गुरुवार, 20 अक्तूबर 2016

तेरहवीं कड़ी -कनाडा डायरी के पन्ने


अंतर्जाल पर साहित्यप्रेमियों की 
     विश्राम स्थली 
: साहित्य कुंज 
अक्तूबर प्रथम अंक 2016 में प्रकाशित 
                                      

                                   
                        सुधा भार्गव 

29/4/2003

इंतजार करते करते 29 अप्रैल हो गई और मैं कह उठी-ओ मेरे प्यारे अनदेखे बच्चे, माँ की गर्भ गुफा से हमारी रोशनी भरी दुनिया मेँ क्यों नहीं आ रहे हो।  हम बड़े व्याकुल है पर प्रतीक्षा के पलों में भी मीठी धुन बज रही है। तुम्हारे हिलने डुलने से एक बात निश्चित है कि तुम भी अकेलापन महसूस कर रहे हो और हमारी रंग बिरंगी दुनिया में आकर मुसकुराना चाहते हो। ओह !तुम्हारी बेचैन भरी करवटों ने मेरी बहू की कमर में दर्द कर दिया है। रुक रुककर दर्द था तब तक ठीक था मगर लगातार व्यथा भरी लहरों को देखकर मन अशांत हो गया है । अब आ भी जाओ ,अपनी माँ को ज्यादा न सताओ।
रात के 10 बजकर 30 मिनट पर असहनीय यंत्रणा होने लगी और बेटा बहू को लेकर कार्लीटोन अस्पताल चल दिया । मैं और भार्गव जी घर पर रह गए। मन में आशंकाओं के घरौदे रह -रह कर बनने बिगड़ने लगे। न जाने मेरा बेटा, बहू को सँभलेगा या कार चलाएगा।वैसे कुछ ही किलोमीटर दूर अस्पताल है। सब ठीक ही होगा।
अनदेखे बच्चे से मेरे दिल के तार अंजाने में ही जुड़ गए। लगा जैसे वह मेरी  बातें सुन रहा है,समझ रहा है। सोचने लगी मेरी बात सुनकर नन्हा जरूर हँसेगा –अरे दादी, इतने बड़े पापा की चिंता! अब मैं उसे कैसे समझाती –उसका पापा कितना ही बड़ा हो जाए मुझसे तो बड़ा हो नहीं सकता।  
शिशु जन्म के समय मेरा अस्पताल जाना निश्चित था। सुन रखा था कार्लीटोन अस्पताल में आधुनिक उपकरणों से सुसज्जित आपरेशन थियेटर है। शान -शौकत में 5स्टार से कम नहीं। नर्सें बड़ी मुस्तैदी से अपना कर्तव्य निबाहती हैं। अपनी मुस्कान से निर्जीवों में प्राण फूकती हैं। मेरी तो यह सब देखने की बड़ी लालसा थी। सबसे बड़ी बात रूई से कोमल बच्चे को जी भर देखना चाहती थी पर मेरे सारे अरमानों पर पानी फिर गया। न जाने सार्स बीमारी टोरेंटों में कहाँ से आन टपकी और अस्पताल में माँ-बाप के अलावा तीसरे का प्रवेश निषेध हो गया। मैं मन मारे घायल पक्षी की तरह तड़पती रह गई।
रजनी की नीरवता को भेदते हुए घड़ी ने 12 घंटे बजाए,दूसरी ओर फोन की घंटी भी घरघराने लगी। मैं और भार्गव जी दोनों ही बच्चों की तरह रिसीवर उठाने भागे कि देखें पहले कौन ?दोनों के हाथ एक दूसरे पर पड़े !हम खिलखिलाकर हंस पड़े । उम्र की सीमा को लांघकर बचपन पसर गया।
बेटे ने जानकारी दी कि बहू को जाकूजी बाथ (Jacuzzi) दिया जा रहा है ताकि दर्द तो उठे पर प्रसव वेदना का अनुभव न हो। सुनकर संतोष हुआ कि कनाडा में वह सुविधा उपलब्ध है जो मुझे अपने समय में न थी। मैं ही उसके कष्ट को जान सकती थी ,भोगे हुए जो थी। अब मेरा सारा ध्यान अंजान बच्चे से हटकर उसकी माँ पर केन्द्रित हो गया।
तभी एक  धीमी सी आवाज सुनाई दी –दादी मुझे अंजान न कहो । जान -पहचान है तभी तो तुमसे मिलने आ रहा हूँ।
मैं चकित सी आँखें घुमा-घुमा कर देखने लगी। दिखाई तो कोई न दिया पर समझ में आ गया –अंजान शब्द का प्रयोग करके गलती की है।
टेलीफोन की घंटी फिर कर्र-कर्र कर उठी.... माँ , आप और पापा थोड़ा सो जाओ । मेरे पापा बनने में अभी 2-3 घंटे की देरी है। उसकी आवाज में पितृत्व का झरना झरझरा उठा था।
यहाँ आराम की किसे सूझ रही थी। हमारी आंखे तो फरिश्ते के स्वागत के लिए बिछी थीं।
घड़ी ने जैसे ही एक का घंटा बजाया कमर सीधी करने के लिए लेट गई। नींद ने कब अपने आगोश में ले लिया पता ही न चला।भार्गव जी तो बाबा बनने की उमंग में विचित्र सी अकुलाहट लिए घर का चक्कर काट रहे थे। बोलते कम थे पर उनकी चाल- ढाल से पता लग जाता था कि अंदर क्या चल रहा है।
इस बार फोन की घंटी इस तरह बज उठी मानो कोई सुखद संदेश देना चाहती हो। एक गर्वीले पिता की आवाज मेरे कानों से टकराई –माँ ,प्यारा सा बच्चा हुआ है।
-अरे यह तो बता लड़का है या लड़की?कैसा है?
-गोरी गोरी भोलू भोलू ।
-कितना वजन है उसका?
-6.6। नाल भी मैंने ही काटा माँ--।
-एँ –तूने नाल काटा!लगा जैसे तीसरी मंजिल से नीचे जा पड़ी हूँ।
-हाँ माँ...  सच कहा रहा हूँ।
-तेरे हाथ नहीं काँपे ?
-बिलकुल नहीं। बल्कि लगा मैं कुछ ही पलों में अपनी बच्ची के बहुत करीब आ गया हूँ। लो अपनी बहू से बातें करो।
-इतनी जल्दी --। अभी तो वह सम्हल भी न पाई होगी। मैं बुदबुदाई–बेटी कैसी हो?
-ठीक हूँ मम्मी जी ।
-कैसा लग रहा है?
-बहुत अच्छा।
उसके इन दो शब्दों ने बहुत कुछ कह दिया। उसके स्वर में पीड़ा या थकान की परछाईं लेशमात्र न थी। मातृत्व से खनकता कंठ गूंज रहा था।

नवजात शिशु के आगमन की सूचना पाकर अपनी कल्पना में नए रंग भरने लगी और अतीव रोमांचक रिश्ते के सुनहरे जाल में फंस गई। पहले तो मुझे लग रहा था 5 माह कनाडा प्रवास के कैसे बीतेंगे पर अब तो इस फूल से फरिश्ते का पलड़ा भारी लगने लगा और मैं विश्वस्त हो उठी कि उसके साथ दिन कपूर की भांति उड़ जाएंगे।

क्रमश :

मंगलवार, 30 अगस्त 2016

बारहवीं कड़ी -कनाडा डायरी


    डायरी के पन्ने                                                  
                                                                  दर्पण 
                                     सुधा भार्गव 
                                                               
