ। डूबते को सहारा मिल गया ।
     अकेले देख एक महिला पूछ बैठी – “अरे आप अकेली---?”
     “हाँ,ग्रुप के साथ बिछुड़ गई हूँ।” 
     “और आपके पति साहब ?”
     “उनके तो दिमाग मेँ ही नहीं आया होगा कि अनजानी जगह में मैं ऐसी मूर्खता कर सकती हूँ। पीछे मुड़कर देखा ही नहीं होगा। वे गाइड के साथ साथ चलना ज्यादा पसंद करते हैं ताकि नए देश का  इतिहास –भूगोल पता लग सके। चलते क्या है भागते हैं हिरण की तरह। मेरी चाल ठहरी कछुए की सी। उनका पीछा करने मेँ मेरा तो सांस फूल जाता है।” 
      मेरी बात पर वे लोग ज़ोर से हंस पड़े।  मेरा तनाव भी कुछ कम हुआ। वे एक ही परिवार से थे। खूब मस्त। हंसी मज़ाक,ख़रीदारी खान-पान एक साथ। सच्चे अर्थ में यात्रा का आनंद उठा रहे थे। हम दूसरे रास्ते से बस की ओर चल दिए। पहुँचने पर भार्गव जी को  बस में बैठे देखा –बड़ा गुस्सा आया –मुझे ढूँढने भी नहीं गए। तभी 2-3 युवक बस में हाँफते घुसे । थककर चकनाचूर थे। चिंता की लकीरें माथे पर साफ झलक रही थी।
     उनमें से एक युवक बोला-ओह आंटी आप आ गई। मुझे देख उनकी सांस में सांस आई।
      दूसरा बोला-“आंटी आप कहाँ चली गई थीं?अंकल बहुत घबरा गए थे। वे आपको खोजने जा रहे थे,। हमने उनको नहीं जाने दिया। वे भला आपको कहाँ -कहाँ खोजते? हमने आपको महल के चारों तरफ देखा-- दुकान- दुकान खोजा। बस आप आ गई--- सबसे अच्छी बात!”
      इनके चेहरे पर हवाइयाँ उड़ रही थीं। साथ ही मुझ पर गुस्सा भी आ रहा होगा पर समय की नजाकत देख होंठ सी लिए। तब से गांठ बांध ली कि साथ- साथ ही रहूँगी और मोबाइल  को गले में लटकाकर रखूंगी । अपना वायदा मैं भूली नहीं।  न्यूयार्क के लिए जबसे चली हूँ गले में मोबाइल के साथ कैमरा भी झूल रहा है। डर के मारे इन्हें नहीं देती कि कहीं फिर से  गुम हो गई तो---।
      चायना बाजार
        यहाँ से सस्ती चीजें खरीदने का सबपर नाशा छाया हुआ था। कुछ ही देर में भीड़-भड़क्के से दूर चायना बाजार के पास बस रुकी और हमें दो घंटे का समय दिया गया। सुन रखा था वहाँ बड़ी सस्ती चीजें मिलती हैं। पूछने पर कपड़े,घड़ियाँ ,कलात्मक क्रॉकरी न  जाने क्या क्या गिनाने लगते। बस के रुकते ही हम ऐसे भागे जैसे मुफ्ती का माल बँट रहा हो,जरा देर हुई कि खतम।
      धूलभरी ऊंची-नीची पथरीली सड़क! ऐसी सड़कें यहाँ!हम मियां बीबी ने हाथ पकड़कर सड़क पार की। कार ,बस शोर करती तेजी से सुरर से निकल जाती। पर हमें तो चायना मार्केट का लुत्फ लेना था सो पहुँच गए वहाँ। एक हिस्से को देख  कलकत्ते की याद आ गई। एकदम फुटपाथिया बाजार ---फुटपाथ से लगीं छोटी छोटी दुकानें पर गहरी,सामान से लदीफदी। उसके अलावा दुकान के बाहर दोनों ओर समान टिका पड़ा था और निगरानी को एक आदमी भी स्टूल पर जमा बैठा था। अब ऐसी गुफा सी दुकान में एक आदमी के खड़े होने की तो जगह नहीं अगर 3-4 आदमी एक साथ अपनी तकदीर आजमाने घुस गए तो पैर के कुचलने में तो कोई कसर बचेगी नहीं। दुकानों के सामने ही कुछ दूरी पर जमीन पर टोपी,घड़ियाँ ,टीशर्ट लिए बैठे थे। अंदर बाहर ,दायें-बाएँ सौदेबाजी की चटरपटर –कें-कें –चीं—चीं-पूरा मछली बाजार था –मछली बाजार।
