गुरुवार, 23 जून 2016

दसवीं कड़ी -कनाडा की डायरी

http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/S/SudhaBhargava/10_poori_adhuri_rekhayen.htmपूरी -अधूरी रेखाएँ पूरी -अधूरी रेखाएँ
साहित्यकुंज की इस लिंक पर भी आप पढ़ सकते हैं।

 डायरी के पन्ने 
                                                                पूरी -अधूरी रेखाएँ 
                                                                          सुधा भार्गव 
19/04/2003 


    ऐसा लगता है मेरे आसपास पूरी -अधूरी रेखाओं का जाल बिछा हुआ है। एक तरह से इनके बीच रहने की आदत हो गई हैं, छुटकारा भी तो नहीं पड़ोसी जो ठहरे।
    सामने वाले  सफेद बंगले में शाम होते ही एक नवयुवक घूमने निकलता है । उसका साथी केवल झबूतरा कुत्ता है। वृद्ध माँ –बाप का निवास स्थान अलग है । पहले वे भी इसी के साथ रहते थे पर इस आशा में कि बेटे जॉन का घर बसना चाहिए ,इस बड़े घर को छोडकर दूसरे छोटे फ्लैट में चले गए । यहाँ उम्र व जरूरतों के अनुसार आवासस्थल बदलने में देरी नहीं लगती। जॉन के बूढ़े माँ-बाप विशाल 6 कमरे वाले बंगले को पूरी तरह व्यवस्थित करने में अपने को असमर्थ पा रहे थे । इसी कारण उसे जवान बेटे के हवाले कर दिया और उसने इसके बदले उनके लिए दो कमरे वाले फ्लैट की व्यवस्था कर दी। मुझे यह बात बहुत पसंद आई।उनका बेटा जरा ज्यादा ही संजीदा रहता है।न मैंने उसे कभी हँसते देखा न ही उसने किसी पड़ोसी से हॅलो किया। शादी अभी की नहीं क्योंकि बिना विवाह के वह सब कुछ हो रहा है जो भारत में विवाह के उपरांत होता है। यहाँ यौन संबंधों पर कोई प्रतिबंध नहीं है—न समाज का, न कानून का और न भावनाओं का। शायद उस नवयुवक को भी भावनात्मक स्तर पर जुड़ाव पसंद नहीं।
   बगल वाले घर में रहने वाले पति –पत्नी बड़े खुशमिजाज़ लगे। उनके दो प्यारे प्यारे बच्चे हैं। उनके चेहरे पर भी मीठी मुस्कान गुनगुन करती  रहती है। उनकी माँ नताशा और मेरे बीच कुछ दिनों तक तो मौन संभाषण चलता रहा। फिर हमारा मिलन दोस्ती में बदल गया। कुछ वर्षों पहले यह परिवार ब्राज़ील से आकर यहाँ बस गया है। नताशा को फूलों से बहुत प्यार है। जरा सा समय मिला बस एप्रिन ,ग्लब्स पहन  खुरपी हाथ में थाम लेती है। धूप की कर्कशता से बचने के लिए टोपी पहनना नहीं भूलती। खुद तो पौधों की काँट- छांट करती ही है आज तो बच्चों के हाथों में भी छोटी सी बाल्टी और खुरपी थमा दी । छोटे –छोटे हाथों से मिट्टी खोदते माँ की नकल करते बड़े प्यारे लग रहे हैं।अरे ये तो एक दूसरे की तरफ मिट्टी भी उछाल रहे हैं। हैरानी है इतनी सफाई पसंद देश में बच्चे अपने कपड़े गंदे कर रहे हैं। पर बचपन तो बचपन ही है । सारे नियम –कानून ताक मेंरख दिए जाते हैं। असल में ये बच्चे शाम को नहाते हैं ।अंधेरा होते ही नहा -धोकर रात का भोजन करेंगे। वैसे भी मेरे ख्याल से बच्चों को मिट्टी से एकदम दूर भी नहीं रखना चाहिए क्योंकि उसमें कुछ ऐसे तत्व होते हैं जो वैक्टीरिया से लड़ने की शरीर में क्षमता पैदा करते हैं।  एक प्रकार से बागवानी यहाँ की जीवन पद्धति का एक खास हिस्सा है।बच्चों इस तरह से खेल ही खेल में बहुत कुछ सीख जाते हैं।
    पार्टी –वार्टी में नताशा के यहाँ रिशतेदारों का अच्छा खासा जमघट रहता है। कनेडियन डे के अवसर पर उसके यहाँ भाई –बंधु बिहस्की-बीयर पी रहे थे। हमारे और उसके घर के बीच मुश्किल से चार –पाँच गज ऊंची दीवार खड़ी है। सो खूब  मौजमस्ती सुनाई –दिखाई दे रही थी। नताशा के पति मि॰ थामस अपने 6  के बालक को भी गिलास से घूंट भरवा रहे थे। मैं तो  यह सब देखकर दंग रह गई पर यथार्थ के धरातल पर उतरते ही सब कुछ स्पष्ट हो गया।  पीना- पिलाना तो इनकी परंपरा है । इसका अभ्यस्त करने के लिए बच्चों को बचपन से ही वाइन-बीयर देने लगते हैं दूसरे ठंड भी बहुत पड़ती है। उसका मुक़ाबला करने में यह सहायक होती है। परंतु बच्चों के जन्मदिन या अन्य अवसर पर बाल मित्रों को सोमरस नहीं दे सकते।
    सुबह शाम मैं पिछली गली का चक्कर लगाते अच्छी सैर कर लेती हूँ। अभी शाम को घूम कर दरवाजे की सीढ़ियों पर बैठ गई हूँ और निगाहें मेरी आकाश की ओर लगी है। लुभावने रंगों के अक्स में भीगा गगन—ओह कितना लुभावना है। अंदर जाने को मन ही नहीं करता। इस समय ज़्यादातर पड़ोसी अपने बगीचे में निकलकर  बागवानी करते हुए  प्रकृति प्रेम का परिचय दे रहे हैं। 
   शैली हमारे सामने रहती है। वह अपनी छोटी सी वाटिका में बारबैक्यू में मुर्गी(chicken) भून रही है। शायद उसकी दोनों बेटियाँ आने वाली है। ये अविवाहित माँ की संताने हैं।प्रेमी तो अपने प्रेम की निशानियाँ देकर अलग हो गया। शैली ने बड़ी मेहनत से पालकर बड़ा किया है। अब तो बड़ी हो गई हैं पर रहती अपनी माँ से अलग ही। नौकरी के कारण रविवार को ही बेटियाँ अपने बॉय फ्रेंड के साथ माँ से मिलने आ पाती हैं और पुराने कपड़ों की तरह अपना बॉय फ्रेंड बदलती रहती हैं। रविवार शैली के जीवन में अनोखा त्यौहार बनकर आता है। अलगाव,अकेलापन कितना दहला देने वाला होते है यह मैंने शैली से ही जाना। चुंबनों की तपिश और स्मृतियों की गर्माहट उसके प्रेमी को नहीं बांध पाई पर वह उन्हीं की जकड़न में तड़प उठती है। उसके इस अत्यंत नाजुक संवेदनशील मसले को छूने का साहस मुझ में न था ।कौमार्य रक्षा हेतु अपने पर नियंत्रण रखना तो उसके समाज में अनिवार्य नहीं पर इस स्वतन्त्रता में भी अतीत की छीलन उसे चैन से नहीं बैठने देती। समय –बेसमय भीतर बाहर की टूटन उसे दिन में सौ बार रुला देती है।
   ऐसे पूरे -अधूरों के बीच जब भी मैं चमकीले रंगों की कल्पना करती हूँ,सब गड्ड –सड्ड हो जाते हैं।
क्रमश :    