                                                                  
26/4/2003

उस दिन महकती बगीची की गुनगुनी धूप में मेरे विचारों की पंखुड़ियाँ खुली हुई थीं कि कब मेरा मनभावन पोता या पोती इस दुनिया में आकर आँखें खोले और मैं उसे इन नाजुक सी पंखुड़ियों में बंद कर सीने से लगा लूँ।

तभी बहू भागी भागी आई –मम्मी जी,मम्मी जी माँ बनने के बाद तो बहुत कुछ भोगना पड़ता है । औरत अपना वजूद ही भूलजाती है। देखिए न , सोनिया  ने माँ बनने के बाद आपबीती लिखी हैं। उसने द ग्लोब एंड मेल समाचार पत्र मेरे हाथ में थमा दिया।

बहू तो चली गई । मैं किसी का भोगा जानने को उत्सुक हो उठी उसे पढ़कर यहाँ  के रहन सहन ,तौर तरीकों की गठरी खुलती सी लगी। यह किसी विशेष की कथा नहीं है अपितु 90%महिलाएं मातृत्व के बाद जिन गलियारों से गुजरती हैं उनका दर्पण है।

अखबार के पन्नों पर से मेरी नजरें बड़ी तेजी से फिसलने लगीं । सोनिया ने खुद लिखा-मैं संगीत कक्ष के फर्श पर लेती बहुत व्याकुल थी। संगमरमर का ठंडा फर्श चुभन पैदा कर रहा था पर तब भी मैं उसमें समा कर अदृश्य हो जाना चाहती थी ताकि मेरे पति और मेरा नवजात शिशु मुझे पा ही न सकें। हाँ ! मैं उनकी नजर से बचना चाहती थी पर मुझे गलत न समझना । मैं अपने बेटे को बहुत प्यार करती हूँ। वह मेरी हर सांस में समाया हुआ है।

मैं ही अकेली प्रथम औरत नहीं हूँ जो अपने बच्चे और पति से बचना चाह रही हो। मेरे चहेरी बहन तो बिस्तर की चादर में मुंह छिपाकर फफकने लगती थी जब उसका पति आधी रात को उसके पास बच्चे को दूध पिलाने लाया करता था। मातृत्व के प्रारम्भिक दिनों में वह सिर से पाँव तक सिहर जाती थी।
कुछ दिनों पहले मैं ब्रिटिश कोलम्बिया अपनी छोटी बहन से मिलने गई । मुझे अचानक देख वह खुश भी हुई और चकित भी पर उससे ज्यादा मैं चकित हुई उसे देखकर। वह अपने घर की सीढ़ियों पर सिर थामें बैठी थी और अंदर उसके दोनों बेटे भाग दौड़ करके लुका छिपी खेल रहे थे। बहन परेशान होकर घर का दरवाजा भेड़कर बाहर बैठ गई ताकि एकांत के पलों में शायद कुछ शांति मिले। तनाव दूर हो।
यही है मातृत्व की परिभाषा –तुम ,तुम्हारा समय,तुम्हारी इच्छाएँ ,तुम्हारी आवश्यकताएँ इन नन्हें देवदूतों से बढ़कर नहीं। मेरे मुंह से निकल पड़ा।

     माँ बनने से पहले मेरा यही विचार था कि खुशी खुशी बच्चे के लिए खुद को कुर्बान कर दूँगी। पर यह कुर्बानी मुझे बलि का बकरा बना देगी ,पता न था। मैंने अपनी माँ से पूछा-मॉम,तुमने बताया नहीं कि संतान को पालने में इतना कष्ट सहना पड़ता है। उन्होंने मेरा सर सहलाया था घंटों और उनकी एक मुस्कान ने मुझे सब कुछ समझा दिया-माँ सहनशीलता और त्याग की मूर्ति है। तभी तो वह दिल के अधिक करीब है। मेरी अवस्था इतनी दयनीय थी कि अपने तीन दिन के शिशु के पोतड़े बदलते –बदलते उनके कथन से पूरी तरह सहमत न हो सकी । यदि वे कुछ बतातीं भी तो मैं उनका विश्वास न कर पाती। भोगे बिना पीड़ा कोई क्या जाने।

    मेरे अनुभव रूपी संपदा समय और सक्रियता के अनुपात में दिनोंदिन बढ़ती ही गई और इस दौड़ में मैंने अपने पति को भी पीछे छोड़ दिया। वैसे तो हम दोनों ने मातृ –पितृ कक्षाओं में साथ साथ शिशु संबन्धित ज्ञान पाया था पर ईशवर पुरुष को भी बच्चे जनने का अवसर देता तभी तो समान ज्ञान व अनुभव के भागीदार होते।ऊपर वाले के इस अन्याय को देखकर मेरा रोम -रोम कुपित हो उठता है । ब्रह्मा ने ही स्त्री –पुरुष को समान नहीं समझा तो समानता का दावा कैसा?
मैं जब गर्भवती थी मैंने मातृत्व को गरिमामयी दृष्टि से देखा पर माँ बनते ही सारा घर तितर –बितर लगने लगा। घर ठीक करूँ या बच्चे को संभालूँ। एक कमरे में नवजात शिशु का बिस्तरा लगाया। अलमारी में उसके कपड़े बड़ी तरतीब से रखे । बेबी शावर के दिन मिले उपहार करीने से सजाए। मैं अपने पति के साथ कितनी खुशी से बेबी के लिए आरामदायक छोटी सी चारपाई ,गद्दा लिहाफ और तकिये लाई। पर सारी की सारी मेहनत बेकार गई।

बेटे के आने पर उसके लालन पालन की आदर्श सोच मोम की तरह गलने लगी। मेरे कमरे में ही धीरे –धीरे उसका सामान आने लगाऔर उसका कमरा कबाड़खाना हो गया। मैले कुचैले कपड़े,पोतड़े और ऊलजलूल चीजों का वहाँ ढेर लग गया। मेरा बेटा उस कमरे में एक दिन भी नहीं सोया। मुझे दूसरे के लिए अपने कमरे का भी मोह छोडना पड़ा ।
माँ बनने से पहले ज़्यादातर में उन्मुक्त पंछी की तरह उड़ा करती थी। जो मैंने चाहा वही किया । जब चाहा जैसे चाहा उसी तरह जीवन की धारा को मोड दिया पर अब मेरे स्वतन्त्रता का अपहरण हो गया था। इस विचार ने मुझे पागल बना दिया ,बस पागलखाने जाने की कसर थी।
   बेटा 15 दिन का हो गया पर मुझे पूरी नींद लेने का समय न मिला। उन दिनों मेरे सास जी आई थी। सहानुभूति के दो बोल पाने की आशा में मैंने एक दिन कहा-बच्चे ने तो मेरे नींद हराम कर दी है।
टका सा उत्तर सुनने को मिल गया-बस बहुत सो ली । अब जीवन भर सोने को नहीं मिलेगा।
झल्लाहट से मेरा माथा दर्द करने लगा। शाम को मेरे पति ऑफिस से आए । मेरा उदास चेहरा देखकर पिघल गए। कपड़े बदलकर और हाथ धोकर बच्चे को गोदी में उठा लिया पर सास के कड़वे बोल गूंज उठे-अभी अभी तो वह थका मांदा घर आया है। उससे बच्चा ही खिलवालों या ऑफिस का काम करा लो।

सारा घर जब नींद के झूले में झूलता होती उस समय मैं कई बार उसे आ –आ- आ कर थपकियाँ देती और लोरी गाकर सुलाने की कोशिश करती। ताज्जुब तब होता जब बेटे के रोने की आवाज से दूसरों की नींद में जरा खलल न पड़ता। पतिदेव करवट बदलते हुए कहते –सानू ,मेरा बेटा क्यों रो रहा है?फिर गूंजने लगते शंखनाद से खर्राटे । मेरे तनबदन में आग लग जाती। सुलगती रहती सोने वालों के प्रति पैदा हुई ईर्ष्या से ,कोसती रहती अपने भाग्य को।