      इस छोटे ,गंदे,भीड़ -भाड़ से अटे बाजार को देख आधा उत्साह ठंडा पड़ गया। भार्गव जी की दुकानों में घुसने की तो हिम्मत ही नहीं हुई। हाँ,उपहार स्वरूप देने के लिए बाहर से ही कुछ टी शर्ट्स और टोपियाँ खरीद लीं। कलाकृतियों में पोर्सलीन के बने चायनीज़ चेहरे अवश्य आकर्षक व सुंदर थे।
     भार्गव जी को अपने एक मित्र मिल गए। वे तो बातों में मशगूल हो गए और मुझे से कहा-यदि तुमको दुकानों से कुछ खरीदना है तो चली जाओ। मैं यहीं खड़ा हूँ। मैं दुकान में घुसकर एक चाबी के गुच्छे का मोलभाव करने लगी। उस पर एक ओर एम्पायर स्टेट बिलडिंग बनी थी और दूसरी ओर लिबर्टी का स्टेच्यू। पीतल का वह लटकता मुझे बड़ा सुंदर लग रहा था। इतने में एक महिला आई । उसने दुकान दार को 20 डॉलर का नोट देकर 10 डॉलर का कुछ समान खरीदा । दुकानदार ने उसे पैकिट थमाया और मेरी  तरफ मुड़ा।
      महिला जल्दी में थी। बोली-“पहले आप हमें 10 डॉलर बकाया दे दीजिए। फिर दूसरे ग्राहक से बात कीजिए‘”
      दुकानदार झट से हिन्दी में ही बोला –“आपने मुझे 10 डॉलर ही दिए थे। 10 डॉलर का समान हो गया,सो हिसाब बराबर ।”
      महिला हतप्रभ हो गई-“अरे मैंने आपको 20 डॉलर दिए थे।”
     “आपको ध्यान नहीं ,आपने 10 ही दिए थे।“
      कुछ देर बहासा बहसी होती रही पर दुकानदार अपनी बात पर ही अड़ा रहा।महिला अनमनी होकर चली गई। पता नहीं किसकी भूल थी।
      हमारे कुछ साथी ख़रीदारी करते-करते बहुत दूर निकल गए। जब बस में मिले तो एक दूसरे को अपनी घड़ियाँ दिखाने लगे।  हर एक के हाथ में स्विस घड़ी थी जो रूपरंग से लुभा रही थी। मुझे भी वे सुंदर सस्ती और टिकाऊँ लगी। अफसोस होने लगा,मैंने क्यों नहीं खरीदी--- 10-15 डॉलर में इतनी शानदार !फिर याद आया –मेरा बेटा भी तो इतने ही दाम में कनाडा से दो रिस्टवाच खरीदकर लाया था। मुश्किल से 2-3 साल ही चली होंगी और ये मेरे टाइटिन की घड़ी –इसे तो आठ साल से बांध रही हूँ। चलते चलते जरा भी नहीं थकी। अच्छा हुआ लालच में नहीं आई। मैं भली और मेरे यह प्यारी घड़ी भली। इस तरह से अपने को सांत्वना देने लगी या यों कहो ,अंगूर नहीं मिले लोमड़ी को तो कहने लगी खट्टे हैं
       थियेटर प्रेमी
       थियेटर प्रेम  के कारण हम सब साथी करीब पाँच बजे दो दिशाओं की ओर चल पड़े। । एक समूह मैरियट कोर्ट यार्ड होटल लौट गया जहां हम सब ठहरे थे। वे ब्रोडवे शो देखने के इच्छुक न थे। दूसरे समूह में हम जैसे थियेटर प्रेमी शो देखने वाले थे। उन्हें थियेटर गेट पर उतारते हुए गाइड ने एलान कर दिया - “शॉपिंग कीजिए या विंडो शॉपिंग परंतु 8 बजते ही थियेटर के गेट पर खड़े मिलिएगा। जिन्होंने थियेटर के टिकट नहीं लिए वे बस से होटल लौट जाएँ। शो समाप्त होने पर टूरिस्ट को लेने बस दुबारा लेने आएगी। उस समय भी ग्रुप के सब लोग थियेटर के बाहर खड़े मिलें।”
