शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017

कनाडा डायरी कड़ी -15


डायरी के पन्ने 
                     नाट्य उत्सव “अरंगेत्रम”
                 सुधा भार्गव 
5॰ 5॰ 2003

“अरंगेत्रम”

शाब्दिक अर्थ है रंगमंच पर प्रथम प्रदर्शन । “अरंगेत्रम”के अवसर पर शिष्या अपनी कला की दक्षता को सार्वजनिक रूप से प्रमाणित करती है और इसके बाद गुरू उसे स्वतंत्र कलाकार की तरह अपनी कला के प्रदर्शन की अनुमति देता है।


   डॉक्टर भार्गव की पुत्री नेहा का अरंगेत्रम(Arangetram)नाट्य उत्सव 4 मई सेंटर पॉइंट थियेटर,ओटावा में होना था। उसका निमंत्रण कार्ड पाकर बहुत ही हर्ष हुआ। विदेश में ऐसे भारतीय कला प्रेमी!आश्चर्य की सीमा न थी। शाम को जब हम वहाँ पहुंचे,हॉल खचाखच भरा हुआ था। केवल भारतीय ही नहीं उनके अमेरिकन ,कनेडियन मित्रगण भी थे। करीब चार घंटे का कार्यक्रम था। नेहा ने भरत नाट्यम नृत्य शैलियों पर आधारित लुभावने नृत्य प्रस्तुत कर दर्शकों का मन मोह लिया। हॉल करतल  ध्वनि से बार बार गूंज उठता।
  इस रस्म में मंच पर सार्वजनिक रूप से नृत्य के प्रथम प्रदर्शन के बाद छात्र यह सिद्ध कर देता है कि वह इस कला में पूर्ण पारंगत है। दक्ष कलाकार की हैसियत से वह स्वतंत्र रूप से विभिन्न कार्यक्रमों का प्रस्तुतीकरण कर सकता है।
  नेहा की गुरू डॉ बासंथी श्रीनिवासन(Dr Vasanthi Srinivasan) हैं जो ओटावा में नाट्यांजली स्कूल की संस्थापक है। वे आजकल स्कूल की डायरेक्टर हैं। उन्होंने ओटावा यूनिवर्सिटी से PhDकी और 1989 से ही फेडेरल गवर्नमेंट मेँ काम कर रही हैं। उन्होंने अनेक एक्ज्यूटिव पदों पर काम किया। आजकल ओंटोरियो क्षेत्र में कनाडा स्वास्थ्य विभाग में रीज़नल एक्जूयटिव डाइरेक्टर हैं। वासनथी जी ने भारत नाट्यम  की तंजौर शैली को आगे बढ़ाया ।     इनके गुरू श्री॰टी॰के मरुथप्पा थे। कलाविद डॉ वासनथी को नृत्यकलानिधि की उपाधि से भी सम्मानित किया गया।
  नेहा उनकी 50वीं छात्रा है जिसने अरंगेत्रम किया। हायर सेकेन्डरी की इस छात्रा के लिए सभी की शुभकामनाएँ थीं कि अध्ययन के साथ साथ नृत्य के क्षेत्र में भी नाम कमाए,उसके परिवार और भारत का नाम सूर्य किरणों की भांति झिलमिलाए।
  इस उत्सव की सफलता का श्रेय नेहा की दस वर्ष की नाट्य साधना को जाता हैं। राजस्थान के लोकनृत्यों में उसकी सदैव से रुचि रही है। उसने न जाने कितनी बार मंच पर अपना कला प्रदर्शन किया है। कई बार स्वेच्छापूर्वक नृत्य शिक्षिका रही है। खेलों  में भी वह किसी से कम नहीं । हॉकी मेँ उसकी विशेष दिलचस्पी है। शेक्सपीयर  और मीरा उसके प्रिय कवि है। इस प्रकार हिन्दी – अंग्रेजी दोनों साहित्य में उसने योग्यता पा ली है। उसका कविता लेखन इस बात का प्रमाण है।
  
डॉ भार्गव काफी समय से यहाँ हैं।  मेरे बेटे –बहू को अपने बच्चों के समान समझते हैं।किसी भी पारिवारिक –धार्मिक पर्व पर वे उन्हें बुलाना नहीं भूलते। चाँद भी उनके नेह निमंत्रण की अवहेलना नहीं कर पाता। सच,प्रेम से इंसान खिंचता  चला जाता है।
   विशेष -यह संस्मरण काफी पहले लिखा गया है। प्रिय नेहा और उनकी गुरू इस समय उन्नति के चरम शिखर पर होंगे। उनको मेरी ओर से मुबारकबाद । 

साहित्य कुंज में प्रकाशित  
02.01.2017 
 :                                                         क्रमश :

कड़ी 14-कनाडा डायरी



डायरी के पन्ने

                            स्वागत की वे लड़ियाँ
                         सुधा भार्गव  
3.5.2003 

गृह प्रवेश 

शीतल जब तब सुप्रसिद्ध महादेवी वर्मा की पंक्तियाँ गुनगुनाती रहती है-

चारु चंद्र की चंचल किरणें खेल रही हैं नभतल में
स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि और अंबर में।

     शायद उसने पहले से ही निश्चित कर रखा था-बेटी हुई तो अवनि नाम रखा जाएगा । बेटा होने पर उसे अम्बर  कहेंगे। इसलिए उस फरिश्ते  को जन्म के बाद से ही उसे अवनि कहा जाने लगा।
    जैसे ही नन्हें से शिशु को लेकर चाँद और शीतल घर में घुसे उनके स्वागत के लिए हम दोनों दरवाजे की ओर दौड़ पड़े और दिमाग के तंतुओं ने आपस में ही टकराना शुरू कर दिया---
    अवनि,प्यारी बच्ची ,तुम  तीन दिन अस्पताल रहीं  पर कह नहीं सकती तुम्हें  देखे बिना ये तीन दिन कैसे कटे?लगता था मेरे शरीर का कोई अंग छिटक कर दूर जा पड़ा है।अस्पताल में ही तुम्हारे पापा ने फोटुएँ खटखट खींचनी शुरू कर दी थीं। चेहरे पर बस बड़ी बड़ी आँखें ही नजर आईं । एकदम अपने बाबा पर गई हो । उनकी आँखों में गज़ब का आकर्षण है। बड़े होने पर तुम्हारी आँखें भी उनकी तरह हँसती और बोलती लगेंगी।
    तुम्हारे पापा के तो अंग अंग से उल्लसित किरणेँ फूट फूट पड़ रही हैं।थका हुआ है फिर भी एक मिनट मिलते ही डिजिटल कैमरे के तार टी॰वी॰से जोड़ दिए हैं और तुम्हारी अपनी मम्मी के साथ प्यारी प्यारी  फोटुएँ स्क्रीन पर आ जा रही हैं पर मेरी  तो हंसी फूट रही है –24 घंटे के बच्चे की इतनी सतर्क निगाहें और खुला मुँह। तुम्हें देख तुम्हारे  पापा का बचपन याद आ रहा है। उसका भी सोते समय मुँह खुल जाता था। मैं तो उसकी टुड्ढी के नीचे तह किया रुमाल रख देती थी कि कोई मक्खी –मच्छर न घुस जाए। देखो तो –--“मेरे बेटे से कितनी मिलती है मेरी पोती” चिल्ला-चिल्लाकर यह  कहने को मन करता है जिससे दसों दिशाएँ जान जाएँ कि तुम मेरे बेटे की बिटिया हो। मेरा वंश बढ़ रहा है।
*
आत्मीयता का सैलाब