6 मास का बेटा होने पर मैं माँ के पास भागी । सुबह पौ फट्ते ही बच्चा कुलबुलाने लगा –मेरे माँ भी बेचैन हो गई। पर मैं 6 माह का गुब्बार निकालते हुए चिल्लाई –माँ इसको यहाँ से ले जाओ। मुझे सोने दो। मुझे इसके बाप के घर सब कुछ मिलता है पर सोने को नहीं।

दिन चढ़े सोती रही या सोने का अभिनय करती रही पता नहीं पर बंद आँखें पल पल मेरी  उम्र बढ़ा रही थी। यह है मेरा मातृत्व जिसने दिन प्रतिदिन मुझे आत्मसमर्पण करने को मजबूर किया और इसी तले मैं रौंदी गई। मुझे पग पग अनुभव हुआ कि मेरी दुनिया खतम हो गई है। मेरे विचारों का –क्रियाकलापों का केंद्र केवल बच्चा है।

एम॰ डी॰ की डिग्री लेने से पहले ही मैंने मातृत्व की डिग्री ले ली थी जिसने मेरी राह कठिन बना दी। पैरों को झूला बनाकर उस नन्हें को झुलाती जाती और उसकी चिल्लाहट के बीच दोनों हाथों से किताब थामे अपना पाठ याद करती। कोशिश करती बच्चे से अधिक मेरा स्वर तेज हो पर क्या ऐसा हो पाता।
मुझे मालूम है यह समाज पग पग पर भोंपू बजाता कहता रहता है जीवन में आए इस परिवर्तन को सहर्ष गले लगालो। सदियों से औरत यही करती आई है पर पता नहीं क्यों,मैं इस बात को नहीं पचा पा रही।
अपने ही लिखे को मैंने जब देखा  तो सोचने लगी –क्यों लिखा है?माँ होने के नाते मैं बच्चे को बहुत प्यार करने लगी हूँ। उसकी हंसी में अपनी मुस्कान देखती हूँ। उसके रोते ही सीने में काँटा सा गड़ जाता है। परंतु यह भी सच है - कभी कभी शिशु पालन के समय मन कड़वाहट से भर जाता है जिसको बांटने वाला कोई नहीं।
वृद्ध पीढ़ी कहते कहते नहीं थकती –आदर्श माँ स्वार्थी नहीं होती।,न ही उसे किसी प्रकार की शिकायत होनी चाहिए। पर कथनी और करनी में बहुत अंतर होता है।
हर माँ के लिए यह संभव नहीं कि जब भी बच्चा उसके अंक में डाल दिया जाए वह उसी की हो जाए और घर भी व्यवस्थित रूप से चलता रहे,बाहर बॉस भी खुश रहे।

माँ बनने के बाद ही मुझे इस बात का अहसास हुआ कि मेरी माँ ने अपनी जवानी के सुनहरे दिन तो मुझे ही अर्पित कर दिए पर मैं ऐसा नहीं करना चाहती थी। अपना स्थान ,अपना समय व अपनी पहचान को सुरक्षित रखने के चक्कर में चक्कर खाती रहती हूँ।

मेरे पति बहुत समझदार हैं और इस बात को अनुभव करते हैं कि बच्चे के साथ साथ माँ की देखरेख भी समुचित ढंग से होनी चाहिए।जबकि ऐसा हो नहीं पाता। कभी कभी वे उदास हो जाते हैं मेरे लिए नहीं अपने लिए। इस दुनिया मेँ बेटे के आने से वे पेशोपेश में पड़ गए हैं। उनके दिमाग में यह बात घर कर गई है कि मैं उन्हें पहले की तरह प्यार नहीं करती। उनके हिस्से का प्यार भी मैंने बेटे पर न्योछावर कर दिया है। पहले की तरह न उनके खाने का ध्यान रखती हूँ न बालक की तरह प्यार करती हूँ न दुलार। क्या करूं!एक जान हजार काम।

उनका तो प्यार ही बंटा है ,मैं तो खुद ही बंट गई हूँ। दिल से भी दिमाग से भी। अभी न जाने कितने भागों में विभाजित होना है। पर मैं ऐसा होने नहीं दूँगी। मुझे फिर से उठना है और उठूँगी।
सोनिया का जीवन संघर्ष पूरे नारी वर्ग के हाहाकार का दर्पण था। इस दर्पण मेँ झाँकते –झाँकते कभी मुझे अपना चेहरा दिखाई देता है,कभी नई पीढ़ी का अंतर द्वंद । सच मेँ इक्कीसवी सदी की नारी घुटने नहीं टेकना चाहती । लेकिन यह भी सच है सम्बन्धों का पिंजरा और मुक्ताकाश एक साथ नहीं मिल सकते।

 क्रमशः 

(प्रकाशित - अन्तर्जात पत्रिका साहित्यकुंज के सितंबर मास के प्रथम अंक में)
http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/S/SudhaBhargava/12_darpan.htm


बारहवीं कड़ी -कनाडा डायरी


    डायरी के पन्ने                                                  
                                                              दर्पण 
                                   सुधा भार्गव 
                                                              
26/4/2003

उस दिन महकती बगीची की गुनगुनी धूप में मेरे विचारों की पंखुड़ियाँ खुली हुई थीं कि कब मेरा मनभावन पोता या पोती इस दुनिया में आकर आँखें खोले और मैं उसे इन नाजुक सी पंखुड़ियों में बंद कर सीने से लगा लूँ।

तभी बहू भागी भागी आई –मम्मी जी,मम्मी जी माँ बनने के बाद तो बहुत कुछ भोगना पड़ता है । औरत अपना वजूद ही भूलजाती है। देखिए न , सोनिया  ने माँ बनने के बाद आपबीती लिखी हैं। उसने द ग्लोब एंड मेल समाचार पत्र मेरे हाथ में थमा दिया।

बहू तो चली गई । मैं किसी का भोगा जानने को उत्सुक हो उठी उसे पढ़कर यहाँ  के रहन सहन ,तौर तरीकों की गठरी खुलती सी लगी। यह किसी विशेष की कथा नहीं है अपितु 90%महिलाएं मातृत्व के बाद जिन गलियारों से गुजरती हैं उनका दर्पण है।

अखबार के पन्नों पर से मेरी नजरें बड़ी तेजी से फिसलने लगीं । सोनिया ने खुद लिखा-मैं संगीत कक्ष के फर्श पर लेती बहुत व्याकुल थी। संगमरमर का ठंडा फर्श चुभन पैदा कर रहा था पर तब भी मैं उसमें समा कर अदृश्य हो जाना चाहती थी ताकि मेरे पति और मेरा नवजात शिशु मुझे पा ही न सकें। हाँ ! मैं उनकी नजर से बचना चाहती थी पर मुझे गलत न समझना । मैं अपने बेटे को बहुत प्यार करती हूँ। वह मेरी हर सांस में समाया हुआ है।

मैं ही अकेली प्रथम औरत नहीं हूँ जो अपने बच्चे और पति से बचना चाह रही हो। मेरे चहेरी बहन तो बिस्तर की चादर में मुंह छिपाकर फफकने लगती थी जब उसका पति आधी रात को उसके पास बच्चे को दूध पिलाने लाया करता था। मातृत्व के प्रारम्भिक दिनों में वह सिर से पाँव तक सिहर जाती थी।
कुछ दिनों पहले मैं ब्रिटिश कोलम्बिया अपनी छोटी बहन से मिलने गई । मुझे अचानक देख वह खुश भी हुई और चकित भी पर उससे ज्यादा मैं चकित हुई उसे देखकर। वह अपने घर की सीढ़ियों पर सिर थामें बैठी थी और अंदर उसके दोनों बेटे भाग दौड़ करके लुका छिपी खेल रहे थे। बहन परेशान होकर घर का दरवाजा भेड़कर बाहर बैठ गई ताकि एकांत के पलों में शायद कुछ शांति मिले। तनाव दूर हो।
यही है मातृत्व की परिभाषा –तुम ,तुम्हारा समय,तुम्हारी इच्छाएँ ,तुम्हारी आवश्यकताएँ इन नन्हें देवदूतों से बढ़कर नहीं। मेरे मुंह से निकल पड़ा।

     माँ बनने से पहले मेरा यही विचार था कि खुशी खुशी बच्चे के लिए खुद को कुर्बान कर दूँगी। पर यह कुर्बानी मुझे बलि का बकरा बना देगी ,पता न था। मैंने अपनी माँ से पूछा-मॉम,तुमने बताया नहीं कि संतान को पालने में इतना कष्ट सहना पड़ता है। उन्होंने मेरा सर सहलाया था घंटों और उनकी एक मुस्कान ने मुझे सब कुछ समझा दिया-माँ सहनशीलता और त्याग की मूर्ति है। तभी तो वह दिल के अधिक करीब है। मेरी अवस्था इतनी दयनीय थी कि अपने तीन दिन के शिशु के पोतड़े बदलते –बदलते उनके कथन से पूरी तरह सहमत न हो सकी । यदि वे कुछ बतातीं भी तो मैं उनका विश्वास न कर पाती। भोगे बिना पीड़ा कोई क्या जाने।

    मेरे अनुभव रूपी संपदा समय और सक्रियता के अनुपात में दिनोंदिन बढ़ती ही गई और इस दौड़ में मैंने अपने पति को भी पीछे छोड़ दिया। वैसे तो हम दोनों ने मातृ –पितृ कक्षाओं में साथ साथ शिशु संबन्धित ज्ञान पाया था पर ईशवर पुरुष को भी बच्चे जनने का अवसर देता तभी तो समान ज्ञान व अनुभव के भागीदार होते।ऊपर वाले के इस अन्याय को देखकर मेरा रोम -रोम कुपित हो उठता है । ब्रह्मा ने ही स्त्री –पुरुष को समान नहीं समझा तो समानता का दावा कैसा?
मैं जब गर्भवती थी मैंने मातृत्व को गरिमामयी दृष्टि से देखा पर माँ बनते ही सारा घर तितर –बितर लगने लगा। घर ठीक करूँ या बच्चे को संभालूँ। एक कमरे में नवजात शिशु का बिस्तरा लगाया। अलमारी में उसके कपड़े बड़ी तरतीब से रखे । बेबी शावर के दिन मिले उपहार करीने से सजाए। मैं अपने पति के साथ कितनी खुशी से बेबी के लिए आरामदायक छोटी सी चारपाई ,गद्दा लिहाफ और तकिये लाई। पर सारी की सारी मेहनत बेकार गई।

बेटे के आने पर उसके लालन पालन की आदर्श सोच मोम की तरह गलने लगी। मेरे कमरे में ही धीरे –धीरे उसका सामान आने लगाऔर उसका कमरा कबाड़खाना हो गया। मैले कुचैले कपड़े,पोतड़े और ऊलजलूल चीजों का वहाँ ढेर लग गया। मेरा बेटा उस कमरे में एक दिन भी नहीं सोया। मुझे दूसरे के लिए अपने कमरे का भी मोह छोडना पड़ा ।
माँ बनने से पहले ज़्यादातर में उन्मुक्त पंछी की तरह उड़ा करती थी। जो मैंने चाहा वही किया । जब चाहा जैसे चाहा उसी तरह जीवन की धारा को मोड दिया पर अब मेरे स्वतन्त्रता का अपहरण हो गया था। इस विचार ने मुझे पागल बना दिया ,बस पागलखाने जाने की कसर थी।
   बेटा 15 दिन का हो गया पर मुझे पूरी नींद लेने का समय न मिला। उन दिनों मेरे सास जी आई थी। सहानुभूति के दो बोल पाने की आशा में मैंने एक दिन कहा-बच्चे ने तो मेरे नींद हराम कर दी है।
टका सा उत्तर सुनने को मिल गया-बस बहुत सो ली । अब जीवन भर सोने को नहीं मिलेगा।
झल्लाहट से मेरा माथा दर्द करने लगा। शाम को मेरे पति ऑफिस से आए । मेरा उदास चेहरा देखकर पिघल गए। कपड़े बदलकर और हाथ धोकर बच्चे को गोदी में उठा लिया पर सास के कड़वे बोल गूंज उठे-अभी अभी तो वह थका मांदा घर आया है। उससे बच्चा ही खिलवालों या ऑफिस का काम करा लो।

सारा घर जब नींद के झूले में झूलता होती उस समय मैं कई बार उसे आ –आ- आ कर थपकियाँ देती और लोरी गाकर सुलाने की कोशिश करती। ताज्जुब तब होता जब बेटे के रोने की आवाज से दूसरों की नींद में जरा खलल न पड़ता। पतिदेव करवट बदलते हुए कहते –सानू ,मेरा बेटा क्यों रो रहा है?फिर गूंजने लगते शंखनाद से खर्राटे । मेरे तनबदन में आग लग जाती। सुलगती रहती सोने वालों के प्रति पैदा हुई ईर्ष्या से ,कोसती रहती अपने भाग्य को।

6 मास का बेटा होने पर मैं माँ के पास भागी । सुबह पौ फट्ते ही बच्चा कुलबुलाने लगा –मेरे माँ भी बेचैन हो गई। पर मैं 6 माह का गुब्बार निकालते हुए चिल्लाई –माँ इसको यहाँ से ले जाओ। मुझे सोने दो। मुझे इसके बाप के घर सब कुछ मिलता है पर सोने को नहीं।

दिन चढ़े सोती रही या सोने का अभिनय करती रही पता नहीं पर बंद आँखें पल पल मेरी  उम्र बढ़ा रही थी। यह है मेरा मातृत्व जिसने दिन प्रतिदिन मुझे आत्मसमर्पण करने को मजबूर किया और इसी तले मैं रौंदी गई। मुझे पग पग अनुभव हुआ कि मेरी दुनिया खतम हो गई है। मेरे विचारों का –क्रियाकलापों का केंद्र केवल बच्चा है।

एम॰ डी॰ की डिग्री लेने से पहले ही मैंने मातृत्व की डिग्री ले ली थी जिसने मेरी राह कठिन बना दी। पैरों को झूला बनाकर उस नन्हें को झुलाती जाती और उसकी चिल्लाहट के बीच दोनों हाथों से किताब थामे अपना पाठ याद करती। कोशिश करती बच्चे से अधिक मेरा स्वर तेज हो पर क्या ऐसा हो पाता।
मुझे मालूम है यह समाज पग पग पर भोंपू बजाता कहता रहता है जीवन में आए इस परिवर्तन को सहर्ष गले लगालो। सदियों से औरत यही करती आई है पर पता नहीं क्यों,मैं इस बात को नहीं पचा पा रही।
अपने ही लिखे को मैंने जब देखा  तो सोचने लगी –क्यों लिखा है?माँ होने के नाते मैं बच्चे को बहुत प्यार करने लगी हूँ। उसकी हंसी में अपनी मुस्कान देखती हूँ। उसके रोते ही सीने में काँटा सा गड़ जाता है। परंतु यह भी सच है - कभी कभी शिशु पालन के समय मन कड़वाहट से भर जाता है जिसको बांटने वाला कोई नहीं।
वृद्ध पीढ़ी कहते कहते नहीं थकती –आदर्श माँ स्वार्थी नहीं होती।,न ही उसे किसी प्रकार की शिकायत होनी चाहिए। पर कथनी और करनी में बहुत अंतर होता है।
हर माँ के लिए यह संभव नहीं कि जब भी बच्चा उसके अंक में डाल दिया जाए वह उसी की हो जाए और घर भी व्यवस्थित रूप से चलता रहे,बाहर बॉस भी खुश रहे।

माँ बनने के बाद ही मुझे इस बात का अहसास हुआ कि मेरी माँ ने अपनी जवानी के सुनहरे दिन तो मुझे ही अर्पित कर दिए पर मैं ऐसा नहीं करना चाहती थी। अपना स्थान ,अपना समय व अपनी पहचान को सुरक्षित रखने के चक्कर में चक्कर खाती रहती हूँ।

मेरे पति बहुत समझदार हैं और इस बात को अनुभव करते हैं कि बच्चे के साथ साथ माँ की देखरेख भी समुचित ढंग से होनी चाहिए।जबकि ऐसा हो नहीं पाता। कभी कभी वे उदास हो जाते हैं मेरे लिए नहीं अपने लिए। इस दुनिया मेँ बेटे के आने से वे पेशोपेश में पड़ गए हैं। उनके दिमाग में यह बात घर कर गई है कि मैं उन्हें पहले की तरह प्यार नहीं करती। उनके हिस्से का प्यार भी मैंने बेटे पर न्योछावर कर दिया है। पहले की तरह न उनके खाने का ध्यान रखती हूँ न बालक की तरह प्यार करती हूँ न दुलार। क्या करूं!एक जान हजार काम।

उनका तो प्यार ही बंटा है ,मैं तो खुद ही बंट गई हूँ। दिल से भी दिमाग से भी। अभी न जाने कितने भागों में विभाजित होना है। पर मैं ऐसा होने नहीं दूँगी। मुझे फिर से उठना है और उठूँगी।
सोनिया का जीवन संघर्ष पूरे नारी वर्ग के हाहाकार का दर्पण था। इस दर्पण मेँ झाँकते –झाँकते कभी मुझे अपना चेहरा दिखाई देता है,कभी नई पीढ़ी का अंतर द्वंद । सच मेँ इक्कीसवी सदी की नारी घुटने नहीं टेकना चाहती । लेकिन यह भी सच है सम्बन्धों का पिंजरा और मुक्ताकाश एक साथ नहीं मिल सकते।

 क्रमशः 

(प्रकाशित - अन्तर्जात पत्रिका साहित्यकुंज के सितंबर मास के प्रथम अंक में)
http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/S/SudhaBhargava/12_darpan.htm


गुरुवार, 23 जून 2016

दसवीं कड़ी -कनाडा की डायरी

http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/S/SudhaBhargava/10_poori_adhuri_rekhayen.htmपूरी -अधूरी रेखाएँ पूरी -अधूरी रेखाएँ
साहित्यकुंज की इस लिंक पर भी आप पढ़ सकते हैं।

 डायरी के पन्ने 
                                                                पूरी -अधूरी रेखाएँ 
                                                                          सुधा भार्गव 
19/04/2003 


    ऐसा लगता है मेरे आसपास पूरी -अधूरी रेखाओं का जाल बिछा हुआ है। एक तरह से इनके बीच रहने की आदत हो गई हैं, छुटकारा भी तो नहीं पड़ोसी जो ठहरे।
    सामने वाले  सफेद बंगले में शाम होते ही एक नवयुवक घूमने निकलता है । उसका साथी केवल झबूतरा कुत्ता है। वृद्ध माँ –बाप का निवास स्थान अलग है । पहले वे भी इसी के साथ रहते थे पर इस आशा में कि बेटे जॉन का घर बसना चाहिए ,इस बड़े घर को छोडकर दूसरे छोटे फ्लैट में चले गए । यहाँ उम्र व जरूरतों के अनुसार आवासस्थल बदलने में देरी नहीं लगती। जॉन के बूढ़े माँ-बाप विशाल 6 कमरे वाले बंगले को पूरी तरह व्यवस्थित करने में अपने को असमर्थ पा रहे थे । इसी कारण उसे जवान बेटे के हवाले कर दिया और उसने इसके बदले उनके लिए दो कमरे वाले फ्लैट की व्यवस्था कर दी। मुझे यह बात बहुत पसंद आई।उनका बेटा जरा ज्यादा ही संजीदा रहता है।न मैंने उसे कभी हँसते देखा न ही उसने किसी पड़ोसी से हॅलो किया। शादी अभी की नहीं क्योंकि बिना विवाह के वह सब कुछ हो रहा है जो भारत में विवाह के उपरांत होता है। यहाँ यौन संबंधों पर कोई प्रतिबंध नहीं है—न समाज का, न कानून का और न भावनाओं का। शायद उस नवयुवक को भी भावनात्मक स्तर पर जुड़ाव पसंद नहीं।
   बगल वाले घर में रहने वाले पति –पत्नी बड़े खुशमिजाज़ लगे। उनके दो प्यारे प्यारे बच्चे हैं। उनके चेहरे पर भी मीठी मुस्कान गुनगुन करती  रहती है। उनकी माँ नताशा और मेरे बीच कुछ दिनों तक तो मौन संभाषण चलता रहा। फिर हमारा मिलन दोस्ती में बदल गया। कुछ वर्षों पहले यह परिवार ब्राज़ील से आकर यहाँ बस गया है। नताशा को फूलों से बहुत प्यार है। जरा सा समय मिला बस एप्रिन ,ग्लब्स पहन  खुरपी हाथ में थाम लेती है। धूप की कर्कशता से बचने के लिए टोपी पहनना नहीं भूलती। खुद तो पौधों की काँट- छांट करती ही है आज तो बच्चों के हाथों में भी छोटी सी बाल्टी और खुरपी थमा दी । छोटे –छोटे हाथों से मिट्टी खोदते माँ की नकल करते बड़े प्यारे लग रहे हैं।अरे ये तो एक दूसरे की तरफ मिट्टी भी उछाल रहे हैं। हैरानी है इतनी सफाई पसंद देश में बच्चे अपने कपड़े गंदे कर रहे हैं। पर बचपन तो बचपन ही है । सारे नियम –कानून ताक मेंरख दिए जाते हैं। असल में ये बच्चे शाम को नहाते हैं ।अंधेरा होते ही नहा -धोकर रात का भोजन करेंगे। वैसे भी मेरे ख्याल से बच्चों को मिट्टी से एकदम दूर भी नहीं रखना चाहिए क्योंकि उसमें कुछ ऐसे तत्व होते हैं जो वैक्टीरिया से लड़ने की शरीर में क्षमता पैदा करते हैं।  एक प्रकार से बागवानी यहाँ की जीवन पद्धति का एक खास हिस्सा है।बच्चों इस तरह से खेल ही खेल में बहुत कुछ सीख जाते हैं।
    पार्टी –वार्टी में नताशा के यहाँ रिशतेदारों का अच्छा खासा जमघट रहता है। कनेडियन डे के अवसर पर उसके यहाँ भाई –बंधु बिहस्की-बीयर पी रहे थे। हमारे और उसके घर के बीच मुश्किल से चार –पाँच गज ऊंची दीवार खड़ी है। सो खूब  मौजमस्ती सुनाई –दिखाई दे रही थी। नताशा के पति मि॰ थामस अपने 6  के बालक को भी गिलास से घूंट भरवा रहे थे। मैं तो  यह सब देखकर दंग रह गई पर यथार्थ के धरातल पर उतरते ही सब कुछ स्पष्ट हो गया।  पीना- पिलाना तो इनकी परंपरा है । इसका अभ्यस्त करने के लिए बच्चों को बचपन से ही वाइन-बीयर देने लगते हैं दूसरे ठंड भी बहुत पड़ती है। उसका मुक़ाबला करने में यह सहायक होती है। परंतु बच्चों के जन्मदिन या अन्य अवसर पर बाल मित्रों को सोमरस नहीं दे सकते।
    सुबह शाम मैं पिछली गली का चक्कर लगाते अच्छी सैर कर लेती हूँ। अभी शाम को घूम कर दरवाजे की सीढ़ियों पर बैठ गई हूँ और निगाहें मेरी आकाश की ओर लगी है। लुभावने रंगों के अक्स में भीगा गगन—ओह कितना लुभावना है। अंदर जाने को मन ही नहीं करता। इस समय ज़्यादातर पड़ोसी अपने बगीचे में निकलकर  बागवानी करते हुए  प्रकृति प्रेम का परिचय दे रहे हैं। 
   शैली हमारे सामने रहती है। वह अपनी छोटी सी वाटिका में बारबैक्यू में मुर्गी(chicken) भून रही है। शायद उसकी दोनों बेटियाँ आने वाली है। ये अविवाहित माँ की संताने हैं।प्रेमी तो अपने प्रेम की निशानियाँ देकर अलग हो गया। शैली ने बड़ी मेहनत से पालकर बड़ा किया है। अब तो बड़ी हो गई हैं पर रहती अपनी माँ से अलग ही। नौकरी के कारण रविवार को ही बेटियाँ अपने बॉय फ्रेंड के साथ माँ से मिलने आ पाती हैं और पुराने कपड़ों की तरह अपना बॉय फ्रेंड बदलती रहती हैं। रविवार शैली के जीवन में अनोखा त्यौहार बनकर आता है। अलगाव,अकेलापन कितना दहला देने वाला होते है यह मैंने शैली से ही जाना। चुंबनों की तपिश और स्मृतियों की गर्माहट उसके प्रेमी को नहीं बांध पाई पर वह उन्हीं की जकड़न में तड़प उठती है। उसके इस अत्यंत नाजुक संवेदनशील मसले को छूने का साहस मुझ में न था ।कौमार्य रक्षा हेतु अपने पर नियंत्रण रखना तो उसके समाज में अनिवार्य नहीं पर इस स्वतन्त्रता में भी अतीत की छीलन उसे चैन से नहीं बैठने देती। समय –बेसमय भीतर बाहर की टूटन उसे दिन में सौ बार रुला देती है।
   ऐसे पूरे -अधूरों के बीच जब भी मैं चमकीले रंगों की कल्पना करती हूँ,सब गड्ड –सड्ड हो जाते हैं।
क्रमश :    


शुक्रवार, 3 जून 2016

नौवीं कड़ी

कनाडा डायरी के पन्ने 

16/4/2003
                             वह लाल गुलाबी मुखड़ेवाली 
                  
                                 
                                     सुधा भार्गव 


अप्रैल मास में उन दिनों मैं कनाडा की राजधानी ओटवा में ही थी । देखते ही देखते बसंत आ गया और देवदार को अपने आगोश में ले लिया । विरही सा कुम्हलाया जर्जर वृक्ष रंग –बिरंगे पत्तों से धक गया। हरे पीले लाल पल्लवों की पलकों के साये में बैठे खिन्न चित्त लिए पक्षी भी चहचहने लगे । ठंड से ठिठुरी कलियों की आँखें खुलीं तो सूर्यवाला के कपोलों पर लाली छा गई।
मुझे भी तो धूप दूध की तरह सुखद लगने  लगी । अप्रत्याशित खुशी मेरे उनीदे अंगों से छ्लकी  पड़ती थी। एक कवि की कुछ पंक्तियाँ गुनगुनाने लगी क्योंकि वे सत्यता उजागर करती प्रतीत हुईं।
                                   
वसंत आ गया
                    
महोत्सव छा गया
                                  
टटोलने लगी उँगलियाँ
                                 
 मादक भरी देह को।  
                                  
उन्माद की आंधी चल पड़ी
                                  
मन की नदिया उफन पड़ी
                                  
पोर पोर दुखने लगा
                                 
दहकने लगा।  
                                  
अनुराग का देवता
                                  
अंग –अंग में पैठ गया
                                  
वसंत के प्रेम पग देते संदेशा फूल को
                                  
लो मैं आ गया।                 
                                                                                 
व्यस्तता की सरिता चारों तरफ उमड़ पड़ी थी । हमें भी सुस्ती में समय गंवाना मंजूर न था। निश्चित किया गया सपरिवार पिकनिक के लिए चला जाए वह भी फलों के बाग में जहां जी भरकर स्ट्रावरी चुने,तोड़ें और खाएं।
यहाँ मई –जून में स्ट्रावरी पकनी शुरू हो जाती हैं और ज्वैल स्ट्रावरी की किस्म सबसे  उत्तम होती है –बेटे ने जब यह बताया मेरे बच्चों की सी हालत हो गई । शोर मचाने लगी जल्दी चलो।
जैसे –तैसे रात काटी और  अगले दिन 10 बजे के करीब सुबह चल दिए फार्म की ओर । साथ में अपने -अपने डिब्बे,टोपी धूप का चश्मा और पानी की बोतल ले ली ताकि धूप से बचा जा सके ।  खाली डिब्बे भी रख लिए ताकि उनमें पानी भरकर स्ट्रोवरी धोई जा सकें।

फार्म में स्ट्रावरी की लंबी कतारें थीं जिनके बीच में झंडियाँ लगी थीं ।
 समझ नहीं सके यह सब क्या है । फार्म के मालिक के पास जाने पर उसने हमे प्लास्टिक की चार डलियाँ पकड़ा दीं ताकि फल तोड़कर उसमें रख सकें। उसमें आधा किलो फल आता था । शर्त थी खूब स्ट्रावरी खाओ पर आधा किलो फल खरीदने जरूर हैं।
सौदा घाटे का नहीं था । उसने हमारे साथ एक गाइड कर दिया । मैं घबरा गई –यह साथ में रहेगा तो छक कर खाएँगे कैसे?। कहीं देखकर यह न सोचे –कैसे हैं ये लोग ,भुक्कड़ की तरह टूट पड़े हैं। अपनी प्रतिष्ठा का सवाल था।इसलिए अपने पर नियंत्रण रखना जरूरी लगा।
मैंने प्रश्नों की झड़ी लगा दी। वह उत्तर देता गया। पंक्ति में जहां तक फल का चयन हो जाता था वहाँ पहले स्थान से झंडी निकालकर चयन समाप्ति स्थल पर वह लगा दी जाती थी । उसने हमसे आग्रह किया गूदेदार कड़ी और लाल स्ट्रोवरी ही तोड़ें । डिब्बों में पानी भर कर रखें । 2 मिनट फल उसमें पड़ा रहने दें फिर उसे खाएँ। धूप तेज है ,खूब पानी पीयेँ और पेट को खाली न रखें वरना एंबुलेंस मंगानी पड़ेगी। कह कर हंस पड़ा। उसका मित्रभाव अच्छा लगा।
फल तोड़ने के विशेष कायदे पर उसने ज़ोर दिया। फल का बर्बाद होना उसे असहनीय था। गाइड ने पौधे की कोमल टहनी एक हाथ से पकड़ी,दूसरे हाथ से फल को ऊपर से धीरे से मोड़ते हुए तोड़ लिया और उसे हथेली पर रख लिया। ।उतावली में मेरा पाँव क्यारी में जा पड़ा। वह एकाएक चिल्लाया –मेमसाहब ,पौधे न कुचलो।
उसने एक खास बात का और जिक्रा किया। खाने वाली स्ट्रावरी को ही पानी से धोना चाहिए। फ्रीज़ करना हो तो बादली छाया या प्रभाती हवा में तोड़ो। उस समय तो सूर्य का प्रचंड ताप था । इसका मतलब आधा किलो खरीदा फल बेकार जाएगा। वह हमारी दुविधा भाँपते हुए बोला-स्ट्रावरी पेड़ की छाया में तोड़कर रख दीजिए । कार में सीट के नीचे ठंडक में वे आराम से सो जाएंगी । घर पहुँचने पर भी ताजगी से भरपूर होंगी।
उसका फल के बारे में अच्छा - खासा ज्ञान था। पर अब मुझे उसका ज्ञान खल रहा था । इंतजार में थी वह जाए तो स्ट्रोवरी पर धावा बोला जाए। बहू –बेटे को खाने का इतना लालच न था। वे पहले भी आचुके थे ,गले तक खा चुके थे । गाइड के जाते ही मैंने भार्गव जी की ओर देखा-मंद मुस्कान ओठों पर थी। शायद वे भी गाइड के जाने की प्रतीक्षा में थे।  



हमारे चारों तरफ स्ट्रावरी बिखरी पड़ी थीं। मंद बयार में पत्तों के पीछे से उनका लुकाछिपी का खेल चल रहा था। आहिस्ता से मैंने उनको छूआ। लाल गुलाबी मुखड़े वाली शिशु सी ---। तोड़ूँ या न तोड़ूँ---  असमंजस में थी । ज्यादा देर तक अपने पर काबू रखना असंभव सा लगा। मोटी –मोटी ,रसीली, अपनी महक फैलाती हुई मेरी टोकरी में समाने लगी। वश चलता तो तोड़ते ही अपने मुख में रख लेतीं पर उनपर छिड्के केमिकल को साफ करना भी जरूरी था। मैंने आठ –दस स्ट्रावरी मुंह में रख ली तब सुध आई दूसरे भी पास खड़े हैं उनके सामने भी पेश करना चाहिए।
बचपन में अपने गाँव में सुबह –सुबह नहर की पुलिया पार करके छोटे भाई के साथ मैं खेत में घुस जाती। कभी गन्ना तोड़ती,कभी टमाटर। बाग का मालिक बाबा को जानता था वरना हमें डंडे मारकर बाहर निकाल देता। मेरा वह बचपन कुछ समय को लौट आया था।
बेटा क्यारियों से बाहर निकल गया था। पहले तो मुझे खाता देखता रहा फिर बोला –बस भी करो माँ ,पेट खराब हो जाएगा ।
-ज़िंदगी में पहली बार तो इस  तरह खा रही हूँ ,कोई पेट –वेट खराब नहीं होगा।
एक स्ट्रोवरी खाकर नजर घुमाती –अरे यह तो और भी रसीली और बड्डी है। उसे तोड़ती,धोती और गप्प से खा जाती। यह सिलसिला गोधूलि तक चला। पेट भर गया पर नियत नहीं भरी। 
-माँ ,अब चलो ।अगली बार चेरी के फार्म पर चलेंगे। वहाँ और भी आनंद आएगा।  
-सच!वायदा रहा। मैं चिहुँक उठी और बालिका की तरह हिलती -डुलती उसके पीछे-पीछे कदम बढ़ाने लगी।

(अंतर्जाल पत्रिका साहित्य कुंज- जून प्रथम अंक 2016 में प्रकाशित) 
क्रमश:  



शुक्रवार, 6 मई 2016

कड़ी 8-कनाडा डायरी के पन्ने

साहित्य कुंज अंतर्जाल  पत्रिका में प्रकाशित -27॰04 ॰2016 , लिंक है-
http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/S/SudhaBhargava/08_Shisupalan_kakshaayen.htm


शिशुपालन कक्षाएँ

सुधा भार्गव 

14/4/2003

यहाँ तो अप्रैल में भी गुलाबी ठंड सताती रहती है इसलिए एक स्वटर या शौल लटकाए ही रहती हूँ । रात में न मक्खी –मच्छर न पसीना । लिहाफ ओढ़कर एक बार सोई तो सुबह 7बजे से पहले नींद नहीं टूटती। आज तो बहू –बेटे की अंतिम पेरेंटस क्लास है। मुझे ये नि:शुल्क कक्षाएँ बहुत रोचक लगीं
प्रथम बार माँ –बाप बनने का सौभाग्य मिलने पर युवक -युवती को इस प्रकार शिक्षित किया जाता है कि वे कुशलता से अपनी संतान के पालन –पोषण का उत्तरदायित्व निभा सकें। राज्य की ओर से जगह-जगह स्वास्थ्य केंद्र खुले हुए हैं । इनमें प्रतिमाह होने वाले बच्चे की विकास प्रक्रिया और माँ के शरीर में होने वाले परिवर्तनों से अवगत कराया जाता है। पति अपनी पत्नी के कष्टों को जानकार उसके प्रति पूर्ण संवेदनशील रहता है । आत्मीयता के एकात्मक क्षणों में समर्पण की पराकाष्ठा मधुर हो उठती है।

शिशु जन्म के पश्चात दुर्बल माँ की देखभाल अधिकांशतया पति  को ही करनी पड़ती है । इसी कारण नौकरी पेशेवाली माँ को तो कई महीने की छुट्टियाँ मिलती ही हैं पर साथ में पिता को भी कुछ दिनों का वेतनिक अवकाश प्रदान करना अनिवार्य है । यदि कंपनी की तरफ से छुट्टियाँ नहीं मिलतीं तो सरकार उनकी व्यवस्था करती है।
माँ को समय –समय पर अपने स्वास्थ्य की जांच करने चाइल्ड –मदर यूनिट में जाना ही पड़ता है। उनके समस्त मेडिकल परीक्षणों की व्यय राशि का भार यहाँ सरकार करती है ।

इस सुव्यवस्था में आधुनिक चिकित्सा संबंधी जागरूकता स्वाभाविक है ।रक्त परीक्षण ,ब्लड प्रेशर ,डाईविटीज ,संतुलित भोजन आदि शब्दों पर अज्ञानता की परतें जम कर नहीं रह गई है । नर्सें भी अपने पेशे के प्रति ईमानदार हैं । वे बहुत धैर्य से अनुभवहीन माँ को बच्चे से संबन्धित जानकारी देती हैं। इससे न जाने कितने भोले भालेमुखड़े मुरझाने से बच जाते हैं ।

अचरज समस्त सीमाएं लांघ गया जब मुझे यह जानकारी मिली की अस्पताल में प्रसव पीड़ा तथा शिशु जन्म के समय पति भी पत्नी के साथ –साथ प्रसव कक्ष या आपरेशन थियेटर में जाता है । लोगों की यह धारणा है कि पति की सहानुभूति व प्रेमपूर्ण स्पर्श  से बच्चा सुविधा से होता है । औरत यह अनुभव करे कि जिस व्यक्ति के  कारण उसको भयंकर प्रसव पीड़ा से गुजरना पड़ रहा है वह उसके दुख के समय कदम से कदम मिलाकर चल रहा है तो बहुत सुकून मिलता है। एक और आश्चर्य !यहाँ बच्चे का नाल काटना बाप के लिए गर्व की बात है । लेबर रूम में प्रसव के समय फोटो भी खींची जा सकती है जो एल्बम की शोभा बढ़ाने में कामयाब होती है । 

कितना अच्छा होता यदि मेरे देश  भारत में भी मेडिकल साइन्स के क्षेत्र में इतनी सुविधाएं देकर सावधानी बरती जाती। इससे पुरुष  अपने बच्ची की जन्मधात्री के साथ अवश्य न्याय कर पाता । 

सोमवार, 1 फ़रवरी 2016

डायरी के पन्ने –कड़ी 7


साहित्यकुंज अंतर्जाल पत्रिका के फरवरी प्रथम अंक में प्रकाशित   
कनाडा सफर के अजब अनूठे रंग
सुधा भार्गव

21/4/2003
कनाडा की ठंड से छुटकारा मिला सोचकर अगड़ाई ले सुबह- सुबह उठ बैठी।   सोचा –आज सुबह की सैर की जाए। उस समय तापक्रम 150 था परन्तु अखबार –द ग्लोब एंड मेल में एक महिला की छपी फोटो देख ठिठक गई जिसके चित्र के नीचे लिखा था –Matin khan lies in a Toronto hospital bed last month,recovering from infection after kidney transplant surgery in her native Pakistan. बहुत से प्रश्न सुई सी चुभन देने लगे। मतिन खान की क्या मजबूरी थी पाकिस्तान जाने की,जबकि कनाडा चिकित्सा के क्षेत्र में बहुत उन्नत व सतर्क है। मैं तो खुद ही कनाडा में अपना स्थाई निवास स्थान बनाने की सोच रही थी। पर मिसेज खान के बारे में पढ़कर विचारधारा  को नया मोड़ देना पड़ा।


                      (अस्पताल के पलंग पर लेटी हुई मिसेज खान)

कनाडा में मिसेज खान का नाम किडनी मिलने वालों की प्रतीक्षारत सूची में था और इस बात की कोई गारंटी नहीं थी कि 7 वर्ष के बाद भी उनकी बारी आ जाती। एक हफ्ते में तीन बार डायलेसिज ट्रीटमेंट के बाद भी स्वास्थ्य बदतर होता जा रहा था, इसीलिए वे लाहौर गई। वहाँ एक मजदूर का गुर्दा उनके लिए उपयुक्त रहा। उन्होंने उसे 25000 पाकिस्तानी मुद्रा में खरीदा ।पाकिस्तान में इतनी गरीबी है कि कुछ लोगों को हमेशा धन की जरूरत होती है और एक गुर्दा बेचकर इतना कमा लेते हैं कि पूरी  ज़िंदगी चैन से गुजर जाए।

कनाडा में मानव अंगों की ख़रीदारी गैरकानूनी है। तब भी 30 से 50%तक वहाँ के निवासी प्रतिवर्ष भारत ,फिलीपाइन्स,चायना आदि देशों में मानव अंगों की तलाश में जाते हैं। यदि कोई देश नागरिकों की जरूरतों को पूरा करने में असमर्थ हो तो बेचारे नागरिक क्या करें। जीवन और मौत के बीच झूलते हुए कहाँ जाएँ? ऐसे कानून से क्या फायदा जों मौत की गिरफ्त को असहनीय कर दे।

कुछ आंकड़े तो बड़े चौकाने वाले हैं। एक ग्रुप की रिपोर्ट के अनुसार अंगों के इंतजार में सन 2002 में कनाडा में करीब 237लोग काल का ग्रास बन गए। कनेडियन इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ इन्फोर्मेशन से ज्ञात हुआ कि दिसंबर 31/2002तक करीब 3956 मरीज विभिन्न अंगों की आस में दिन बिता रहे थे। केनेडियन ऑर्गन रिपलेसमेंट रजिस्टर्स बोर्ड के चेयरमेन ने तो अपने टेलीफोन इंटरव्यू के दौरान स्वीकार भी किया –यदि हमारे पास और ज्यादा मानव शरीर के अंग होते और उनका प्रत्यारोपण ठीक समय पर कर पाते तो कम आदमी मरते।

जिन दिनों मिसेज खान अफगानिस्तान और भारत होते हुए  पाकिस्तान पहुंची उन दिनों ईराक –अमेरिका युद्ध के बादल छाए हुए थे। जगह जगह लाहौर मेँ नागरिक अमेरिका के झंडे जलाकर अमेरिका की युद्ध नीति की खिलाफत मेँ जुलूस निकाल रहे थे। किसी तरह मिसेज खान अपने परिवार मेँ पहुंची जहां उनके भाइयों और माँ ने इलाज के लिए धन जुटाने में कोई कसर न रखी। उन्होंने अपनी संपति बेची,बैंक से उधार लिया,अपने बचत खाते से धन निकाला।

रावलपिंडी मेँ मार्च 1998 मेँ उनके एक गुर्दे का प्रतिरोपण हुआ पर 2000  मेँ गर्मियों मेँ ही उनका शरीर प्रतिरोपित गुर्दे को सहन करने मेँ असमर्थता दिखाने लगा। कमर के निचले भाग मेँ दर्द बढ़ता ही गया। बुखार तो हमेशा रहता ही था। 12 मार्च को वे किसी तरह टोरेंटों पीयर्सन इन्टरनेशनल एयरपोर्ट पहुँचीं । सुरक्षा हेतु विशेष प्रकार की वेल्ट उनकी कमर के चारों तरफ लपेटी गई थी। हवाई अड्डे पर एंबुलेंस पहले से ही खड़ी थी  जिसने उन्हें स्टुअर्ट माइकेल हॉस्पिटल पहुंचाया।

मिसेज खान हड्डियों में वेक्टीरिया संक्रमण(ostcomyelitis)से पीड़ित थीं। टी वी का भी शक था। कारण का तो ठीक से पता न चला पर भाग्य से दवाइयाँ असर दिखाने लगीं। धीरे धीरे उनकी दशा सुधरने लगी। दर्द से राहत मिली। आज वे टोरेंटों में रीहेविलेशन हॉस्पिटल में हैं जहां डॉ जाल्ट्ज़मैन(Zaltjman)जैसे विशेषज्ञों की देखरेख में अपने पैरों और कमर की मांस पेशियों को मजबूत बनाने में जुटी हुई हैं।

डॉ जाल्ट्जमैन चिकित्सा की इस सफलता पर बहुत खुश थे। परंतु उन्होंने भी माना कि मिसेज खान तकदीरवाली हैं वरना इलाज के समय बहुत कठिनाइयाँ आईं,साथ ही कनाडा मेँ गुर्दा न मिलने के कारण उन्होंने जो उसके प्रतिरोपड़ का मार्ग अपनाया वह बहुत खेचीला और बीहड़ रहा। यदि मुझको भी अपने या अपने बच्चे के लिए 8 वर्षों तक इंतजार करना पड़ता तो उसका विकल्प जरूर सोचता।
इस महिला की स्वास्थ्य सम्बन्धी खबरें बड़ी दयनीय लगीं। उसमें मेरी इतनी दिलचस्पी हो गई कि रोज ही अखबार टटोलती हूँ । अपने प्रभु से उसकी आरोग्यता की कामना भी करती हूँ । मेरे जैसे न जाने कितने उनके लिए दुआ मांग रहे होंगे। शायद इन प्रार्थनाओं के कारण ही वे जल्दी से ठीक होकर घर चली जाएँ । मेरी शुभकामनाएँ हमेशा उनके साथ रहेंगी।
क्रमश: