सोमवार, 26 जून 2017

कनाडा डायरी की 19वीं कड़ी


डायरी के पन्ने 
कनेडियन माली 
सुधा भार्गव

           साहित्य कुंज में प्रकाशित 

16 5 2003
कनेडियन माली
    
    हम सबको भगवान ने बनाया है । वही हमारा पालनहारा है। पर पेड़-पौधों का भगवान माली है। वही बीज बोकर उन्हें उगाता है। उसी की देखरेख में वे बड़े होकर फल फूलों से लदे धरती माँ की शोभा बढ़ाते हैं। 
     कनाडा में ऐसे माली घर-घर बसते हैं, जिन्हें प्रकृति से अगाध प्यार है। असल में कनाडा वासियों को बागबानी का बड़ा शौक है। महिलाएं भी इस काम में पीछे नहीं रहती। कामकाजी महिलाएं रोज शाम को अपने बगीचे की सुंदरता निहारते मिलेंगी। जमीन खोदने,घास हटाने का काम ,बीज बोने ,पौधों में पानी देने आदि से जरा भी नहीं कतराती। मुझे लगता है यह शौक उनके खून में है। बच्चे तक माँ का हाथ बंटाते हैं । बचपन से ही उनके हाथ में छोटी-छोटी -खुरपी, बाल्टी थमा देते हैं जो खिलौनों से कम नहीं दीखतीं। खेल- खेल में ही वे फूल-पौधों के बारे में बहुत कुछ जान जाते हैं और उनसे उन्हें लगाव हो जाता है।
    बच्चा छोटा हो या बड़ा ,एक हो या दो,काम महिलाओं के कभी स्थगित नहीं होते। वे बहुत मेहनती और ऊर्जावान होती हैं। गोदी का बच्चा हो तो उसे प्रेंबुलेटर में लेटा खुरपी चलाने लगती हैं। बच्चा घुटनु चलता हो तो कंगारू की तरह आगे या पीछे एक थैली बांध लेती है और इस बेबी केरियर में बच्चे को लिए अपने काम निबटाती हैं। उसमें बच्चा आराम से बैठा  रहता है और हिलते- डुलते सो भी जाता है। सबसे बड़ी बात बच्चे को इसका आभास रहता है कि वह अपनी माँ के साथ है।
    छुट्टी के दिन तो पति-पत्नी  दोनों ही अपनी छोटी से बगीची को सजने सँवारने में लग जाते हैं। बगीचा देखने लायक होता है। जगह जगह रोशनी जगमगाती मिलेगी। लाल,पीले ,नीले फूलों के बीच मिट्टी- काँच के बने मेंढक- मछली -बतख दिखाई देंगे जो सचमुच के प्रतीत होते हैं।  प्राकृतिक दृश्य उपस्थित करने के लिए उनके सामने पानी से भरा बड़ा सा तसला रख दिया जाता है या छोटा सा कुंड बना देंगे। इनकी खूबसूरती देख मेरी निगाहें तो रह रह कर उनमें ही अटक जाती।
    अपने बाग के फूलों को कभी मैंने उन्हें तोड़ते नहीं देखा। घर में फूल सजाने के लिए वे बाजार से खरीदकर लाते हैं। अपने घर-आँगन की फुलवारी को नष्ट करने की तो कल्पना भी नहीं कर सकते।  यदि हम भी इनकी तरह फूल-पौधों को  प्यार करने लगें तो पेड़ कटवाकर धरती माँ को कष्ट देने की बात किसी के दिमाग में ही न आए।
*
    यहाँ रहते रहते मेरा बेटा भी अच्छा खासा माली बन गया है। बच्चे का  घर में आगमन होने से कम कुछ बढ़ गया है इस कारण चाँद को बगीचा साफ करने में देरी हो गई। बगीचा साफ करना भी बहुत जरूरी था। शीत ऋतु में यह बगीचा बर्फ से ढका श्वेत श्वेत नजर आने लगा । जगह जगह हिम के टीले बन गए। सूर्यताप से जैसे ही बर्फ ने पिघलना शुरू किया उसके नीचे दबी घास और पत्ते भीग  गए। जल्दी ही सड़कर बदबू फैलाने लगे। इससे पड़ोसियों को एतराज भी हो सकता था।
    अवसर पाते ही चाँद ने बागवानी करने के लिए कपड़े बदले। टोपी पहनकर दस्ताने चढ़ाए और उतार पड़ा पेड़-पौधों के जंगल में। लंबी लंबी कंटीली झाड़ियाँ,सूखे-गीले पत्तों का ढेर ,ढेर सी उगी जंगली घास को देख मैं तो सकते में आ गई-चाँद सा बेटा मेरा चाँद अकेले कैसे करेगा?तभी उसे गैराज से इलेक्ट्रिक हेगर ,लॉनमोवर निकालते देखा। शीतल  उसकी सहायता कर नहीं सकती थी। मैं और मेरे पति खड़े खड़े देखने लगे। पर ज्यादा देर उसको अकेले इन मशीनों से जूझते देख न सके। हम दोनों ने आँखों आँखों मे इशारा किया। अंदर जाकर पुराने कपड़े पहने,टोपी और दस्ताने पहनकर बाहर निकल आए। दरवाजे पर ही 2-3 जोड़ी चप्पलें पड़ी थी जिन्हें पहनकर घर के अंदर नहीं घुस सकते थे।   उनको पहना और बागबानी करने निकल पड़े। हमें खुरपी,फावड़े चलाने का ज्यादा अनुभव न था । तब भी बेटे की मदद करने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ थे।
    हम पूरे कनेडियन माली लग  रहे थे। चाँद हमें देखकर बड़ा खुश हुआ। इसलिए नहीं कि उसे मददगार मिल गए बल्कि इसलिए कि इस उम्र में भी उसके माँ-बाप में जवानी का जोश है । वह  बिजली के यंत्र की सहायता से घास-पत्तों  को रौंदता,कट कट काटता चल पड़ा। मैं कचरे को दूसरे  यंत्र की सहायता  से कोने में इखट्टा करने लगी।बाद में हमने मिलकर प्लास्टिक के बड़े बड़े बोरों में भर मुंह बंद कर दिया। रात में चाँद उन्हें उठाकर अपने  घर के सामने सड़क पर रख आया ताकि सुबह कचरे की गाड़ी आए तो बोरों को ले जाए।
    थोड़ा -बहुत काम धीरे- धीरे करके बगीचे  को इस लायक बना दिया कि उसमें बैठा जाए। यहाँ बड़ी सी मेज व दस कुरसियाँ पड़ी है। साथ ही इलेक्ट्रिक तंदूर भी एक कोने में रखा है। अब तो छोटी छोटी पार्टियां वहीं होने लगीं। सुबह –शाम की चाय भी वहीं पीते हैं।सुबह की ताजी हवा और गुनगुनी धूप के बीच उड़ती तितलियों को देखते देखते चाय की चुसकियाँ लेने का मजा कुछ और ही है।
क्रमश:




शनिवार, 24 जून 2017

2017 :लंदन डायरी -दूसरा पन्ना

लंदन डायरी
2017
21/6/2017
सूर्यदेव का रौद्र रूप
    मैं बैंगलोर से चली,बड़ी खुश। आह !लंदन जा रही हूँ। मिलने वालों ने भी मेरे भाग्य की सराहना की। यहाँ की जमीन पर पैर रखे तो तापमान 32 डिग्री। चेहरे पर हवाइयाँ उड़ चलीं। अफसोस कर बैठे बैंगलोर में शिमला जैसी टकराती  ठंडी हवाओं को छोड़ कहाँ आन फंसे! चार दिन बीत गए पर अभी तक मौसम का पारा उतरा नहीं है।
   



यहाँ घर वातानुकूल तो हैं ही नहीं। छत से पंखे भी लटके नजर न
हीं आते। हाँ,इक्के-दुक्के घरों में टेबिल फैन चलते जरूर दिखाई दे जाते हैं। वह भी हर कमरे में नहीं बल्कि घर में इकलौता। दिन में धूप में निकलना कठिन –कार ओवेन की तरह जलती है। जब तक वह ठंडी होती है तब तक गंतव्य स्थान पर पहुँच ही जाते हैं। उस दिन की ही बात ले लो जब हम  शेरेटन होटल  गए –इतना बड़ा होटल- - - पर भरी दोपहरी में कहीं  कोई  पंखा नहीं चल रहा था। एयर कंडीशन की तो बात करना ही बेकार है। न जाने यहाँ के लोग कैसे रहते हैं!
    हमारे बाहर के काम गर्मी से रुक जाते हैं। सोच में पड़ जाते हैं –घर से बाहर निकलने पर चिलचिलाती धूप में कहीं खोपड़ी गरम न हो जाए ,पानी ले जाना पड़ेगा आदि-आदि। पर यहाँ  के निवासियों को कोई फर्क नहीं पड़ता। कहते हैं –हम तो धूप के लिए तरसते हैं। यही तो समय है जब ठंड की  ठिठुरन से छुटकारा मिलता है और शरीर पर चढ़ी कपड़ों की परतें गायब होती हैं।

    कुछ भी हो हमारा दिमाग तो इतनी गर्मी में काम करता नहीं। लोग कहते हैं 25 साल में इतनी गर्मी पड़ रही है। अगले हफ्ते वर्षा रानी जरूर आएगी। इसी भरोसे समय कट रहा है --- शायद रिमझिम- रिमझिम बारिश शुरू हो जाय और सूर्य महाराज उसके सामने हथियार डाल दें।
क्रमश:

शुक्रवार, 23 जून 2017

2017 लंदन डायरी -पहला पन्ना

लंदन डायरी 
2017
पहला पन्ना-18 जून 2017
नए मित्र का जन्मदिवस  
    कौन कहता है विदेश में बसे भारतीय  अपनी जड़ों से कट जाते हैं! भावना शून्य हो रिश्तों की अहमियत भूल जाते हैं! माँ-बाप अपने को  उपेक्षित महसूस करते हैं! मेरा तो अनुभव कुछ दूसरा ही रहा।
    मैं 18 जून को भारत से लंदन दोपहर दो बजे के करीब घर पहुंची। रास्ते में ही बेटा बोला- -“माँ घर पहुँचकर थोड़ा आराम कर लेना । 4बजे के करीब शेरेटन होटल (Sheraton hotel) में जन्मदिन पार्टी में जाना है।
    मैं जाकर क्या करूंगी?”थके स्वर में बोली।
   “आपका जाना तो बहुत जरूरी है। आज प्रेमा आंटी का जन्मदिन हैं। वे मेरे दोस्त की सासु माँ हैं । आज 75वर्ष पूरे कर लेंगी। उनकी बेटी ने जन्मदिवस मनाने की खूब ज़ोर-शोर से तैयारी की है और आपको खास तौर से बुलाया है।”
   “तब तो जरूर जाऊँगी। चिंता न कर --झटपट तैयार हो जाऊँगी ।’’ मैं उत्साह से भर उठी और सारी थकान भूल गई।
    पाँच बजे के करीब अपनी बहू के साथ शेरटन होटल में जा पहुंची। केवल महिलाओं ही आमंत्रित थीं। प्रेमा जी सोफे पर बैठी थी और बर्थडे केक उनसे कुछ दूरी पर मेज पर रखी पार्टी की शोभा बढ़ा रही थी। 


उस पर उनका ध्यान भी न गया। असल में उनको पता ही नहीं था कि उनके जन्मदिन की पार्टी है। वे तो सोचकर बैठी थीं कि अन्य मेहमानों की तरह वे भी किसी अन्य की जन्मदिवस पार्टी में शामिल होने आई हैं । 
    मैं जैसे ही वहाँ पहुंची मैंने हँसते हुए पूछा –भई,आज की बर्थडे गर्ल कहाँ है? उनकी बेटी अनुपमा ने प्रसन्न मुद्रा में मेरा परिचय  कराया। मैंने उन्हें जन्मदिन की मुबारकबाद दी और कहा- “आज का दिन तो आपका है। आप ही पूरी पार्टी की चमक हैं।

वे चौंकी-“मेरा जन्मदिन!”
   बस एक साथ जोर का शोर हवा में घुल गया- हैपी बर्थ डे टू यू! 

   आश्चर्य मिश्रित खुशी से प्रेमाजी की आँखें भर आईं । एक पल को उनका गला भर्रा गया और अपनी बेटी व पोती को गले लगा लिया।इतना व्यवस्थित आयोजन और इस सरप्राइज़ पार्टी की उन्हें भनक तक नहीं!फिर तो ज़ोर शोर से बधाइयों का तांता लग गया, तालियों की गड़गड़ाहट कानों में रस घोलने लगीं। केक कटी गई और प्रेम से उसका आदान-प्रदान होने लगा। 



इस आयोजन की तैयारी कई महीने से चल रही थी। एक समय था प्रेमाजी को फिल्मी गाने सुनने का बड़ा शौक था। हमेशा गुनगुनाती रहती थीं। उनकी मनपसंद गानों का किसी तरह पता लगाया गया। उनकी बेटी ने वे गाने अपनी सहेलियों को तैयार करने को दिये। और फिर उनकी रिकॉर्डिंग की गई।डिनर करते समय वे गाने सबने सुने। संगीत लहरी ने वातावरण को और भी खुशनुमा बना दिया। प्रेमाजी सोचती ही रह गई कि इन गानों का पता कैसे लगा! हम भी पीछे कैसे रहते! जो मन में आया उसे कविता के रंगों में ढाल अपने नए मित्र के लिए सुना दिया। धीरे धीरे वे अतीत की गलियों में खो गई। खामोश मगर उनके  चेहरे पर अद्भुत चमक की चादर तनती चली गई।  
    वात्सल्यमयी  माँ की आँखों से अगाध स्नेह छलका पड़ता था। प्रतीत होता था मानों उसका वे भार सँभाल नहीं पा रही हैं।नेह सहित गले लगते हुए हम सब प्यारी सी याद लिए एक दूसरे से विदा हुए।  

क्रमश:

बुधवार, 24 मई 2017

कनाडा डायरी की 18 वीं कड़ी


डायरी के पन्ने 

सुधा भार्गव  

14.5.2003
विकास की सीढ़ियाँ 

   अब तो घर मेँ आए सभी लोग नव शिशु अवनि के बारे में ही बातें करते हैं या उसी के बारे में सोचते हैं। मेरा भी मन करता है उससे बातें करूं। जानती हूँ वह बोल नहीं सकेगी पर एक तरफा ही सही। उसी से असीम संतोष मिलेगा।
   सुबह शाम यहाँ तापमान 10डिग्री तक आ जाता है। सेंट्रल हीटिंग सिस्टम के कारण ठंड थम जाती है परंतु विश्राम करते समय इच्छा करती है कुछ ओढ़कर ज्यादा गर्माहट का अनुभव किया जाए । इसीलिए अवनि को सोता देखकर मैंने उसकी बुआ का भेजा फलालेन का कंबल ओढा दिया। कुछ देर तो वह  सोती रहीं पर जल्दी ही कुलबुलाने लगी। हमने सोचा –शायद गर्मी लग रही है! इसी उधेड़बुन  मेँ कंबल हटा दिया। मगर यह क्या !प्यारी सी बच्ची अपने हाथ पैर चला आँखें घुमाने लगीं और कंबल दूर छिटक गया। अच्छा जी तो यह बात है –हमारी नन्ही विकास की सीढ़ियाँ चढ़ रही है।
   मैं उत्तेजित हो चिल्ला उठी –“प्यारी बच्ची,देखो--- देखो,तुम्हारा पापा तुम्हारे आने से कितना प्रसन्न  है। हर दिन तुम्हारे लिए कुछ न कुछ नया करना चाहता है।”
   तभी बेटा आ गया और बोला-“माँ ऐसा करते हैं इसके पलंग में म्यूजिकल मोबाइल भालू लगा देते हैं। आप अवनि को लेकर ऊपर की मंजिल में 10 मिनट बाद लेकर आ जाना।”
   उत्साह का सागर हिलोरे मार रहा था उसे दिल में समेटे छोटी बच्ची के माँ- बाप एक ही सांस में कई सीढ़ियाँ चढ़ गए। उन्हें देख मुझे अपने दिन याद आ गए जब बड़ा बेटा हुआ था और हम पहली बार माँ-बाप बने थे। उस पर जमाने भर की खुशियाँ लुटा देना चाहते थे।कितना प्यारा ज़िंदगी का यह पहलू है।
   जैसे ही मोबाइल भालू की मनमोहक घंटियाँ सुनाई पड़ीं मैं अवनि को लेकर ऊपर पहुँच गई। मोबाइल खिलौने में में पाँच भालू रंगबिरंगी पोशाक पहने मटक रहे थे। बेबीकॉट पर लेटाते ही उसकी नजर कभी लाल भालू पर जाती  तो कभी पीछे वाले भालू पर।  इस कोशिश में गर्दन-आँख घुमाते कहीं थक न गई हो-यह सोच कर खिलौना बंद कर दिया गया।
   बहू-बेटे कुछ काम में लग गए और मैंने अवनि से बातें करनी इस तरह शुरू कर दीं जैसे वह समझ ही जाएगी। 
   “बच्ची,मेरा मन तो अजीब से डर में डूबा हुआ है । जिस खिलौने को तुम्हारा  पापा इतने शौक से लाया है उसके स्वरों की खनक से डरकर तुम कहीं रो न पड़ो।क्या करूँ,मेरा अनुभव ही कुछ इस प्रकार का हुआ है।
   पिछले हफ्ते राहुल के पहले जन्मदिन पर तुमको लेकर गए थे। उसका पापा और तुम्हारा पापा दोनों गहरे दोस्त हैं। चहल-पहल के बीच प्रेशर कुकर की सीटी सुनकर वह भय से चीखकर रोने लगा। उन्मुक्त हंसी से गूँजता वातावरण बोझिल हो उठा। लेकिन तुम तो बहुत बहादुर निकलीं---न चौंकी और न रोईं । मुझे तुम पर बहुत  गर्व हुआ।  
    दूसरी बात भी मैं नहीं पचा पा रही हूँ।तुम्हारे जन्म से पहले एक दिन हम पारस के अन्नप्राशन उत्सव में गए। उसके पापा भी मित्र मंडली में हैं और बंगाली है। बंगाली बाबू से मिलकर हमें बहुत खुशी होती है। हो भी क्यों न !हम करीब 40 वर्ष कलकत्ता रहे हैं । बंगाली भाषा,बंगाली खानपान ,रीति-रवाज़ सभी तो सुहाते है। हमने तो वहाँ जाते ही बंगाली में गिटपिट शुरू कर दी पर मैंने अनुभव किया कि पारस नए -नए चेहरे देख आतंकित हो उठता है और बार -बार माँ के आँचल में छिपकर अपने को सुरक्षित अनुभव करता है। न अपने पिता के पास जाता और न दादी –बाबा के पास जो बड़े अरमानों से कलकत्ते से अपने पोते की खातिर दौड़े दौड़े आए थे। माँ की हालत बड़ी दयनीय थी। थकी- थकी सी पारस को गोद में लिए मेहमानों का स्वागत कर रही थी। वह बेचारी रसोई सँभाले या बच्चा। वह तो अच्छा था मेहमान ,मेहमान नहीं मेजबान लग रहे थे।
   महिलाएं मिलजुलकर खाने का काम सँभाल रही थीं ।ज़्यादातर आगंतुक अपने झूठे बर्तन धोकर रख देते। सब की यही कोशिश  थी कि उनके सहयोग से पारस के मम्मी-पापा की भागदौड़ कम हो जाए और वे भी अन्नप्राशन उत्सव का आनंद उठा सकें।
   पारस का उसके मम्मी-पापा बहुत ध्यान रखते थे। उसे ज्यादा न कहीं लेजाते थे न सबके सामने उसे उसके कमरे से निकालते थे। सोचते उसे किसी की छूत न लग जाए,कोई उस पर बुरी नजर न डाले,उसके दैनिक कामों में खलल न पड़े। पर इससे वह घर-घुस्सू बन गया। यहाँ तक कि अपने कमरे को छोडकर वह कहीं सो भी न पाता था। दूसरों को देखते ही सहम जाता।उसका नतीजा माँ-बाप भी भोग रहे थे।  
   उस समय ही सोच लिया था कि जब तुम हमारे पास आ जाओगी,अकेले कमरे में तुम्हें ज्यादा नहीं रहने दिया जाएगा वरना एकांतवास की आदत पड़ जाएगी और घर में आए लोगों को देखकर बस हुआं ---हु -आं करके घर को सिर पर उठा लोगी।
   सच में हमने ऐसा ही किया। सोते समय तुम अपने कमरे में रहती हो  पर जागने पर हम सबके बीच।  कभी पालने में लेटी रहती हो तो कभी पापा की बाहों में झूलती हो। मुझ दादी माँ की गोदी में तो आते ही सो जाती हो।  
    चार लोगों के बीच में रहने के कारण ही किसी अजनबी को देख तुम कोहराम नहीं मचाती हो। जब वह प्यार से तुम्हें गोदी मेँ लेता है और बातें करता है तो  तुम्हारी टुकुर- टुकुर आँखेँ चलने लगती है मानो तुम उसकी  बातें समझ रही हो। गोदी में लेने वाला भी तुम्हारे हाव-भाव देख खिल-खिल उठता है और शांत माहौल में शांति से बात कर पाता है।”

क्रमश : 

प्रकाशित - साहित्य कुंज 19.04.2017
http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/S/SudhaBhargava/18_vikaas_kee_sidiyan.htm

सोमवार, 17 अप्रैल 2017

कनाडा डायरी की कड़ी-17


डायरी के पन्ने 

सुधा भार्गव 

14.5.2003

मातृत्व की पुकार 

अवनि,मेरी लाड़ली  जैसे -जैसे तुम बड़ी होती जा रही हो मेरा मन करता है तुमसे बातें करती ही रहूँ—करती ही रहूँ। पर तुम तो समझोगी नहीं!मुश्किल से 15 दिन की तो हो। अपने स्नेहसिक्त  भावों को मैं कागज के कोरे पन्नों पर उतार कर रख देती हूँ। बड़े होने पर तुम उन्हें पढ़ लेना।  इस बहाने अपनी दादी माँ को याद करोगी।  
-ओह! हाथ –पैर मारकर खूब व्यायाम कर रही हो। थकान होने पर निढाल होकर ज्यों ही तुम्हारी पलकें भारी होती है,तुम्हारी माँ को बहुत दया आती है और कलेजे से तुम्हें लगाकर अनिवर्चनीय सुख का अनुभव करती है। तुम्हारी अच्छी से अच्छी परवरिश करने की तमन्ना उसके दिल में है।

बहू-बेटे के चेहरे पर खिले गुलाबों को देख कभी -कभी तो मैं अपने मातृत्व को ही टटोलने लगती हूँ। जिन हाथों से मैंने अपने बच्चों की परवरिश की,अर्द्धरात्रि को यदि भूले से भी उनका ध्यान कर लूँ तो वे मेरी बाहों के झूले में झूलते नजर आने लगते हैं। फिर तो मजाल क्या कि पलकें बंद हो जाएँ।
आज तो चलचित्र की भांति नेत्रपटल पर वर्षों पहले के दृश्य आ-जा रहे हैं। बेटा- बेटी घुटनों चलने लगे है और मैं हाथ पकड़कर चलना सिखा रही हूँ। छोटा बेटा तोतली बोली में बोलने की कोशिश में है। मैं बार -बार उसके शब्दों को दोहराकर उच्चारण ठीक करने में लगी हूँ। जैसे ही वह एक शब्द बोलता मैं मुग्ध हो उसके गाल पर अपने प्यार की छाप लगा देती।

अतीत खँगालने में सारा दिन गुजर गया।रात में मेरा जीवन साथी बगल में लेटा खर्राटे भरे और में जागती रहूँ मुझसे सहन न हुआ। अंधेरे में निशाना लगा बैठी –सो गए क्या?
-मन में कुछ घूम रहा है क्या?सोते समय विचारों के दलदल में फँसकर हमेशा विचलित हो जाती हो। दिन में तुम्हें कोई फर्क नहीं पड़ता?
-दिन में तो अंग क्रियाशील रहते हैं और  सुप्त मस्तिष्क के पीछे चलते द्वंद को मेरा जाग्रत मस्तिष्क नहीं जान पाता है।
-लेकिन मैं तो जान जाता हूँ।
-क्या जान जाते हो?
-तुम मुझसे अपने मन की बात कहकर भारहीन हो रुई की तरह हवा में उड़ जाना चाहती हो।
-कहाँ?
-कल्पना की बसाई अपनी नगरी में!
-क्या मज़ाक ले बैठे!जब आप जागे ही हो तो मेरी बात भी सुन लो। आप ही तो एक हो जिसे मैं भोगे अनभोगे पलों का हिस्सेदार बना सकती हूँ। 40 वर्षों का आपका साथ सच्चाई की तह में कुछ जल्दी ही ले जाता है।
-मेरे तारीफ ही करती रहोगी या मन की गांठ भी खोलोगी।
-आप देख रहे हैं ,बहू-बेटे हमारी पोती का कितना ध्यान रखते हैं। एक से एक सुविधा का सामान जुटा रहे हैं।
-हूँ! मैं देख तो रहा हूँ।
-क्यों जी ---हमने भी तो अपने बच्चे बड़े प्यार से और शान से पाले हैं। माना आजकल की तरह हमारे पास सुविधाएं न थीं पर जितना हो सकता था उसमें कोई कसर न छोड़ी थी।
- कह तो ठीक रही हो। 
- आपको याद है----फेरेक्स खिलाने के और दूध बनाने के बर्तन चांदी के थे जिन्हें मैं दूध की बोतल के साथ कीटाणुरहित करने के लिए उबाला करती थी। अम्मा ने तो कह भी दिया था –इतनी सफाई !बड़ी बहमी है।
-हा—हा—हा--, यह तो मैं भी सोचता था। पर चुप रहता था क्योंकि इसमें भी बच्चों की भलाई ही थी।
-आप भी तो एक अच्छे पिता हो। छोटू लेक्टोजन दूध ही पीता था। एकबार उसके डिब्बे कलकत्ते में नहीं मिले ,मैं तो चिंता के मारे अधमरी हो गई पर आपने तो  दिल्ली से एक साथ तीन डिब्बे मँगवा दिए।
-एक डिब्बे की कीमत केवल 60 रुपये ही थी पर उस समय 60 ही हमारे लिए बहुत थे। बच्चों का मोह सब करा लेता है। भार्गव जी की यादों की परतें उघड़ने लगीं।
-हमने बच्चों के लिए नौकरानी भी रखी थी जी पर बड़कू के लिए नहीं थी।
-पहले बच्चे के लिए तो हमारे पास काफी समय बच जाता था। उस समय तुम नौकरी भी नहीं करती थीं। घर के काम के लिए तो नायडू आती ही थी।  
-मुझे नौकरी करने का कोई शौक न था। हाँ बच्चे बहुत प्यारे लगते हैं। छुटपन में छोटे भाई बहनों के साथ खूब खेली –दौड़ लगाई। उनके साथ मेरा बचपन खूब इठलाता था।अपने बच्चे हुए तो उनमें रम गई पर उनके बड़े होने पर स्कूल का रास्ता देखना पड़ा। वहाँ भोले -भाले नाजुक से फूलों के बीच अपना सारा तनाव -चिंता भूल जाती थी।
-हम तो छह भाई बहन हैं। मिल जाएँ तो बातों का उत्सव शुरू !फिर तो न किसी पड़ोसी की जरूरत और न दोस्त की। अपने समय की हवा के अनुसार तो 2 बच्चे ही बहुत समझे जाते थे।  हमारे तीसरे बच्चे के समय तो मालती ने सुना ही दिया था –तीसरा बच्चा!oh too much .आई अंग्रेजी झाड़ने। तुम्हारे बॉस की बीबी थी इसलिए कुछ न बोली।बस,अंदर ही अंदर सुलग उठी।
-तुम्हें बच्चों का इतना ही शौक है तो दो-तीन बच्चे गोद ले लेते हैं। विनोदप्रिय पतिदेव दिल खोलकर हंस पड़े।
-अब तो बहुत देर हो गई –कहने के साथ ही एक लंबी सी मुस्कान मेरे अधरों पर छा गई।
 
फलभर चुप्पी के बाद मैं बोली-आप शायद जानते नहीं पिता जी मेरे बारे में क्या सोचते थे?
-तुमने कभी बताया ही नहीं।
-वे सोचते थे कि मैं धनी परिवार में पली शायद बच्चों के साथ मेहनत न कर सकूँ । इसी कारण एक दिन उन्होंने कहा था-
-बेटा,बच्चों को अपने कलेजे से लगाए रखना।ये ही तुम्हारा भविष्य हैं।
उनका शायद यही मतलब था कि बच्चों को अच्छे संस्कार व विदद्या दूँ और अपने खर्चे कम करके पैसे को सँभाल कर रखूँ। एक तरह से यह मेरे लिए चेतावनी भी थी और नसीहत भी। मैंने उनकी बात को सहेजकर रख लिया।
-हाँ,यह तो है ,तुमने सिद्ध कर दिया कि शिक्षित माँ कुशल व आदर्श गुरू भी हो सकती है। बेटी के होने पर तुमने एक लड़की उसकी देखभाल के लिए रखी तो थी  जो शाम को घुमाने ले जाया करती थी। पर तुम्हारे पैर में तो चक्र है। कुछ न कुछ करती ही रहती थीं। बेटी जब चार दिन की ही थी तभी से बेटे को गृहकार्य कराना  शुरू कर दिया। वह सिरहाने खड़ा हो जाता और तुम आँखें मींचे उसे उत्तर बताती रहती।जिद्दी भी तो इतना था कि माँ ही कराएगी। शुरू से ही बच्चों का झुकाव तुम्हारी तरफ है।
-माँ जो हूँ।
-और बाप!
-आप तो मेरे मार्गदर्शक व सहयोगी हो।
-फिर तारीफ---,कुछ चाहिए क्या!
-मुझे क्या चाहिए!मेरे पास सब कुछ है।हाँ, मैंने मेहनत तो बहुत की है पर आपकी बदौलत यह रंग लाई।

गुटरगूं करते हुए हम मियां -बीबी न जाने कब तक अपने बच्चों की उस दुनिया में खोए रहे जो चटकीले रंगों से भरपूर थी।जितना उसकी गहराई में उतरते उतना ही पुलकित हो उठते। 
क्रमश:
प्रकाशित-साहित्यकुंज अंतर्जाल पत्रिका -03.22.2017 

बुधवार, 29 मार्च 2017

कनाडा डायरी की कड़ी-16


डायरी के पन्ने 

           परम्पराएँ 

          सुधा भार्गव 

12.5॰2003

परम्पराएँ

मेरी पोती मुश्किल से एक हफ्ते की हुई होगी कि एक सुबह बहू शीतल को रसोई में चाय बनाते देखा। बड़े प्यार से मेरे हाथों में चाय का कप थमाते हुए बोली –मम्मी जी आप कई दिनों से बहुत काम कर रही हैं आज मैं खाना बनाऊँगी ,आप आराम कीजिए।

मैं हँसकर उसकी बात झेल गई मगर उसके कार्य की प्रशंसा नहीं कर सकी।मैं अपने समय की छुआछूत तो नहीं मानती। मेरी  सास ने सवा महीने तक चौके में घुसने नहीं दिया था और न मेरे पास सबको आने देती थीं।पर इस प्रथा के पीछे छिपी भलाई की भावना को नकार नहीं सकती। इस बहाने मुझे आराम मिल गया और शिशु को माँ की छाया। शारीरिक –मानसिक दृष्टि से हितकर ही रहा।  
दो मिनट चुप्पी साधने के बाद मैं सासु माँ के लहजे में बोली-शीतल, अभी बच्चा बहुत छोटा है,तुम भी कमजोर हो।एक बार शक्ति आ जाए,खूब काम करना। अभी अपने पर ज़ोर न डालो। फिर हम तो आए ही तुम्हारी मदद के लिए हैं।

दूसरे हफ्ते से नवशिशु को देखने और उसकी माँ को बधाई देने वालों का तांता लग गया। बेटा तो बच्चे के दस दिन हो जाने के बाद आफिस जाने लगा। अब सब्जी- आटा -दाल आदि लाने का दायित्व शीतल का ही था। कार तो मुझे या भार्गव जी को  चलानी आती नहीं थी सो बच्चे को घर में छोड़कर शीतल को बाजार जाना ही पड़ा। मुझे यह सब देखकर लगा –उसके साथ ज्याद्ती हो रही है।मैं उसकी कोई खास मदद नहीं कर पाती हूँ। एक बात और है ,कोई घर कितना ही सँभाल ले माँ का काम तो माँ को ही करना पड़ता है। उसकी तो नींद ही पूरी नहीं होती थी।

 अवनि से मिलने खूब मित्रमंडली आती । कोई प्यार से बच्चे को उठाता  ,कोई उसकी माँ से गप्प लड़ाता। परंतु कभी -कभी यह प्यार बड़ा महंगा पड़ जाता है। एक बार तो मुझे कहना भी पड़ा-पहले हाथ धो लो तब बच्चे को उठाना। आज भी कुछ दोस्त आने वाले हैं। चाँद और शीतल उनके खानपान का प्रबंध करने में दो दिन से जुटे हैं।डिनर के समय गरम –गरम पूरियाँ तो मैं तल दूँगी।कुछ तो हाथ बंटाऊँ उनका। कम से कम 3-4 घंटे तो  महफिल जमेगी ही।
एक बात किसी के ध्यान में नहीं आती कि शीतल को बच्चे का भी काम है। वह उसे देखेगी या मेहमान बाजी करेगी।फिर नई माँ की थकान का तो ध्यान रखना ही चाहिए। क्या बताऊँ सब अल्हड़-मस्त हैं।मैं तो देख- देख कुढ़ती ही रहती हूँ।

दोस्तों के जाते ही शीतल थककर बैठ गई।
-शीतल ,क्या बात है।
–कमर में दर्द हो रहा है।
-वह तो होगा ही। कमजोर शरीर है तुम्हारा। बच्चे के बहाने ही उठ जाती सबके बीच से। मेरे स्वर में झुंझलाहट थी।
-अच्छा नहीं लगता उठना पर अवनि भूखी सो गई।
-ऐसी औपचारिकता किस काम की। अब तो जाओ बच्चे के पास और तुम भी आराम करो। घर के काम तो चलते ही रहेंगे –हो जाएंगे सब।

कोई माने या न माने मुझे तो अपने समाज की प्राचीन परम्पराओं से लगाव ही है। उनके महत्व को झुठलाना संभव नहीं। बालजन्म के बाद जच्चा-बच्चा को अलग ही रखा जाता था। मतलब ,हर कोई न उनके कमरे में जा सकता था न उनके आराम करने , नहाने –धोने और खाने पीने के उपक्रम में बाधा पड़ती थी। इसके अलावा नवजात शिशु की माँ भी दुर्बल होती है। ऐसे में बड़ी सरलता से दूसरों से बीमारी की छूत लग सकती है। एक महिला माँ-बच्चे का काम सँभालती थी। वही ज़्यादातर उसके पास रहती थी। घर का काम परिवार के अन्य सदस्य देखते थे । सवा-डेढ़ माह के बाद माँ में इतनी शक्ति आने लगती थी कि वह बच्चा और घर देख सके।

आजकल पहली वाली बातें नहीं चल पातीं । एक तो एकल परिवार हो गए हैं दूसरे,बच्चे अस्पताल में होते हैं जो स्वच्छ्ता और स्वास्थ्य की दृष्टि से अति उत्तम है। परन्तु  घर लौटने पर माँ -बच्चे की देखभाल के लिए दूसरों की जरूरत तो अब भी पड़ती है। इसी कारण प्रवासी बहू-बेटियों के लिए माँ-सासें अपना देश अपना आराम छोड़ भागी -भागी उनके  पास चली आती हैं। इसके अतिरिक्त एक नारी की पीड़ा एक नारी ही तो समझ सकती है।

क्रमश : 

साहित्य कुंज में प्रकाशित 

मार्च 2017 


 http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/S/SudhaBhargava/16_parampraayen.htm

शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017

कनाडा डायरी कड़ी -15


डायरी के पन्ने 
                     नाट्य उत्सव “अरंगेत्रम”
                 सुधा भार्गव 
5॰ 5॰ 2003

“अरंगेत्रम”

शाब्दिक अर्थ है रंगमंच पर प्रथम प्रदर्शन । “अरंगेत्रम”के अवसर पर शिष्या अपनी कला की दक्षता को सार्वजनिक रूप से प्रमाणित करती है और इसके बाद गुरू उसे स्वतंत्र कलाकार की तरह अपनी कला के प्रदर्शन की अनुमति देता है।


   डॉक्टर भार्गव की पुत्री नेहा का अरंगेत्रम(Arangetram)नाट्य उत्सव 4 मई सेंटर पॉइंट थियेटर,ओटावा में होना था। उसका निमंत्रण कार्ड पाकर बहुत ही हर्ष हुआ। विदेश में ऐसे भारतीय कला प्रेमी!आश्चर्य की सीमा न थी। शाम को जब हम वहाँ पहुंचे,हॉल खचाखच भरा हुआ था। केवल भारतीय ही नहीं उनके अमेरिकन ,कनेडियन मित्रगण भी थे। करीब चार घंटे का कार्यक्रम था। नेहा ने भरत नाट्यम नृत्य शैलियों पर आधारित लुभावने नृत्य प्रस्तुत कर दर्शकों का मन मोह लिया। हॉल करतल  ध्वनि से बार बार गूंज उठता।
  इस रस्म में मंच पर सार्वजनिक रूप से नृत्य के प्रथम प्रदर्शन के बाद छात्र यह सिद्ध कर देता है कि वह इस कला में पूर्ण पारंगत है। दक्ष कलाकार की हैसियत से वह स्वतंत्र रूप से विभिन्न कार्यक्रमों का प्रस्तुतीकरण कर सकता है।
  नेहा की गुरू डॉ बासंथी श्रीनिवासन(Dr Vasanthi Srinivasan) हैं जो ओटावा में नाट्यांजली स्कूल की संस्थापक है। वे आजकल स्कूल की डायरेक्टर हैं। उन्होंने ओटावा यूनिवर्सिटी से PhDकी और 1989 से ही फेडेरल गवर्नमेंट मेँ काम कर रही हैं। उन्होंने अनेक एक्ज्यूटिव पदों पर काम किया। आजकल ओंटोरियो क्षेत्र में कनाडा स्वास्थ्य विभाग में रीज़नल एक्जूयटिव डाइरेक्टर हैं। वासनथी जी ने भारत नाट्यम  की तंजौर शैली को आगे बढ़ाया ।     इनके गुरू श्री॰टी॰के मरुथप्पा थे। कलाविद डॉ वासनथी को नृत्यकलानिधि की उपाधि से भी सम्मानित किया गया।
  नेहा उनकी 50वीं छात्रा है जिसने अरंगेत्रम किया। हायर सेकेन्डरी की इस छात्रा के लिए सभी की शुभकामनाएँ थीं कि अध्ययन के साथ साथ नृत्य के क्षेत्र में भी नाम कमाए,उसके परिवार और भारत का नाम सूर्य किरणों की भांति झिलमिलाए।
  इस उत्सव की सफलता का श्रेय नेहा की दस वर्ष की नाट्य साधना को जाता हैं। राजस्थान के लोकनृत्यों में उसकी सदैव से रुचि रही है। उसने न जाने कितनी बार मंच पर अपना कला प्रदर्शन किया है। कई बार स्वेच्छापूर्वक नृत्य शिक्षिका रही है। खेलों  में भी वह किसी से कम नहीं । हॉकी मेँ उसकी विशेष दिलचस्पी है। शेक्सपीयर  और मीरा उसके प्रिय कवि है। इस प्रकार हिन्दी – अंग्रेजी दोनों साहित्य में उसने योग्यता पा ली है। उसका कविता लेखन इस बात का प्रमाण है।
  
डॉ भार्गव काफी समय से यहाँ हैं।  मेरे बेटे –बहू को अपने बच्चों के समान समझते हैं।किसी भी पारिवारिक –धार्मिक पर्व पर वे उन्हें बुलाना नहीं भूलते। चाँद भी उनके नेह निमंत्रण की अवहेलना नहीं कर पाता। सच,प्रेम से इंसान खिंचता  चला जाता है।
   विशेष -यह संस्मरण काफी पहले लिखा गया है। प्रिय नेहा और उनकी गुरू इस समय उन्नति के चरम शिखर पर होंगे। उनको मेरी ओर से मुबारकबाद । 

साहित्य कुंज में प्रकाशित  
02.01.2017 
 :                                                         क्रमश :