          बस के जाते ही हम थियेटर प्रेमी स्टार बॅक कॉफी का स्वाद लेने में मशगूल हो गए।
        अब प्रश्न था कि हम 5 से 8 बजे तक ब्रोडवे की सड़कों पर कहाँ -कहाँ घूमेंगे? कैसे इतना लंबा  समय बिताएँगे? इत्तफाक से एक युगल जोड़े से हमारी दोस्ती हो गई। वे आपस में बहुत कम बात करते थे। सज्जन हमसे भी बड़ी नपी -तुली बातें करके चुप्पी साध लेते परंतु थे बड़े घुमक्कड़ी स्वभाव के।  हमारे संदेह व समस्याओं को सुलझाने में दिलचस्पी लेते थे। यूरोपियन होने के कारण उन्हें अँग्रेजी के अलावा फ्रेंच भी आती थी और अनेक देशों का तजुरबा था। इसलिए उनका साथ होने से अच्छा ही रहा। हम उनके साथ ब्रॉडवे थियेटर के आसपास शाम के 8बजे तक जवानों की तरह सड़कों पर चहलकदमी करते रहे।
       धूप में घूमने से गला सूखने लगा । अपने पास का पानी खतम हो गया । फुटपाथ पर पानी –पेप्सी की बोतलें लिए बैठे थे । दो पानी की  बोतलें खरीदीं जो पेप्सी औए बीयर से महंगी थीं। हमारे मित्र तो धड़ाधड़ सिगरेट के पैकिट खाली कर रहे थे जिसके सहारे शायद उनकी भूख-प्यास उड़ गई थी पर हमें तो पानी चाहिए था। पेप्सी भी पी पर उससे शांति  कहाँ! एक बार में एक एक गिलास पानी पीने वाले एक एक घूंट पीकर समय काट रहे थे। हर जगह पानी मिलने वाला नहीं था। बड़े -बड़े स्टोर देखने के बाद थककर  सड़क के किनारे बनी बैंचों पर बैठ जाते। कभी जंक फूड खरीदते तो कभी बिना किसी प्रयोजन के इधर उधर निगाहें दौड़ाने लगते।
थियेटर का कैब्रेट शो 
     
शाम का झुटपुटा होते ही न्यूयोर्क रंगबिरंगी रोशनियों से झिलमिलाने लगा था ।  रात्रि के आठ बजते ही हम ब्रोडवेज थियेटर के सामने जा खड़े हुये और  भरपूर निगाहों से उसकी बहुमंज़िली इमारत को देखने लगे। जगह जगह विज्ञापनों की भीड़ लगी थी। सड़क के किनारे खंभों पर टिके टी॰ वी॰ की तरह बड़े-बड़े स्क्रीनो पर दर्शनीय स्थल व विज्ञापनों की छवियाँ उभर रही थीं । देखते ही देखते वे अदृश्य भी हो जातीं। । दूसरे पल वह स्क्रीन दूसरी दिशा में मुड़ती और कुछ अन्य ही दिखाई देने लगता। वहाँ का मीडिया और तकनीक इतना सशक्त व आधुनिक है कि एक ही जगह खड़े होकर लगता था कि पूरे न्यूयार्क पर नजर है।
      थियेटर के प्रमुख द्वार से प्रवेश करके सीढ़ियों द्वारा पहली मंजिल में गए। सभागार में घुसकर बालकनी की कुर्सी में आराम से बैठ गए। हर कुर्सी के साथ छोटी सी एक मेज लगी थी जिस पर टेबिल लैंप रखा था। गिलास रखने के लिए  उसमें एक गोलाकार परिधि बनी थी जिससे गिलास या कप लुढ़क न जाय।