     पोती के जन्म पश्चात एक सुबह  मैंने चाय का प्याला मुँह से लगाया ही था कि चाँद और शीतल सीढ़ियाँ उतरकर जल्दी से आए। बेटा बोला –माँ ,हमें बचा लो ---हमें बचा लो।
   -क्या हुआ? मैं घबरा उठी ।
   -आज करीब दस लोग मिलने आएंगे।मेरी छाती पर  मूंग दल कर  जाएंगे। मूंग-बेसन की पकोड़ियाँ बना दो माँ,बचा लो माँ।
   उसके कौतुक देख मेरी हंसी फूट पड़ी।
   मेहमानों की आवभगत के लिए पूरा परिवार फिरकनी की तरह नाचने लगा। किसी ने रसोई संभाली,किसी ने अवनि को नहला धुलाकर नन्ही परी बना दिया,कोई घर की साज संवार मेँ लग गया।
   समय के  पाबंद डा दत्ता ने ठीक 11बजे दरवाजे पर दस्तक दे दी। घर मेँ प्रवेश करते ही उनकी पत्नी ने भारतीय मिठाइयों का डिब्बा मेरे हाथों मेँ थमा दिया ,जिसे देखते ही मुंह मेँ पानी भर आया। खोलकर देख लेती तो न जाने क्या दशा होती। जबसे भारत छोड़ा हल्दीराम,नाथूराम,गंगूराम की मिठाई सपने की बात हो गई।
   ये डॉक्टर साहब बाल विशेषज्ञ थे। उनके आते ही अवनि के बारे मेँ बातें शुरू हो गईं। मालिश किस तेल से हो,कब नहलाया जाए आदि –आदि।  प्रश्नों का अंबार लग गया। उन्होंने अपने अभ्यस्त हाथों से अवनि को फुर्ती से उठाया और नाल देखने लगे,पर मेरा तो दिल धडक उठा –कहीं नाल हिल न जाए और छोटी सी जान को कष्ट हो। अभी तो वह सूखकर गिरा भी नहीं है।
    डॉक्टर दत्ता ने बड़े अपनेपन से शिशु पालन संबंधी बातें बताईं। बच्ची को बहुत देर तक गोद मेँ लिए बैठे रहे। उनके व्यवहार मेँ चुम्बकीय अदा थी। हम भी उनकी ओर खींचे चले गए । अब तो अवनी जरा छींकती भी तो दत्ता अंकल याद किए जाते।
   दत्ता साहब के जाने के बाद मिठाई का पैकिट खोला गया और बच्चों  की तरह उसे चखा जाने लगा। हाथ के बने नुक्ती के लड्डू,काजू की बर्फी खाकर हम मिसेज दत्ता की प्रशंसा किए बिना न रहे। भारतीय स्टोर और टोरेंटों मेँ मिठाइयाँ मिलती तो हैं पर उनको चखते ही मुंह का स्वाद कड़वा हो जाता है इसी वजह से भारतीय घर मेँ मिठाई-नमकीन बनाकर पाक कला मेँ खूब निपुण हो गए हैं। पुरुष भी इन कामों मेँ महिलाओं की खूब मदद करते हैं।
पिछले तीस वर्षों से दत्ता परिवार ओटवा मेँ बसा हुआ है पर हिन्दी, बंगाली और संस्कृत भाषा व      भारतीय संस्कृति से ,रीतिरिवाजों व त्यौहारों से बेहद जुड़े हैं। विदेश मेँ भी रहकर अपनी मिट्टी से उन्हें बहुत प्यार है। उनका घर मुझे जरूर म्यूजियम नजर आता है। परंतु भारत के हर राज्य की झाँकी उनके विशालकाय भवन मेँ देखने को मिल जाएंगी।उसे देख एक सुखद अनुभूति भी होती है।
*
नर्स का नजरिया

   उसी शाम को स्वास्थ्य विभाग से एक नर्स आई। उसने हमारे घर आए नवजात शिशु की जांच की और नए बने माँ –बाप को पालन पोषण संबंधी तथ्य बताए। 2घंटे तक समस्याओ का समाधान करती रही । मैं इस व्यवस्था को देख बहुत संतुष्ट हुई। पर एक बात मुझे बहुत बुरी लगी।
नर्स ने पूछा-घर मेँ कोई सहायता करने वाला है?
   -हाँ,मेरे सास-ससुर भारत से आए है। बहू शीतल बोली।
   -कब तक रहेंगे?
   -3-4 माह तक।
   -क्या वे तुम्हारी वास्तव मेँ सहायता करते हैं?
   -सच मेँ करते हैं।
   -पूरे विश्वास से कह रही हो?
   -इसमें कोई शक की बात ही नहीं है।
   -ठीक है,तब भी शरीर से कम और दिमाग से ज्यादा काम लो।
   नर्स के शंकित हृदय की बहुत देर तक थाह लेती रही,कंकड़ों के अलावा कुछ न मिला।  
   न जाने ये पश्चिमवासी सास –बहू के रिश्ते को तनावपूर्ण क्यों समझते हैं?जिस माँ की बदौलत मैंने प्यारी सी पोती पाई उसे क्यों न दिल दूँगी। इसके अलावा माँ सबको प्यारी होती है। बड़ी होने पर जब अवनि देखेगी कि मैं उसकी माँ को कितना चाहती हूँ तो वह खुद मुझे प्यार करने लगेगी। उसके प्यार के लिए मुझे तरसना नहीं पड़ेगा। दादी अम्मा कहकर जब वह मेरी बाहों मेँ समाएगी तो खुशियों का असीमित सागर मेरे सीने मेँ लहरा उठेगा। शायद उस नर्स ने कभी साफ नीला आकाश देखा ही नहीं । उसकी नजर केवल धुंधले बादलों पर ही टिकी रहती है।
क्रमश
  
साहित्य कुंज में प्रकाशित 
11.3.2016

लिंक-http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/S/SudhaBhargava/14_swagat_kee_vah_laDiyan.htm

गुरुवार, 20 अक्तूबर 2016

तेरहवीं कड़ी -कनाडा डायरी के पन्ने


अंतर्जाल पर साहित्यप्रेमियों की 
     विश्राम स्थली 
: साहित्य कुंज 
अक्तूबर प्रथम अंक 2016 में प्रकाशित 
                                      