शुक्रवार, 3 जून 2016

नौवीं कड़ी

कनाडा डायरी के पन्ने 

16/4/2003
                             वह लाल गुलाबी मुखड़ेवाली 
                  
                                 
                                     सुधा भार्गव 


अप्रैल मास में उन दिनों मैं कनाडा की राजधानी ओटवा में ही थी । देखते ही देखते बसंत आ गया और देवदार को अपने आगोश में ले लिया । विरही सा कुम्हलाया जर्जर वृक्ष रंग –बिरंगे पत्तों से धक गया। हरे पीले लाल पल्लवों की पलकों के साये में बैठे खिन्न चित्त लिए पक्षी भी चहचहने लगे । ठंड से ठिठुरी कलियों की आँखें खुलीं तो सूर्यवाला के कपोलों पर लाली छा गई।
मुझे भी तो धूप दूध की तरह सुखद लगने  लगी । अप्रत्याशित खुशी मेरे उनीदे अंगों से छ्लकी  पड़ती थी। एक कवि की कुछ पंक्तियाँ गुनगुनाने लगी क्योंकि वे सत्यता उजागर करती प्रतीत हुईं।
                                   
वसंत आ गया
                    
महोत्सव छा गया
                                  
टटोलने लगी उँगलियाँ
                                 
 मादक भरी देह को।  
                                  
उन्माद की आंधी चल पड़ी
                                  
मन की नदिया उफन पड़ी
                                  
पोर पोर दुखने लगा
                                 
दहकने लगा।  
                                  
अनुराग का देवता
                                  
अंग –अंग में पैठ गया
                                  
वसंत के प्रेम पग देते संदेशा फूल को
                                  
लो मैं आ गया।                 
                                                                                 
व्यस्तता की सरिता चारों तरफ उमड़ पड़ी थी । हमें भी सुस्ती में समय गंवाना मंजूर न था। निश्चित किया गया सपरिवार पिकनिक के लिए चला जाए वह भी फलों के बाग में जहां जी भरकर स्ट्रावरी चुने,तोड़ें और खाएं।
यहाँ मई –जून में स्ट्रावरी पकनी शुरू हो जाती हैं और ज्वैल स्ट्रावरी की किस्म सबसे  उत्तम होती है –बेटे ने जब यह बताया मेरे बच्चों की सी हालत हो गई । शोर मचाने लगी जल्दी चलो।
जैसे –तैसे रात काटी और  अगले दिन 10 बजे के करीब सुबह चल दिए फार्म की ओर । साथ में अपने -अपने डिब्बे,टोपी धूप का चश्मा और पानी की बोतल ले ली ताकि धूप से बचा जा सके ।  खाली डिब्बे भी रख लिए ताकि उनमें पानी भरकर स्ट्रोवरी धोई जा सकें।

फार्म में स्ट्रावरी की लंबी कतारें थीं जिनके बीच में झंडियाँ लगी थीं ।
 समझ नहीं सके यह सब क्या है । फार्म के मालिक के पास जाने पर उसने हमे प्लास्टिक की चार डलियाँ पकड़ा दीं ताकि फल तोड़कर उसमें रख सकें। उसमें आधा किलो फल आता था । शर्त थी खूब स्ट्रावरी खाओ पर आधा किलो फल खरीदने जरूर हैं।
सौदा घाटे का नहीं था । उसने हमारे साथ एक गाइड कर दिया । मैं घबरा गई –यह साथ में रहेगा तो छक कर खाएँगे कैसे?। कहीं देखकर यह न सोचे –कैसे हैं ये लोग ,भुक्कड़ की तरह टूट पड़े हैं। अपनी प्रतिष्ठा का सवाल था।इसलिए अपने पर नियंत्रण रखना जरूरी लगा।
मैंने प्रश्नों की झड़ी लगा दी। वह उत्तर देता गया। पंक्ति में जहां तक फल का चयन हो जाता था वहाँ पहले स्थान से झंडी निकालकर चयन समाप्ति स्थल पर वह लगा दी जाती थी । उसने हमसे आग्रह किया गूदेदार कड़ी और लाल स्ट्रोवरी ही तोड़ें । डिब्बों में पानी भर कर रखें । 2 मिनट फल उसमें पड़ा रहने दें फिर उसे खाएँ। धूप तेज है ,खूब पानी पीयेँ और पेट को खाली न रखें वरना एंबुलेंस मंगानी पड़ेगी। कह कर हंस पड़ा। उसका मित्रभाव अच्छा लगा।
फल तोड़ने के विशेष कायदे पर उसने ज़ोर दिया। फल का बर्बाद होना उसे असहनीय था। गाइड ने पौधे की कोमल टहनी एक हाथ से पकड़ी,दूसरे हाथ से फल को ऊपर से धीरे से मोड़ते हुए तोड़ लिया और उसे हथेली पर रख लिया। ।उतावली में मेरा पाँव क्यारी में जा पड़ा। वह एकाएक चिल्लाया –मेमसाहब ,पौधे न कुचलो।
उसने एक खास बात का और जिक्रा किया। खाने वाली स्ट्रावरी को ही पानी से धोना चाहिए। फ्रीज़ करना हो तो बादली छाया या प्रभाती हवा में तोड़ो। उस समय तो सूर्य का प्रचंड ताप था । इसका मतलब आधा किलो खरीदा फल बेकार जाएगा। वह हमारी दुविधा भाँपते हुए बोला-स्ट्रावरी पेड़ की छाया में तोड़कर रख दीजिए । कार में सीट के नीचे ठंडक में वे आराम से सो जाएंगी । घर पहुँचने पर भी ताजगी से भरपूर होंगी।
उसका फल के बारे में अच्छा - खासा ज्ञान था। पर अब मुझे उसका ज्ञान खल रहा था । इंतजार में थी वह जाए तो स्ट्रोवरी पर धावा बोला जाए। बहू –बेटे को खाने का इतना लालच न था। वे पहले भी आचुके थे ,गले तक खा चुके थे । गाइड के जाते ही मैंने भार्गव जी की ओर देखा-मंद मुस्कान ओठों पर थी। शायद वे भी गाइड के जाने की प्रतीक्षा में थे।  