       हमारे सामने मंच की ओर अंधेरा ही अंधेरा था ।हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था। अचानक मंच की जगह कुछ आकृतियाँ तैरती नजर आईं। धीरे - धीरे उजाला  होने पर पूरा रंगमंच झिलमिला उठा। मंच के ऊपर बनी बालकनी में वाद्य-यंत्रों के कुशल कलाकार विभिन्न मुद्राओं में खड़े या बैठे हुए थे। उनकी बालकनी से बाएँ –दाएँ मंच की ओर सीढ़ियाँ आती थीं। संगीत की झंकार के साथ पर्दे हटे । नाटक के पात्र अपनी विभिन्न मुद्राओं से दर्शकों को लुभाते रहे । नृत्य के  साथ साथ उनके अंग - अंग की थिरकन,अभिनय कौशल सभी तो आश्चर्य में डालने वाला था। इस नाटक में किशोरी की तरह प्रौढ़ नायिका जब बात-बात में लजा जाती है, प्रौढ़ प्रेमी का इंतजार करती है तो बहुत सुंदर ढंग से अपने प्रेमी हृदय की भावनाओं को व्यक्त करती है। वाद्य संगीत सोने में सुहागा था ।
       इस नाट्य प्रदर्शन  से केवल मनोरंजन ही नहीं हो रहा था बल्कि यथार्थ बताकर एक गूंढ संदेश मिल रहा था। मेरी समझ से जिसका सार था—
     यह दुनिया रंग रंगीली है। हर कोई यहाँ भाग रहा है। कोई पैसे के पीछे,कोई जवानी के पीछे,कोई प्रेमी के पीछे तो कोई भावनाओं के पीछे।हर प्राणी के पैर में चक्र है जो उसे नचा रहा है।इस भागदौड़ में युवा पीढ़ी यह भूल जाती है कि माँ –बाप की उम्र जरूर हो गई है पर उनके भी हृदय है। वे प्यार करना जानते हैं और प्यार चाहते हैं। वे बूढ़े हो गए हैं पर उनका प्रेम बूढ़ा नहीं हुआ है। उनका दिल भी धड़कना जानता है। । पल –पल वहाँ भी इंतजार होता है किसी  के आने का और बूढ़ी शिराओं में स्पंदन होने लगता है। इस समय प्रौढ़ो को जरूरत पड़ती है बच्चों के सहयोग की ,मित्रवत व्यवहार की। तभी तो उनको लगेगा कल उनका भी है ।
       जन जागृति के लिए,युवाओं की सोच में परिवर्तन लाने के उद्देश्य से प्रस्तुत किया यह शो अति प्रशंसनीय था।
       बहुत से लोग कैब्रेट शो को देखने इसलिए गए थे कि शायद अर्ध नग्न खूबसूरती के दर्शन हो जाएँ । पर ऐसा कुछ नहीं था। प्यार व विरही दृश्य कलात्मक सौंदर्य लिए पेश किए गए थे। एक और विशेषता थी इस शो की। नाटक में लेने वाले कलाकार बहुकलाओं में पारंगत थे। वे खुद गाते थे ,वे ही नृत्य करते थे,साथ में उनका अभिनय भी चलता था । हर पात्र किसी न किसी वाद्य यंत्र को बजाने में निपुण था। हम तो यह देख हैरान हो जाते थे कि जो पात्र मंच पर अभिनय कर रहा है। वह दूसरे दृश्य में लय के साथ थिरककर नृत्य कर रहा है,पर्दा गिरने पर  नजर उठी तो उसे मंच पर बनी बालकनी में बैठे  वोयलिन बजाते देखा । हमारे तो अचरज की सीमा न थी।
       इतने दक्ष कलाकारों के कारण ही ब्रॉडवे के इतिहास में कैबरेट उन प्रसिद्ध संगीतमय नाटकों में से एक है जो दीर्घकाल तक दर्शकों की मांग पर उनका मनोरंजन करने में सफल रहा। इसको टोनी एवार्ड से भी पुरस्कृत किया गया है।
       नाटक रात के करीब साढ़े दस बजे समाप्त हुआ लेकिन आँखें झपकने का नाम ही नहीं ले रही थीं । आलीशान थियेटर का अविस्मरणीय शो! उसकी  यादें सँजोकर उठ खड़े हुए जो जहन में अब भी तरोताजा हैं।
       पूर्व निश्चित योजना के अनुसार हम दोनों बाहर आ गए और अपने  उन साथियों को भी खोजने लगे जो थियेटर देखने आए थे। सबके चेहरे आनंद की चमक से झिलमिल कर रहे थे।
क्रमश