                                   
                        सुधा भार्गव 

29/4/2003

इंतजार करते करते 29 अप्रैल हो गई और मैं कह उठी-ओ मेरे प्यारे अनदेखे बच्चे, माँ की गर्भ गुफा से हमारी रोशनी भरी दुनिया मेँ क्यों नहीं आ रहे हो।  हम बड़े व्याकुल है पर प्रतीक्षा के पलों में भी मीठी धुन बज रही है। तुम्हारे हिलने डुलने से एक बात निश्चित है कि तुम भी अकेलापन महसूस कर रहे हो और हमारी रंग बिरंगी दुनिया में आकर मुसकुराना चाहते हो। ओह !तुम्हारी बेचैन भरी करवटों ने मेरी बहू की कमर में दर्द कर दिया है। रुक रुककर दर्द था तब तक ठीक था मगर लगातार व्यथा भरी लहरों को देखकर मन अशांत हो गया है । अब आ भी जाओ ,अपनी माँ को ज्यादा न सताओ।
रात के 10 बजकर 30 मिनट पर असहनीय यंत्रणा होने लगी और बेटा बहू को लेकर कार्लीटोन अस्पताल चल दिया । मैं और भार्गव जी घर पर रह गए। मन में आशंकाओं के घरौदे रह -रह कर बनने बिगड़ने लगे। न जाने मेरा बेटा, बहू को सँभलेगा या कार चलाएगा।वैसे कुछ ही किलोमीटर दूर अस्पताल है। सब ठीक ही होगा।
अनदेखे बच्चे से मेरे दिल के तार अंजाने में ही जुड़ गए। लगा जैसे वह मेरी  बातें सुन रहा है,समझ रहा है। सोचने लगी मेरी बात सुनकर नन्हा जरूर हँसेगा –अरे दादी, इतने बड़े पापा की चिंता! अब मैं उसे कैसे समझाती –उसका पापा कितना ही बड़ा हो जाए मुझसे तो बड़ा हो नहीं सकता।  
शिशु जन्म के समय मेरा अस्पताल जाना निश्चित था। सुन रखा था कार्लीटोन अस्पताल में आधुनिक उपकरणों से सुसज्जित आपरेशन थियेटर है। शान -शौकत में 5स्टार से कम नहीं। नर्सें बड़ी मुस्तैदी से अपना कर्तव्य निबाहती हैं। अपनी मुस्कान से निर्जीवों में प्राण फूकती हैं। मेरी तो यह सब देखने की बड़ी लालसा थी। सबसे बड़ी बात रूई से कोमल बच्चे को जी भर देखना चाहती थी पर मेरे सारे अरमानों पर पानी फिर गया। न जाने सार्स बीमारी टोरेंटों में कहाँ से आन टपकी और अस्पताल में माँ-बाप के अलावा तीसरे का प्रवेश निषेध हो गया। मैं मन मारे घायल पक्षी की तरह तड़पती रह गई।
रजनी की नीरवता को भेदते हुए घड़ी ने 12 घंटे बजाए,दूसरी ओर फोन की घंटी भी घरघराने लगी। मैं और भार्गव जी दोनों ही बच्चों की तरह रिसीवर उठाने भागे कि देखें पहले कौन ?दोनों के हाथ एक दूसरे पर पड़े !हम खिलखिलाकर हंस पड़े । उम्र की सीमा को लांघकर बचपन पसर गया।
बेटे ने जानकारी दी कि बहू को जाकूजी बाथ (Jacuzzi) दिया जा रहा है ताकि दर्द तो उठे पर प्रसव वेदना का अनुभव न हो। सुनकर संतोष हुआ कि कनाडा में वह सुविधा उपलब्ध है जो मुझे अपने समय में न थी। मैं ही उसके कष्ट को जान सकती थी ,भोगे हुए जो थी। अब मेरा सारा ध्यान अंजान बच्चे से हटकर उसकी माँ पर केन्द्रित हो गया।
तभी एक  धीमी सी आवाज सुनाई दी –दादी मुझे अंजान न कहो । जान -पहचान है तभी तो तुमसे मिलने आ रहा हूँ।
मैं चकित सी आँखें घुमा-घुमा कर देखने लगी। दिखाई तो कोई न दिया पर समझ में आ गया –अंजान शब्द का प्रयोग करके गलती की है।
टेलीफोन की घंटी फिर कर्र-कर्र कर उठी.... माँ , आप और पापा थोड़ा सो जाओ । मेरे पापा बनने में अभी 2-3 घंटे की देरी है। उसकी आवाज में पितृत्व का झरना झरझरा उठा था।
यहाँ आराम की किसे सूझ रही थी। हमारी आंखे तो फरिश्ते के स्वागत के लिए बिछी थीं।
घड़ी ने जैसे ही एक का घंटा बजाया कमर सीधी करने के लिए लेट गई। नींद ने कब अपने आगोश में ले लिया पता ही न चला।भार्गव जी तो बाबा बनने की उमंग में विचित्र सी अकुलाहट लिए घर का चक्कर काट रहे थे। बोलते कम थे पर उनकी चाल- ढाल से पता लग जाता था कि अंदर क्या चल रहा है।
इस बार फोन की घंटी इस तरह बज उठी मानो कोई सुखद संदेश देना चाहती हो। एक गर्वीले पिता की आवाज मेरे कानों से टकराई –माँ ,प्यारा सा बच्चा हुआ है।
-अरे यह तो बता लड़का है या लड़की?कैसा है?
-गोरी गोरी भोलू भोलू ।
-कितना वजन है उसका?
-6.6। नाल भी मैंने ही काटा माँ--।
-एँ –तूने नाल काटा!लगा जैसे तीसरी मंजिल से नीचे जा पड़ी हूँ।
-हाँ माँ...  सच कहा रहा हूँ।
-तेरे हाथ नहीं काँपे ?
-बिलकुल नहीं। बल्कि लगा मैं कुछ ही पलों में अपनी बच्ची के बहुत करीब आ गया हूँ। लो अपनी बहू से बातें करो।
-इतनी जल्दी --। अभी तो वह सम्हल भी न पाई होगी। मैं बुदबुदाई–बेटी कैसी हो?
-ठीक हूँ मम्मी जी ।
-कैसा लग रहा है?
-बहुत अच्छा।
उसके इन दो शब्दों ने बहुत कुछ कह दिया। उसके स्वर में पीड़ा या थकान की परछाईं लेशमात्र न थी। मातृत्व से खनकता कंठ गूंज रहा था।

नवजात शिशु के आगमन की सूचना पाकर अपनी कल्पना में नए रंग भरने लगी और अतीव रोमांचक रिश्ते के सुनहरे जाल में फंस गई। पहले तो मुझे लग रहा था 5 माह कनाडा प्रवास के कैसे बीतेंगे पर अब तो इस फूल से फरिश्ते का पलड़ा भारी लगने लगा और मैं विश्वस्त हो उठी कि उसके साथ दिन कपूर की भांति उड़ जाएंगे।

क्रमश :

मंगलवार, 30 अगस्त 2016

बारहवीं कड़ी -कनाडा डायरी


    डायरी के पन्ने                                                  
                                                                  दर्पण 
                                     सुधा भार्गव 
                                                               
                                                                  
26/4/2003

उस दिन महकती बगीची की गुनगुनी धूप में मेरे विचारों की पंखुड़ियाँ खुली हुई थीं कि कब मेरा मनभावन पोता या पोती इस दुनिया में आकर आँखें खोले और मैं उसे इन नाजुक सी पंखुड़ियों में बंद कर सीने से लगा लूँ।

तभी बहू भागी भागी आई –मम्मी जी,मम्मी जी माँ बनने के बाद तो बहुत कुछ भोगना पड़ता है । औरत अपना वजूद ही भूलजाती है। देखिए न , सोनिया  ने माँ बनने के बाद आपबीती लिखी हैं। उसने द ग्लोब एंड मेल समाचार पत्र मेरे हाथ में थमा दिया।

बहू तो चली गई । मैं किसी का भोगा जानने को उत्सुक हो उठी उसे पढ़कर यहाँ  के रहन सहन ,तौर तरीकों की गठरी खुलती सी लगी। यह किसी विशेष की कथा नहीं है अपितु 90%महिलाएं मातृत्व के बाद जिन गलियारों से गुजरती हैं उनका दर्पण है।

अखबार के पन्नों पर से मेरी नजरें बड़ी तेजी से फिसलने लगीं । सोनिया ने खुद लिखा-मैं संगीत कक्ष के फर्श पर लेती बहुत व्याकुल थी। संगमरमर का ठंडा फर्श चुभन पैदा कर रहा था पर तब भी मैं उसमें समा कर अदृश्य हो जाना चाहती थी ताकि मेरे पति और मेरा नवजात शिशु मुझे पा ही न सकें। हाँ ! मैं उनकी नजर से बचना चाहती थी पर मुझे गलत न समझना । मैं अपने बेटे को बहुत प्यार करती हूँ। वह मेरी हर सांस में समाया हुआ है।

मैं ही अकेली प्रथम औरत नहीं हूँ जो अपने बच्चे और पति से बचना चाह रही हो। मेरे चहेरी बहन तो बिस्तर की चादर में मुंह छिपाकर फफकने लगती थी जब उसका पति आधी रात को उसके पास बच्चे को दूध पिलाने लाया करता था। मातृत्व के प्रारम्भिक दिनों में वह सिर से पाँव तक सिहर जाती थी।
कुछ दिनों पहले मैं ब्रिटिश कोलम्बिया अपनी छोटी बहन से मिलने गई । मुझे अचानक देख वह खुश भी हुई और चकित भी पर उससे ज्यादा मैं चकित हुई उसे देखकर। वह अपने घर की सीढ़ियों पर सिर थामें बैठी थी और अंदर उसके दोनों बेटे भाग दौड़ करके लुका छिपी खेल रहे थे। बहन परेशान होकर घर का दरवाजा भेड़कर बाहर बैठ गई ताकि एकांत के पलों में शायद कुछ शांति मिले। तनाव दूर हो।
यही है मातृत्व की परिभाषा –तुम ,तुम्हारा समय,तुम्हारी इच्छाएँ ,तुम्हारी आवश्यकताएँ इन नन्हें देवदूतों से बढ़कर नहीं। मेरे मुंह से निकल पड़ा।