हमारे चारों तरफ स्ट्रावरी बिखरी पड़ी थीं। मंद बयार में पत्तों के पीछे से उनका लुकाछिपी का खेल चल रहा था। आहिस्ता से मैंने उनको छूआ। लाल गुलाबी मुखड़े वाली शिशु सी ---। तोड़ूँ या न तोड़ूँ---  असमंजस में थी । ज्यादा देर तक अपने पर काबू रखना असंभव सा लगा। मोटी –मोटी ,रसीली, अपनी महक फैलाती हुई मेरी टोकरी में समाने लगी। वश चलता तो तोड़ते ही अपने मुख में रख लेतीं पर उनपर छिड्के केमिकल को साफ करना भी जरूरी था। मैंने आठ –दस स्ट्रावरी मुंह में रख ली तब सुध आई दूसरे भी पास खड़े हैं उनके सामने भी पेश करना चाहिए।
बचपन में अपने गाँव में सुबह –सुबह नहर की पुलिया पार करके छोटे भाई के साथ मैं खेत में घुस जाती। कभी गन्ना तोड़ती,कभी टमाटर। बाग का मालिक बाबा को जानता था वरना हमें डंडे मारकर बाहर निकाल देता। मेरा वह बचपन कुछ समय को लौट आया था।
बेटा क्यारियों से बाहर निकल गया था। पहले तो मुझे खाता देखता रहा फिर बोला –बस भी करो माँ ,पेट खराब हो जाएगा ।
-ज़िंदगी में पहली बार तो इस  तरह खा रही हूँ ,कोई पेट –वेट खराब नहीं होगा।
एक स्ट्रोवरी खाकर नजर घुमाती –अरे यह तो और भी रसीली और बड्डी है। उसे तोड़ती,धोती और गप्प से खा जाती। यह सिलसिला गोधूलि तक चला। पेट भर गया पर नियत नहीं भरी। 
-माँ ,अब चलो ।अगली बार चेरी के फार्म पर चलेंगे। वहाँ और भी आनंद आएगा।  
-सच!वायदा रहा। मैं चिहुँक उठी और बालिका की तरह हिलती -डुलती उसके पीछे-पीछे कदम बढ़ाने लगी।

(अंतर्जाल पत्रिका साहित्य कुंज- जून प्रथम अंक 2016 में प्रकाशित) 
क्रमश:  



शुक्रवार, 6 मई 2016

कड़ी 8-कनाडा डायरी के पन्ने

साहित्य कुंज अंतर्जाल  पत्रिका में प्रकाशित -27॰04 ॰2016 , लिंक है-
http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/S/SudhaBhargava/08_Shisupalan_kakshaayen.htm


शिशुपालन कक्षाएँ

सुधा भार्गव 

14/4/2003

यहाँ तो अप्रैल में भी गुलाबी ठंड सताती रहती है इसलिए एक स्वटर या शौल लटकाए ही रहती हूँ । रात में न मक्खी –मच्छर न पसीना । लिहाफ ओढ़कर एक बार सोई तो सुबह 7बजे से पहले नींद नहीं टूटती। आज तो बहू –बेटे की अंतिम पेरेंटस क्लास है। मुझे ये नि:शुल्क कक्षाएँ बहुत रोचक लगीं
प्रथम बार माँ –बाप बनने का सौभाग्य मिलने पर युवक -युवती को इस प्रकार शिक्षित किया जाता है कि वे कुशलता से अपनी संतान के पालन –पोषण का उत्तरदायित्व निभा सकें। राज्य की ओर से जगह-जगह स्वास्थ्य केंद्र खुले हुए हैं । इनमें प्रतिमाह होने वाले बच्चे की विकास प्रक्रिया और माँ के शरीर में होने वाले परिवर्तनों से अवगत कराया जाता है। पति अपनी पत्नी के कष्टों को जानकार उसके प्रति पूर्ण संवेदनशील रहता है । आत्मीयता के एकात्मक क्षणों में समर्पण की पराकाष्ठा मधुर हो उठती है।

शिशु जन्म के पश्चात दुर्बल माँ की देखभाल अधिकांशतया पति  को ही करनी पड़ती है । इसी कारण नौकरी पेशेवाली माँ को तो कई महीने की छुट्टियाँ मिलती ही हैं पर साथ में पिता को भी कुछ दिनों का वेतनिक अवकाश प्रदान करना अनिवार्य है । यदि कंपनी की तरफ से छुट्टियाँ नहीं मिलतीं तो सरकार उनकी व्यवस्था करती है।
माँ को समय –समय पर अपने स्वास्थ्य की जांच करने चाइल्ड –मदर यूनिट में जाना ही पड़ता है। उनके समस्त मेडिकल परीक्षणों की व्यय राशि का भार यहाँ सरकार करती है ।

इस सुव्यवस्था में आधुनिक चिकित्सा संबंधी जागरूकता स्वाभाविक है ।रक्त परीक्षण ,ब्लड प्रेशर ,डाईविटीज ,संतुलित भोजन आदि शब्दों पर अज्ञानता की परतें जम कर नहीं रह गई है । नर्सें भी अपने पेशे के प्रति ईमानदार हैं । वे बहुत धैर्य से अनुभवहीन माँ को बच्चे से संबन्धित जानकारी देती हैं। इससे न जाने कितने भोले भालेमुखड़े मुरझाने से बच जाते हैं ।

अचरज समस्त सीमाएं लांघ गया जब मुझे यह जानकारी मिली की अस्पताल में प्रसव पीड़ा तथा शिशु जन्म के समय पति भी पत्नी के साथ –साथ प्रसव कक्ष या आपरेशन थियेटर में जाता है । लोगों की यह धारणा है कि पति की सहानुभूति व प्रेमपूर्ण स्पर्श  से बच्चा सुविधा से होता है । औरत यह अनुभव करे कि जिस व्यक्ति के  कारण उसको भयंकर प्रसव पीड़ा से गुजरना पड़ रहा है वह उसके दुख के समय कदम से कदम मिलाकर चल रहा है तो बहुत सुकून मिलता है। एक और आश्चर्य !यहाँ बच्चे का नाल काटना बाप के लिए गर्व की बात है । लेबर रूम में प्रसव के समय फोटो भी खींची जा सकती है जो एल्बम की शोभा बढ़ाने में कामयाब होती है । 

कितना अच्छा होता यदि मेरे देश  भारत में भी मेडिकल साइन्स के क्षेत्र में इतनी सुविधाएं देकर सावधानी बरती जाती। इससे पुरुष  अपने बच्ची की जन्मधात्री के साथ अवश्य न्याय कर पाता । 

सोमवार, 1 फ़रवरी 2016

डायरी के पन्ने –कड़ी 7


साहित्यकुंज अंतर्जाल पत्रिका के फरवरी प्रथम अंक में प्रकाशित   
कनाडा सफर के अजब अनूठे रंग
सुधा भार्गव

21/4/2003
कनाडा की ठंड से छुटकारा मिला सोचकर अगड़ाई ले सुबह- सुबह उठ बैठी।   सोचा –आज सुबह की सैर की जाए। उस समय तापक्रम 150 था परन्तु अखबार –द ग्लोब एंड मेल में एक महिला की छपी फोटो देख ठिठक गई जिसके चित्र के नीचे लिखा था –Matin khan lies in a Toronto hospital bed last month,recovering from infection after kidney transplant surgery in her native Pakistan. बहुत से प्रश्न सुई सी चुभन देने लगे। मतिन खान की क्या मजबूरी थी पाकिस्तान जाने की,जबकि कनाडा चिकित्सा के क्षेत्र में बहुत उन्नत व सतर्क है। मैं तो खुद ही कनाडा में अपना स्थाई निवास स्थान बनाने की सोच रही थी। पर मिसेज खान के बारे में पढ़कर विचारधारा  को नया मोड़ देना पड़ा।


                      (अस्पताल के पलंग पर लेटी हुई मिसेज खान)

कनाडा में मिसेज खान का नाम किडनी मिलने वालों की प्रतीक्षारत सूची में था और इस बात की कोई गारंटी नहीं थी कि 7 वर्ष के बाद भी उनकी बारी आ जाती। एक हफ्ते में तीन बार डायलेसिज ट्रीटमेंट के बाद भी स्वास्थ्य बदतर होता जा रहा था, इसीलिए वे लाहौर गई। वहाँ एक मजदूर का गुर्दा उनके लिए उपयुक्त रहा। उन्होंने उसे 25000 पाकिस्तानी मुद्रा में खरीदा ।पाकिस्तान में इतनी गरीबी है कि कुछ लोगों को हमेशा धन की जरूरत होती है और एक गुर्दा बेचकर इतना कमा लेते हैं कि पूरी  ज़िंदगी चैन से गुजर जाए।

कनाडा में मानव अंगों की ख़रीदारी गैरकानूनी है। तब भी 30 से 50%तक वहाँ के निवासी प्रतिवर्ष भारत ,फिलीपाइन्स,चायना आदि देशों में मानव अंगों की तलाश में जाते हैं। यदि कोई देश नागरिकों की जरूरतों को पूरा करने में असमर्थ हो तो बेचारे नागरिक क्या करें। जीवन और मौत के बीच झूलते हुए कहाँ जाएँ? ऐसे कानून से क्या फायदा जों मौत की गिरफ्त को असहनीय कर दे।

कुछ आंकड़े तो बड़े चौकाने वाले हैं। एक ग्रुप की रिपोर्ट के अनुसार अंगों के इंतजार में सन 2002 में कनाडा में करीब 237लोग काल का ग्रास बन गए। कनेडियन इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ इन्फोर्मेशन से ज्ञात हुआ कि दिसंबर 31/2002तक करीब 3956 मरीज विभिन्न अंगों की आस में दिन बिता रहे थे। केनेडियन ऑर्गन रिपलेसमेंट रजिस्टर्स बोर्ड के चेयरमेन ने तो अपने टेलीफोन इंटरव्यू के दौरान स्वीकार भी किया –यदि हमारे पास और ज्यादा मानव शरीर के अंग होते और उनका प्रत्यारोपण ठीक समय पर कर पाते तो कम आदमी मरते।

जिन दिनों मिसेज खान अफगानिस्तान और भारत होते हुए  पाकिस्तान पहुंची उन दिनों ईराक –अमेरिका युद्ध के बादल छाए हुए थे। जगह जगह लाहौर मेँ नागरिक अमेरिका के झंडे जलाकर अमेरिका की युद्ध नीति की खिलाफत मेँ जुलूस निकाल रहे थे। किसी तरह मिसेज खान अपने परिवार मेँ पहुंची जहां उनके भाइयों और माँ ने इलाज के लिए धन जुटाने में कोई कसर न रखी। उन्होंने अपनी संपति बेची,बैंक से उधार लिया,अपने बचत खाते से धन निकाला।

रावलपिंडी मेँ मार्च 1998 मेँ उनके एक गुर्दे का प्रतिरोपण हुआ पर 2000  मेँ गर्मियों मेँ ही उनका शरीर प्रतिरोपित गुर्दे को सहन करने मेँ असमर्थता दिखाने लगा। कमर के निचले भाग मेँ दर्द बढ़ता ही गया। बुखार तो हमेशा रहता ही था। 12 मार्च को वे किसी तरह टोरेंटों पीयर्सन इन्टरनेशनल एयरपोर्ट पहुँचीं । सुरक्षा हेतु विशेष प्रकार की वेल्ट उनकी कमर के चारों तरफ लपेटी गई थी। हवाई अड्डे पर एंबुलेंस पहले से ही खड़ी थी  जिसने उन्हें स्टुअर्ट माइकेल हॉस्पिटल पहुंचाया।

मिसेज खान हड्डियों में वेक्टीरिया संक्रमण(ostcomyelitis)से पीड़ित थीं। टी वी का भी शक था। कारण का तो ठीक से पता न चला पर भाग्य से दवाइयाँ असर दिखाने लगीं। धीरे धीरे उनकी दशा सुधरने लगी। दर्द से राहत मिली। आज वे टोरेंटों में रीहेविलेशन हॉस्पिटल में हैं जहां डॉ जाल्ट्ज़मैन(Zaltjman)जैसे विशेषज्ञों की देखरेख में अपने पैरों और कमर की मांस पेशियों को मजबूत बनाने में जुटी हुई हैं।

डॉ जाल्ट्जमैन चिकित्सा की इस सफलता पर बहुत खुश थे। परंतु उन्होंने भी माना कि मिसेज खान तकदीरवाली हैं वरना इलाज के समय बहुत कठिनाइयाँ आईं,साथ ही कनाडा मेँ गुर्दा न मिलने के कारण उन्होंने जो उसके प्रतिरोपड़ का मार्ग अपनाया वह बहुत खेचीला और बीहड़ रहा। यदि मुझको भी अपने या अपने बच्चे के लिए 8 वर्षों तक इंतजार करना पड़ता तो उसका विकल्प जरूर सोचता।
इस महिला की स्वास्थ्य सम्बन्धी खबरें बड़ी दयनीय लगीं। उसमें मेरी इतनी दिलचस्पी हो गई कि रोज ही अखबार टटोलती हूँ । अपने प्रभु से उसकी आरोग्यता की कामना भी करती हूँ । मेरे जैसे न जाने कितने उनके लिए दुआ मांग रहे होंगे। शायद इन प्रार्थनाओं के कारण ही वे जल्दी से ठीक होकर घर चली जाएँ । मेरी शुभकामनाएँ हमेशा उनके साथ रहेंगी।
क्रमश:


शुक्रवार, 15 जनवरी 2016

डायरी के पन्ने -कड़ी 6

प्रकाशित -साहित्य कुंज अंतर्जाल मासिक पत्रिका जनवरी के दूसरे अंक 2016  में। 
www.sahityakunj.net
/LEKHAK/S/SudhaBhargava/06_patjhar_se_kinaaraa.htm

                                              कनाडा  सफर के अजब अनूठे रंग       
                                                                  सुधा भार्गव 
17/4/2003 
पतझड़ से किनारा

       आज हम बेटे के  मित्र आलोक के यहाँ दावत उड़ाने गए । वहाँ अन्य जोड़े भी थे । किसी का बच्चा किंडरगारडन में जाता था तो किसी का नर्सरी में । बातों ही बातों में एक ने मुझे बताया –आंटी यहाँ का कायदा मुझे बहुत पसंद आता है । केवल किताबी ज्ञान न देकर शिष्टाचार ,सद्व्यवहार और मानवीय कोमल भावनाओं को उजागर करने पर अधिक बल दिया जाता है पर मेरे आश्चर्य की सीमा नहीं रही !ये नियम –कानून ,यह सोच कहाँ विलीन हो गए थी  जब इसी धरती के एक कोने में इराकीय मासूम बच्चों को सदैव के लिए मौन किया जा रहा था ।

        मेरी कुछ स्मृतियाँ  भी पुनर्जीवित होने लगीं और आलोक की बात पर विश्वास न कर सकी।
बात ही कुछ ऐसी थी। कुछ साल पहले की ही तो बात है मेरे मित्र श्रीमन के बेटी –दामाद अपने प्यारे  बच्चे रूबल  के साथ चार साल के लिए लंदन गए। परंतु सास- ससुर की अस्वस्थ्यता के कारण बेटी सुलक्षणा को दामाद जी से  6माह पहले ही भारत लौटना पड़ा। बड़ा अरमान था कि बेटे को कुछ  साल तक वहीं पढ़ाएंगे। उसने नर्सरी से निकलकर कक्षा 2 उत्तीर्ण भी कर ली थी और रूबल वहाँ बहुत खुश था। जब उसे पता चला कि भारत जाने का उसका टिकट खरीदा जा चुका है तो उखड़ पड़ा ।

        तमतमाए चेहरे से उसने प्रश्न किया –माँ ,किससे पूछकर आपने भारत जाने का मेरा टिकट कराया?
सुलक्षणा को इस प्रकार के प्रश्न की आशा न थी। वह हँसते हुए बोली –अरे ,तुम मेरे बिना कैसे रहोगे ?
-पापा तो यहीं रहेंगे !
-तुम्हारे पप्पू तो अस्पताल में मरीजों को देखते रहेंगे,तुम्हारी देखभाल कौन करेगा ?
-मैं अपनी देखभाल करना अच्छी तरह जानता हूँ ।
-कैसे?
-स्कूल में हमें बताया गया है जिनके माँ –पापा अलग रहते हैं या उनका तलाक हो जाए तो उन्हें अपने काम अपने आप करने चाहिए।
तलाक शब्द इतने छोटे बच्चे के मुंह से सुनकर सुलक्षणा का माथा भन्ना गया। फिर भी उसके कौतूहल ने सिर उठा लिया था।
उसने पूछा –मैं भी तो सुनूँ---मेरा लाड़ला क्या –क्या ,कैसे-कैसे  करेगा ?
-घर में अकेला होने पर जंक फूड ,प्रीकुक्ड फूड,फ्रीज़ फूड खाकर और दूध पीकर रह लूँगा। मेरे पास इन्टरनेट से लिए होटल के फोन नंबर भी हैं । डायल करने से वे तुरंत घर में सबवे सेंडविच ,पीज़ा पहुंचा देंगे। माँ ,नो प्रोब्लम !
माँ को झटका सा लगा –वह अपने बच्चे को जितना बड़ा समझती थी उससे कहीं ज्यादा बड़ा हो गया उसका बेटा ।
बुझे से स्वर में बोली –बेटा तुम्हें मेरी याद नहीं आएगी ?
-आएगी मम्मा पर टी वी मेरा साथी जिंदाबाद!
-तुम बीमार हो गए तो मैं बहुत परेशान हो जाऊँगी ।
-अरे आप भूल गईं !आपने ही तो बताया था एक फोन नम्बर जिसे घुमाते ही एंबुलेंस दरवाजे पर आन खड़ी होगी ।
-लेकिन बेटा तुम्हें तो मालूम है कि पापा थक जाने के बाद चिड़चिड़े हो जाते हैं । अगर तुम्हें डांटने लगे तो तुम्हें भी दुख होगा और मुझे भी ।
-देखो माँ! डांट तो सह लूँगा क्योंकि पैदा होने के बाद डांट खाते –खाते मुझे इसकी आदत पड़ गई है पर मार सहना मेरे बसकी नहीं । मुझे स्कूल में अपनी रक्षा करना भी बताया जाता है।
-अपनी रक्षा !
-मतलब ,अपने को कैसे बचाया जाए !
-तुम अपनी रक्षा कैसे करोगे ? मेरे भोले बच्चे के हाथ तो बहुत छोटे –छोटे हैं । प्यार से सुलक्षणा ने रूबल के हाथों को अपने हाथों में ले लिया।
ममता को दुतकारते हुए रूबल ने अपना हाथ छुड़ा लिया –अगर पापा मुझ पर हाथ उठाएंगे तो मैं पुलिस को फोन कट दूंगा। वह पापा को झट पकड़ कर ले जाएगी या उन्हें जुर्माना भरना पड़ेगा। यहाँ बच्चों को मारना अपराध है । मैं आप के साथ भारत नहीं जाऊंगा ,वहाँ मेरे चांटे लगाओगी ।

       सुलक्षणा की इस बात में दो राय नहीं थीं कि उसका बेटा कुछ ज्यादा ही सीख गया है । उसने लंदन छोडने में ही भलाई समझी। उसे एक –एक दिन भारी पड़ रहा था । बेटे के व्यवहार से विद्रोह की बू आ रही थी लेकिन डॉक्टर होने के नाते वह यह भी जानती थी कि उसकी सोच को एक उचित मोड़ देना होगा।

       सुलक्षणा भयानक अंधड़ से गुजर रही थी। यह कैसा न्याय !गलती करने पर माँ –बाप को दंडित करने की समुचित व्यवस्था है परंतु माँ –बाप से जब संतान बुरा आचरण करे तो उन्हें सजा देने या समझाने का कोई विधान नहीं ।
        अपने को संयत करते हुए सुलक्षणा ने बेटे को समझाने का प्रयास किया –बच्चे हम अपने देश में तुम्हारे दादी –बाबा के साथ रहते हैं और एक दूसरे से बहुत प्यार करते हैं।  वे तुम्हारे बिना नहीं रह सकते ।
-बाबा का तो कल ही फोन आया था । पूछ रहे थे ,हम कब वापस आ रहे हैं । उनकी याद आते ही बच्चे  की आँखें छलछला आईं। आखिर जड़ें तो रूबल की भारतीय थीं।

        अब रूबल दूसरी ही दुनिया में चला गया  जहां रिश्तों की महक से वह  महकता रहता था। कुछ रुक कर बोला –दादी तो ज्यादा चल नहीं सकतीं । बाबा को ही सारा काम करना पड़ता होगा । आप भी तो यहाँ चली आईं। मेरे दोस्तों के दादी –बाबा तो यहाँ उनसे अलग रहते हैं । बूढ़े होने पर भी उन्हें बहुत काम करना पड़ता है । कल मम्मा ,आपने आइकिया (I K E A)में देखा था न ,वह पतली –पतली टांगों वाली बूढ़ी दादी कितनी भारी ट्रॉली खींचती हाँफ रही थी । उसकी सहायता करने वाला कोई न था । रूबल का मन करुणा से भर गया ।

         कुछ मिनट  पहले बहस की गरमा गर्मी शांत हो चुकी थी । हरिण सी कुलाचें मारता रूबल का मन अपनी जन्मभूमि की ओर उड़ चला था ।
-मम्मी जब आप लखनऊ में अस्पताल चली जाती थीं तो दादी माँ मुझे खाना खिलातीं ,परियों की कहानी सुनातीं। ओह !बाबा तो मेरे साथ फुटबॉल खेलते थे । अब तो वे अकेले पड़ गए हैं । अच्छा मम्मी !मैं भी चलूँगा आपके साथ । मैं अभी ई मेल बाबा को कर देता हूँ।
       अपने अनुकूल बहती बसंती बयार में सुलक्षणा ने गहरी सांस ली । उसको लगा जैसे पतझड़ उसके ऊपर से गुजर गया ।
क्रमश:

सोमवार, 4 जनवरी 2016

कड़ी 5- बेबी शावर डे


प्रकाशित-साहित्य कुंज अंतर्जाल मासिक पत्रिका जनवरी प्रथम अंक 2016 में लिंक http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/S/SudhaBhargava/05_Baby_Shower_Day.htm 

डायरी के पन्ने 

कनाडा सफर के अजब अनूठे रंग
सुधा भार्गव 

12/4/2003

बेबी शॉवर डे

कनाडा पहुँचने के दो दिन पहले बर्फीला तूफान आ चुका था। 10अप्रैल तक सड़क के दोनों ओर बर्फ ही बर्फ  जमी थी।अब यह पिघल गई है। खिड़की से झाँककर इस अनूठे प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद उठा रही हूँ । आमने खड़ा चिनार का वृक्ष (maple tree) पल्लवविहीन होते हुए भी सूर्य की आभा से जीवन पा रहा है। उसके नीचे बिछी बर्फ की शुभ्रता युद्ध के मँडराते बादलों के मध्य शांति का संदेश देती प्रतीत होती है । अमेरिका –ईराक के युद्ध के समाचार सुनते –पढ़ते कान पक चुके हैं । टी.वी. में देखे हुए रोंगटे खड़े करने वाले दृश्यों से राहत पाने के लिए प्रकृति में खो जाना चाहती हूँ।
आज दोपहर लंच के लिए बहू शीतल की सहेली नमिता के घर जाना है। यहाँ  भारत से आए माँ –बाप को विशेष अनुग्रह द्वारा निमंत्रित किया जाता है । जहां से निमंत्रण मिलता है वहाँ मित्र एक –एक सब्जी , पूरियाँ या मिठाई बना कर ले जाते हैं। इस सहयोग से 30 जनों के खाने का प्रबंध सरलता से हो जाता है । यहाँ यह जरूरी भी है क्योंकि नौकर शाही प्रथा के अभाव में खुद ही मालिक हैं और खुद ही नौकर । शीतल ने भी ले जाने के लिए केक बना ली है वह भी बिना अंडे के । नमिता की माँ अंडा नहीं खाती हैं।
हमने जैसे ही नमिता के घर में प्रवेश किया फोटोग्राफी होने लगी । सबकी नजरे  शीतल पर टिकी थीं । मैं हैरान –यह सब क्या हो रहा है!
बाद में पता लगा कि  मेरे बहू का ही बेबी शावर डे (baby shower day)मनाने का आयोजन है । इस अवसर की सफलता के लिए चुपके –चुपके तैयारियां करके भावी माँ का अभिनंदन तालियों की गड़गड़ाहट व आश्चर्य मिश्रित भाव-भंगिमाओं के साथ किया जाता है । मित्र और रिश्तेदार नवशिशु की कुशलता व उसके आगमन की कामना करते हैं। इससे  वात्सल्य तरंगे झनझना उठती हैं।  जो इस कार्यक्रम के प्रबंधकर्ता होते हैं उनको ही इस उत्सव की जानकारी होती है बाकी सब अनभिज्ञ । इसीकरण मुझे व शीतल को इसके बारे में कुछ पता न था ।
शीतल किसी की मीठी धुन में समा गई। आने वाले बच्चे की सुखद कल्पना से उसके चेहरे पर ताजी गुलाब खिल गए । उसे कुर्सी पर बैठा दिया गया है ताकि थकान उसके लावण्य को कम न कर दे । बारी –बारी से मित्रों ने उपहार देकर अपने  स्नेह धागे से उसे बांध दिया। सारे पैकिट खोलकर वह  सबको दिखा रही है और बेटा पास में बैठा देने वालों की प्रशंसा कर रहा है । शौक व अरमानों से अगर कोई वस्तु भेंट में दे तो उस ही के सामने उसकी तारीफ में दो बोल बहुत जरूरी है –यह मैंने अभी महसूस किया ।
बहुत कुछ तो दिया है दोस्तों ने –मॉनिटर ,डायपर्स ,कॉट,कारसीट आदि –आदि । कोई बेकार का समान नहीं ,यह देखकर मुझे बहुत अच्छा लगा । इससे नवशिशु के आने के बाद आर्थिक बोझ उठाने में भी सहायता मिलती है। उपहार देने से पहले पूछ लिया जाता है कि क्या चाहिए ?कुछ लोग शिशु पालन से संबन्धित वस्तुओं की सूची बनाकर दुकानदार को भेज देते हैं और बंधुगण अपने पसंद की वस्तु का चुनाव  कर दुकान से खरीद लेते हैं । यदि  भावी माँ –बाप के पास एक ही तरह की वस्तु दो हो जाएँ तो दुकान से उसे बदला भी जा सकता है । बिल होने पर दाम लौटा दिए जाते हैं। वस्तु लौटाने की अवधि 3-4 माह होती है । यह नियम बड़ा ही भला लगा ।न ही अनावश्यक वस्तु का जमाव हो न  पैसा नष्ट हो।
लंच के बाद आत्मीयता से एक दूसरे से  परिचय कराया गया। कनेडियन्,इटेलियन,मराठी,पंजाबी,मद्रासी बंगाली सभी तों हैं। विभिन्न क्यारियों के फूल एक ही क्यारी में नजर आ रहे हैं।
-अब कुछ खेल खेले जाएंगे जिनका संबंध गर्भवती माँ से है। शीतल की दोस्त ने ऐलान किया और मुझसे कहा – आंटी एक बात पूछूं?शैतानी उसकी आँखों से टपक रही थी ।
-हाँ !हाँ पूछो । मैं भी बहुत उत्साहित थी ।
-अच्छा बताइये !शीतल के पेट का घेरा कितना बड़ा होगा ?
मैं तो सकपका गई । जबाब देते न बना। खिसियाई बिल्ली बन मुंह छिपाने लगी । विनोदी लहजे में वह कहने लगी –आंटी आप तो सबसे ज्यादा शिल्पी के पास रहती हैं ,आपको इतना भी नहीं मालूम ! एक क्षण तो मुझे लगा ,वाकई में बड़ी भारी गलती ही गई । मुझे सोच में डूबा देख दूसरी बोली –यह सब हंसी मजाक है ताकि होने वाली माँ को अधिक से अधिक खुश रखा जा सके।
उपयुक्त उत्तर की आशा में उसने प्रश्न दूसरों की तरफ उछाल दिया । कोई संतोषजनक उत्तर नहीं  आने पर  दूसरा प्रश्न पूछा  गया-
-अब यह बताया जाए कि बालक किस तिथि को जन्म लेगा ?सबने अपने अंदाज भरे तीर चलाए । डॉक्टर ने शिशु जन्म की तारीख 8मई बताई थी। मगर यह किसी को मालूम न थी।जिसने 8तारीख के सबसे पास वाली तारीख बताई उसे इनाम दिया गया। तालियों की गड़गड़ाहट ओसकी बूंद बन माथों पर झलक पड़ी।
मेरी  नजरों के सामने 2-3गर्भवती महिलाएँ बैठी है जिन्हें अपने बेबी शावर का बेसब्री से इंतजार है पर विचित्र बात है ऐसी महिला न  उसका प्रबंध कर सकती है और न उसे आखिरी समय तक अपने ही बेबी शावर का पता लग पाता है । हाँ उसका पति अवश्य दूसरों से गुप्त रूप से मिला होता है। शुभ कामनाओं की बौछार करने की बड़ी रोमांचक व अनूठी प्रथा है इस उत्सव की विनोदप्रियता व चुहुलबाजी मुझे अब भी  रहरहकर गुदगुदा देती है।

क्रमश: 

कड़ी 4 -कनाडा एयरपोर्ट


साहित्य कुंज अंतर्जाल मासिक पत्रिका ,जनवरी प्रथम अंक 2016 में प्रकाशित,

लिंक-http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/S/SudhaBhargava/04_Canad_airport.htm

कनाडा डायरी 

04 कनाडा एयरपोर्ट

कनाडा एयरपोर्ट पर बहू-बेटे दोनों ही लेने आए थे। दिल से तो मैं यही चाहती थी कि बहू शीतल एयरपोर्ट पर न आए क्योंकि उसका प्रसवकाल निकट था। उसे फुर्ती से अपनी ओर आते देखा ,लगा तो बहुत अच्छा। गृहस्थी की गाड़ी को खींचने वाले दोनों पहिये समान रूप से सक्रिय नजर आए। उन्होंने  हमारे चरण स्पर्श किए और और सीने से लग गए।तीन वर्ष का वियोग क्षण भर में मिट गया।
सफर की सारी थकान हम अपनी मंजिल पर पहुँचते ही भूल गए। कार में एक दूसरे से नजर टकराते ही आँखों में चमक आ जाती।मूक होकर भी हजार बात कह देते। कार रॉकेट बनी हवा को चीरती चिकनी सड़कों पर सरपट दौड़ रही थी। मेरी समझ में नहीं आया –ठंडे सुहावने मौसम में भी बेटे ने कार के शीशे चढ़ा रखे हैं  और एयर कंडीशन चल रहा है।
-यहाँ तो प्रदूषण भी नहीं है । ताजी हवा के झोंके आने के लिए खिड़कियों के शीशे नीचे कर दो। मैंने सलाह दी।
उसने हमारी तरफ का शीशा थोड़ा सा हटा दिया। यह क्या !हवा के तीव्र झोंकों से हम आतंकित हो उठे। दूसरे कार की स्पीड भी बहुत तेज थी। साँय-साँय की आवाज ऐसी कर्णभेदी हो गई मानो जंगल में हलचल मच गई हो।
-अरे बंद कर शीशा । मैं चिल्ला उठी।
-बंद कर दूँ ---। आपजान कर बेटा ज़ोर से बोला और हंसने लगा। अब आया समझ में राज शीशे बंद रखने का।
रोज़लोन कोर्ट में घुसते ही उसके बंगले के सामने खड़े हो गए । सीट पर बैठे ही रिमोट कंट्रोल का बटन दबाने से खुल जा समसम की तरह गैराज का शटर ऊपर जाने लगा। लौंडरी रूम,रसोईघर ड्राइंगरूम पार करते हुए ऊपर जाने लगे। बेटा बहुत विनोदी स्वभाव का है सो सीढ़ियाँ चढ़ते-चढ़ते उसका टेप रिकॉर्डर चालू हो गया। 
-माँ, सुबह-सुबह ताजी हवा खाने के चक्कर में नीचे का दरवाजा न खोल देना। अलार्म बज उठा तो पुलिस आन धमकेगी और पकड़कर ले जाएगी।
-हम क्या चोर है!
-चोर तो नहीं पर खतरे की घंटी तो बज जाएगी। सुबह उठकर एलार्म का गलेटुआ घोंटना पड़ता है।
-यहाँ भी चोरी होती है क्या।?धनी राष्ट्रों में हमारे देश की तरह गरीबी कहाँ!भार्गव जी बोले।  
-चोरी गरीब ही नहीं करता । आदत पड़ने पर अमीर भी चोरी कर सकता है। चोरी भी तो चौसठ कलाओं में से एक है।  
-अरे वाह !पहले से क्यों नहीं बताया माँ। मैंने बेकार आई.आई.टी. में चार साल गँवाए, यही कला सीखता।
-ओह ,तू तो बहुत खिजाता है। बस मेरी बात पकड़ ली।
शीतल हमारी बातों का आनंद उठा रही थी। व्यवस्थित मास्टर बेडरूम ,बेबी रूम,से होते हुए हम अपने शयनागार में पहुंचे । स्वच्छ चादर व फूलदार लिहाफ हमारा इंतजार कर रहे थे। शीतल के हाथ का खाना खाकर कुछ ही देर में हम शुभ रात्रि कहते हुए उसमें दुबक गए।
दिल्ली में तो मन में उथल पुथल मची ही रहती थी कि बच्चे पराई संस्कृति में रह रहे हैं, कहीं बदल न जाएँ। न जाने किस विचारधारा से टकरा कर सुविधा के जाल में फंस जाएँ पर संस्कारों की जड़ें इतनी मजबूत लगीं कि भटकन की कोई गुंजाइश नहीं दिखाई दी।  
विचारों की घाटियों से गुजरते 2बज गए। दिमाग ने कहा –सोने की कोशिश तो करनी ही पड़ेगी,कल से नए वातावरण से समझौता करने और उसे समझने का श्री गणेश हो जाएगा। कुछ भी हो हम 8 अप्रैल के चले 10 की रात कनाडा अपने घर तो पहुँच ही गए थे सो चिंतारहित चादर तान सो गए ।

क्रमश: