मंगलवार, 7 मई 2019

कनाडा डायरी कड़ी-॥ 28॥


कनाडा डायरी के पन्ने 

प्रकाशित 
अंतर्जाल पत्रिका  साहित्य कुंज 

विदेशी बहू
सुधा भार्गव 

26 6 2003                   
      भार्गव जी को हल्की सी डायबिटीज़ है। खूब घूमते फिरते हैं पर कभी कभी बदपरहेजी कर ही लेते हैं।
     एक दिन बहू शीतल बड़ी गंभीरता से बोली-“मम्मी जी आप पापा जी को हर दो घंटे बाद खाने को दिया करें। यदि एक समय ज्यादा या नुकसान देने वाली चीज खाने  लगें तो मना कर दें।“
     “बेटी,मैं एक बार कहती हूँ दुबारा नहीं। यदि उसका मोल नहीं समझा जाता तो मुझे बुरा लगता है।”
      “अरे मम्मी जी,अपनों का कोई बुरा माना जाता है। यदि कुछ अनहोनी हुई तो सबसे ज्यादा आपको ही सहन करना पड़ेगा। आपके बेटे अगर कोई गलत काम करेंगे तो मैं बार –बार टोकूंगी चाहे उनको कितना ही बुरा लगे।”
     मैं चुप आज्ञाकारी बच्चे की तरह उसकी बातों की गहराई में डुबकी लगा रही थी। कौन कहता है नई पीढ़ी बुजुर्गों का ध्यान नहीं रखती। शायद समझने में गलती हुई है बड़ों से।
     यह वही शीतल है जिसे मेरे बेटे ने खुद पसंद करके अपना जीवन साथी चुना था। उस समय मैं भारत में थी और वे दोनों एडमोनटन(admonton) में। मुझे वह रात याद आ रही है जब फोन की घंटी बजी और बेटे की खनखनाती आवाज सुनी-माँ, मैंने तुम्हारे लिए बहू ढूंढ ली है।”
          एक बार तो लगा आकाश से नीचे  आन गिरी हूँ। पर यह सोचकर कि बेटे के प्यार और उसकी आजीवन खुशी का सवाल है—जल्दी ही संभल गई। फिर  माँ-बाप की खुशी तो बच्चों की खुशी में ही है सो हम मियाँ-बीबी ने तुरंत सहमति दे दी। हमें पूरा-पूरा विश्वास था कि वह जो भी कदम उठाएगा सोच -समझकर उठाएगा।
       मेरी जिज्ञासा चुप बैठने वाली न थी। उसने सर उठा ही लिया  –“बेटा,पर वह है कैसी?”
      “अब आप खुद ही देख लेना। बहुत प्यारी है।” सैकड़ों दूर बैठे भी प्रेमी हृदय की तरंगे बहुत कुछ कह रही थी।
      “अच्छा एक बात और बता --मेरी होने वाली बहू सुबह उठकर एक प्याला चाय तो दे देगी?’ठिठोली करते  कहा। 
          “हाँ माँ,उससे भी ज्यादा ।”
      “तब ठीक है। हम उसको अपने घर में लाने की तैयारी करते हैं।”
      “माँ—माँ ,पापा तो खुश है !”
      “हाँ --हाँ सब ठीक है –तू चिंता न कर।” मैंने फोन रख दिया।
       मैंने अपनी हिम्मत पर हाँतो कह दिया लेकिन भार्गव जी खामोश से हो गए थे। मैं एक एक पल इनके मनोभावों को पढ़ने की कोशिश कर रही थी। शायद बेटे के निर्णय के अनुरूप अपने को ढालने की कोशिश में थे। पर इन्होंने उस समय व बाद में भी विरोध में एक शब्द नहीं कहा।इससे मुझे बल मिला।  
      सहमति देने के बाद  अच्छी - ख़ासी मेरी परीक्षा शुरू हो गई। कई रातें ठीक से कहाँ सो पाई ।संशय की दीवार रह-रहकर मुझे दबोच लेती- -विदेश में पली और पढ़ी-लिखी लड़कियों के मानसपटल पर पश्चिमी सभ्यता की छाप अवश्य लगती है। जो उनके व्यवहार , पहनावे और खान-पान में परिलक्षित होती है। कहीं---तेरी बहू के विचार तुझसे न मिले तो---। मैं विचलित हो बैठती। मुझे लव मेरिज से शिकायत न थी –शिकायत थी तो विदेशी छाप से।
      इसके अलावा अतीत का साया भी तो मेरा पीछा नहीं छोड़ रहा था। जिसके कारण  मेरा मानस मंथन शुरू हो जाता और  चचेरे  भाई आलोक की छवि  सामने उभर कर आने लगती । उसने वर्षों पहले  जर्मनी जाकर जर्मनी लड़की से लव मैरिज कर ली थी। कोर्टमैरिज करने के बाद ताऊ जी को इतला दी-  “मैं अपनी गर्ल फ्रेंड के साथ  उसे आप सबसे मिलाने और भारत घुमाने आ रहा हूँ । तीन दिन ही आपके पास दिल्ली में रहूँगा।” तब तपरिवार में लोग गर्ल फ्रेंड—बॉय फ्रेंड शब्द सुनने के या देखने के आदी न थे। हमने फ्रेंड तो जरूर  देखे थे पर गर्ल-बॉय फ्रेंड नहीं। सब लोग असमंजस में पड़ गए –यह कैसी गर्ल फ्रेंड !साथ रहेगी साथ घूमेगी।चाचा जी बहुत मज़ाकिया थे । ताऊ जी से बोले –“भाईसाहब यह तो प्यार का लफड़ा लगता है। आप तो शहनाई बजवाने की तैयारी कीजिये।”
       “अरे क्या कह रहा है!उसने जो कहा --- हम मान गए। यह भी कोई बात हुई?”
       “देख लो भाई जी कहीं विदेशी बहू बेटे को न ले उड़े और आप बेटे से भी जाएँ ।”
       चाचा के इस मज़ाक ने सोचने पर बाध्य  कर दिया और सच में उनकी शादी करने को घरवाले तैयार हो गए।जर्मन भाई भी शायद यही चाहता था । उसके आने के दूसरे दिन ही भारतीय परंपरा के अनुसार उनके फेरे हुए और रात में केवल खास खास रिशतेदारों के साथ शानदार डिनर हुआ। अगले दिन ही दोनों बाई—बाई कर गए।
      आलोक की पत्नी बहुत गोरी थी इसलिए प्यार से उसे श्वेता कहने लगे।2-3 साल तो वे सर्दियों में हर वर्ष भारत आते थे।  पर बाद में आना बंद हो गया। श्वेता को भारत में बड़ी परेशानी सी होती थी। पानी न पीकर हमेशा कॉफी लेती थी। ज़्यादातर सोफे पर बैठी रहती थी। उसे इस बात का भ्रम था कि भारत में बहुत गंदगी है। पानी,हवा,वातावरण सब प्रदूषित हैं। शाम को नहाती थी क्योंकि उसे सुबह नहाने की आदत नहीं थी। उसकी आदतें बड़ी हैरान करने वाली थी। इसके अलावा उसे केवल जर्मनी व इंगलिश आती थी। इससे सबसे ज्यादा आत्मीय वार्तालाप न हो सका।
      असल में दो विभिन्न संस्कृतियों के बीच सामंजस्यता का पुल नहीं निर्मित हो पाया।  कुछ वर्षों के बाद भाई को हृदय संबंधी रोग हो गया। वह ठीक तो गया पर इसी बीच उनका तलाक हो गया। संस्कारों का पौधा अलग -अलग मिट्टी में पनपा –शायद इसी कारण वैवाहिक जीवन में भी दरारें पड़ती गई। भाई मानसिक रूप से इसके लिए तैयार न था। इसलिए कई  वर्षों तक सँभल न सका।
      ऐसे कड़वे अनुभव के बीच मेरी  मानसिक दशा घड़ी के पेंडुलम की भांति होनी स्वाभाविक थी। बार बार खिचड़ी पकाती- बेटे की जो पसंद है उसके भाई भी तो कनाडा में बस गए हैं। लड़की ने कई वर्षों कनाडा रहकर शिक्षा प्राप्त की है। अब वहाँ का असर आना तो निश्चित है। आधी यूरोपियन होगी। अब सब सहना तो होगा ही।
      इस नकारात्मक सोच पर विजय पाने मैं  भार्गव जी ने काफी सहयोग दिया। मैं शीघ्र ही  दिमाग की खिड़कियाँ खोलने के लिए कटिबद्ध हो गई ताकि कार्बन सा अँधियारा  दूर हो और आक्सीजन मिले एक नई रोशनी में भीगी हुई।  चंद दिनों में ही मैं नई स्फूर्ति व उमंग के साथ अपनी बहू का स्वागत करने को तैयार हो गई ।
     इतनी दास्तान के बाद यह तो पता लग ही गया होगा कि मेरी बहू और कोई नहीं शीतल ही है । सच,शीतल से जितनी मान-सम्मान और प्यार मिला उसकी उम्मीद न थी। अब हमें उनके निर्णय पर गर्व होता है।
क्रमश:


    





गुरुवार, 2 मई 2019

कनाडा डायरी कड़ी ॥ 31॥



कनाडा डायरी के पन्ने 
प्रकाशित 
अपनी भाषा अपने रंग 
सुधा भार्गव 


20॰ 7॰ 2003
      
      पिछले माह डॉक्टर भागीरथ ने आकर हमें बहुत प्रभावित कर दिया था बहुत से कवियों और लेखकों  के नाम गिनाकर। साथ ही वायदा भी किया कि आगामी कवि सम्मेलन में मुझे अवश्य बुलाकर ओटावा की कवि मंडली से परिचय कराएंगे। साथ ही कविता पाठ करने का मौका देंगे। सुनते ही हम तो गदगद हो गए और  अपना  कविता संग्रह रोशनी की तलाश में तुरंत उन्हें भेंट में दिया। कुछ ज्यादा ही  मीठी जबान में उनसे बातें करते रहे जब तक वे हमारे घर रहे। बड़ी ही बेसब्री से इनके आमंत्रण की प्रतीक्षा करने लगे पर वह दिन आया कभी नहीं। एक लंबी सी सांस खींचकर रह गए।
      कल ही पाटिल दंपति आए। ललिता शीतल की अंतरंग  सहेली है।  उससे पता लगा कि 28 जून को तो वह कवि सम्मेलन हो भी चुका है जिसकी चर्चा मि॰भागीरथ ने की थी। उस कवि सम्मेलन के संगठनकर्ता पूरा तरह से वे ही थे। अब हम क्या करते?हाथ ही मलते रह गए। लेकिन हमसे इतनी नाराजगी! कारण कुछ समझ नहीं आया। कम से कम सूचना तो दे देते । हम इंतजार की गली में तो न भटकते।
     पाटिल दंपति  ओटावा में 25-30 वर्षों से हैं। पर कनेडियन छाप एक दम नहीं लगी है। अनिता पाटिल पटना की रहने वाली हैं और शिक्षा –दीक्षा भी पटना में ही हुई।हमारी बहू भी पटना मेँ रह चुकी है। तभी दोनों बिहारी बोल रहे थे तो कभी हिन्दी मेँ बोलते।  मजे की बात कि मि॰पाटिल भी इटावा(यू॰पी॰) के रहने वाले निकल आए।वे उसी  मोहल्ले में रहते थे जहां भार्गव  जी का ठौर -ठिकाना था। फिर तो बातों का बाजार ऐसा गरम हुआ कि आश्चर्य ही होता था। था। सच दुनिया बहुत छोटी हो गई है। कब कौन कहाँ मिल जाए पता नहीं। सद्व्यवहार से हर जगह एक प्यारी न्यारी छोटी सी दुनिया बस सकती है। 
      अनिता और रमेश दोनों ही मिलनसार शाकाहारी व हिन्दी प्रेमी हैं पर इनके इकलौते शाहजादे एकदम विपरीत। मांसाहारी ,हिन्दी के नाम नाक भौं सिकोड़ने वाले अँग्रेजी मेँ गिटपिट करते हुए अंग्रेजों की दम। स्वभाव में इतनी भिन्नता! समझ न सकी गलती कहाँ हुई है पर गलती हुई तो है। दूसरी भाषाएँ बोलना और सीखना तो सहृदयता की निशानी है पर मातृ भाषा को नकारते हुए उसका अपमान करना अपनी जड़ों पर कुल्हाड़ी मारने के समान है। 

       वैसे गलती तो माँ-बाप की ही मानी जाएगी । दादी बाबा बनने पर उन्हें अपनी भूल का एहसास जरूर होगा जब नाती-पोते पूरे परिवेश को  ही बदल कर रख देंगे। रीति-रिवाज ,विचार व संस्कारों की भूल भुलैया में ये दादी बाबा शतरंज के पिटे मोहरे बनकर रह जाएंगे
       इनसे मिलकर बार बार मुझे अपनी सहेली डॉ॰कुलकर्णी की याद आ रही है। वह शादी के बाद कनाडा की ही होकर रह गई है। घर से करीब एक किलोमीटर दूर रहती है। डिनर जल्दी लेने के बाद हम अकसर घूमते-घामते उसके घर चले जाते हैं।वहाँ गरम गरम कॉफी पीते हुए गप्प-शप्प में शामिल हो जाते हैं।उनके बच्चे हमारे सामने कम ही आते हैं--- नमस्ते करके 2 मिनट बैठे और बस चले गए । एक दिन मैंने पूछा –“मन्नो,तेरे बच्चे बहुत कम बोलते हैं क्या?”
“अरे नहीं--- बड़े बातूनी और झगड़ालू है। सब समय कुट-कुट करते रहते हैं।”
“लेकिन हमारे सामने तो मौनी बाबा से बैठे रहते हैं।”
     “हाँ सुधा यह बात तो है। असल में उनको हिन्दी बहुत कम आती है। ठीक से समझ भी नहीं पाते।बोलने के लिए शब्द ढूंढते ही रह जाते  हैं।”  
      “अरे,  भारत जाकर अपने नानी-दादी से कैसे बात करते होंगे?”
     “खाक करते हैं। जब छोटे थे तो चले जाते थे पर अब तो जाने का नाम ही नहीं लेते। पापा तो इनसे मिलने को तरसते  हैं। भारत से तो इंका संबंध छूटा ही समझो।”
     “तुझे यह अच्छा लगता है क्या?”
     “नहीं ---पर दोष भी तो मेरा है। इनकी पैदाइश तो कनाडा है पर मेरी तो लखनऊ है। हिन्दी भाषा-भाषी होते हुए भी नई पीढ़ी को हिन्दी न सिखा सकी।
     “पर क्योंकर ऐसा हुआ!? क्या तेरे पतिदेव को हिन्दी अच्छी नहीं लगती?”
     “अरे नहीं—उन्हें इन बच्चों से तो ज्यादा ही आती है। कहा न अपराधिन तो मैं ही हूँ। यहाँ आने पर अँग्रेजी का ऐसा  नशा चढ़ा कि हिन्दी बोलनी एकदम बंद कर दी। लिवास और रहन सहन भी अंग्रेजों जैसा कर लिया।  बच्चों ने बचपन में कभी हमें हिन्दी बोलते ही नहीं सुना –सीखते कहाँ से! भारत जाती तो अपने बच्चों को भतीजों के मुक़ाबले अँग्रेजी फर्राटे से बोलते देखती । गर्व से फूल उठती। सच बोलूँ -मैंने कभी चाहा भी नहीं कि बच्चे हिन्दी सीखें,हमारी संस्कृति जाने। न रामायण –महाभारत की कहानियाँ सुनाई न ईश प्रार्थना में इन्हें शरीक किया।  
     तुम्हें तो मालूम ही है कि मुझे भजन गाने का और सितार बजाने का कितना शौक है। वह मैंने नहीं छोड़ा। पति रमेश का ज़्यादातर टूर पर रहना बढ़ गया और बच्चे बड़े होने लगे ।  मुझे समय काफी मिलने लगा । मैं अपने गायन के इस शौक को ज्यादा समय देने लगी। बच्चे ज़्यादातर अपने कमरे में बंद रहते।यह नहीं कि दो मिनट को मेरे पास आकर बैठ जाये। तब मुझे एकाकीपन का अनुभव हुआ । अपने परिवार की याद आने लगी। बच्चे तो उनसे अलग हो ही गए थे। मैं भी अपनी जन्मभूमि और खूंके मधुर रिश्तों से कटकर रह गई हूँ। अपनी भूल सुधारने के लिए भारत से हिन्दी की किताबें लाई –कलैंडर लाई। पूजा गृह में राम -कृष्ण की फोटो लगाई कि उनके बारे में इन्हें बताऊँगी । बड़ी कोशिश के बाद टूटी-फूटी हिन्दी तो बोलने लगे है समझने का प्रयास भी करते है । असल में बहुत :देर हो चुकी है। हम तो अपनी पहचान ही खो बैठे हैं। न केनेडियन रहे और न भारतीय।"
     उसके स्वर में टनों पश्चाताप था औए चेहरे पर थी उदासी की मोटी परत।

       उसकी बात सुन में सन्नाटे में रह गई। सच पूछो तो मैं अपनी पोती को लेकर चिंतित हो उठी । अगर वह भी अँग्रेजी मेँ गिटगिट गिटर- गिटर करने लगी तो मेरा क्या होगा! मैं तो अपनों के बीच में ही पराई हो जाऊँगी। जो दिल और मन का तालम तेल अपनी भाषा में बैठता है वह पराई  भाषा में कहाँ! पर ऐसा होगा नहीं। उसकी मम्मी  घर में हिन्दी ही बोलती है और उसकी हिन्दी तो उसके पापा से भी अच्छी है। मम्मी जब इतनी सजग है तो वह अपनी दादी माँ से हिन्दी में जरूर बोलेगी। मेरे पास आएगी,मेरे साथ बतियायेगी। मैं वारी जाऊँ। फिर तो उसे मैं अपने एक- दो काम भी गिना दूँगी। कभी मेरा चश्मा दूँढ़ कर लाएगी तो कभी मेरी छ्ड़ी।  और मैं--मैं फूल सी खिली सौ बरस जीऊंगी। उड़ने लगी न कल्पना में---उसका नाम आते ही मेरी सोच को पंख लग जाते हैं।

बुधवार, 27 मार्च 2019

कनाडा डायरी की कड़ी ॥ 28॥

साहित्य कुंज अंतर्जाल पत्रिका में प्रकाशित
अंक फरवरी 2019
डायरी के  पन्ने
विदेशी बहू 
सुधा भार्गव  

26जून 2003

        भार्गव जी को हल्की सी डायबिटीज़ है। खूब घूमते -फिरते हैं पर कभी कभी बदपरहेजी कर ही लेते हैं।
      एक दिन बहू शीतल बड़ी गंभीरता से बोली-“मम्मी जी आप पापा जी को हर दो घंटे बाद खाने को दिया करें। यदि एक समय ज्यादा या नुकसान देने वाली चीज खाने  लगें तो मना कर दें।”
      “बेटी,मैं एक बार कहती हूँ दुबारा नहीं। यदि उसका मोल नहीं समझा जाता तो मुझे बुरा लगता है।”
      “अरे मम्मी जी ,अपनों का कोई बुरा माना जाता है। यदि कुछ अनहोनी हुई तो सबसे ज्यादा आपको ही सहन करना पड़ेगा। आपके बेटे अगर कोई गलत काम करेंगे तो मैं बार –बार टोकूंगी चाहे उनको कितना ही बुरा लगे।”
       मैं चुप आज्ञाकारी बच्चे की तरह उसकी बातों की गहराई में डुबकी लगा रही थी। कौन कहता है नई पीढ़ी बुजुर्गों का ध्यान नहीं रखती। शायद समझने में गलती हुई है बड़ों से।
     यह वही शीतल है जिसे मेरे बेटे ने खुद पसंद करके अपना जीवन साथी चुना था। जब उसने अपने निर्णय की सूचना मुझे दी तब मैं भारत में थी और वे दोनों एडमोनटन(admonton) में। माँ-बाप की खुशी तो बच्चों की खुशी में है सो हम मिया-बीबी ने तुरंत सहमति दे दी। दूसरे मुझे पूरा-पूरा विश्वास था कि वह जो भी कदम उठाएगा सोच समझकर उठाएगा। लेकिन संशय की दीवार सिर उठाने से बाज न आई । सोचने लगी---विदेश में रही व पढ़ी-लिखी लड़की हम बड़ों को सम्मान दे पाएगी या नहीं! सो पूछ लिया फोन पर ही - बेटा,मेरी होने  वाली बहू सुबह उठकर एक प्याला चाय तो दे देगी?’
       “ हाँ माँ,उससे भी ज्यादा।”
       सच,शीतल से जितनी मान-सम्मान मिला उसकी उम्मीद न थी। माँ बनने पर वह मेरे पोती-पोते को जरूर अच्छे संस्कार देगी।
क्रमश :
  

रविवार, 10 फ़रवरी 2019

कनाडा डायरी की कड़ी॥ 27॥


      साहित्यकुंज अंतर्जाल पत्रिका में प्रकाशित 
अंक फरवरी 


http://sahityakunj.net/LEKHAK/S/SudhaBhargava/27_
dard_ke_tever_Sansmaran.htm



डायरी के पन्ने 
 दर्द के तेवर

सुधा भार्गव 
24 6 2003
      
     यहाँ आने पर एक माह तो हम पति-पत्नी स्वस्थ रहे। फिर न जाने क्या हुआ कि भार्गव जी की गर्दन और कंधे में दर्द होने लगा । धीरे धीरे यह दर्द सीधे हाथ की ओर बढ्ने लगा। सावधानी और नियमित जीवन बिताने वाले को ऐसी व्याधि!मैं तो घबरा उठी। मन में संदेह का कीड़ा रेंगने लगा कहीं दिल का रोग तो नहीं होने वाला है। कलकता होम्योपैथिक डॉक्टर सिन्हा को फोन खटखटा दिया,दिल्ली अपोलो हॉस्पिटल के विख्यात हृदय विशेषज्ञ डॉक्टर सक्सेना से बातें की। अपने बेटी और जमाई से भी बातें करना न भूली क्योंकि वे दोनों ही डॉक्टर है। सबसे सांत्वना के दो शब्द पाकर व्याकुलता कम हुई और निश्चित हुआ कि दर्द का संबंध मांसपेशियों से है न कि दिल से। एक बार पेशीय दर्द इनके पहले भी हुआ था।
       यहाँ के नागरिकों के स्वास्थय का पूरा दायित्व सरकार का है। एक से एक उत्तम सुविधाएं। पर उन माँ बाप का क्या जो चंद दिनों को बाहर से अपने बच्चों से मिलने आते हैं, बीमारी आने पर भागदौड़ में उनको तो पसीना आ जाता है और पैसे पर चलती है चक्की अलग। जब हमारे बच्चे इस देश को आगे बढ़ाने में लगे है तो उनके माँ-बाप की अवहेलना क्यों? पर मैं ऐसा सोच क्यों रही हूँ? शायद भावनाओं का यहाँ कोई मूल्य नहीं!
      भारत में अधिकांशतया कर्मचारियों को बुजुर्ग माँ-बाप और  बच्चों की चिकित्सा के लिए कुछ धन राशि मिलती है क्योंकि वे सब एक ही परिवार के माने जाते हैं। यहाँ अलगाववादी प्रक्रिया ने व्यक्ति विशेष को ही प्रधानता दी है। इसी कारण सब अलग-थलग ,आत्मकेंद्रित और संवेदनहीन नजर आते हैं।   
       भार्गव जी के दर्द के लिए डॉक्टर सिन्हा ने दवा फोन पर ही बता दी। यह दवा पहले भी भारत में ले चुके थे। पर डॉक्टर के बिना लिखित नुस्खे के दवा का मिलना असंभव था । तकदीर से डाक्टर सिन्हा का पुराना नुस्खा भार्गव जी के पर्स में ही मिल गया। राहत मिली। दवा से आराम होने लगा तो मैं भार्गव जी की तरफ से बेफिक्र हो गई।

*

छोटी पर बात बड़ी
    
     कुछ न कुछ जीवन  में घटता ही रहता है पर उन्हें निरर्थक ,अर्थहीन समझकर भूलना ठीक नहीं। मेरे लिए तो छोटी छोटी बातें अर्थपूर्ण और जीवन दायिनी हैं।
     यह बात उन दिनों की है जब भार्गव जी के दर्द के तेवर संभाले नहीं सँभल रहे थे। चाँद मेरे पास आकर धीरे से बोला -माँ,आज से आप और पापा मेरे कमरे वाले पलंग पर सोएँगे । मैंने उसे पिछले माह ही खरीदा है। किंग साइज डबल गद्दे पर सोने से गर्दन का दर्द भाग जाएगा।
     “न बेटा,मैं तुम्हारे बैड रूम में नहीं सोऊँगी। तुमने कितने शौक से पलंग लगाया है और हम सो जाएँ। यह कहाँ की रीति है?
     “लेकिन बेटे की कमाई पर तो माँ-बाप का भी हक है।”
      हमने उसके इस निर्णय का दिल से समर्थन किया ।  खुशी के अतिरेक से नेत्र सजल हो उठे।
     उसके अनुरोध को टालने की गुंजायश न थी। उस समय मेरी पोती एक माह की थी।सारा समान दूसरे कमरे में ले जाना पड़ा। उस कमरे में उससे जुड़ा स्नानागार भी न था। बच्चे के साथ बड़ी असुविधा रही होगी।
     हमें उसके कमरे में सोना ही पड़ा।सोये तो कम ही,रात भर बस पलकें झपकाते रहे और उसकी तारीफ करते रहे। 
      सुबह की बेला में बेटे से आमना सामना हुआ। गले मिले। उसकी आँखें चमक रही थीं सोच सोचकर कि माँ-बाप रात भर गहरी नींद में भरपूर सोए होंगे और दर्द भी कम होगा। पर अपनी गति हम ही जानते थे।
     संध्या घिरते ही हमने निश्चय किया कि आज उनके बैड रूम में नहीं सोना है,वहाँ सोना उनके प्रति अन्याय होगा। उसको समझाना बड़ी टेढ़ी खीर साबित हुआ। सब एक दूसरे के सुखों से जुड़े थे।

मंगलवार, 15 जनवरी 2019

कनाडा डायरी की छब्बीसवीं कड़ी



साहित्यकुंज में प्रकाशित 
अंक  जनवरी  2019


डायरी के पन्ने 


अबूझ पहेली
सुधा भार्गव  

दिनांक 23:6:2003 

    हम जब से ओटावा आए है,बेटा शाम को ऑफिस से घर जल्दी आने की कोशिश में रहता है। ऑफिस में समय से पाँच मिनट  भी ज्यादा रहना उसे अखरता है। एक दिन उसके बॉस ने उसकी इस जल्दबाज़ी को भाँप लिया। अवसर मिलते ही उसने निशाना लगा दिया-“चाँद ,तुमको आजकल हमारे साथ बात करने का भी समय नहीं रहता!”
    “इंडिया से मेरे माता- पिता आए हुए हैं।”
    “कब तक रहेंगे? 
    “तीन माह।”
    “ती---न माह ! क्यों?
    “क्योंकि वे मुझसे मिलने ही तो यहाँ आए हैं।”
    “मेरे माता-पिता तो मुश्किल से मेरे पास दस दिन रह पाते हैं। एक हफ्ते बाद ही मेरी माँ का पत्नी से झगड़ा होने लगता है।”
    “मेरा तो यहाँ कोई भाई-बहन भी नहीं है। मुझे उनकी याद बहुत सताती है। घर –गृहस्थी की जिम्मेदारियों के कारण वे मेरे पास जल्दी-जल्दी नहीं आ सकते। करीब तीन वर्ष के बाद आए हैं। मैं तो  पल-पल उनके साथ रहना चाहता हूँ। उनके आने से लग रहा है मानो मेरा बचपन लौट आया है।”
    बॉस अवाक होकर चाँद की बात सुनता रहा। फिर उसने किसी दिन उसे नहीं टोका। उसके लिए चाँद की माता -पिता के प्रति आसक्ति अबूझ पहेली थी।
क्रमश :


गुरुवार, 13 दिसंबर 2018

कनाडा डायरी की चौबीसवीं कड़ी


साहित्य कुंज में प्रकाशित 
अंक दिसंबर 2018 


http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/S/SudhaBhargava/25_

pitridiwas.htm
डायरी के पन्ने 

सुधा भार्गव   


दिनांक :19 6 2003   

:       ओंटेरिओ में पितृ दिवस मनाने की तैयारी ही रही है । हर पत्रिका में पिता से संबन्धित कोई विज्ञापन या  उनसे जुड़ी यादें पढ़ने को मिलती हैं।बच्चे अपने पिता को उपहार आदि देकर उनको मान देते है और प्यार जताते हैं। मेरे ख्याल से मेरी  पोती अवनि को भी चाहिए कि अपने पापा को कोई गिफ्ट दे। मगर देगी कैसे! नन्हें नन्हें हाथ,नन्हें नन्हें पैर । एक कदम चल तो सकती नहीं। हाँ याद आया –कुछ दिन पहले  मातृ दिवस था। उसका पापा एक सुंदर सी टीशर्ट  खरीदकर ले आया  और अवनि से  उसकी माँ को दिलवा दी । बस मन गया मातृ दिवस । पितृ दिवस भी ऐसे ही मन जाएगा। माँ लाएगी और वह अपने पापा को टुकुर टुकुर देखती दे देगी। वैसे मेरा बेटा उसे बड़ा प्यार करता है। उसके लिए कहो तो आकाश के तारे तोड़कर ले आए। ऑफिस से आते ही उसे बाहों के झूले में झुलाकर अपनी सारी थकान भूल जाता है।
      इस नन्ही बच्ची के संग-साथ ने तो मुझे अपने बचपन के कगार पर ला खड़ा किया है। पिता जी का चेहरा मेरी आँखों में घूम-घूम जाता है। हम छह भाई-बहन—पिताजी ने  हमारे लिए क्या नहीं किया। वे मुझे  बहुत प्यार करते थे। अपने माँ-बाप की मैं पहली संतान थी । हमेशा अपने साथ साथ रखना चाहते। घर में घुसते ही कहते –बड़ी ज़ोर से भूख लगी है। बिटिया कहाँ है?इसका मतलब था --वे मेरे साथ खाना खाएँगे।
        वे शान-शौकत पसंद शौकीन मिजाजी थे। बाबा जी तो कहा करते –तूने मेरे घर क्यों जन्म लिया ,लिया होता जन्म किसी राजा - महाराजा के।जरा भी हम उनकी नापसंद के कपड़े या पुराने डिजायन की ड्रेस  पहनते तो उनका गट्ठर बनवाकर नौकरों को दे देते और नए-नए कपड़े तुरंत बनवा देते। जरा भी चटका या किनारे से टूटा कप-प्लेट  देखते तो तुरंत फिकवा देते। तहसील में रहते हुए भी  अगले दिन ही शहर से नए कप-प्लेट आ जाते। उन दिनों मिर्जापुर के कालीन बहुत प्रसिद्ध थे। वहीं के  2-3 कालीन दीवार से सटे चादर में लिपटे खड़े रहते। खास उत्सवों पर ही वे बिछाए जाते। किसी के घर में शादी होती तो बड़े उदारता से दे  दिए जाते। जरूरत मंद आदमी को घर बनाने के लिए जमीन का टुकड़ा लिया तो वापस लेने का नाम नहीं। चुप चुप गरीबों की मदद करते और उसे मुंह पर नहीं लाते।
      उनकी माँ बचपन में ही छोड़कर चल बसी। अधूरी इच्छाओं और ममता के अभाव में बड़े हुए। निश्चय किया बच्चों के पालन में कोई कमी न रखेंगे। उन दिनों पत्थर के कोयलों की अंगीठी पर पानी गरम होता।गीजर का चलन न था। सर्दियों के दिनों में नौकर तो सुबह 8बजे  आता पर हमेँ सुबह ही नहा धोकर स्कूल जान होता। वे सुबह 6बजे उठकर कड़ाके की ठंड मेँ अंगीठी जलाते,हमारे नहाने को पानी गरम करते।अम्मा को नहीं जगाते। वे छोटे भाई के कारण रात को ठीक से सो नहीं पाती थी। दूसरे डरते कि सुबह उठने पर माँ को ठंड लग गई तो उसका असर बच्चे पर भी होगा। डॉक्टर थे इस कारण सफाई का बहुत ध्यान रखते थे। बच्चे होने के समय दाई आती माँ और बच्चे की देखभाल के लिए पर पिता जी उस पर ज्यादा विश्वास नहीं करते और अपनी देख रेख में बहुत से काम कराते।
      गलती होने पर वे मुझे डांटते । कभी कभी थप्पड़ भी गाल पर रसीद कर देते। तो बस फुला लेती मुंह। न कुछ खाती ,न कुछ पीती। औंधे मुंह लेटकर सोने का बहाना करती पर इंतजार करती रहती कब पिता जी आएँ ,कब मुझे मनाएँ। बीच -बीच में आँखें खोलकर देखती भी पर झट से आँखें बंद कर लेती---कही मेरी  नाटकबाजी  न पकड़ी जाए। थोड़ी देर में ही पिता जी का गुस्सा शांत हो जाता और मेरी सुध लेने दौड़े- दौड़े आते। बस फिर तो प्यार की बौछार शुरू—मेरे गाल पर प्यार करते,उठाते,खाना खिलाते,पैसों से मेरी गुल्लक भर देते। ऐसा था पिता का प्यार।
      पिता जी मुझे न तो साड़ी पहनने देते थे और न ही खाना बनाने देते थे।कहते- खाना बनाने को तो ज़िंदगी पड़ी है। शादी से पहले जो सीखना है सीख लो। बाद में न जाने कैसी परिस्थिति हो। बी॰ए॰एक दिन माँ ने कहा-बेटे कभी कभी साड़ी भी पहन लिया करो ताकि बांधना आ जाए । मैंने रेशम की हलकी  सी साड़ी चाची की सहायता से पहन ली।
      इतने में पिता जी आ गए –"कहीं जाना है क्या?"
      "नहीं तो। मेरे गले से मुश्किल से निकला ।" मैं समझ गई थी कि उनको मेरा साड़ी पहनना पसंद नहीं आया।
      "तो साड़ी उतारकर आओ। सलवार कुर्ता पहनो।"
       उस समय तो बुरा लगा पर उनकी नापसंद का कारण बाद में समझी। पिता जी को इस बात का  अहसास होता था कि अब मैं बड़ी हो गई हूँ। एक दिन ससुराल जाना होगा। इस विचार से ही वे तड़प जाते होंगे। शादी  के बाद भी मैंने उनके सामने डरते डरते साड़ी पहननी शुरू की थी। अब तो ऐसी डांट-फटकार के लिए तरसती हूँ।
       गर्मी की छुट्टियों में ताई अलीगढ़ से आईं। मैं बी॰ ए॰ की परीक्षा देकर हॉस्टल से  घर पहुँच चुकी थी। 2-3 दिन तो सोती रही,मित्रों से मिलती रही पर रसोई में एक दिन जाकर नहीं झाँका। हाँ,बड़ों को खाना खिलाने ,मेज लगाने का काम जरूर करती थी।
        ताई से चुप न रहा गया। बोलीं-"लाला,मुन्नी अब काफी बड़ी हो गई है। एक-दो साल बाद हाथ पीले हो जाएंगे। ससुराल जाकर खाना तो पकाना ही पड़ेगा। उसे दाल –रोटी तो बनानी आनी ही चाहिए।" ताई पिता जी को लाला  कहती थीं।
      पिताजी हँसकर बोले-"भाभी ,इसे चाय बनानी बहुत अच्छी आती है।" ताई की भी हंसी फूट पड़ी। स्नेह का झरना फूट रहा था।
      विदायगी के वे पल मुझे अभी तक  याद हैं जब पिताजी मुझे अश्रुपूर्ण नेत्रों से देखते हुए ससुर जी से बोले- "मेर बेटी को सब कुछ आता है पर खाना बनाना नहीं आता है।" मेरे ससुर जी भी बहुत नेक व सरल हृदय के थे। तुरंत बोले -"चिंता न करें ,खाना बनाना हम सीखा देंगे। बाकी काम तो आपने सिखा ही दिए हैं।"
       पिता पिता ही होते हैं। उनके होने से हर संकट की घड़ी में रक्षा की छतरी हमारे ऊपर तनी रहती है।
      कहाँ से कहाँ बह चली। किस्सा शुरू हुआ था अवनि से और अंत हुआ मुझ पर। मैंने भी यादों के आगोश में बैठकर पितृ दिवस मना डाला । 


गुरुवार, 27 सितंबर 2018

॥ 3॥ बोलता कल


स्मृतियों की सन्दूकची 
  

 नीमराना ग्लास हाउस
 का  
  बोलता कल 

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       उत्तरांचल जिला टहरी गढ़वाल में एक गाँव है –गुलार डोंगी । यह ऋषिकेश से 23 किलोमीटर दूर बद्रीनाथ रोड पर स्थित है । हरिद्वार की यात्रा के दौरान मैं वहाँ अपने  परिवार सहित पहुंची । वहाँ  मंद –मंद मुसकाती –बहती गंगा सैलानियों को सहज भाव से  अपनी ओर आकर्षित कर लेती है । इसके किनारे भारतीय परिवेश का रक्षक नीमराना ग्लास हाउस होटल बड़े गर्व से भव्य रूप में खड़ा है। सन् 2005 में हम इसी होटल में ठहरे थे। 
       इसमें प्रवेश करते ही अनुभव हुआ मानो हम चौदहवीं से इक्कीसवीं सदी के बीच विचरण कर रहे हैं । अदृश्य रूप में आत्माएँ आ –जा रही हैं ,हमसे टकरा रही हैं । अचानक मुझे किसी की उपस्थिति का एहसास हुआ जो मुझसे सटते हुए बोली-आधुनिकी बाना धरण किए तुम जैसे लोगों को भी मैं अपनी बस्ती में खींच लाई। यह नगरी पुरानी जरूर है पर एक बार तुम्हारे दिल में पैठ गई तो मुझे विस्मृत करना कठिन है।
      ग्लास हाउस में जरा आगे बढ़े तो कदम ड्राइंग रूम में कदम पड़े । चूंकि उसकी दीवारें शीशे की हैं इसलिए उसके पार दिखाई देने वाली पर्वतों की श्रंखलाओं ,उन पर छिटकती हरियाली , गंगा की लगातार उठती –गिरती चमकती लहरों ने मन भिगोकर रख दिया ।




       एक कोने पर नजर पड़ी तो देखा – पत्थरों को एक दूसरे पर रखकर कैलाश परवत बनाने का सफल प्रयास हुआ है । उसके मध्य प्रतिष्ठित है हर –हर महादेव की विराट मूर्ति । हठात रसखान की पंक्तियाँ गुनगुनाने लगी –
     
     भाल में चंद्र बिराजि रहौ,ओ जटान  में देवी धुनि लहरै ।
     हाथ सुशोभित त्यौं तिरसूल ,गरे बीच नाग परे फहरै।।

     महाराज भागीरथ ने तो अपने पूर्वजों का उद्धार करने के लिए शिव आराधना की थी पर लगता है भूतलवासी भी तर गए । शायद तभी से मृत्यु के बाद राख़ और अवशेष गंगा में प्रवाहित करने की परंपरा ने जन्म लिया । ।
     एक दीवार पर करीब 10 -12 पेंटिंग्स शीशे में जड़ित थीं जिनमें सूर्य पूजा ,विष्णु पूजा ,अग्नि पूजा ,महादेव पूजा ,पवन पूजा ,गायत्री मंत्र और गौ पूजा के विभिन्न स्वरूप अति कुशलता से चित्रित किए गए थे । एक चित्र में ब्राहमन सूर्य की अर्घ्य  दे रहा था दूसरे में वह गाय के पास खड़ा था । इसका कारण हमारी समझ में न आया । पुस्तकाध्यक्ष ने बताया –ब्राहमन और गाय एक ही कुल के दो भाग हैं। ब्राहमण के हृदय में वेदमंत्र निवास करते हैं तो गौ के हृदय में हवि(आहुति देने की वस्तु )रहती है । गाय से ही यज्ञ प्रवृत्त होते हैं । 
     उन्होंने एक दिलचस्प बात और बताई की गौ में सभी देव प्रतिष्ठित् हैं  । चित्र में भी  सींगों की जड़ों में ब्रह्मा –विष्णु और बीच में महादेव थे । गौ के ललाट में पार्वती ,नेत्रों में सूर्य –चंद्रमा का निवास था ।
     ब्रह्म पूजा वाले चित्र में ब्रहमा के चार मुख थे जिनसे चारों वेद झर रहे थे । चित्र को देखने वाले दर्शक आपस में बातें कर रहे थे और मैंने उनमें से एक को कहते सुना –ब्रह्मा के मल से रुद्रका और वक्ष से विष्णु का आविर्भाव हुआ । प्रलय के बाद सृष्टि की रचना ब्रह्मा ने की ,इसलिए वे सर्वश्रेष्ठ हैं ।
     शहरी आबोहवा में मैं ऋषि –मुनियों की वाणी को भूल ही गई थी । यहाँ आना सार्थक हो गया था । मैंने कहीं पढ़ा था –ब्रह्मा को तरह –तरह से स्नान कराया जाता है पर क्यों ?मेरी यह गुत्थी उलझी हुई थी । मैंने यहीं इसे सुलझाना चाहा ,फिर मौका मिले या न मिले  । सामने सोफे पर गेरुआ वस्त्र धारी जटाओं वाले संत  बड़ी गंभीर मुद्रा में बैठे कल्याण पत्रिका के पन्ने उलट रहे थे । मैंने  ज्ञान मूर्ति समझ अपना कुलबुलाता प्रश्न उनके सामने रख दिया । चेहरे पर हंसी लाते हुए बोले –तुमने ठीक ही सुना है । दूध से ब्रहमा को स्नान करने से मरने के बाद ब्रहमलोक जाते हैं । दही से स्नान कराने से विष्णुलोक की प्राप्ति होती है । शहद स्नान से तो इंद्रलोक मिल जाता है । ईख के रस में उन्हें डुबोने से सूर्य लोक गमन होता है । गायत्री मंत्र के साथ ब्रहमा की स्तुति की जाए तो लगता है मानों ब्रहमलोक में ही खड़े हैं । उनकी बातें सुनकर प्राचीन धर्म समन्वित अध्यात्म के दर्शन हुए ।
     अध्यात्म दर्शन का श्रेय अमनदास जी को जाता है जो एक कवि ,शिल्पकार और कलाकार हैं । ये पुरानी इमारतों को खरीदकर उन्हें नया रूप देते हैं पर कलेवर वही वर्षों  पुराना होता है । ग्लास हाउस भी एक समय गढ़वाल के महाराजा का हंटिंग लॉज था । उसे कुशल कारीगरी का दस्तावेज़ बनाकर भारतीय संस्कृति का अनुपम उदाहरण पेश किया गया  है ।
     थोड़ी देर आराम फरमाने को हम कमरे की ओर चल दिये । लेकिन आराम कहाँ –वहाँ तो जिज्ञासा सिर उठाये खड़ी थी  । वहाँ बिताया एक एक पल जीवंत होता जा रहा  है ।  
मेरे  कमरे का नाम नर्मदा है ,बेटे के कमरे का नाम  गोदावरी और  उसके सास-ससुर के कमरे का नाम है गोमती ।  वाह क्या कहने । उससे जुड़ा एक प्रसाधन  कक्ष है । अरे एक स्टोर नुमा कोठरी भी है । जरा देखूँ इसमें क्या है ?-- यह तो बंद है । जरूर राजा यहाँ खजाना रखता होगा या  उसकी रानियाँ लकड़ी की बकसिया में अपने गहने रखती होंगी । खुला होता तो जरूर ताक झांक करती । मन बहुत चंचल हो उठा है ।
      पलंग तो चमकता हुआ बेंत का है जिसका सिरहाना अर्ध चंद्राकार है । इतना बड़ा कि चार आराम से पैर फैला लें । एक तरफ सोफा मेरे बाबा के समय का है पर लगता बड़ा मजबूत है । पलंग के दोनों ओर हाथरस की बुनी दरियाँ गलीचे की तरह बिछी हैं । सामने की दीवार मे आतिशदान है ताकि कोयले जलाकर कमरा गरम किया जा सके । दीवार में बनी लकड़ी की नक्काशीदार अलमारी इस बात का सबूत है कि यहाँ रहने वाला धनी व शौकीन मिजाज का होगा ।  फर्श वर्षों पुराना लाल रंग का पर चमक में कोई कमी नहीं  ।
      मेज पर एक कोने में चिमनी है शीशे की । उसके नीचे मोमबत्ती रखी है जिससे साफ पता लग रहा है कि उन दिनों मिट्टी के लैंप जला करते थे । मैंने खुद अपने पिता जी को शीशे की चिमनी को मुलायम कपड़े से साफ करते देखा है । यहाँ आकार बचपन के कई सुप्त कोने जी उठे ।       मोमबत्ती के ऊपर चिमनी रखकर सजावट का एक नया नमूना पेश किया है। बिजली के लट्टुओं के सामने चिमनी वाले लैंप की रोशनी कुछ नहीं  पर प्राचीन परंपरा व रीति रिवाजों से पर्दा उठते देख अति सुखद अनुभूति होती है । कमरे के दरवाजे और खिड़कियाँ सब शीशे के हैं । और तो और मेरे सामने जो मेज रखी है –बड़ी खास है । बस पत्थर पर भारी सा एक शीशा रख दिया है ।
काफी समय से स्नानागार जाने से जी चुरा रही थी कि होगा गंदा -संदा पर कब तक बचती । आशा के विपरीत देखा -फर्श पर टाइल्स लगी हैं । नल के नीचे अवश्य लकड़ी का पट्टा पट्टियों वाला रखा हुआ है । मेरी पोती उसे हटाने लगी । उसको बड़ा अजीब सा लगा । मैंने उसे समझाया –"बेटा ,पुराने समय इसी पर बैठकर नहाते थे।''
     "क्या दादी माँ आप भी इस पर नहाई हो ?"
     "घर में तो नहीं देखा पर धर्मशाला में नहाने की जगह ऐसा पट्टा रखा रहता था । अब तुम पूछोगी –धर्मशाला किसे कहते हैं ?मेरी बच्ची छुटपन में जब मैं अपनी माँ और पिताजी के साथ घूमने जाती थी तो होटल में नहीं धर्मशाला में ठहरती थी।''
    मैं  पट्टे पर नहाने बैठी । न जाने उस पर कितने राजा रानी नहाये होंगे । वे तो चले गए पर उनकी रूह मुझसे कुछ कहना चाह रही  थी  ,बड़े रोमांचकारी क्षण थे । तौलिया लेने को हाथ बढ़ाया जो लकड़ी की खुनटियों के सहारे लटका हुआ था । ऐसा स्टैंड मैंने कनाडा में भी देखा था पर उसे जमीन पर टिकाकर बयर –व्हिस्की की बोतलें रखी थीं । वैसे भी भारतीय शिल्पकला का तो पूरा विश्व कायल है ।
      कमरे में ज्यादा देर तक बैठना मेरा मुश्किल हो गया । न यहाँ कोई टेलीफोन न ही दूरदर्शन। असल मैं यह कोई विलास स्थल नहीं,विभिन्न संस्कृतियों के मेल मिलाप का शांतिस्थल है । पहली मंजिल की बालकनी से झांक कर देखा –ड्राइंगरूम में अनेक धरमालम्बी एकत्र हो गए हैं और उनमें कोई बहस छिड़ी है ।
       कोई ताश खेल रहा है तो कोई गजलें सुन रहा है । इतना होते हुए भी चुप्पी का आभास होता था ।
      हम भी नीचे उतर आए ।ड्राइंग रूम में बैठे भी पर्यटक उचक उचककर बाहर की छटा देखना चाहते थे । संध्या सुंदरी धीरे –धीरे अपने पग धरती पर रख रही थी  । उसके मनमोहक रंगों पर मोहित हो  गंगा की लहरे डूबती उतराती चंचल हो उठी थी । गगन चुम्बी पर्वत वात्सल्यभाव से पुत्री गंगा को निहार पुलकायमान प्रतीत होता था । 

उसे देख कवि दिनकर की पंक्तियाँ याद आने लगीं –

      मेरे नगपति !मेरे विशाल
     साकार दिव्य गौरव विराट
     पौरुष के पुंजीभूत ज्वाल
     मेरे भारत के दिव्य भाल ।

     दोपहरी का ताप शांत हो चुका था । हम पर्यटकों  ने  गंगा के किनारे –किनारे चलकर घाटों पर पहुँचने का निश्चय किया । बहता पवन शीतलता व नवजीवन प्रदान कर रहा था । अनेक देवी –देवताओं को प्रणाम करते हुए हम उस पक्के घाट पर पहुंचे जहां आरती आरंभ होने वाली थी । आशा के विपरीत वहाँ की सफाई व अनुशासन प्रशंसनीय था । तभी ढोलक –मजीरों की ध्वनि के साथ अनगिनत प्रदीप जल उठे । भजन –कीर्तन कानों में कूंकने लगे । करतल ध्वनि के लिए हाथ खुद उठ गए । ।जल में एक –एक  दीपक हमने भी जलाया और गंगा के नयनाभिराम दृश्य को पलमों में बंद करके जल्दी ही उठ गए ।
    चुल्लू भर –भर कर आनंद पीने की बेला में कुछ दूरी पर बुजुर्गों की एक टोली बैठी थी । उनको आरती से ज्यादा अपनी बातों में ज्यादा दिलचस्पी थी । उदास आँखें –बुझे चेहरे !लगता था उनका सब कुछ छिन  गया है । परिवार की उपेक्षा और प्यार के अभाव में वे ईशवर की नगरी में ही बसने को मजबूर हो गए थे ।
     लौटते समय हम थक कर चूर थे पर रात के  सन्नाटे में नींद मुझे अपने आगोश में न ले सकी ।  बिस्तर पर लेते –लेते जरा सी सरसराहट से चौंक पड़ती । लगता उस पर सोने वालों की सांसें अब भी वहाँ चल रही हैं ।
      पौं फटते ही शीशायघर  से पैर बाहर रखा । सामने ही बाग में चौकी पर बैठा एक युवक ध्यान लगा रहा था । पीतल की चौकी पर ताँबे के चमकते फूल ,पैर भी शेर के पंजों वाले थे ।   हाथ में  रूद्राक्ष की माला लिए उसे फेर रहा था । मैं अपने घर की 60 साल पुरानी संस्कृति में लौट गई ।
     याद आया आज तो महाकुंभ है । उसमें नहाने से उसकी तरह तन –मन निर्मल हो जाएगा । ऐसा सोचकर बड़े –बड़े तौलिये कंधों पर डालकर साँप सी बलखती सीढ़ियों से गंगा किनारे उतर पड़े । दोनों तरफ बड़े बड़े विशाल पत्थरों से टकराती पत्थरो का ढेर लगा था और सीढ़ीनुमा कटे पहाड़ को पार करते समय यमराज नजर आने लगे थे ।
विशाल लहरों से टकराती दूध सी लहरों में मन अटक अटक जाता । गीली बालू में पैर धसते ही 
लड़कपन हंसने लगा । धम्म से हम पति-पत्नी नीचे बैठ गए। पर बैठकर भी मुझे चैन न मिला और बनाने लगी रेत का घरौंदा । कुछ भूरे –पीले सूखे पत्ते फड़फड़ाते घरौंदे पर बैठ गए । किलक उठी आह !कितना  सुंदर ! 





बुदबुदाने लगी  ---

    एक मेरे सामने है ,एक मेरे पीछे
    एक बालुई घरौंदा है दूसरा शीश महल
    एक नाशवान है ,दूसरा अमर
    सच तो यह है
    स्वर्ण कण बिखरे पड़े हैं
    अंदर  –बाहर
    बस परखने को चाहिए
    जौहरी की सी आँखें ।

     आनंद के पलों के समेटे हम दिल्ली लौट पड़े पर एक बात रास्ते भर सालती रही की न जाने कहाँ –कहाँ उपेक्षित इतिहास ,नि: श्वास लेती संस्कृति दम तोड़ रही है । रक्षा का कवच पहनाना उसे बहुत जरूरी है। 

 समाप्त