     माँ बनने से पहले मेरा यही विचार था कि खुशी खुशी बच्चे के लिए खुद को कुर्बान कर दूँगी। पर यह कुर्बानी मुझे बलि का बकरा बना देगी ,पता न था। मैंने अपनी माँ से पूछा-मॉम,तुमने बताया नहीं कि संतान को पालने में इतना कष्ट सहना पड़ता है। उन्होंने मेरा सर सहलाया था घंटों और उनकी एक मुस्कान ने मुझे सब कुछ समझा दिया-माँ सहनशीलता और त्याग की मूर्ति है। तभी तो वह दिल के अधिक करीब है। मेरी अवस्था इतनी दयनीय थी कि अपने तीन दिन के शिशु के पोतड़े बदलते –बदलते उनके कथन से पूरी तरह सहमत न हो सकी । यदि वे कुछ बतातीं भी तो मैं उनका विश्वास न कर पाती। भोगे बिना पीड़ा कोई क्या जाने।

    मेरे अनुभव रूपी संपदा समय और सक्रियता के अनुपात में दिनोंदिन बढ़ती ही गई और इस दौड़ में मैंने अपने पति को भी पीछे छोड़ दिया। वैसे तो हम दोनों ने मातृ –पितृ कक्षाओं में साथ साथ शिशु संबन्धित ज्ञान पाया था पर ईशवर पुरुष को भी बच्चे जनने का अवसर देता तभी तो समान ज्ञान व अनुभव के भागीदार होते।ऊपर वाले के इस अन्याय को देखकर मेरा रोम -रोम कुपित हो उठता है । ब्रह्मा ने ही स्त्री –पुरुष को समान नहीं समझा तो समानता का दावा कैसा?
मैं जब गर्भवती थी मैंने मातृत्व को गरिमामयी दृष्टि से देखा पर माँ बनते ही सारा घर तितर –बितर लगने लगा। घर ठीक करूँ या बच्चे को संभालूँ। एक कमरे में नवजात शिशु का बिस्तरा लगाया। अलमारी में उसके कपड़े बड़ी तरतीब से रखे । बेबी शावर के दिन मिले उपहार करीने से सजाए। मैं अपने पति के साथ कितनी खुशी से बेबी के लिए आरामदायक छोटी सी चारपाई ,गद्दा लिहाफ और तकिये लाई। पर सारी की सारी मेहनत बेकार गई।

बेटे के आने पर उसके लालन पालन की आदर्श सोच मोम की तरह गलने लगी। मेरे कमरे में ही धीरे –धीरे उसका सामान आने लगाऔर उसका कमरा कबाड़खाना हो गया। मैले कुचैले कपड़े,पोतड़े और ऊलजलूल चीजों का वहाँ ढेर लग गया। मेरा बेटा उस कमरे में एक दिन भी नहीं सोया। मुझे दूसरे के लिए अपने कमरे का भी मोह छोडना पड़ा ।
माँ बनने से पहले ज़्यादातर में उन्मुक्त पंछी की तरह उड़ा करती थी। जो मैंने चाहा वही किया । जब चाहा जैसे चाहा उसी तरह जीवन की धारा को मोड दिया पर अब मेरे स्वतन्त्रता का अपहरण हो गया था। इस विचार ने मुझे पागल बना दिया ,बस पागलखाने जाने की कसर थी।
   बेटा 15 दिन का हो गया पर मुझे पूरी नींद लेने का समय न मिला। उन दिनों मेरे सास जी आई थी। सहानुभूति के दो बोल पाने की आशा में मैंने एक दिन कहा-बच्चे ने तो मेरे नींद हराम कर दी है।
टका सा उत्तर सुनने को मिल गया-बस बहुत सो ली । अब जीवन भर सोने को नहीं मिलेगा।
झल्लाहट से मेरा माथा दर्द करने लगा। शाम को मेरे पति ऑफिस से आए । मेरा उदास चेहरा देखकर पिघल गए। कपड़े बदलकर और हाथ धोकर बच्चे को गोदी में उठा लिया पर सास के कड़वे बोल गूंज उठे-अभी अभी तो वह थका मांदा घर आया है। उससे बच्चा ही खिलवालों या ऑफिस का काम करा लो।

सारा घर जब नींद के झूले में झूलता होती उस समय मैं कई बार उसे आ –आ- आ कर थपकियाँ देती और लोरी गाकर सुलाने की कोशिश करती। ताज्जुब तब होता जब बेटे के रोने की आवाज से दूसरों की नींद में जरा खलल न पड़ता। पतिदेव करवट बदलते हुए कहते –सानू ,मेरा बेटा क्यों रो रहा है?फिर गूंजने लगते शंखनाद से खर्राटे । मेरे तनबदन में आग लग जाती। सुलगती रहती सोने वालों के प्रति पैदा हुई ईर्ष्या से ,कोसती रहती अपने भाग्य को।

6 मास का बेटा होने पर मैं माँ के पास भागी । सुबह पौ फट्ते ही बच्चा कुलबुलाने लगा –मेरे माँ भी बेचैन हो गई। पर मैं 6 माह का गुब्बार निकालते हुए चिल्लाई –माँ इसको यहाँ से ले जाओ। मुझे सोने दो। मुझे इसके बाप के घर सब कुछ मिलता है पर सोने को नहीं।

दिन चढ़े सोती रही या सोने का अभिनय करती रही पता नहीं पर बंद आँखें पल पल मेरी  उम्र बढ़ा रही थी। यह है मेरा मातृत्व जिसने दिन प्रतिदिन मुझे आत्मसमर्पण करने को मजबूर किया और इसी तले मैं रौंदी गई। मुझे पग पग अनुभव हुआ कि मेरी दुनिया खतम हो गई है। मेरे विचारों का –क्रियाकलापों का केंद्र केवल बच्चा है।

एम॰ डी॰ की डिग्री लेने से पहले ही मैंने मातृत्व की डिग्री ले ली थी जिसने मेरी राह कठिन बना दी। पैरों को झूला बनाकर उस नन्हें को झुलाती जाती और उसकी चिल्लाहट के बीच दोनों हाथों से किताब थामे अपना पाठ याद करती। कोशिश करती बच्चे से अधिक मेरा स्वर तेज हो पर क्या ऐसा हो पाता।
मुझे मालूम है यह समाज पग पग पर भोंपू बजाता कहता रहता है जीवन में आए इस परिवर्तन को सहर्ष गले लगालो। सदियों से औरत यही करती आई है पर पता नहीं क्यों,मैं इस बात को नहीं पचा पा रही।
अपने ही लिखे को मैंने जब देखा  तो सोचने लगी –क्यों लिखा है?माँ होने के नाते मैं बच्चे को बहुत प्यार करने लगी हूँ। उसकी हंसी में अपनी मुस्कान देखती हूँ। उसके रोते ही सीने में काँटा सा गड़ जाता है। परंतु यह भी सच है - कभी कभी शिशु पालन के समय मन कड़वाहट से भर जाता है जिसको बांटने वाला कोई नहीं।
वृद्ध पीढ़ी कहते कहते नहीं थकती –आदर्श माँ स्वार्थी नहीं होती।,न ही उसे किसी प्रकार की शिकायत होनी चाहिए। पर कथनी और करनी में बहुत अंतर होता है।
हर माँ के लिए यह संभव नहीं कि जब भी बच्चा उसके अंक में डाल दिया जाए वह उसी की हो जाए और घर भी व्यवस्थित रूप से चलता रहे,बाहर बॉस भी खुश रहे।

