बुधवार, 24 मई 2017

कनाडा डायरी की 18 वीं कड़ी


डायरी के पन्ने 

सुधा भार्गव  

14.5.2003
विकास की सीढ़ियाँ 

   अब तो घर मेँ आए सभी लोग नव शिशु अवनि के बारे में ही बातें करते हैं या उसी के बारे में सोचते हैं। मेरा भी मन करता है उससे बातें करूं। जानती हूँ वह बोल नहीं सकेगी पर एक तरफा ही सही। उसी से असीम संतोष मिलेगा।
   सुबह शाम यहाँ तापमान 10डिग्री तक आ जाता है। सेंट्रल हीटिंग सिस्टम के कारण ठंड थम जाती है परंतु विश्राम करते समय इच्छा करती है कुछ ओढ़कर ज्यादा गर्माहट का अनुभव किया जाए । इसीलिए अवनि को सोता देखकर मैंने उसकी बुआ का भेजा फलालेन का कंबल ओढा दिया। कुछ देर तो वह  सोती रहीं पर जल्दी ही कुलबुलाने लगी। हमने सोचा –शायद गर्मी लग रही है! इसी उधेड़बुन  मेँ कंबल हटा दिया। मगर यह क्या !प्यारी सी बच्ची अपने हाथ पैर चला आँखें घुमाने लगीं और कंबल दूर छिटक गया। अच्छा जी तो यह बात है –हमारी नन्ही विकास की सीढ़ियाँ चढ़ रही है।
   मैं उत्तेजित हो चिल्ला उठी –“प्यारी बच्ची,देखो--- देखो,तुम्हारा पापा तुम्हारे आने से कितना प्रसन्न  है। हर दिन तुम्हारे लिए कुछ न कुछ नया करना चाहता है।”
   तभी बेटा आ गया और बोला-“माँ ऐसा करते हैं इसके पलंग में म्यूजिकल मोबाइल भालू लगा देते हैं। आप अवनि को लेकर ऊपर की मंजिल में 10 मिनट बाद लेकर आ जाना।”
   उत्साह का सागर हिलोरे मार रहा था उसे दिल में समेटे छोटी बच्ची के माँ- बाप एक ही सांस में कई सीढ़ियाँ चढ़ गए। उन्हें देख मुझे अपने दिन याद आ गए जब बड़ा बेटा हुआ था और हम पहली बार माँ-बाप बने थे। उस पर जमाने भर की खुशियाँ लुटा देना चाहते थे।कितना प्यारा ज़िंदगी का यह पहलू है।
   जैसे ही मोबाइल भालू की मनमोहक घंटियाँ सुनाई पड़ीं मैं अवनि को लेकर ऊपर पहुँच गई। मोबाइल खिलौने में में पाँच भालू रंगबिरंगी पोशाक पहने मटक रहे थे। बेबीकॉट पर लेटाते ही उसकी नजर कभी लाल भालू पर जाती  तो कभी पीछे वाले भालू पर।  इस कोशिश में गर्दन-आँख घुमाते कहीं थक न गई हो-यह सोच कर खिलौना बंद कर दिया गया।
   बहू-बेटे कुछ काम में लग गए और मैंने अवनि से बातें करनी इस तरह शुरू कर दीं जैसे वह समझ ही जाएगी। 
   “बच्ची,मेरा मन तो अजीब से डर में डूबा हुआ है । जिस खिलौने को तुम्हारा  पापा इतने शौक से लाया है उसके स्वरों की खनक से डरकर तुम कहीं रो न पड़ो।क्या करूँ,मेरा अनुभव ही कुछ इस प्रकार का हुआ है।
   पिछले हफ्ते राहुल के पहले जन्मदिन पर तुमको लेकर गए थे। उसका पापा और तुम्हारा पापा दोनों गहरे दोस्त हैं। चहल-पहल के बीच प्रेशर कुकर की सीटी सुनकर वह भय से चीखकर रोने लगा। उन्मुक्त हंसी से गूँजता वातावरण बोझिल हो उठा। लेकिन तुम तो बहुत बहादुर निकलीं---न चौंकी और न रोईं । मुझे तुम पर बहुत  गर्व हुआ।  
    दूसरी बात भी मैं नहीं पचा पा रही हूँ।तुम्हारे जन्म से पहले एक दिन हम पारस के अन्नप्राशन उत्सव में गए। उसके पापा भी मित्र मंडली में हैं और बंगाली है। बंगाली बाबू से मिलकर हमें बहुत खुशी होती है। हो भी क्यों न !हम करीब 40 वर्ष कलकत्ता रहे हैं । बंगाली भाषा,बंगाली खानपान ,रीति-रवाज़ सभी तो सुहाते है। हमने तो वहाँ जाते ही बंगाली में गिटपिट शुरू कर दी पर मैंने अनुभव किया कि पारस नए -नए चेहरे देख आतंकित हो उठता है और बार -बार माँ के आँचल में छिपकर अपने को सुरक्षित अनुभव करता है। न अपने पिता के पास जाता और न दादी –बाबा के पास जो बड़े अरमानों से कलकत्ते से अपने पोते की खातिर दौड़े दौड़े आए थे। माँ की हालत बड़ी दयनीय थी। थकी- थकी सी पारस को गोद में लिए मेहमानों का स्वागत कर रही थी। वह बेचारी रसोई सँभाले या बच्चा। वह तो अच्छा था मेहमान ,मेहमान नहीं मेजबान लग रहे थे।
   महिलाएं मिलजुलकर खाने का काम सँभाल रही थीं ।ज़्यादातर आगंतुक अपने झूठे बर्तन धोकर रख देते। सब की यही कोशिश  थी कि उनके सहयोग से पारस के मम्मी-पापा की भागदौड़ कम हो जाए और वे भी अन्नप्राशन उत्सव का आनंद उठा सकें।
   पारस का उसके मम्मी-पापा बहुत ध्यान रखते थे। उसे ज्यादा न कहीं लेजाते थे न सबके सामने उसे उसके कमरे से निकालते थे। सोचते उसे किसी की छूत न लग जाए,कोई उस पर बुरी नजर न डाले,उसके दैनिक कामों में खलल न पड़े। पर इससे वह घर-घुस्सू बन गया। यहाँ तक कि अपने कमरे को छोडकर वह कहीं सो भी न पाता था। दूसरों को देखते ही सहम जाता।उसका नतीजा माँ-बाप भी भोग रहे थे।  
   उस समय ही सोच लिया था कि जब तुम हमारे पास आ जाओगी,अकेले कमरे में तुम्हें ज्यादा नहीं रहने दिया जाएगा वरना एकांतवास की आदत पड़ जाएगी और घर में आए लोगों को देखकर बस हुआं ---हु -आं करके घर को सिर पर उठा लोगी।
   सच में हमने ऐसा ही किया। सोते समय तुम अपने कमरे में रहती हो  पर जागने पर हम सबके बीच।  कभी पालने में लेटी रहती हो तो कभी पापा की बाहों में झूलती हो। मुझ दादी माँ की गोदी में तो आते ही सो जाती हो।  
    चार लोगों के बीच में रहने के कारण ही किसी अजनबी को देख तुम कोहराम नहीं मचाती हो। जब वह प्यार से तुम्हें गोदी मेँ लेता है और बातें करता है तो  तुम्हारी टुकुर- टुकुर आँखेँ चलने लगती है मानो तुम उसकी  बातें समझ रही हो। गोदी में लेने वाला भी तुम्हारे हाव-भाव देख खिल-खिल उठता है और शांत माहौल में शांति से बात कर पाता है।”

क्रमश : 

प्रकाशित - साहित्य कुंज 19.04.2017
http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/S/SudhaBhargava/18_vikaas_kee_sidiyan.htm

सोमवार, 17 अप्रैल 2017

कनाडा डायरी की कड़ी-17


डायरी के पन्ने 

सुधा भार्गव 

14.5.2003

मातृत्व की पुकार 

अवनि,मेरी लाड़ली  जैसे -जैसे तुम बड़ी होती जा रही हो मेरा मन करता है तुमसे बातें करती ही रहूँ—करती ही रहूँ। पर तुम तो समझोगी नहीं!मुश्किल से 15 दिन की तो हो। अपने स्नेहसिक्त  भावों को मैं कागज के कोरे पन्नों पर उतार कर रख देती हूँ। बड़े होने पर तुम उन्हें पढ़ लेना।  इस बहाने अपनी दादी माँ को याद करोगी।  
-ओह! हाथ –पैर मारकर खूब व्यायाम कर रही हो। थकान होने पर निढाल होकर ज्यों ही तुम्हारी पलकें भारी होती है,तुम्हारी माँ को बहुत दया आती है और कलेजे से तुम्हें लगाकर अनिवर्चनीय सुख का अनुभव करती है। तुम्हारी अच्छी से अच्छी परवरिश करने की तमन्ना उसके दिल में है।

बहू-बेटे के चेहरे पर खिले गुलाबों को देख कभी -कभी तो मैं अपने मातृत्व को ही टटोलने लगती हूँ। जिन हाथों से मैंने अपने बच्चों की परवरिश की,अर्द्धरात्रि को यदि भूले से भी उनका ध्यान कर लूँ तो वे मेरी बाहों के झूले में झूलते नजर आने लगते हैं। फिर तो मजाल क्या कि पलकें बंद हो जाएँ।
आज तो चलचित्र की भांति नेत्रपटल पर वर्षों पहले के दृश्य आ-जा रहे हैं। बेटा- बेटी घुटनों चलने लगे है और मैं हाथ पकड़कर चलना सिखा रही हूँ। छोटा बेटा तोतली बोली में बोलने की कोशिश में है। मैं बार -बार उसके शब्दों को दोहराकर उच्चारण ठीक करने में लगी हूँ। जैसे ही वह एक शब्द बोलता मैं मुग्ध हो उसके गाल पर अपने प्यार की छाप लगा देती।

अतीत खँगालने में सारा दिन गुजर गया।रात में मेरा जीवन साथी बगल में लेटा खर्राटे भरे और में जागती रहूँ मुझसे सहन न हुआ। अंधेरे में निशाना लगा बैठी –सो गए क्या?
-मन में कुछ घूम रहा है क्या?सोते समय विचारों के दलदल में फँसकर हमेशा विचलित हो जाती हो। दिन में तुम्हें कोई फर्क नहीं पड़ता?
-दिन में तो अंग क्रियाशील रहते हैं और  सुप्त मस्तिष्क के पीछे चलते द्वंद को मेरा जाग्रत मस्तिष्क नहीं जान पाता है।
-लेकिन मैं तो जान जाता हूँ।
-क्या जान जाते हो?
-तुम मुझसे अपने मन की बात कहकर भारहीन हो रुई की तरह हवा में उड़ जाना चाहती हो।
-कहाँ?
-कल्पना की बसाई अपनी नगरी में!
-क्या मज़ाक ले बैठे!जब आप जागे ही हो तो मेरी बात भी सुन लो। आप ही तो एक हो जिसे मैं भोगे अनभोगे पलों का हिस्सेदार बना सकती हूँ। 40 वर्षों का आपका साथ सच्चाई की तह में कुछ जल्दी ही ले जाता है।
-मेरे तारीफ ही करती रहोगी या मन की गांठ भी खोलोगी।
-आप देख रहे हैं ,बहू-बेटे हमारी पोती का कितना ध्यान रखते हैं। एक से एक सुविधा का सामान जुटा रहे हैं।
-हूँ! मैं देख तो रहा हूँ।
-क्यों जी ---हमने भी तो अपने बच्चे बड़े प्यार से और शान से पाले हैं। माना आजकल की तरह हमारे पास सुविधाएं न थीं पर जितना हो सकता था उसमें कोई कसर न छोड़ी थी।
- कह तो ठीक रही हो। 
- आपको याद है----फेरेक्स खिलाने के और दूध बनाने के बर्तन चांदी के थे जिन्हें मैं दूध की बोतल के साथ कीटाणुरहित करने के लिए उबाला करती थी। अम्मा ने तो कह भी दिया था –इतनी सफाई !बड़ी बहमी है।
-हा—हा—हा--, यह तो मैं भी सोचता था। पर चुप रहता था क्योंकि इसमें भी बच्चों की भलाई ही थी।
-आप भी तो एक अच्छे पिता हो। छोटू लेक्टोजन दूध ही पीता था। एकबार उसके डिब्बे कलकत्ते में नहीं मिले ,मैं तो चिंता के मारे अधमरी हो गई पर आपने तो  दिल्ली से एक साथ तीन डिब्बे मँगवा दिए।
-एक डिब्बे की कीमत केवल 60 रुपये ही थी पर उस समय 60 ही हमारे लिए बहुत थे। बच्चों का मोह सब करा लेता है। भार्गव जी की यादों की परतें उघड़ने लगीं।
-हमने बच्चों के लिए नौकरानी भी रखी थी जी पर बड़कू के लिए नहीं थी।
-पहले बच्चे के लिए तो हमारे पास काफी समय बच जाता था। उस समय तुम नौकरी भी नहीं करती थीं। घर के काम के लिए तो नायडू आती ही थी।  
-मुझे नौकरी करने का कोई शौक न था। हाँ बच्चे बहुत प्यारे लगते हैं। छुटपन में छोटे भाई बहनों के साथ खूब खेली –दौड़ लगाई। उनके साथ मेरा बचपन खूब इठलाता था।अपने बच्चे हुए तो उनमें रम गई पर उनके बड़े होने पर स्कूल का रास्ता देखना पड़ा। वहाँ भोले -भाले नाजुक से फूलों के बीच अपना सारा तनाव -चिंता भूल जाती थी।
-हम तो छह भाई बहन हैं। मिल जाएँ तो बातों का उत्सव शुरू !फिर तो न किसी पड़ोसी की जरूरत और न दोस्त की। अपने समय की हवा के अनुसार तो 2 बच्चे ही बहुत समझे जाते थे।  हमारे तीसरे बच्चे के समय तो मालती ने सुना ही दिया था –तीसरा बच्चा!oh too much .आई अंग्रेजी झाड़ने। तुम्हारे बॉस की बीबी थी इसलिए कुछ न बोली।बस,अंदर ही अंदर सुलग उठी।
-तुम्हें बच्चों का इतना ही शौक है तो दो-तीन बच्चे गोद ले लेते हैं। विनोदप्रिय पतिदेव दिल खोलकर हंस पड़े।
-अब तो बहुत देर हो गई –कहने के साथ ही एक लंबी सी मुस्कान मेरे अधरों पर छा गई।
 
फलभर चुप्पी के बाद मैं बोली-आप शायद जानते नहीं पिता जी मेरे बारे में क्या सोचते थे?
-तुमने कभी बताया ही नहीं।
-वे सोचते थे कि मैं धनी परिवार में पली शायद बच्चों के साथ मेहनत न कर सकूँ । इसी कारण एक दिन उन्होंने कहा था-
-बेटा,बच्चों को अपने कलेजे से लगाए रखना।ये ही तुम्हारा भविष्य हैं।
उनका शायद यही मतलब था कि बच्चों को अच्छे संस्कार व विदद्या दूँ और अपने खर्चे कम करके पैसे को सँभाल कर रखूँ। एक तरह से यह मेरे लिए चेतावनी भी थी और नसीहत भी। मैंने उनकी बात को सहेजकर रख लिया।
-हाँ,यह तो है ,तुमने सिद्ध कर दिया कि शिक्षित माँ कुशल व आदर्श गुरू भी हो सकती है। बेटी के होने पर तुमने एक लड़की उसकी देखभाल के लिए रखी तो थी  जो शाम को घुमाने ले जाया करती थी। पर तुम्हारे पैर में तो चक्र है। कुछ न कुछ करती ही रहती थीं। बेटी जब चार दिन की ही थी तभी से बेटे को गृहकार्य कराना  शुरू कर दिया। वह सिरहाने खड़ा हो जाता और तुम आँखें मींचे उसे उत्तर बताती रहती।जिद्दी भी तो इतना था कि माँ ही कराएगी। शुरू से ही बच्चों का झुकाव तुम्हारी तरफ है।
-माँ जो हूँ।
-और बाप!
-आप तो मेरे मार्गदर्शक व सहयोगी हो।
-फिर तारीफ---,कुछ चाहिए क्या!
-मुझे क्या चाहिए!मेरे पास सब कुछ है।हाँ, मैंने मेहनत तो बहुत की है पर आपकी बदौलत यह रंग लाई।

गुटरगूं करते हुए हम मियां -बीबी न जाने कब तक अपने बच्चों की उस दुनिया में खोए रहे जो चटकीले रंगों से भरपूर थी।जितना उसकी गहराई में उतरते उतना ही पुलकित हो उठते। 
क्रमश:
प्रकाशित-साहित्यकुंज अंतर्जाल पत्रिका -03.22.2017 

बुधवार, 29 मार्च 2017

कनाडा डायरी की कड़ी-16


डायरी के पन्ने 

           परम्पराएँ 

          सुधा भार्गव 

12.5॰2003

परम्पराएँ

मेरी पोती मुश्किल से एक हफ्ते की हुई होगी कि एक सुबह बहू शीतल को रसोई में चाय बनाते देखा। बड़े प्यार से मेरे हाथों में चाय का कप थमाते हुए बोली –मम्मी जी आप कई दिनों से बहुत काम कर रही हैं आज मैं खाना बनाऊँगी ,आप आराम कीजिए।

मैं हँसकर उसकी बात झेल गई मगर उसके कार्य की प्रशंसा नहीं कर सकी।मैं अपने समय की छुआछूत तो नहीं मानती। मेरी  सास ने सवा महीने तक चौके में घुसने नहीं दिया था और न मेरे पास सबको आने देती थीं।पर इस प्रथा के पीछे छिपी भलाई की भावना को नकार नहीं सकती। इस बहाने मुझे आराम मिल गया और शिशु को माँ की छाया। शारीरिक –मानसिक दृष्टि से हितकर ही रहा।  
दो मिनट चुप्पी साधने के बाद मैं सासु माँ के लहजे में बोली-शीतल, अभी बच्चा बहुत छोटा है,तुम भी कमजोर हो।एक बार शक्ति आ जाए,खूब काम करना। अभी अपने पर ज़ोर न डालो। फिर हम तो आए ही तुम्हारी मदद के लिए हैं।

दूसरे हफ्ते से नवशिशु को देखने और उसकी माँ को बधाई देने वालों का तांता लग गया। बेटा तो बच्चे के दस दिन हो जाने के बाद आफिस जाने लगा। अब सब्जी- आटा -दाल आदि लाने का दायित्व शीतल का ही था। कार तो मुझे या भार्गव जी को  चलानी आती नहीं थी सो बच्चे को घर में छोड़कर शीतल को बाजार जाना ही पड़ा। मुझे यह सब देखकर लगा –उसके साथ ज्याद्ती हो रही है।मैं उसकी कोई खास मदद नहीं कर पाती हूँ। एक बात और है ,कोई घर कितना ही सँभाल ले माँ का काम तो माँ को ही करना पड़ता है। उसकी तो नींद ही पूरी नहीं होती थी।

 अवनि से मिलने खूब मित्रमंडली आती । कोई प्यार से बच्चे को उठाता  ,कोई उसकी माँ से गप्प लड़ाता। परंतु कभी -कभी यह प्यार बड़ा महंगा पड़ जाता है। एक बार तो मुझे कहना भी पड़ा-पहले हाथ धो लो तब बच्चे को उठाना। आज भी कुछ दोस्त आने वाले हैं। चाँद और शीतल उनके खानपान का प्रबंध करने में दो दिन से जुटे हैं।डिनर के समय गरम –गरम पूरियाँ तो मैं तल दूँगी।कुछ तो हाथ बंटाऊँ उनका। कम से कम 3-4 घंटे तो  महफिल जमेगी ही।
एक बात किसी के ध्यान में नहीं आती कि शीतल को बच्चे का भी काम है। वह उसे देखेगी या मेहमान बाजी करेगी।फिर नई माँ की थकान का तो ध्यान रखना ही चाहिए। क्या बताऊँ सब अल्हड़-मस्त हैं।मैं तो देख- देख कुढ़ती ही रहती हूँ।

दोस्तों के जाते ही शीतल थककर बैठ गई।
-शीतल ,क्या बात है।
–कमर में दर्द हो रहा है।
-वह तो होगा ही। कमजोर शरीर है तुम्हारा। बच्चे के बहाने ही उठ जाती सबके बीच से। मेरे स्वर में झुंझलाहट थी।
-अच्छा नहीं लगता उठना पर अवनि भूखी सो गई।
-ऐसी औपचारिकता किस काम की। अब तो जाओ बच्चे के पास और तुम भी आराम करो। घर के काम तो चलते ही रहेंगे –हो जाएंगे सब।

कोई माने या न माने मुझे तो अपने समाज की प्राचीन परम्पराओं से लगाव ही है। उनके महत्व को झुठलाना संभव नहीं। बालजन्म के बाद जच्चा-बच्चा को अलग ही रखा जाता था। मतलब ,हर कोई न उनके कमरे में जा सकता था न उनके आराम करने , नहाने –धोने और खाने पीने के उपक्रम में बाधा पड़ती थी। इसके अलावा नवजात शिशु की माँ भी दुर्बल होती है। ऐसे में बड़ी सरलता से दूसरों से बीमारी की छूत लग सकती है। एक महिला माँ-बच्चे का काम सँभालती थी। वही ज़्यादातर उसके पास रहती थी। घर का काम परिवार के अन्य सदस्य देखते थे । सवा-डेढ़ माह के बाद माँ में इतनी शक्ति आने लगती थी कि वह बच्चा और घर देख सके।

आजकल पहली वाली बातें नहीं चल पातीं । एक तो एकल परिवार हो गए हैं दूसरे,बच्चे अस्पताल में होते हैं जो स्वच्छ्ता और स्वास्थ्य की दृष्टि से अति उत्तम है। परन्तु  घर लौटने पर माँ -बच्चे की देखभाल के लिए दूसरों की जरूरत तो अब भी पड़ती है। इसी कारण प्रवासी बहू-बेटियों के लिए माँ-सासें अपना देश अपना आराम छोड़ भागी -भागी उनके  पास चली आती हैं। इसके अतिरिक्त एक नारी की पीड़ा एक नारी ही तो समझ सकती है।

क्रमश : 

साहित्य कुंज में प्रकाशित 

मार्च 2017 


 http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/S/SudhaBhargava/16_parampraayen.htm

शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017

कनाडा डायरी कड़ी -15


डायरी के पन्ने 
                     नाट्य उत्सव “अरंगेत्रम”
                 सुधा भार्गव 
5॰ 5॰ 2003

“अरंगेत्रम”

शाब्दिक अर्थ है रंगमंच पर प्रथम प्रदर्शन । “अरंगेत्रम”के अवसर पर शिष्या अपनी कला की दक्षता को सार्वजनिक रूप से प्रमाणित करती है और इसके बाद गुरू उसे स्वतंत्र कलाकार की तरह अपनी कला के प्रदर्शन की अनुमति देता है।


   डॉक्टर भार्गव की पुत्री नेहा का अरंगेत्रम(Arangetram)नाट्य उत्सव 4 मई सेंटर पॉइंट थियेटर,ओटावा में होना था। उसका निमंत्रण कार्ड पाकर बहुत ही हर्ष हुआ। विदेश में ऐसे भारतीय कला प्रेमी!आश्चर्य की सीमा न थी। शाम को जब हम वहाँ पहुंचे,हॉल खचाखच भरा हुआ था। केवल भारतीय ही नहीं उनके अमेरिकन ,कनेडियन मित्रगण भी थे। करीब चार घंटे का कार्यक्रम था। नेहा ने भरत नाट्यम नृत्य शैलियों पर आधारित लुभावने नृत्य प्रस्तुत कर दर्शकों का मन मोह लिया। हॉल करतल  ध्वनि से बार बार गूंज उठता।
  इस रस्म में मंच पर सार्वजनिक रूप से नृत्य के प्रथम प्रदर्शन के बाद छात्र यह सिद्ध कर देता है कि वह इस कला में पूर्ण पारंगत है। दक्ष कलाकार की हैसियत से वह स्वतंत्र रूप से विभिन्न कार्यक्रमों का प्रस्तुतीकरण कर सकता है।
  नेहा की गुरू डॉ बासंथी श्रीनिवासन(Dr Vasanthi Srinivasan) हैं जो ओटावा में नाट्यांजली स्कूल की संस्थापक है। वे आजकल स्कूल की डायरेक्टर हैं। उन्होंने ओटावा यूनिवर्सिटी से PhDकी और 1989 से ही फेडेरल गवर्नमेंट मेँ काम कर रही हैं। उन्होंने अनेक एक्ज्यूटिव पदों पर काम किया। आजकल ओंटोरियो क्षेत्र में कनाडा स्वास्थ्य विभाग में रीज़नल एक्जूयटिव डाइरेक्टर हैं। वासनथी जी ने भारत नाट्यम  की तंजौर शैली को आगे बढ़ाया ।     इनके गुरू श्री॰टी॰के मरुथप्पा थे। कलाविद डॉ वासनथी को नृत्यकलानिधि की उपाधि से भी सम्मानित किया गया।
  नेहा उनकी 50वीं छात्रा है जिसने अरंगेत्रम किया। हायर सेकेन्डरी की इस छात्रा के लिए सभी की शुभकामनाएँ थीं कि अध्ययन के साथ साथ नृत्य के क्षेत्र में भी नाम कमाए,उसके परिवार और भारत का नाम सूर्य किरणों की भांति झिलमिलाए।
  इस उत्सव की सफलता का श्रेय नेहा की दस वर्ष की नाट्य साधना को जाता हैं। राजस्थान के लोकनृत्यों में उसकी सदैव से रुचि रही है। उसने न जाने कितनी बार मंच पर अपना कला प्रदर्शन किया है। कई बार स्वेच्छापूर्वक नृत्य शिक्षिका रही है। खेलों  में भी वह किसी से कम नहीं । हॉकी मेँ उसकी विशेष दिलचस्पी है। शेक्सपीयर  और मीरा उसके प्रिय कवि है। इस प्रकार हिन्दी – अंग्रेजी दोनों साहित्य में उसने योग्यता पा ली है। उसका कविता लेखन इस बात का प्रमाण है।
  
डॉ भार्गव काफी समय से यहाँ हैं।  मेरे बेटे –बहू को अपने बच्चों के समान समझते हैं।किसी भी पारिवारिक –धार्मिक पर्व पर वे उन्हें बुलाना नहीं भूलते। चाँद भी उनके नेह निमंत्रण की अवहेलना नहीं कर पाता। सच,प्रेम से इंसान खिंचता  चला जाता है।
   विशेष -यह संस्मरण काफी पहले लिखा गया है। प्रिय नेहा और उनकी गुरू इस समय उन्नति के चरम शिखर पर होंगे। उनको मेरी ओर से मुबारकबाद । 

साहित्य कुंज में प्रकाशित  
02.01.2017 
 :                                                         क्रमश :

कड़ी 14-कनाडा डायरी



डायरी के पन्ने

                            स्वागत की वे लड़ियाँ
                         सुधा भार्गव  
3.5.2003 

गृह प्रवेश 

शीतल जब तब सुप्रसिद्ध महादेवी वर्मा की पंक्तियाँ गुनगुनाती रहती है-

चारु चंद्र की चंचल किरणें खेल रही हैं नभतल में
स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि और अंबर में।

     शायद उसने पहले से ही निश्चित कर रखा था-बेटी हुई तो अवनि नाम रखा जाएगा । बेटा होने पर उसे अम्बर  कहेंगे। इसलिए उस फरिश्ते  को जन्म के बाद से ही उसे अवनि कहा जाने लगा।
    जैसे ही नन्हें से शिशु को लेकर चाँद और शीतल घर में घुसे उनके स्वागत के लिए हम दोनों दरवाजे की ओर दौड़ पड़े और दिमाग के तंतुओं ने आपस में ही टकराना शुरू कर दिया---
    अवनि,प्यारी बच्ची ,तुम  तीन दिन अस्पताल रहीं  पर कह नहीं सकती तुम्हें  देखे बिना ये तीन दिन कैसे कटे?लगता था मेरे शरीर का कोई अंग छिटक कर दूर जा पड़ा है।अस्पताल में ही तुम्हारे पापा ने फोटुएँ खटखट खींचनी शुरू कर दी थीं। चेहरे पर बस बड़ी बड़ी आँखें ही नजर आईं । एकदम अपने बाबा पर गई हो । उनकी आँखों में गज़ब का आकर्षण है। बड़े होने पर तुम्हारी आँखें भी उनकी तरह हँसती और बोलती लगेंगी।
    तुम्हारे पापा के तो अंग अंग से उल्लसित किरणेँ फूट फूट पड़ रही हैं।थका हुआ है फिर भी एक मिनट मिलते ही डिजिटल कैमरे के तार टी॰वी॰से जोड़ दिए हैं और तुम्हारी अपनी मम्मी के साथ प्यारी प्यारी  फोटुएँ स्क्रीन पर आ जा रही हैं पर मेरी  तो हंसी फूट रही है –24 घंटे के बच्चे की इतनी सतर्क निगाहें और खुला मुँह। तुम्हें देख तुम्हारे  पापा का बचपन याद आ रहा है। उसका भी सोते समय मुँह खुल जाता था। मैं तो उसकी टुड्ढी के नीचे तह किया रुमाल रख देती थी कि कोई मक्खी –मच्छर न घुस जाए। देखो तो –--“मेरे बेटे से कितनी मिलती है मेरी पोती” चिल्ला-चिल्लाकर यह  कहने को मन करता है जिससे दसों दिशाएँ जान जाएँ कि तुम मेरे बेटे की बिटिया हो। मेरा वंश बढ़ रहा है।
*
आत्मीयता का सैलाब

     पोती के जन्म पश्चात एक सुबह  मैंने चाय का प्याला मुँह से लगाया ही था कि चाँद और शीतल सीढ़ियाँ उतरकर जल्दी से आए। बेटा बोला –माँ ,हमें बचा लो ---हमें बचा लो।
   -क्या हुआ? मैं घबरा उठी ।
   -आज करीब दस लोग मिलने आएंगे।मेरी छाती पर  मूंग दल कर  जाएंगे। मूंग-बेसन की पकोड़ियाँ बना दो माँ,बचा लो माँ।
   उसके कौतुक देख मेरी हंसी फूट पड़ी।
   मेहमानों की आवभगत के लिए पूरा परिवार फिरकनी की तरह नाचने लगा। किसी ने रसोई संभाली,किसी ने अवनि को नहला धुलाकर नन्ही परी बना दिया,कोई घर की साज संवार मेँ लग गया।
   समय के  पाबंद डा दत्ता ने ठीक 11बजे दरवाजे पर दस्तक दे दी। घर मेँ प्रवेश करते ही उनकी पत्नी ने भारतीय मिठाइयों का डिब्बा मेरे हाथों मेँ थमा दिया ,जिसे देखते ही मुंह मेँ पानी भर आया। खोलकर देख लेती तो न जाने क्या दशा होती। जबसे भारत छोड़ा हल्दीराम,नाथूराम,गंगूराम की मिठाई सपने की बात हो गई।
   ये डॉक्टर साहब बाल विशेषज्ञ थे। उनके आते ही अवनि के बारे मेँ बातें शुरू हो गईं। मालिश किस तेल से हो,कब नहलाया जाए आदि –आदि।  प्रश्नों का अंबार लग गया। उन्होंने अपने अभ्यस्त हाथों से अवनि को फुर्ती से उठाया और नाल देखने लगे,पर मेरा तो दिल धडक उठा –कहीं नाल हिल न जाए और छोटी सी जान को कष्ट हो। अभी तो वह सूखकर गिरा भी नहीं है।
    डॉक्टर दत्ता ने बड़े अपनेपन से शिशु पालन संबंधी बातें बताईं। बच्ची को बहुत देर तक गोद मेँ लिए बैठे रहे। उनके व्यवहार मेँ चुम्बकीय अदा थी। हम भी उनकी ओर खींचे चले गए । अब तो अवनी जरा छींकती भी तो दत्ता अंकल याद किए जाते।
   दत्ता साहब के जाने के बाद मिठाई का पैकिट खोला गया और बच्चों  की तरह उसे चखा जाने लगा। हाथ के बने नुक्ती के लड्डू,काजू की बर्फी खाकर हम मिसेज दत्ता की प्रशंसा किए बिना न रहे। भारतीय स्टोर और टोरेंटों मेँ मिठाइयाँ मिलती तो हैं पर उनको चखते ही मुंह का स्वाद कड़वा हो जाता है इसी वजह से भारतीय घर मेँ मिठाई-नमकीन बनाकर पाक कला मेँ खूब निपुण हो गए हैं। पुरुष भी इन कामों मेँ महिलाओं की खूब मदद करते हैं।
पिछले तीस वर्षों से दत्ता परिवार ओटवा मेँ बसा हुआ है पर हिन्दी, बंगाली और संस्कृत भाषा व      भारतीय संस्कृति से ,रीतिरिवाजों व त्यौहारों से बेहद जुड़े हैं। विदेश मेँ भी रहकर अपनी मिट्टी से उन्हें बहुत प्यार है। उनका घर मुझे जरूर म्यूजियम नजर आता है। परंतु भारत के हर राज्य की झाँकी उनके विशालकाय भवन मेँ देखने को मिल जाएंगी।उसे देख एक सुखद अनुभूति भी होती है।
*
नर्स का नजरिया

   उसी शाम को स्वास्थ्य विभाग से एक नर्स आई। उसने हमारे घर आए नवजात शिशु की जांच की और नए बने माँ –बाप को पालन पोषण संबंधी तथ्य बताए। 2घंटे तक समस्याओ का समाधान करती रही । मैं इस व्यवस्था को देख बहुत संतुष्ट हुई। पर एक बात मुझे बहुत बुरी लगी।
नर्स ने पूछा-घर मेँ कोई सहायता करने वाला है?
   -हाँ,मेरे सास-ससुर भारत से आए है। बहू शीतल बोली।
   -कब तक रहेंगे?
   -3-4 माह तक।
   -क्या वे तुम्हारी वास्तव मेँ सहायता करते हैं?
   -सच मेँ करते हैं।
   -पूरे विश्वास से कह रही हो?
   -इसमें कोई शक की बात ही नहीं है।
   -ठीक है,तब भी शरीर से कम और दिमाग से ज्यादा काम लो।
   नर्स के शंकित हृदय की बहुत देर तक थाह लेती रही,कंकड़ों के अलावा कुछ न मिला।  
   न जाने ये पश्चिमवासी सास –बहू के रिश्ते को तनावपूर्ण क्यों समझते हैं?जिस माँ की बदौलत मैंने प्यारी सी पोती पाई उसे क्यों न दिल दूँगी। इसके अलावा माँ सबको प्यारी होती है। बड़ी होने पर जब अवनि देखेगी कि मैं उसकी माँ को कितना चाहती हूँ तो वह खुद मुझे प्यार करने लगेगी। उसके प्यार के लिए मुझे तरसना नहीं पड़ेगा। दादी अम्मा कहकर जब वह मेरी बाहों मेँ समाएगी तो खुशियों का असीमित सागर मेरे सीने मेँ लहरा उठेगा। शायद उस नर्स ने कभी साफ नीला आकाश देखा ही नहीं । उसकी नजर केवल धुंधले बादलों पर ही टिकी रहती है।
क्रमश
  
साहित्य कुंज में प्रकाशित 
11.3.2016

लिंक-http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/S/SudhaBhargava/14_swagat_kee_vah_laDiyan.htm

गुरुवार, 20 अक्तूबर 2016

तेरहवीं कड़ी -कनाडा डायरी के पन्ने


अंतर्जाल पर साहित्यप्रेमियों की 
     विश्राम स्थली 
: साहित्य कुंज 
अक्तूबर प्रथम अंक 2016 में प्रकाशित 
                                      

                                   
                        सुधा भार्गव 

29/4/2003

इंतजार करते करते 29 अप्रैल हो गई और मैं कह उठी-ओ मेरे प्यारे अनदेखे बच्चे, माँ की गर्भ गुफा से हमारी रोशनी भरी दुनिया मेँ क्यों नहीं आ रहे हो।  हम बड़े व्याकुल है पर प्रतीक्षा के पलों में भी मीठी धुन बज रही है। तुम्हारे हिलने डुलने से एक बात निश्चित है कि तुम भी अकेलापन महसूस कर रहे हो और हमारी रंग बिरंगी दुनिया में आकर मुसकुराना चाहते हो। ओह !तुम्हारी बेचैन भरी करवटों ने मेरी बहू की कमर में दर्द कर दिया है। रुक रुककर दर्द था तब तक ठीक था मगर लगातार व्यथा भरी लहरों को देखकर मन अशांत हो गया है । अब आ भी जाओ ,अपनी माँ को ज्यादा न सताओ।
रात के 10 बजकर 30 मिनट पर असहनीय यंत्रणा होने लगी और बेटा बहू को लेकर कार्लीटोन अस्पताल चल दिया । मैं और भार्गव जी घर पर रह गए। मन में आशंकाओं के घरौदे रह -रह कर बनने बिगड़ने लगे। न जाने मेरा बेटा, बहू को सँभलेगा या कार चलाएगा।वैसे कुछ ही किलोमीटर दूर अस्पताल है। सब ठीक ही होगा।
अनदेखे बच्चे से मेरे दिल के तार अंजाने में ही जुड़ गए। लगा जैसे वह मेरी  बातें सुन रहा है,समझ रहा है। सोचने लगी मेरी बात सुनकर नन्हा जरूर हँसेगा –अरे दादी, इतने बड़े पापा की चिंता! अब मैं उसे कैसे समझाती –उसका पापा कितना ही बड़ा हो जाए मुझसे तो बड़ा हो नहीं सकता।  
शिशु जन्म के समय मेरा अस्पताल जाना निश्चित था। सुन रखा था कार्लीटोन अस्पताल में आधुनिक उपकरणों से सुसज्जित आपरेशन थियेटर है। शान -शौकत में 5स्टार से कम नहीं। नर्सें बड़ी मुस्तैदी से अपना कर्तव्य निबाहती हैं। अपनी मुस्कान से निर्जीवों में प्राण फूकती हैं। मेरी तो यह सब देखने की बड़ी लालसा थी। सबसे बड़ी बात रूई से कोमल बच्चे को जी भर देखना चाहती थी पर मेरे सारे अरमानों पर पानी फिर गया। न जाने सार्स बीमारी टोरेंटों में कहाँ से आन टपकी और अस्पताल में माँ-बाप के अलावा तीसरे का प्रवेश निषेध हो गया। मैं मन मारे घायल पक्षी की तरह तड़पती रह गई।
रजनी की नीरवता को भेदते हुए घड़ी ने 12 घंटे बजाए,दूसरी ओर फोन की घंटी भी घरघराने लगी। मैं और भार्गव जी दोनों ही बच्चों की तरह रिसीवर उठाने भागे कि देखें पहले कौन ?दोनों के हाथ एक दूसरे पर पड़े !हम खिलखिलाकर हंस पड़े । उम्र की सीमा को लांघकर बचपन पसर गया।
बेटे ने जानकारी दी कि बहू को जाकूजी बाथ (Jacuzzi) दिया जा रहा है ताकि दर्द तो उठे पर प्रसव वेदना का अनुभव न हो। सुनकर संतोष हुआ कि कनाडा में वह सुविधा उपलब्ध है जो मुझे अपने समय में न थी। मैं ही उसके कष्ट को जान सकती थी ,भोगे हुए जो थी। अब मेरा सारा ध्यान अंजान बच्चे से हटकर उसकी माँ पर केन्द्रित हो गया।
तभी एक  धीमी सी आवाज सुनाई दी –दादी मुझे अंजान न कहो । जान -पहचान है तभी तो तुमसे मिलने आ रहा हूँ।
मैं चकित सी आँखें घुमा-घुमा कर देखने लगी। दिखाई तो कोई न दिया पर समझ में आ गया –अंजान शब्द का प्रयोग करके गलती की है।
टेलीफोन की घंटी फिर कर्र-कर्र कर उठी.... माँ , आप और पापा थोड़ा सो जाओ । मेरे पापा बनने में अभी 2-3 घंटे की देरी है। उसकी आवाज में पितृत्व का झरना झरझरा उठा था।
यहाँ आराम की किसे सूझ रही थी। हमारी आंखे तो फरिश्ते के स्वागत के लिए बिछी थीं।
घड़ी ने जैसे ही एक का घंटा बजाया कमर सीधी करने के लिए लेट गई। नींद ने कब अपने आगोश में ले लिया पता ही न चला।भार्गव जी तो बाबा बनने की उमंग में विचित्र सी अकुलाहट लिए घर का चक्कर काट रहे थे। बोलते कम थे पर उनकी चाल- ढाल से पता लग जाता था कि अंदर क्या चल रहा है।
इस बार फोन की घंटी इस तरह बज उठी मानो कोई सुखद संदेश देना चाहती हो। एक गर्वीले पिता की आवाज मेरे कानों से टकराई –माँ ,प्यारा सा बच्चा हुआ है।
-अरे यह तो बता लड़का है या लड़की?कैसा है?
-गोरी गोरी भोलू भोलू ।
-कितना वजन है उसका?
-6.6। नाल भी मैंने ही काटा माँ--।
-एँ –तूने नाल काटा!लगा जैसे तीसरी मंजिल से नीचे जा पड़ी हूँ।
-हाँ माँ...  सच कहा रहा हूँ।
-तेरे हाथ नहीं काँपे ?
-बिलकुल नहीं। बल्कि लगा मैं कुछ ही पलों में अपनी बच्ची के बहुत करीब आ गया हूँ। लो अपनी बहू से बातें करो।
-इतनी जल्दी --। अभी तो वह सम्हल भी न पाई होगी। मैं बुदबुदाई–बेटी कैसी हो?
-ठीक हूँ मम्मी जी ।
-कैसा लग रहा है?
-बहुत अच्छा।
उसके इन दो शब्दों ने बहुत कुछ कह दिया। उसके स्वर में पीड़ा या थकान की परछाईं लेशमात्र न थी। मातृत्व से खनकता कंठ गूंज रहा था।

नवजात शिशु के आगमन की सूचना पाकर अपनी कल्पना में नए रंग भरने लगी और अतीव रोमांचक रिश्ते के सुनहरे जाल में फंस गई। पहले तो मुझे लग रहा था 5 माह कनाडा प्रवास के कैसे बीतेंगे पर अब तो इस फूल से फरिश्ते का पलड़ा भारी लगने लगा और मैं विश्वस्त हो उठी कि उसके साथ दिन कपूर की भांति उड़ जाएंगे।

क्रमश :

मंगलवार, 30 अगस्त 2016

बारहवीं कड़ी -कनाडा डायरी


    डायरी के पन्ने                                                  
                                                                  दर्पण 
                                     सुधा भार्गव 
                                                               
                                                                  
26/4/2003

उस दिन महकती बगीची की गुनगुनी धूप में मेरे विचारों की पंखुड़ियाँ खुली हुई थीं कि कब मेरा मनभावन पोता या पोती इस दुनिया में आकर आँखें खोले और मैं उसे इन नाजुक सी पंखुड़ियों में बंद कर सीने से लगा लूँ।

तभी बहू भागी भागी आई –मम्मी जी,मम्मी जी माँ बनने के बाद तो बहुत कुछ भोगना पड़ता है । औरत अपना वजूद ही भूलजाती है। देखिए न , सोनिया  ने माँ बनने के बाद आपबीती लिखी हैं। उसने द ग्लोब एंड मेल समाचार पत्र मेरे हाथ में थमा दिया।

बहू तो चली गई । मैं किसी का भोगा जानने को उत्सुक हो उठी उसे पढ़कर यहाँ  के रहन सहन ,तौर तरीकों की गठरी खुलती सी लगी। यह किसी विशेष की कथा नहीं है अपितु 90%महिलाएं मातृत्व के बाद जिन गलियारों से गुजरती हैं उनका दर्पण है।

अखबार के पन्नों पर से मेरी नजरें बड़ी तेजी से फिसलने लगीं । सोनिया ने खुद लिखा-मैं संगीत कक्ष के फर्श पर लेती बहुत व्याकुल थी। संगमरमर का ठंडा फर्श चुभन पैदा कर रहा था पर तब भी मैं उसमें समा कर अदृश्य हो जाना चाहती थी ताकि मेरे पति और मेरा नवजात शिशु मुझे पा ही न सकें। हाँ ! मैं उनकी नजर से बचना चाहती थी पर मुझे गलत न समझना । मैं अपने बेटे को बहुत प्यार करती हूँ। वह मेरी हर सांस में समाया हुआ है।

मैं ही अकेली प्रथम औरत नहीं हूँ जो अपने बच्चे और पति से बचना चाह रही हो। मेरे चहेरी बहन तो बिस्तर की चादर में मुंह छिपाकर फफकने लगती थी जब उसका पति आधी रात को उसके पास बच्चे को दूध पिलाने लाया करता था। मातृत्व के प्रारम्भिक दिनों में वह सिर से पाँव तक सिहर जाती थी।
कुछ दिनों पहले मैं ब्रिटिश कोलम्बिया अपनी छोटी बहन से मिलने गई । मुझे अचानक देख वह खुश भी हुई और चकित भी पर उससे ज्यादा मैं चकित हुई उसे देखकर। वह अपने घर की सीढ़ियों पर सिर थामें बैठी थी और अंदर उसके दोनों बेटे भाग दौड़ करके लुका छिपी खेल रहे थे। बहन परेशान होकर घर का दरवाजा भेड़कर बाहर बैठ गई ताकि एकांत के पलों में शायद कुछ शांति मिले। तनाव दूर हो।
यही है मातृत्व की परिभाषा –तुम ,तुम्हारा समय,तुम्हारी इच्छाएँ ,तुम्हारी आवश्यकताएँ इन नन्हें देवदूतों से बढ़कर नहीं। मेरे मुंह से निकल पड़ा।

     माँ बनने से पहले मेरा यही विचार था कि खुशी खुशी बच्चे के लिए खुद को कुर्बान कर दूँगी। पर यह कुर्बानी मुझे बलि का बकरा बना देगी ,पता न था। मैंने अपनी माँ से पूछा-मॉम,तुमने बताया नहीं कि संतान को पालने में इतना कष्ट सहना पड़ता है। उन्होंने मेरा सर सहलाया था घंटों और उनकी एक मुस्कान ने मुझे सब कुछ समझा दिया-माँ सहनशीलता और त्याग की मूर्ति है। तभी तो वह दिल के अधिक करीब है। मेरी अवस्था इतनी दयनीय थी कि अपने तीन दिन के शिशु के पोतड़े बदलते –बदलते उनके कथन से पूरी तरह सहमत न हो सकी । यदि वे कुछ बतातीं भी तो मैं उनका विश्वास न कर पाती। भोगे बिना पीड़ा कोई क्या जाने।

    मेरे अनुभव रूपी संपदा समय और सक्रियता के अनुपात में दिनोंदिन बढ़ती ही गई और इस दौड़ में मैंने अपने पति को भी पीछे छोड़ दिया। वैसे तो हम दोनों ने मातृ –पितृ कक्षाओं में साथ साथ शिशु संबन्धित ज्ञान पाया था पर ईशवर पुरुष को भी बच्चे जनने का अवसर देता तभी तो समान ज्ञान व अनुभव के भागीदार होते।ऊपर वाले के इस अन्याय को देखकर मेरा रोम -रोम कुपित हो उठता है । ब्रह्मा ने ही स्त्री –पुरुष को समान नहीं समझा तो समानता का दावा कैसा?
मैं जब गर्भवती थी मैंने मातृत्व को गरिमामयी दृष्टि से देखा पर माँ बनते ही सारा घर तितर –बितर लगने लगा। घर ठीक करूँ या बच्चे को संभालूँ। एक कमरे में नवजात शिशु का बिस्तरा लगाया। अलमारी में उसके कपड़े बड़ी तरतीब से रखे । बेबी शावर के दिन मिले उपहार करीने से सजाए। मैं अपने पति के साथ कितनी खुशी से बेबी के लिए आरामदायक छोटी सी चारपाई ,गद्दा लिहाफ और तकिये लाई। पर सारी की सारी मेहनत बेकार गई।

बेटे के आने पर उसके लालन पालन की आदर्श सोच मोम की तरह गलने लगी। मेरे कमरे में ही धीरे –धीरे उसका सामान आने लगाऔर उसका कमरा कबाड़खाना हो गया। मैले कुचैले कपड़े,पोतड़े और ऊलजलूल चीजों का वहाँ ढेर लग गया। मेरा बेटा उस कमरे में एक दिन भी नहीं सोया। मुझे दूसरे के लिए अपने कमरे का भी मोह छोडना पड़ा ।
माँ बनने से पहले ज़्यादातर में उन्मुक्त पंछी की तरह उड़ा करती थी। जो मैंने चाहा वही किया । जब चाहा जैसे चाहा उसी तरह जीवन की धारा को मोड दिया पर अब मेरे स्वतन्त्रता का अपहरण हो गया था। इस विचार ने मुझे पागल बना दिया ,बस पागलखाने जाने की कसर थी।
   बेटा 15 दिन का हो गया पर मुझे पूरी नींद लेने का समय न मिला। उन दिनों मेरे सास जी आई थी। सहानुभूति के दो बोल पाने की आशा में मैंने एक दिन कहा-बच्चे ने तो मेरे नींद हराम कर दी है।
टका सा उत्तर सुनने को मिल गया-बस बहुत सो ली । अब जीवन भर सोने को नहीं मिलेगा।
झल्लाहट से मेरा माथा दर्द करने लगा। शाम को मेरे पति ऑफिस से आए । मेरा उदास चेहरा देखकर पिघल गए। कपड़े बदलकर और हाथ धोकर बच्चे को गोदी में उठा लिया पर सास के कड़वे बोल गूंज उठे-अभी अभी तो वह थका मांदा घर आया है। उससे बच्चा ही खिलवालों या ऑफिस का काम करा लो।

सारा घर जब नींद के झूले में झूलता होती उस समय मैं कई बार उसे आ –आ- आ कर थपकियाँ देती और लोरी गाकर सुलाने की कोशिश करती। ताज्जुब तब होता जब बेटे के रोने की आवाज से दूसरों की नींद में जरा खलल न पड़ता। पतिदेव करवट बदलते हुए कहते –सानू ,मेरा बेटा क्यों रो रहा है?फिर गूंजने लगते शंखनाद से खर्राटे । मेरे तनबदन में आग लग जाती। सुलगती रहती सोने वालों के प्रति पैदा हुई ईर्ष्या से ,कोसती रहती अपने भाग्य को।

6 मास का बेटा होने पर मैं माँ के पास भागी । सुबह पौ फट्ते ही बच्चा कुलबुलाने लगा –मेरे माँ भी बेचैन हो गई। पर मैं 6 माह का गुब्बार निकालते हुए चिल्लाई –माँ इसको यहाँ से ले जाओ। मुझे सोने दो। मुझे इसके बाप के घर सब कुछ मिलता है पर सोने को नहीं।

दिन चढ़े सोती रही या सोने का अभिनय करती रही पता नहीं पर बंद आँखें पल पल मेरी  उम्र बढ़ा रही थी। यह है मेरा मातृत्व जिसने दिन प्रतिदिन मुझे आत्मसमर्पण करने को मजबूर किया और इसी तले मैं रौंदी गई। मुझे पग पग अनुभव हुआ कि मेरी दुनिया खतम हो गई है। मेरे विचारों का –क्रियाकलापों का केंद्र केवल बच्चा है।

एम॰ डी॰ की डिग्री लेने से पहले ही मैंने मातृत्व की डिग्री ले ली थी जिसने मेरी राह कठिन बना दी। पैरों को झूला बनाकर उस नन्हें को झुलाती जाती और उसकी चिल्लाहट के बीच दोनों हाथों से किताब थामे अपना पाठ याद करती। कोशिश करती बच्चे से अधिक मेरा स्वर तेज हो पर क्या ऐसा हो पाता।
मुझे मालूम है यह समाज पग पग पर भोंपू बजाता कहता रहता है जीवन में आए इस परिवर्तन को सहर्ष गले लगालो। सदियों से औरत यही करती आई है पर पता नहीं क्यों,मैं इस बात को नहीं पचा पा रही।
अपने ही लिखे को मैंने जब देखा  तो सोचने लगी –क्यों लिखा है?माँ होने के नाते मैं बच्चे को बहुत प्यार करने लगी हूँ। उसकी हंसी में अपनी मुस्कान देखती हूँ। उसके रोते ही सीने में काँटा सा गड़ जाता है। परंतु यह भी सच है - कभी कभी शिशु पालन के समय मन कड़वाहट से भर जाता है जिसको बांटने वाला कोई नहीं।
वृद्ध पीढ़ी कहते कहते नहीं थकती –आदर्श माँ स्वार्थी नहीं होती।,न ही उसे किसी प्रकार की शिकायत होनी चाहिए। पर कथनी और करनी में बहुत अंतर होता है।
हर माँ के लिए यह संभव नहीं कि जब भी बच्चा उसके अंक में डाल दिया जाए वह उसी की हो जाए और घर भी व्यवस्थित रूप से चलता रहे,बाहर बॉस भी खुश रहे।

माँ बनने के बाद ही मुझे इस बात का अहसास हुआ कि मेरी माँ ने अपनी जवानी के सुनहरे दिन तो मुझे ही अर्पित कर दिए पर मैं ऐसा नहीं करना चाहती थी। अपना स्थान ,अपना समय व अपनी पहचान को सुरक्षित रखने के चक्कर में चक्कर खाती रहती हूँ।

मेरे पति बहुत समझदार हैं और इस बात को अनुभव करते हैं कि बच्चे के साथ साथ माँ की देखरेख भी समुचित ढंग से होनी चाहिए।जबकि ऐसा हो नहीं पाता। कभी कभी वे उदास हो जाते हैं मेरे लिए नहीं अपने लिए। इस दुनिया मेँ बेटे के आने से वे पेशोपेश में पड़ गए हैं। उनके दिमाग में यह बात घर कर गई है कि मैं उन्हें पहले की तरह प्यार नहीं करती। उनके हिस्से का प्यार भी मैंने बेटे पर न्योछावर कर दिया है। पहले की तरह न उनके खाने का ध्यान रखती हूँ न बालक की तरह प्यार करती हूँ न दुलार। क्या करूं!एक जान हजार काम।

उनका तो प्यार ही बंटा है ,मैं तो खुद ही बंट गई हूँ। दिल से भी दिमाग से भी। अभी न जाने कितने भागों में विभाजित होना है। पर मैं ऐसा होने नहीं दूँगी। मुझे फिर से उठना है और उठूँगी।
सोनिया का जीवन संघर्ष पूरे नारी वर्ग के हाहाकार का दर्पण था। इस दर्पण मेँ झाँकते –झाँकते कभी मुझे अपना चेहरा दिखाई देता है,कभी नई पीढ़ी का अंतर द्वंद । सच मेँ इक्कीसवी सदी की नारी घुटने नहीं टेकना चाहती । लेकिन यह भी सच है सम्बन्धों का पिंजरा और मुक्ताकाश एक साथ नहीं मिल सकते।

 क्रमशः 

(प्रकाशित - अन्तर्जात पत्रिका साहित्यकुंज के सितंबर मास के प्रथम अंक में)
http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/S/SudhaBhargava/12_darpan.htm