माँ बनने के बाद ही मुझे इस बात का अहसास हुआ कि मेरी माँ ने अपनी जवानी के सुनहरे दिन तो मुझे ही अर्पित कर दिए पर मैं ऐसा नहीं करना चाहती थी। अपना स्थान ,अपना समय व अपनी पहचान को सुरक्षित रखने के चक्कर में चक्कर खाती रहती हूँ।

मेरे पति बहुत समझदार हैं और इस बात को अनुभव करते हैं कि बच्चे के साथ साथ माँ की देखरेख भी समुचित ढंग से होनी चाहिए।जबकि ऐसा हो नहीं पाता। कभी कभी वे उदास हो जाते हैं मेरे लिए नहीं अपने लिए। इस दुनिया मेँ बेटे के आने से वे पेशोपेश में पड़ गए हैं। उनके दिमाग में यह बात घर कर गई है कि मैं उन्हें पहले की तरह प्यार नहीं करती। उनके हिस्से का प्यार भी मैंने बेटे पर न्योछावर कर दिया है। पहले की तरह न उनके खाने का ध्यान रखती हूँ न बालक की तरह प्यार करती हूँ न दुलार। क्या करूं!एक जान हजार काम।

उनका तो प्यार ही बंटा है ,मैं तो खुद ही बंट गई हूँ। दिल से भी दिमाग से भी। अभी न जाने कितने भागों में विभाजित होना है। पर मैं ऐसा होने नहीं दूँगी। मुझे फिर से उठना है और उठूँगी।
सोनिया का जीवन संघर्ष पूरे नारी वर्ग के हाहाकार का दर्पण था। इस दर्पण मेँ झाँकते –झाँकते कभी मुझे अपना चेहरा दिखाई देता है,कभी नई पीढ़ी का अंतर द्वंद । सच मेँ इक्कीसवी सदी की नारी घुटने नहीं टेकना चाहती । लेकिन यह भी सच है सम्बन्धों का पिंजरा और मुक्ताकाश एक साथ नहीं मिल सकते।

 क्रमशः 

(प्रकाशित - अन्तर्जात पत्रिका साहित्यकुंज के सितंबर मास के प्रथम अंक में)
http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/S/SudhaBhargava/12_darpan.htm


बारहवीं कड़ी -कनाडा डायरी


    डायरी के पन्ने                                                  
                                                              दर्पण 
                                   सुधा भार्गव 
                                                              
26/4/2003

उस दिन महकती बगीची की गुनगुनी धूप में मेरे विचारों की पंखुड़ियाँ खुली हुई थीं कि कब मेरा मनभावन पोता या पोती इस दुनिया में आकर आँखें खोले और मैं उसे इन नाजुक सी पंखुड़ियों में बंद कर सीने से लगा लूँ।

तभी बहू भागी भागी आई –मम्मी जी,मम्मी जी माँ बनने के बाद तो बहुत कुछ भोगना पड़ता है । औरत अपना वजूद ही भूलजाती है। देखिए न , सोनिया  ने माँ बनने के बाद आपबीती लिखी हैं। उसने द ग्लोब एंड मेल समाचार पत्र मेरे हाथ में थमा दिया।

बहू तो चली गई । मैं किसी का भोगा जानने को उत्सुक हो उठी उसे पढ़कर यहाँ  के रहन सहन ,तौर तरीकों की गठरी खुलती सी लगी। यह किसी विशेष की कथा नहीं है अपितु 90%महिलाएं मातृत्व के बाद जिन गलियारों से गुजरती हैं उनका दर्पण है।

अखबार के पन्नों पर से मेरी नजरें बड़ी तेजी से फिसलने लगीं । सोनिया ने खुद लिखा-मैं संगीत कक्ष के फर्श पर लेती बहुत व्याकुल थी। संगमरमर का ठंडा फर्श चुभन पैदा कर रहा था पर तब भी मैं उसमें समा कर अदृश्य हो जाना चाहती थी ताकि मेरे पति और मेरा नवजात शिशु मुझे पा ही न सकें। हाँ ! मैं उनकी नजर से बचना चाहती थी पर मुझे गलत न समझना । मैं अपने बेटे को बहुत प्यार करती हूँ। वह मेरी हर सांस में समाया हुआ है।

मैं ही अकेली प्रथम औरत नहीं हूँ जो अपने बच्चे और पति से बचना चाह रही हो। मेरे चहेरी बहन तो बिस्तर की चादर में मुंह छिपाकर फफकने लगती थी जब उसका पति आधी रात को उसके पास बच्चे को दूध पिलाने लाया करता था। मातृत्व के प्रारम्भिक दिनों में वह सिर से पाँव तक सिहर जाती थी।
कुछ दिनों पहले मैं ब्रिटिश कोलम्बिया अपनी छोटी बहन से मिलने गई । मुझे अचानक देख वह खुश भी हुई और चकित भी पर उससे ज्यादा मैं चकित हुई उसे देखकर। वह अपने घर की सीढ़ियों पर सिर थामें बैठी थी और अंदर उसके दोनों बेटे भाग दौड़ करके लुका छिपी खेल रहे थे। बहन परेशान होकर घर का दरवाजा भेड़कर बाहर बैठ गई ताकि एकांत के पलों में शायद कुछ शांति मिले। तनाव दूर हो।
यही है मातृत्व की परिभाषा –तुम ,तुम्हारा समय,तुम्हारी इच्छाएँ ,तुम्हारी आवश्यकताएँ इन नन्हें देवदूतों से बढ़कर नहीं। मेरे मुंह से निकल पड़ा।

     माँ बनने से पहले मेरा यही विचार था कि खुशी खुशी बच्चे के लिए खुद को कुर्बान कर दूँगी। पर यह कुर्बानी मुझे बलि का बकरा बना देगी ,पता न था। मैंने अपनी माँ से पूछा-मॉम,तुमने बताया नहीं कि संतान को पालने में इतना कष्ट सहना पड़ता है। उन्होंने मेरा सर सहलाया था घंटों और उनकी एक मुस्कान ने मुझे सब कुछ समझा दिया-माँ सहनशीलता और त्याग की मूर्ति है। तभी तो वह दिल के अधिक करीब है। मेरी अवस्था इतनी दयनीय थी कि अपने तीन दिन के शिशु के पोतड़े बदलते –बदलते उनके कथन से पूरी तरह सहमत न हो सकी । यदि वे कुछ बतातीं भी तो मैं उनका विश्वास न कर पाती। भोगे बिना पीड़ा कोई क्या जाने।

    मेरे अनुभव रूपी संपदा समय और सक्रियता के अनुपात में दिनोंदिन बढ़ती ही गई और इस दौड़ में मैंने अपने पति को भी पीछे छोड़ दिया। वैसे तो हम दोनों ने मातृ –पितृ कक्षाओं में साथ साथ शिशु संबन्धित ज्ञान पाया था पर ईशवर पुरुष को भी बच्चे जनने का अवसर देता तभी तो समान ज्ञान व अनुभव के भागीदार होते।ऊपर वाले के इस अन्याय को देखकर मेरा रोम -रोम कुपित हो उठता है । ब्रह्मा ने ही स्त्री –पुरुष को समान नहीं समझा तो समानता का दावा कैसा?
मैं जब गर्भवती थी मैंने मातृत्व को गरिमामयी दृष्टि से देखा पर माँ बनते ही सारा घर तितर –बितर लगने लगा। घर ठीक करूँ या बच्चे को संभालूँ। एक कमरे में नवजात शिशु का बिस्तरा लगाया। अलमारी में उसके कपड़े बड़ी तरतीब से रखे । बेबी शावर के दिन मिले उपहार करीने से सजाए। मैं अपने पति के साथ कितनी खुशी से बेबी के लिए आरामदायक छोटी सी चारपाई ,गद्दा लिहाफ और तकिये लाई। पर सारी की सारी मेहनत बेकार गई।

बेटे के आने पर उसके लालन पालन की आदर्श सोच मोम की तरह गलने लगी। मेरे कमरे में ही धीरे –धीरे उसका सामान आने लगाऔर उसका कमरा कबाड़खाना हो गया। मैले कुचैले कपड़े,पोतड़े और ऊलजलूल चीजों का वहाँ ढेर लग गया। मेरा बेटा उस कमरे में एक दिन भी नहीं सोया। मुझे दूसरे के लिए अपने कमरे का भी मोह छोडना पड़ा ।
माँ बनने से पहले ज़्यादातर में उन्मुक्त पंछी की तरह उड़ा करती थी। जो मैंने चाहा वही किया । जब चाहा जैसे चाहा उसी तरह जीवन की धारा को मोड दिया पर अब मेरे स्वतन्त्रता का अपहरण हो गया था। इस विचार ने मुझे पागल बना दिया ,बस पागलखाने जाने की कसर थी।
   बेटा 15 दिन का हो गया पर मुझे पूरी नींद लेने का समय न मिला। उन दिनों मेरे सास जी आई थी। सहानुभूति के दो बोल पाने की आशा में मैंने एक दिन कहा-बच्चे ने तो मेरे नींद हराम कर दी है।
टका सा उत्तर सुनने को मिल गया-बस बहुत सो ली । अब जीवन भर सोने को नहीं मिलेगा।
झल्लाहट से मेरा माथा दर्द करने लगा। शाम को मेरे पति ऑफिस से आए । मेरा उदास चेहरा देखकर पिघल गए। कपड़े बदलकर और हाथ धोकर बच्चे को गोदी में उठा लिया पर सास के कड़वे बोल गूंज उठे-अभी अभी तो वह थका मांदा घर आया है। उससे बच्चा ही खिलवालों या ऑफिस का काम करा लो।

सारा घर जब नींद के झूले में झूलता होती उस समय मैं कई बार उसे आ –आ- आ कर थपकियाँ देती और लोरी गाकर सुलाने की कोशिश करती। ताज्जुब तब होता जब बेटे के रोने की आवाज से दूसरों की नींद में जरा खलल न पड़ता। पतिदेव करवट बदलते हुए कहते –सानू ,मेरा बेटा क्यों रो रहा है?फिर गूंजने लगते शंखनाद से खर्राटे । मेरे तनबदन में आग लग जाती। सुलगती रहती सोने वालों के प्रति पैदा हुई ईर्ष्या से ,कोसती रहती अपने भाग्य को।

6 मास का बेटा होने पर मैं माँ के पास भागी । सुबह पौ फट्ते ही बच्चा कुलबुलाने लगा –मेरे माँ भी बेचैन हो गई। पर मैं 6 माह का गुब्बार निकालते हुए चिल्लाई –माँ इसको यहाँ से ले जाओ। मुझे सोने दो। मुझे इसके बाप के घर सब कुछ मिलता है पर सोने को नहीं।

दिन चढ़े सोती रही या सोने का अभिनय करती रही पता नहीं पर बंद आँखें पल पल मेरी  उम्र बढ़ा रही थी। यह है मेरा मातृत्व जिसने दिन प्रतिदिन मुझे आत्मसमर्पण करने को मजबूर किया और इसी तले मैं रौंदी गई। मुझे पग पग अनुभव हुआ कि मेरी दुनिया खतम हो गई है। मेरे विचारों का –क्रियाकलापों का केंद्र केवल बच्चा है।

एम॰ डी॰ की डिग्री लेने से पहले ही मैंने मातृत्व की डिग्री ले ली थी जिसने मेरी राह कठिन बना दी। पैरों को झूला बनाकर उस नन्हें को झुलाती जाती और उसकी चिल्लाहट के बीच दोनों हाथों से किताब थामे अपना पाठ याद करती। कोशिश करती बच्चे से अधिक मेरा स्वर तेज हो पर क्या ऐसा हो पाता।
मुझे मालूम है यह समाज पग पग पर भोंपू बजाता कहता रहता है जीवन में आए इस परिवर्तन को सहर्ष गले लगालो। सदियों से औरत यही करती आई है पर पता नहीं क्यों,मैं इस बात को नहीं पचा पा रही।
अपने ही लिखे को मैंने जब देखा  तो सोचने लगी –क्यों लिखा है?माँ होने के नाते मैं बच्चे को बहुत प्यार करने लगी हूँ। उसकी हंसी में अपनी मुस्कान देखती हूँ। उसके रोते ही सीने में काँटा सा गड़ जाता है। परंतु यह भी सच है - कभी कभी शिशु पालन के समय मन कड़वाहट से भर जाता है जिसको बांटने वाला कोई नहीं।
वृद्ध पीढ़ी कहते कहते नहीं थकती –आदर्श माँ स्वार्थी नहीं होती।,न ही उसे किसी प्रकार की शिकायत होनी चाहिए। पर कथनी और करनी में बहुत अंतर होता है।
हर माँ के लिए यह संभव नहीं कि जब भी बच्चा उसके अंक में डाल दिया जाए वह उसी की हो जाए और घर भी व्यवस्थित रूप से चलता रहे,बाहर बॉस भी खुश रहे।

माँ बनने के बाद ही मुझे इस बात का अहसास हुआ कि मेरी माँ ने अपनी जवानी के सुनहरे दिन तो मुझे ही अर्पित कर दिए पर मैं ऐसा नहीं करना चाहती थी। अपना स्थान ,अपना समय व अपनी पहचान को सुरक्षित रखने के चक्कर में चक्कर खाती रहती हूँ।

मेरे पति बहुत समझदार हैं और इस बात को अनुभव करते हैं कि बच्चे के साथ साथ माँ की देखरेख भी समुचित ढंग से होनी चाहिए।जबकि ऐसा हो नहीं पाता। कभी कभी वे उदास हो जाते हैं मेरे लिए नहीं अपने लिए। इस दुनिया मेँ बेटे के आने से वे पेशोपेश में पड़ गए हैं। उनके दिमाग में यह बात घर कर गई है कि मैं उन्हें पहले की तरह प्यार नहीं करती। उनके हिस्से का प्यार भी मैंने बेटे पर न्योछावर कर दिया है। पहले की तरह न उनके खाने का ध्यान रखती हूँ न बालक की तरह प्यार करती हूँ न दुलार। क्या करूं!एक जान हजार काम।

उनका तो प्यार ही बंटा है ,मैं तो खुद ही बंट गई हूँ। दिल से भी दिमाग से भी। अभी न जाने कितने भागों में विभाजित होना है। पर मैं ऐसा होने नहीं दूँगी। मुझे फिर से उठना है और उठूँगी।
सोनिया का जीवन संघर्ष पूरे नारी वर्ग के हाहाकार का दर्पण था। इस दर्पण मेँ झाँकते –झाँकते कभी मुझे अपना चेहरा दिखाई देता है,कभी नई पीढ़ी का अंतर द्वंद । सच मेँ इक्कीसवी सदी की नारी घुटने नहीं टेकना चाहती । लेकिन यह भी सच है सम्बन्धों का पिंजरा और मुक्ताकाश एक साथ नहीं मिल सकते।

 क्रमशः 

(प्रकाशित - अन्तर्जात पत्रिका साहित्यकुंज के सितंबर मास के प्रथम अंक में)
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गुरुवार, 23 जून 2016

दसवीं कड़ी -कनाडा की डायरी

http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/S/SudhaBhargava/10_poori_adhuri_rekhayen.htmपूरी -अधूरी रेखाएँ पूरी -अधूरी रेखाएँ
साहित्यकुंज की इस लिंक पर भी आप पढ़ सकते हैं।

 डायरी के पन्ने 
                                                                पूरी -अधूरी रेखाएँ 
                                                                          सुधा भार्गव 
19/04/2003 


    ऐसा लगता है मेरे आसपास पूरी -अधूरी रेखाओं का जाल बिछा हुआ है। एक तरह से इनके बीच रहने की आदत हो गई हैं, छुटकारा भी तो नहीं पड़ोसी जो ठहरे।
    सामने वाले  सफेद बंगले में शाम होते ही एक नवयुवक घूमने निकलता है । उसका साथी केवल झबूतरा कुत्ता है। वृद्ध माँ –बाप का निवास स्थान अलग है । पहले वे भी इसी के साथ रहते थे पर इस आशा में कि बेटे जॉन का घर बसना चाहिए ,इस बड़े घर को छोडकर दूसरे छोटे फ्लैट में चले गए । यहाँ उम्र व जरूरतों के अनुसार आवासस्थल बदलने में देरी नहीं लगती। जॉन के बूढ़े माँ-बाप विशाल 6 कमरे वाले बंगले को पूरी तरह व्यवस्थित करने में अपने को असमर्थ पा रहे थे । इसी कारण उसे जवान बेटे के हवाले कर दिया और उसने इसके बदले उनके लिए दो कमरे वाले फ्लैट की व्यवस्था कर दी। मुझे यह बात बहुत पसंद आई।उनका बेटा जरा ज्यादा ही संजीदा रहता है।न मैंने उसे कभी हँसते देखा न ही उसने किसी पड़ोसी से हॅलो किया। शादी अभी की नहीं क्योंकि बिना विवाह के वह सब कुछ हो रहा है जो भारत में विवाह के उपरांत होता है। यहाँ यौन संबंधों पर कोई प्रतिबंध नहीं है—न समाज का, न कानून का और न भावनाओं का। शायद उस नवयुवक को भी भावनात्मक स्तर पर जुड़ाव पसंद नहीं।
   बगल वाले घर में रहने वाले पति –पत्नी बड़े खुशमिजाज़ लगे। उनके दो प्यारे प्यारे बच्चे हैं। उनके चेहरे पर भी मीठी मुस्कान गुनगुन करती  रहती है। उनकी माँ नताशा और मेरे बीच कुछ दिनों तक तो मौन संभाषण चलता रहा। फिर हमारा मिलन दोस्ती में बदल गया। कुछ वर्षों पहले यह परिवार ब्राज़ील से आकर यहाँ बस गया है। नताशा को फूलों से बहुत प्यार है। जरा सा समय मिला बस एप्रिन ,ग्लब्स पहन  खुरपी हाथ में थाम लेती है। धूप की कर्कशता से बचने के लिए टोपी पहनना नहीं भूलती। खुद तो पौधों की काँट- छांट करती ही है आज तो बच्चों के हाथों में भी छोटी सी बाल्टी और खुरपी थमा दी । छोटे –छोटे हाथों से मिट्टी खोदते माँ की नकल करते बड़े प्यारे लग रहे हैं।अरे ये तो एक दूसरे की तरफ मिट्टी भी उछाल रहे हैं। हैरानी है इतनी सफाई पसंद देश में बच्चे अपने कपड़े गंदे कर रहे हैं। पर बचपन तो बचपन ही है । सारे नियम –कानून ताक मेंरख दिए जाते हैं। असल में ये बच्चे शाम को नहाते हैं ।अंधेरा होते ही नहा -धोकर रात का भोजन करेंगे। वैसे भी मेरे ख्याल से बच्चों को मिट्टी से एकदम दूर भी नहीं रखना चाहिए क्योंकि उसमें कुछ ऐसे तत्व होते हैं जो वैक्टीरिया से लड़ने की शरीर में क्षमता पैदा करते हैं।  एक प्रकार से बागवानी यहाँ की जीवन पद्धति का एक खास हिस्सा है।बच्चों इस तरह से खेल ही खेल में बहुत कुछ सीख जाते हैं।
    पार्टी –वार्टी में नताशा के यहाँ रिशतेदारों का अच्छा खासा जमघट रहता है। कनेडियन डे के अवसर पर उसके यहाँ भाई –बंधु बिहस्की-बीयर पी रहे थे। हमारे और उसके घर के बीच मुश्किल से चार –पाँच गज ऊंची दीवार खड़ी है। सो खूब  मौजमस्ती सुनाई –दिखाई दे रही थी। नताशा के पति मि॰ थामस अपने 6  के बालक को भी गिलास से घूंट भरवा रहे थे। मैं तो  यह सब देखकर दंग रह गई पर यथार्थ के धरातल पर उतरते ही सब कुछ स्पष्ट हो गया।  पीना- पिलाना तो इनकी परंपरा है । इसका अभ्यस्त करने के लिए बच्चों को बचपन से ही वाइन-बीयर देने लगते हैं दूसरे ठंड भी बहुत पड़ती है। उसका मुक़ाबला करने में यह सहायक होती है। परंतु बच्चों के जन्मदिन या अन्य अवसर पर बाल मित्रों को सोमरस नहीं दे सकते।
    सुबह शाम मैं पिछली गली का चक्कर लगाते अच्छी सैर कर लेती हूँ। अभी शाम को घूम कर दरवाजे की सीढ़ियों पर बैठ गई हूँ और निगाहें मेरी आकाश की ओर लगी है। लुभावने रंगों के अक्स में भीगा गगन—ओह कितना लुभावना है। अंदर जाने को मन ही नहीं करता। इस समय ज़्यादातर पड़ोसी अपने बगीचे में निकलकर  बागवानी करते हुए  प्रकृति प्रेम का परिचय दे रहे हैं। 
   शैली हमारे सामने रहती है। वह अपनी छोटी सी वाटिका में बारबैक्यू में मुर्गी(chicken) भून रही है। शायद उसकी दोनों बेटियाँ आने वाली है। ये अविवाहित माँ की संताने हैं।प्रेमी तो अपने प्रेम की निशानियाँ देकर अलग हो गया। शैली ने बड़ी मेहनत से पालकर बड़ा किया है। अब तो बड़ी हो गई हैं पर रहती अपनी माँ से अलग ही। नौकरी के कारण रविवार को ही बेटियाँ अपने बॉय फ्रेंड के साथ माँ से मिलने आ पाती हैं और पुराने कपड़ों की तरह अपना बॉय फ्रेंड बदलती रहती हैं। रविवार शैली के जीवन में अनोखा त्यौहार बनकर आता है। अलगाव,अकेलापन कितना दहला देने वाला होते है यह मैंने शैली से ही जाना। चुंबनों की तपिश और स्मृतियों की गर्माहट उसके प्रेमी को नहीं बांध पाई पर वह उन्हीं की जकड़न में तड़प उठती है। उसके इस अत्यंत नाजुक संवेदनशील मसले को छूने का साहस मुझ में न था ।कौमार्य रक्षा हेतु अपने पर नियंत्रण रखना तो उसके समाज में अनिवार्य नहीं पर इस स्वतन्त्रता में भी अतीत की छीलन उसे चैन से नहीं बैठने देती। समय –बेसमय भीतर बाहर की टूटन उसे दिन में सौ बार रुला देती है।
   ऐसे पूरे -अधूरों के बीच जब भी मैं चमकीले रंगों की कल्पना करती हूँ,सब गड्ड –सड्ड हो जाते हैं।
क्रमश :    


शुक्रवार, 3 जून 2016

नौवीं कड़ी

कनाडा डायरी के पन्ने 

16/4/2003
                             वह लाल गुलाबी मुखड़ेवाली 
                  
                                 
                                     सुधा भार्गव 


अप्रैल मास में उन दिनों मैं कनाडा की राजधानी ओटवा में ही थी । देखते ही देखते बसंत आ गया और देवदार को अपने आगोश में ले लिया । विरही सा कुम्हलाया जर्जर वृक्ष रंग –बिरंगे पत्तों से धक गया। हरे पीले लाल पल्लवों की पलकों के साये में बैठे खिन्न चित्त लिए पक्षी भी चहचहने लगे । ठंड से ठिठुरी कलियों की आँखें खुलीं तो सूर्यवाला के कपोलों पर लाली छा गई।
मुझे भी तो धूप दूध की तरह सुखद लगने  लगी । अप्रत्याशित खुशी मेरे उनीदे अंगों से छ्लकी  पड़ती थी। एक कवि की कुछ पंक्तियाँ गुनगुनाने लगी क्योंकि वे सत्यता उजागर करती प्रतीत हुईं।
                                   
वसंत आ गया
                    
महोत्सव छा गया
                                  
टटोलने लगी उँगलियाँ
                                 
 मादक भरी देह को।  
                                  
उन्माद की आंधी चल पड़ी
                                  
मन की नदिया उफन पड़ी
                                  
पोर पोर दुखने लगा
                                 
दहकने लगा।  
                                  
अनुराग का देवता
                                  
अंग –अंग में पैठ गया
                                  
वसंत के प्रेम पग देते संदेशा फूल को
                                  
लो मैं आ गया।                 
                                                                                 
व्यस्तता की सरिता चारों तरफ उमड़ पड़ी थी । हमें भी सुस्ती में समय गंवाना मंजूर न था। निश्चित किया गया सपरिवार पिकनिक के लिए चला जाए वह भी फलों के बाग में जहां जी भरकर स्ट्रावरी चुने,तोड़ें और खाएं।
यहाँ मई –जून में स्ट्रावरी पकनी शुरू हो जाती हैं और ज्वैल स्ट्रावरी की किस्म सबसे  उत्तम होती है –बेटे ने जब यह बताया मेरे बच्चों की सी हालत हो गई । शोर मचाने लगी जल्दी चलो।
जैसे –तैसे रात काटी और  अगले दिन 10 बजे के करीब सुबह चल दिए फार्म की ओर । साथ में अपने -अपने डिब्बे,टोपी धूप का चश्मा और पानी की बोतल ले ली ताकि धूप से बचा जा सके ।  खाली डिब्बे भी रख लिए ताकि उनमें पानी भरकर स्ट्रोवरी धोई जा सकें।

फार्म में स्ट्रावरी की लंबी कतारें थीं जिनके बीच में झंडियाँ लगी थीं ।
 समझ नहीं सके यह सब क्या है । फार्म के मालिक के पास जाने पर उसने हमे प्लास्टिक की चार डलियाँ पकड़ा दीं ताकि फल तोड़कर उसमें रख सकें। उसमें आधा किलो फल आता था । शर्त थी खूब स्ट्रावरी खाओ पर आधा किलो फल खरीदने जरूर हैं।
सौदा घाटे का नहीं था । उसने हमारे साथ एक गाइड कर दिया । मैं घबरा गई –यह साथ में रहेगा तो छक कर खाएँगे कैसे?। कहीं देखकर यह न सोचे –कैसे हैं ये लोग ,भुक्कड़ की तरह टूट पड़े हैं। अपनी प्रतिष्ठा का सवाल था।इसलिए अपने पर नियंत्रण रखना जरूरी लगा।
मैंने प्रश्नों की झड़ी लगा दी। वह उत्तर देता गया। पंक्ति में जहां तक फल का चयन हो जाता था वहाँ पहले स्थान से झंडी निकालकर चयन समाप्ति स्थल पर वह लगा दी जाती थी । उसने हमसे आग्रह किया गूदेदार कड़ी और लाल स्ट्रोवरी ही तोड़ें । डिब्बों में पानी भर कर रखें । 2 मिनट फल उसमें पड़ा रहने दें फिर उसे खाएँ। धूप तेज है ,खूब पानी पीयेँ और पेट को खाली न रखें वरना एंबुलेंस मंगानी पड़ेगी। कह कर हंस पड़ा। उसका मित्रभाव अच्छा लगा।
फल तोड़ने के विशेष कायदे पर उसने ज़ोर दिया। फल का बर्बाद होना उसे असहनीय था। गाइड ने पौधे की कोमल टहनी एक हाथ से पकड़ी,दूसरे हाथ से फल को ऊपर से धीरे से मोड़ते हुए तोड़ लिया और उसे हथेली पर रख लिया। ।उतावली में मेरा पाँव क्यारी में जा पड़ा। वह एकाएक चिल्लाया –मेमसाहब ,पौधे न कुचलो।
उसने एक खास बात का और जिक्रा किया। खाने वाली स्ट्रावरी को ही पानी से धोना चाहिए। फ्रीज़ करना हो तो बादली छाया या प्रभाती हवा में तोड़ो। उस समय तो सूर्य का प्रचंड ताप था । इसका मतलब आधा किलो खरीदा फल बेकार जाएगा। वह हमारी दुविधा भाँपते हुए बोला-स्ट्रावरी पेड़ की छाया में तोड़कर रख दीजिए । कार में सीट के नीचे ठंडक में वे आराम से सो जाएंगी । घर पहुँचने पर भी ताजगी से भरपूर होंगी।
उसका फल के बारे में अच्छा - खासा ज्ञान था। पर अब मुझे उसका ज्ञान खल रहा था । इंतजार में थी वह जाए तो स्ट्रोवरी पर धावा बोला जाए। बहू –बेटे को खाने का इतना लालच न था। वे पहले भी आचुके थे ,गले तक खा चुके थे । गाइड के जाते ही मैंने भार्गव जी की ओर देखा-मंद मुस्कान ओठों पर थी। शायद वे भी गाइड के जाने की प्रतीक्षा में थे।  



हमारे चारों तरफ स्ट्रावरी बिखरी पड़ी थीं। मंद बयार में पत्तों के पीछे से उनका लुकाछिपी का खेल चल रहा था। आहिस्ता से मैंने उनको छूआ। लाल गुलाबी मुखड़े वाली शिशु सी ---। तोड़ूँ या न तोड़ूँ---  असमंजस में थी । ज्यादा देर तक अपने पर काबू रखना असंभव सा लगा। मोटी –मोटी ,रसीली, अपनी महक फैलाती हुई मेरी टोकरी में समाने लगी। वश चलता तो तोड़ते ही अपने मुख में रख लेतीं पर उनपर छिड्के केमिकल को साफ करना भी जरूरी था। मैंने आठ –दस स्ट्रावरी मुंह में रख ली तब सुध आई दूसरे भी पास खड़े हैं उनके सामने भी पेश करना चाहिए।
बचपन में अपने गाँव में सुबह –सुबह नहर की पुलिया पार करके छोटे भाई के साथ मैं खेत में घुस जाती। कभी गन्ना तोड़ती,कभी टमाटर। बाग का मालिक बाबा को जानता था वरना हमें डंडे मारकर बाहर निकाल देता। मेरा वह बचपन कुछ समय को लौट आया था।
बेटा क्यारियों से बाहर निकल गया था। पहले तो मुझे खाता देखता रहा फिर बोला –बस भी करो माँ ,पेट खराब हो जाएगा ।
-ज़िंदगी में पहली बार तो इस  तरह खा रही हूँ ,कोई पेट –वेट खराब नहीं होगा।
एक स्ट्रोवरी खाकर नजर घुमाती –अरे यह तो और भी रसीली और बड्डी है। उसे तोड़ती,धोती और गप्प से खा जाती। यह सिलसिला गोधूलि तक चला। पेट भर गया पर नियत नहीं भरी। 
-माँ ,अब चलो ।अगली बार चेरी के फार्म पर चलेंगे। वहाँ और भी आनंद आएगा।  
-सच!वायदा रहा। मैं चिहुँक उठी और बालिका की तरह हिलती -डुलती उसके पीछे-पीछे कदम बढ़ाने लगी।

(अंतर्जाल पत्रिका साहित्य कुंज- जून प्रथम अंक 2016 में प्रकाशित) 
क्रमश: