शुक्रवार, 6 मई 2016

कड़ी 8-कनाडा डायरी के पन्ने

साहित्य कुंज अंतर्जाल  पत्रिका में प्रकाशित -27॰04 ॰2016 , लिंक है-
http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/S/SudhaBhargava/08_Shisupalan_kakshaayen.htm


शिशुपालन कक्षाएँ

सुधा भार्गव 

14/4/2003

यहाँ तो अप्रैल में भी गुलाबी ठंड सताती रहती है इसलिए एक स्वटर या शौल लटकाए ही रहती हूँ । रात में न मक्खी –मच्छर न पसीना । लिहाफ ओढ़कर एक बार सोई तो सुबह 7बजे से पहले नींद नहीं टूटती। आज तो बहू –बेटे की अंतिम पेरेंटस क्लास है। मुझे ये नि:शुल्क कक्षाएँ बहुत रोचक लगीं
प्रथम बार माँ –बाप बनने का सौभाग्य मिलने पर युवक -युवती को इस प्रकार शिक्षित किया जाता है कि वे कुशलता से अपनी संतान के पालन –पोषण का उत्तरदायित्व निभा सकें। राज्य की ओर से जगह-जगह स्वास्थ्य केंद्र खुले हुए हैं । इनमें प्रतिमाह होने वाले बच्चे की विकास प्रक्रिया और माँ के शरीर में होने वाले परिवर्तनों से अवगत कराया जाता है। पति अपनी पत्नी के कष्टों को जानकार उसके प्रति पूर्ण संवेदनशील रहता है । आत्मीयता के एकात्मक क्षणों में समर्पण की पराकाष्ठा मधुर हो उठती है।

शिशु जन्म के पश्चात दुर्बल माँ की देखभाल अधिकांशतया पति  को ही करनी पड़ती है । इसी कारण नौकरी पेशेवाली माँ को तो कई महीने की छुट्टियाँ मिलती ही हैं पर साथ में पिता को भी कुछ दिनों का वेतनिक अवकाश प्रदान करना अनिवार्य है । यदि कंपनी की तरफ से छुट्टियाँ नहीं मिलतीं तो सरकार उनकी व्यवस्था करती है।
माँ को समय –समय पर अपने स्वास्थ्य की जांच करने चाइल्ड –मदर यूनिट में जाना ही पड़ता है। उनके समस्त मेडिकल परीक्षणों की व्यय राशि का भार यहाँ सरकार करती है ।

इस सुव्यवस्था में आधुनिक चिकित्सा संबंधी जागरूकता स्वाभाविक है ।रक्त परीक्षण ,ब्लड प्रेशर ,डाईविटीज ,संतुलित भोजन आदि शब्दों पर अज्ञानता की परतें जम कर नहीं रह गई है । नर्सें भी अपने पेशे के प्रति ईमानदार हैं । वे बहुत धैर्य से अनुभवहीन माँ को बच्चे से संबन्धित जानकारी देती हैं। इससे न जाने कितने भोले भालेमुखड़े मुरझाने से बच जाते हैं ।

अचरज समस्त सीमाएं लांघ गया जब मुझे यह जानकारी मिली की अस्पताल में प्रसव पीड़ा तथा शिशु जन्म के समय पति भी पत्नी के साथ –साथ प्रसव कक्ष या आपरेशन थियेटर में जाता है । लोगों की यह धारणा है कि पति की सहानुभूति व प्रेमपूर्ण स्पर्श  से बच्चा सुविधा से होता है । औरत यह अनुभव करे कि जिस व्यक्ति के  कारण उसको भयंकर प्रसव पीड़ा से गुजरना पड़ रहा है वह उसके दुख के समय कदम से कदम मिलाकर चल रहा है तो बहुत सुकून मिलता है। एक और आश्चर्य !यहाँ बच्चे का नाल काटना बाप के लिए गर्व की बात है । लेबर रूम में प्रसव के समय फोटो भी खींची जा सकती है जो एल्बम की शोभा बढ़ाने में कामयाब होती है । 

कितना अच्छा होता यदि मेरे देश  भारत में भी मेडिकल साइन्स के क्षेत्र में इतनी सुविधाएं देकर सावधानी बरती जाती। इससे पुरुष  अपने बच्ची की जन्मधात्री के साथ अवश्य न्याय कर पाता । 

सोमवार, 1 फ़रवरी 2016

डायरी के पन्ने –कड़ी 7


साहित्यकुंज अंतर्जाल पत्रिका के फरवरी प्रथम अंक में प्रकाशित   
कनाडा सफर के अजब अनूठे रंग
सुधा भार्गव

21/4/2003
कनाडा की ठंड से छुटकारा मिला सोचकर अगड़ाई ले सुबह- सुबह उठ बैठी।   सोचा –आज सुबह की सैर की जाए। उस समय तापक्रम 150 था परन्तु अखबार –द ग्लोब एंड मेल में एक महिला की छपी फोटो देख ठिठक गई जिसके चित्र के नीचे लिखा था –Matin khan lies in a Toronto hospital bed last month,recovering from infection after kidney transplant surgery in her native Pakistan. बहुत से प्रश्न सुई सी चुभन देने लगे। मतिन खान की क्या मजबूरी थी पाकिस्तान जाने की,जबकि कनाडा चिकित्सा के क्षेत्र में बहुत उन्नत व सतर्क है। मैं तो खुद ही कनाडा में अपना स्थाई निवास स्थान बनाने की सोच रही थी। पर मिसेज खान के बारे में पढ़कर विचारधारा  को नया मोड़ देना पड़ा।


                      (अस्पताल के पलंग पर लेटी हुई मिसेज खान)

कनाडा में मिसेज खान का नाम किडनी मिलने वालों की प्रतीक्षारत सूची में था और इस बात की कोई गारंटी नहीं थी कि 7 वर्ष के बाद भी उनकी बारी आ जाती। एक हफ्ते में तीन बार डायलेसिज ट्रीटमेंट के बाद भी स्वास्थ्य बदतर होता जा रहा था, इसीलिए वे लाहौर गई। वहाँ एक मजदूर का गुर्दा उनके लिए उपयुक्त रहा। उन्होंने उसे 25000 पाकिस्तानी मुद्रा में खरीदा ।पाकिस्तान में इतनी गरीबी है कि कुछ लोगों को हमेशा धन की जरूरत होती है और एक गुर्दा बेचकर इतना कमा लेते हैं कि पूरी  ज़िंदगी चैन से गुजर जाए।

कनाडा में मानव अंगों की ख़रीदारी गैरकानूनी है। तब भी 30 से 50%तक वहाँ के निवासी प्रतिवर्ष भारत ,फिलीपाइन्स,चायना आदि देशों में मानव अंगों की तलाश में जाते हैं। यदि कोई देश नागरिकों की जरूरतों को पूरा करने में असमर्थ हो तो बेचारे नागरिक क्या करें। जीवन और मौत के बीच झूलते हुए कहाँ जाएँ? ऐसे कानून से क्या फायदा जों मौत की गिरफ्त को असहनीय कर दे।

कुछ आंकड़े तो बड़े चौकाने वाले हैं। एक ग्रुप की रिपोर्ट के अनुसार अंगों के इंतजार में सन 2002 में कनाडा में करीब 237लोग काल का ग्रास बन गए। कनेडियन इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ इन्फोर्मेशन से ज्ञात हुआ कि दिसंबर 31/2002तक करीब 3956 मरीज विभिन्न अंगों की आस में दिन बिता रहे थे। केनेडियन ऑर्गन रिपलेसमेंट रजिस्टर्स बोर्ड के चेयरमेन ने तो अपने टेलीफोन इंटरव्यू के दौरान स्वीकार भी किया –यदि हमारे पास और ज्यादा मानव शरीर के अंग होते और उनका प्रत्यारोपण ठीक समय पर कर पाते तो कम आदमी मरते।

जिन दिनों मिसेज खान अफगानिस्तान और भारत होते हुए  पाकिस्तान पहुंची उन दिनों ईराक –अमेरिका युद्ध के बादल छाए हुए थे। जगह जगह लाहौर मेँ नागरिक अमेरिका के झंडे जलाकर अमेरिका की युद्ध नीति की खिलाफत मेँ जुलूस निकाल रहे थे। किसी तरह मिसेज खान अपने परिवार मेँ पहुंची जहां उनके भाइयों और माँ ने इलाज के लिए धन जुटाने में कोई कसर न रखी। उन्होंने अपनी संपति बेची,बैंक से उधार लिया,अपने बचत खाते से धन निकाला।

रावलपिंडी मेँ मार्च 1998 मेँ उनके एक गुर्दे का प्रतिरोपण हुआ पर 2000  मेँ गर्मियों मेँ ही उनका शरीर प्रतिरोपित गुर्दे को सहन करने मेँ असमर्थता दिखाने लगा। कमर के निचले भाग मेँ दर्द बढ़ता ही गया। बुखार तो हमेशा रहता ही था। 12 मार्च को वे किसी तरह टोरेंटों पीयर्सन इन्टरनेशनल एयरपोर्ट पहुँचीं । सुरक्षा हेतु विशेष प्रकार की वेल्ट उनकी कमर के चारों तरफ लपेटी गई थी। हवाई अड्डे पर एंबुलेंस पहले से ही खड़ी थी  जिसने उन्हें स्टुअर्ट माइकेल हॉस्पिटल पहुंचाया।

मिसेज खान हड्डियों में वेक्टीरिया संक्रमण(ostcomyelitis)से पीड़ित थीं। टी वी का भी शक था। कारण का तो ठीक से पता न चला पर भाग्य से दवाइयाँ असर दिखाने लगीं। धीरे धीरे उनकी दशा सुधरने लगी। दर्द से राहत मिली। आज वे टोरेंटों में रीहेविलेशन हॉस्पिटल में हैं जहां डॉ जाल्ट्ज़मैन(Zaltjman)जैसे विशेषज्ञों की देखरेख में अपने पैरों और कमर की मांस पेशियों को मजबूत बनाने में जुटी हुई हैं।

डॉ जाल्ट्जमैन चिकित्सा की इस सफलता पर बहुत खुश थे। परंतु उन्होंने भी माना कि मिसेज खान तकदीरवाली हैं वरना इलाज के समय बहुत कठिनाइयाँ आईं,साथ ही कनाडा मेँ गुर्दा न मिलने के कारण उन्होंने जो उसके प्रतिरोपड़ का मार्ग अपनाया वह बहुत खेचीला और बीहड़ रहा। यदि मुझको भी अपने या अपने बच्चे के लिए 8 वर्षों तक इंतजार करना पड़ता तो उसका विकल्प जरूर सोचता।
इस महिला की स्वास्थ्य सम्बन्धी खबरें बड़ी दयनीय लगीं। उसमें मेरी इतनी दिलचस्पी हो गई कि रोज ही अखबार टटोलती हूँ । अपने प्रभु से उसकी आरोग्यता की कामना भी करती हूँ । मेरे जैसे न जाने कितने उनके लिए दुआ मांग रहे होंगे। शायद इन प्रार्थनाओं के कारण ही वे जल्दी से ठीक होकर घर चली जाएँ । मेरी शुभकामनाएँ हमेशा उनके साथ रहेंगी।
क्रमश:


शुक्रवार, 15 जनवरी 2016

डायरी के पन्ने -कड़ी 6

प्रकाशित -साहित्य कुंज अंतर्जाल मासिक पत्रिका जनवरी के दूसरे अंक 2016  में। 
www.sahityakunj.net
/LEKHAK/S/SudhaBhargava/06_patjhar_se_kinaaraa.htm

                                              कनाडा  सफर के अजब अनूठे रंग       
                                                                  सुधा भार्गव 
17/4/2003 
पतझड़ से किनारा

       आज हम बेटे के  मित्र आलोक के यहाँ दावत उड़ाने गए । वहाँ अन्य जोड़े भी थे । किसी का बच्चा किंडरगारडन में जाता था तो किसी का नर्सरी में । बातों ही बातों में एक ने मुझे बताया –आंटी यहाँ का कायदा मुझे बहुत पसंद आता है । केवल किताबी ज्ञान न देकर शिष्टाचार ,सद्व्यवहार और मानवीय कोमल भावनाओं को उजागर करने पर अधिक बल दिया जाता है पर मेरे आश्चर्य की सीमा नहीं रही !ये नियम –कानून ,यह सोच कहाँ विलीन हो गए थी  जब इसी धरती के एक कोने में इराकीय मासूम बच्चों को सदैव के लिए मौन किया जा रहा था ।

        मेरी कुछ स्मृतियाँ  भी पुनर्जीवित होने लगीं और आलोक की बात पर विश्वास न कर सकी।
बात ही कुछ ऐसी थी। कुछ साल पहले की ही तो बात है मेरे मित्र श्रीमन के बेटी –दामाद अपने प्यारे  बच्चे रूबल  के साथ चार साल के लिए लंदन गए। परंतु सास- ससुर की अस्वस्थ्यता के कारण बेटी सुलक्षणा को दामाद जी से  6माह पहले ही भारत लौटना पड़ा। बड़ा अरमान था कि बेटे को कुछ  साल तक वहीं पढ़ाएंगे। उसने नर्सरी से निकलकर कक्षा 2 उत्तीर्ण भी कर ली थी और रूबल वहाँ बहुत खुश था। जब उसे पता चला कि भारत जाने का उसका टिकट खरीदा जा चुका है तो उखड़ पड़ा ।

        तमतमाए चेहरे से उसने प्रश्न किया –माँ ,किससे पूछकर आपने भारत जाने का मेरा टिकट कराया?
सुलक्षणा को इस प्रकार के प्रश्न की आशा न थी। वह हँसते हुए बोली –अरे ,तुम मेरे बिना कैसे रहोगे ?
-पापा तो यहीं रहेंगे !
-तुम्हारे पप्पू तो अस्पताल में मरीजों को देखते रहेंगे,तुम्हारी देखभाल कौन करेगा ?
-मैं अपनी देखभाल करना अच्छी तरह जानता हूँ ।
-कैसे?
-स्कूल में हमें बताया गया है जिनके माँ –पापा अलग रहते हैं या उनका तलाक हो जाए तो उन्हें अपने काम अपने आप करने चाहिए।
तलाक शब्द इतने छोटे बच्चे के मुंह से सुनकर सुलक्षणा का माथा भन्ना गया। फिर भी उसके कौतूहल ने सिर उठा लिया था।
उसने पूछा –मैं भी तो सुनूँ---मेरा लाड़ला क्या –क्या ,कैसे-कैसे  करेगा ?
-घर में अकेला होने पर जंक फूड ,प्रीकुक्ड फूड,फ्रीज़ फूड खाकर और दूध पीकर रह लूँगा। मेरे पास इन्टरनेट से लिए होटल के फोन नंबर भी हैं । डायल करने से वे तुरंत घर में सबवे सेंडविच ,पीज़ा पहुंचा देंगे। माँ ,नो प्रोब्लम !
माँ को झटका सा लगा –वह अपने बच्चे को जितना बड़ा समझती थी उससे कहीं ज्यादा बड़ा हो गया उसका बेटा ।
बुझे से स्वर में बोली –बेटा तुम्हें मेरी याद नहीं आएगी ?
-आएगी मम्मा पर टी वी मेरा साथी जिंदाबाद!
-तुम बीमार हो गए तो मैं बहुत परेशान हो जाऊँगी ।
-अरे आप भूल गईं !आपने ही तो बताया था एक फोन नम्बर जिसे घुमाते ही एंबुलेंस दरवाजे पर आन खड़ी होगी ।
-लेकिन बेटा तुम्हें तो मालूम है कि पापा थक जाने के बाद चिड़चिड़े हो जाते हैं । अगर तुम्हें डांटने लगे तो तुम्हें भी दुख होगा और मुझे भी ।
-देखो माँ! डांट तो सह लूँगा क्योंकि पैदा होने के बाद डांट खाते –खाते मुझे इसकी आदत पड़ गई है पर मार सहना मेरे बसकी नहीं । मुझे स्कूल में अपनी रक्षा करना भी बताया जाता है।
-अपनी रक्षा !
-मतलब ,अपने को कैसे बचाया जाए !
-तुम अपनी रक्षा कैसे करोगे ? मेरे भोले बच्चे के हाथ तो बहुत छोटे –छोटे हैं । प्यार से सुलक्षणा ने रूबल के हाथों को अपने हाथों में ले लिया।
ममता को दुतकारते हुए रूबल ने अपना हाथ छुड़ा लिया –अगर पापा मुझ पर हाथ उठाएंगे तो मैं पुलिस को फोन कट दूंगा। वह पापा को झट पकड़ कर ले जाएगी या उन्हें जुर्माना भरना पड़ेगा। यहाँ बच्चों को मारना अपराध है । मैं आप के साथ भारत नहीं जाऊंगा ,वहाँ मेरे चांटे लगाओगी ।

       सुलक्षणा की इस बात में दो राय नहीं थीं कि उसका बेटा कुछ ज्यादा ही सीख गया है । उसने लंदन छोडने में ही भलाई समझी। उसे एक –एक दिन भारी पड़ रहा था । बेटे के व्यवहार से विद्रोह की बू आ रही थी लेकिन डॉक्टर होने के नाते वह यह भी जानती थी कि उसकी सोच को एक उचित मोड़ देना होगा।

       सुलक्षणा भयानक अंधड़ से गुजर रही थी। यह कैसा न्याय !गलती करने पर माँ –बाप को दंडित करने की समुचित व्यवस्था है परंतु माँ –बाप से जब संतान बुरा आचरण करे तो उन्हें सजा देने या समझाने का कोई विधान नहीं ।
        अपने को संयत करते हुए सुलक्षणा ने बेटे को समझाने का प्रयास किया –बच्चे हम अपने देश में तुम्हारे दादी –बाबा के साथ रहते हैं और एक दूसरे से बहुत प्यार करते हैं।  वे तुम्हारे बिना नहीं रह सकते ।
-बाबा का तो कल ही फोन आया था । पूछ रहे थे ,हम कब वापस आ रहे हैं । उनकी याद आते ही बच्चे  की आँखें छलछला आईं। आखिर जड़ें तो रूबल की भारतीय थीं।

        अब रूबल दूसरी ही दुनिया में चला गया  जहां रिश्तों की महक से वह  महकता रहता था। कुछ रुक कर बोला –दादी तो ज्यादा चल नहीं सकतीं । बाबा को ही सारा काम करना पड़ता होगा । आप भी तो यहाँ चली आईं। मेरे दोस्तों के दादी –बाबा तो यहाँ उनसे अलग रहते हैं । बूढ़े होने पर भी उन्हें बहुत काम करना पड़ता है । कल मम्मा ,आपने आइकिया (I K E A)में देखा था न ,वह पतली –पतली टांगों वाली बूढ़ी दादी कितनी भारी ट्रॉली खींचती हाँफ रही थी । उसकी सहायता करने वाला कोई न था । रूबल का मन करुणा से भर गया ।

         कुछ मिनट  पहले बहस की गरमा गर्मी शांत हो चुकी थी । हरिण सी कुलाचें मारता रूबल का मन अपनी जन्मभूमि की ओर उड़ चला था ।
-मम्मी जब आप लखनऊ में अस्पताल चली जाती थीं तो दादी माँ मुझे खाना खिलातीं ,परियों की कहानी सुनातीं। ओह !बाबा तो मेरे साथ फुटबॉल खेलते थे । अब तो वे अकेले पड़ गए हैं । अच्छा मम्मी !मैं भी चलूँगा आपके साथ । मैं अभी ई मेल बाबा को कर देता हूँ।
       अपने अनुकूल बहती बसंती बयार में सुलक्षणा ने गहरी सांस ली । उसको लगा जैसे पतझड़ उसके ऊपर से गुजर गया ।
क्रमश:

सोमवार, 4 जनवरी 2016

कड़ी 5- बेबी शावर डे


प्रकाशित-साहित्य कुंज अंतर्जाल मासिक पत्रिका जनवरी प्रथम अंक 2016 में लिंक http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/S/SudhaBhargava/05_Baby_Shower_Day.htm 

डायरी के पन्ने 

कनाडा सफर के अजब अनूठे रंग
सुधा भार्गव 

12/4/2003

बेबी शॉवर डे

कनाडा पहुँचने के दो दिन पहले बर्फीला तूफान आ चुका था। 10अप्रैल तक सड़क के दोनों ओर बर्फ ही बर्फ  जमी थी।अब यह पिघल गई है। खिड़की से झाँककर इस अनूठे प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद उठा रही हूँ । आमने खड़ा चिनार का वृक्ष (maple tree) पल्लवविहीन होते हुए भी सूर्य की आभा से जीवन पा रहा है। उसके नीचे बिछी बर्फ की शुभ्रता युद्ध के मँडराते बादलों के मध्य शांति का संदेश देती प्रतीत होती है । अमेरिका –ईराक के युद्ध के समाचार सुनते –पढ़ते कान पक चुके हैं । टी.वी. में देखे हुए रोंगटे खड़े करने वाले दृश्यों से राहत पाने के लिए प्रकृति में खो जाना चाहती हूँ।
आज दोपहर लंच के लिए बहू शीतल की सहेली नमिता के घर जाना है। यहाँ  भारत से आए माँ –बाप को विशेष अनुग्रह द्वारा निमंत्रित किया जाता है । जहां से निमंत्रण मिलता है वहाँ मित्र एक –एक सब्जी , पूरियाँ या मिठाई बना कर ले जाते हैं। इस सहयोग से 30 जनों के खाने का प्रबंध सरलता से हो जाता है । यहाँ यह जरूरी भी है क्योंकि नौकर शाही प्रथा के अभाव में खुद ही मालिक हैं और खुद ही नौकर । शीतल ने भी ले जाने के लिए केक बना ली है वह भी बिना अंडे के । नमिता की माँ अंडा नहीं खाती हैं।
हमने जैसे ही नमिता के घर में प्रवेश किया फोटोग्राफी होने लगी । सबकी नजरे  शीतल पर टिकी थीं । मैं हैरान –यह सब क्या हो रहा है!
बाद में पता लगा कि  मेरे बहू का ही बेबी शावर डे (baby shower day)मनाने का आयोजन है । इस अवसर की सफलता के लिए चुपके –चुपके तैयारियां करके भावी माँ का अभिनंदन तालियों की गड़गड़ाहट व आश्चर्य मिश्रित भाव-भंगिमाओं के साथ किया जाता है । मित्र और रिश्तेदार नवशिशु की कुशलता व उसके आगमन की कामना करते हैं। इससे  वात्सल्य तरंगे झनझना उठती हैं।  जो इस कार्यक्रम के प्रबंधकर्ता होते हैं उनको ही इस उत्सव की जानकारी होती है बाकी सब अनभिज्ञ । इसीकरण मुझे व शीतल को इसके बारे में कुछ पता न था ।
शीतल किसी की मीठी धुन में समा गई। आने वाले बच्चे की सुखद कल्पना से उसके चेहरे पर ताजी गुलाब खिल गए । उसे कुर्सी पर बैठा दिया गया है ताकि थकान उसके लावण्य को कम न कर दे । बारी –बारी से मित्रों ने उपहार देकर अपने  स्नेह धागे से उसे बांध दिया। सारे पैकिट खोलकर वह  सबको दिखा रही है और बेटा पास में बैठा देने वालों की प्रशंसा कर रहा है । शौक व अरमानों से अगर कोई वस्तु भेंट में दे तो उस ही के सामने उसकी तारीफ में दो बोल बहुत जरूरी है –यह मैंने अभी महसूस किया ।
बहुत कुछ तो दिया है दोस्तों ने –मॉनिटर ,डायपर्स ,कॉट,कारसीट आदि –आदि । कोई बेकार का समान नहीं ,यह देखकर मुझे बहुत अच्छा लगा । इससे नवशिशु के आने के बाद आर्थिक बोझ उठाने में भी सहायता मिलती है। उपहार देने से पहले पूछ लिया जाता है कि क्या चाहिए ?कुछ लोग शिशु पालन से संबन्धित वस्तुओं की सूची बनाकर दुकानदार को भेज देते हैं और बंधुगण अपने पसंद की वस्तु का चुनाव  कर दुकान से खरीद लेते हैं । यदि  भावी माँ –बाप के पास एक ही तरह की वस्तु दो हो जाएँ तो दुकान से उसे बदला भी जा सकता है । बिल होने पर दाम लौटा दिए जाते हैं। वस्तु लौटाने की अवधि 3-4 माह होती है । यह नियम बड़ा ही भला लगा ।न ही अनावश्यक वस्तु का जमाव हो न  पैसा नष्ट हो।
लंच के बाद आत्मीयता से एक दूसरे से  परिचय कराया गया। कनेडियन्,इटेलियन,मराठी,पंजाबी,मद्रासी बंगाली सभी तों हैं। विभिन्न क्यारियों के फूल एक ही क्यारी में नजर आ रहे हैं।
-अब कुछ खेल खेले जाएंगे जिनका संबंध गर्भवती माँ से है। शीतल की दोस्त ने ऐलान किया और मुझसे कहा – आंटी एक बात पूछूं?शैतानी उसकी आँखों से टपक रही थी ।
-हाँ !हाँ पूछो । मैं भी बहुत उत्साहित थी ।
-अच्छा बताइये !शीतल के पेट का घेरा कितना बड़ा होगा ?
मैं तो सकपका गई । जबाब देते न बना। खिसियाई बिल्ली बन मुंह छिपाने लगी । विनोदी लहजे में वह कहने लगी –आंटी आप तो सबसे ज्यादा शिल्पी के पास रहती हैं ,आपको इतना भी नहीं मालूम ! एक क्षण तो मुझे लगा ,वाकई में बड़ी भारी गलती ही गई । मुझे सोच में डूबा देख दूसरी बोली –यह सब हंसी मजाक है ताकि होने वाली माँ को अधिक से अधिक खुश रखा जा सके।
उपयुक्त उत्तर की आशा में उसने प्रश्न दूसरों की तरफ उछाल दिया । कोई संतोषजनक उत्तर नहीं  आने पर  दूसरा प्रश्न पूछा  गया-
-अब यह बताया जाए कि बालक किस तिथि को जन्म लेगा ?सबने अपने अंदाज भरे तीर चलाए । डॉक्टर ने शिशु जन्म की तारीख 8मई बताई थी। मगर यह किसी को मालूम न थी।जिसने 8तारीख के सबसे पास वाली तारीख बताई उसे इनाम दिया गया। तालियों की गड़गड़ाहट ओसकी बूंद बन माथों पर झलक पड़ी।
मेरी  नजरों के सामने 2-3गर्भवती महिलाएँ बैठी है जिन्हें अपने बेबी शावर का बेसब्री से इंतजार है पर विचित्र बात है ऐसी महिला न  उसका प्रबंध कर सकती है और न उसे आखिरी समय तक अपने ही बेबी शावर का पता लग पाता है । हाँ उसका पति अवश्य दूसरों से गुप्त रूप से मिला होता है। शुभ कामनाओं की बौछार करने की बड़ी रोमांचक व अनूठी प्रथा है इस उत्सव की विनोदप्रियता व चुहुलबाजी मुझे अब भी  रहरहकर गुदगुदा देती है।

क्रमश: 

कड़ी 4 -कनाडा एयरपोर्ट


साहित्य कुंज अंतर्जाल मासिक पत्रिका ,जनवरी प्रथम अंक 2016 में प्रकाशित,

लिंक-http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/S/SudhaBhargava/04_Canad_airport.htm

कनाडा डायरी 

04 कनाडा एयरपोर्ट

कनाडा एयरपोर्ट पर बहू-बेटे दोनों ही लेने आए थे। दिल से तो मैं यही चाहती थी कि बहू शीतल एयरपोर्ट पर न आए क्योंकि उसका प्रसवकाल निकट था। उसे फुर्ती से अपनी ओर आते देखा ,लगा तो बहुत अच्छा। गृहस्थी की गाड़ी को खींचने वाले दोनों पहिये समान रूप से सक्रिय नजर आए। उन्होंने  हमारे चरण स्पर्श किए और और सीने से लग गए।तीन वर्ष का वियोग क्षण भर में मिट गया।
सफर की सारी थकान हम अपनी मंजिल पर पहुँचते ही भूल गए। कार में एक दूसरे से नजर टकराते ही आँखों में चमक आ जाती।मूक होकर भी हजार बात कह देते। कार रॉकेट बनी हवा को चीरती चिकनी सड़कों पर सरपट दौड़ रही थी। मेरी समझ में नहीं आया –ठंडे सुहावने मौसम में भी बेटे ने कार के शीशे चढ़ा रखे हैं  और एयर कंडीशन चल रहा है।
-यहाँ तो प्रदूषण भी नहीं है । ताजी हवा के झोंके आने के लिए खिड़कियों के शीशे नीचे कर दो। मैंने सलाह दी।
उसने हमारी तरफ का शीशा थोड़ा सा हटा दिया। यह क्या !हवा के तीव्र झोंकों से हम आतंकित हो उठे। दूसरे कार की स्पीड भी बहुत तेज थी। साँय-साँय की आवाज ऐसी कर्णभेदी हो गई मानो जंगल में हलचल मच गई हो।
-अरे बंद कर शीशा । मैं चिल्ला उठी।
-बंद कर दूँ ---। आपजान कर बेटा ज़ोर से बोला और हंसने लगा। अब आया समझ में राज शीशे बंद रखने का।
रोज़लोन कोर्ट में घुसते ही उसके बंगले के सामने खड़े हो गए । सीट पर बैठे ही रिमोट कंट्रोल का बटन दबाने से खुल जा समसम की तरह गैराज का शटर ऊपर जाने लगा। लौंडरी रूम,रसोईघर ड्राइंगरूम पार करते हुए ऊपर जाने लगे। बेटा बहुत विनोदी स्वभाव का है सो सीढ़ियाँ चढ़ते-चढ़ते उसका टेप रिकॉर्डर चालू हो गया। 
-माँ, सुबह-सुबह ताजी हवा खाने के चक्कर में नीचे का दरवाजा न खोल देना। अलार्म बज उठा तो पुलिस आन धमकेगी और पकड़कर ले जाएगी।
-हम क्या चोर है!
-चोर तो नहीं पर खतरे की घंटी तो बज जाएगी। सुबह उठकर एलार्म का गलेटुआ घोंटना पड़ता है।
-यहाँ भी चोरी होती है क्या।?धनी राष्ट्रों में हमारे देश की तरह गरीबी कहाँ!भार्गव जी बोले।  
-चोरी गरीब ही नहीं करता । आदत पड़ने पर अमीर भी चोरी कर सकता है। चोरी भी तो चौसठ कलाओं में से एक है।  
-अरे वाह !पहले से क्यों नहीं बताया माँ। मैंने बेकार आई.आई.टी. में चार साल गँवाए, यही कला सीखता।
-ओह ,तू तो बहुत खिजाता है। बस मेरी बात पकड़ ली।
शीतल हमारी बातों का आनंद उठा रही थी। व्यवस्थित मास्टर बेडरूम ,बेबी रूम,से होते हुए हम अपने शयनागार में पहुंचे । स्वच्छ चादर व फूलदार लिहाफ हमारा इंतजार कर रहे थे। शीतल के हाथ का खाना खाकर कुछ ही देर में हम शुभ रात्रि कहते हुए उसमें दुबक गए।
दिल्ली में तो मन में उथल पुथल मची ही रहती थी कि बच्चे पराई संस्कृति में रह रहे हैं, कहीं बदल न जाएँ। न जाने किस विचारधारा से टकरा कर सुविधा के जाल में फंस जाएँ पर संस्कारों की जड़ें इतनी मजबूत लगीं कि भटकन की कोई गुंजाइश नहीं दिखाई दी।  
विचारों की घाटियों से गुजरते 2बज गए। दिमाग ने कहा –सोने की कोशिश तो करनी ही पड़ेगी,कल से नए वातावरण से समझौता करने और उसे समझने का श्री गणेश हो जाएगा। कुछ भी हो हम 8 अप्रैल के चले 10 की रात कनाडा अपने घर तो पहुँच ही गए थे सो चिंतारहित चादर तान सो गए ।

क्रमश:     

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2015

कनाडा डायरी के पन्ने,कड़ियाँ 1,2,3



मित्रों
 एक अरसा हो गया कनाडा गए। मगर कनाडा  में बिताए मीठे -कड़वे अनुभवों को डायरी में कैद करती  चली गई थी।  आज जब भी उसको पढ़ती हूँ तो रोमांचित हो उठती हूँ --और लगता है कल ही  तो  कनाडा से अपने वतन लौटी हूँ। मेरी  डायरी के पन्ने सुमन कुमार घई जी को  पसंद आए और उन्होंने इसको साहित्य कुंज में क्रमश; प्रकाशित करने का निश्चय किया । इससे मुझे अपनी डायरी के पन्नों को उलटने पलटने का मौका मिला। मैं इसके लिए  उनकी बहुत शुक्रगुजार हूँ।व्यस्त ज़िंदगी से कुछ  अनमोल पल निकाल कर आप भी  इसे अवश्य पढ़ने का  प्रयत्न कीजिएगा और बताइएगा आपने कैसा महसूस किया।
इसे आप साहित्य कुंज में भी पढ़ सकते हैं।
लिंक है -
http://sahityakunj.net/
Sahitya Kunj Aapkee Sahitiyak Patrika -साहित्य कुंज आपकी साहित्यिक पत्रिका






कनाडा के अजब अनूठे रंग                   

8 अप्रैल 2003 
(1) स्वदेश से विदा

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उसके साथ बिताए पलों को मैने मुट्ठी में कसकर बंद कर रखा था । केवल सोते समय मुट्ठियाँ खुलती थीं। परन्तु वे सुनहरे पल धीरे-धीरे मेरी उँगलियों के बीच से इस प्रकार सरकने लगे जैसे बालू। फोन पर बातें करते-करते आवाज भर्रा उठती और एक व्यापक मौन मुझसे ही टकराकर पूरे जिस्म में फैल जाता। चाँद बेटा मेरी  हलचल को मीलों दूर कनाडा में बैठे भाँप गया। मेरी मनोस्थिति तो पतिदेव (भार्गव जी) भी ताड़ गए थे। इसीलिए शीघ्र ही कनाडा की राजधानी ओटवा जाने का कार्यक्रम बन गया।
8अप्रैल,2003 को सुबह 8:45 पर हमने अपने देश से विदा ली।एयर इंडिया विमान से लंदन हिथ्रो एयरपोर्ट बड़े आराम से पहुँच गए। लंदन घड़ी 9 की सुबह 11:30 बजा रही थी। वहाँ से 12:55 पर कनाडा उड़ान पकडनी थी। दोनों उड़ानों के बीच का समय बहुत कम था। अत : औपचारिकता पूरी कर भी न पाए थे कि विदेशी भूमि पर एयर कनाडा उड़ान हम जैसे बहुत से लोगों को असहाय छोडकर उड़ गई।
उन दिनों अमेरिका-ईराक जंग ज़ोरों पर थी । दूसरे टोरंटो में सार्स बीमारी के भयानक रूप से पैर जम गए थे। पूछताछ करने पर पता लगा-कोई उड़ान रद्द हो रही है तो किसी का मार्ग बदला जा रहा है परंतु टोरेंटों की उड़ानें ज़्यादातर खाली हैं। वहाँ से कनाडा जल्दी पहुंचना मुश्किल नहीं है। हम टोरेंटों का टिकट खरीदने वाले ही थे कि जयपुरवासी डॉक्टर राणा से टकरा गए। बड़ी आत्मीयता से बोले –आप भूलकर भी टोरेंटों नहीं जाइएगा।  सार्स तो बड़ा खतरनाक रहस्यमय निमोनिया है। लक्षण हैं-सिरदर्द खांसी,सांस लेने में कष्ट --। उनकी पूरी बात सुने बिना ही भागे हम। सिरदर्द तो उड़ान छूटने के बाद ही शुरू हो गया था। एक दो मिनट और उनकी बात सुनते तो दम जरूर घुट जाता। दिमाग की हांडी में खौफ की खिचड़ी पकने लगी। टोरेंटों की उड़ान का हमने इरादा छोड़ दिया।
एयरपोर्ट पर लेकिन कब तक पड़े रहते?टिकट पाने के लिए लंदन एयरलाइंस के अफसर को अपनी करुण कथा सुनाने बैठ गए। वह बड़े धैर्य से हमारी बातों पर कान लगाए रहा और अगले दिन 10अप्रैल का एयर कनाडा का टिकट हाथों में थमाकर मुनि दधीचि की तरह हमें उबार लिया।
एयर बस से हमें रेडिसन एडवरडियन होटल रात गुजारने के लिए पहुंचा दिया गया क्योंकि यह एयरलाइंस की जिम्मेवारी थी। जल्दी से जल्दी पेटपूजा करनी थी,दोपहर के तीन बज गए थे। हम शाकाहारी भोजन कक्ष में बहुत देर तक माथापच्ची करते रहे। मनमाफिक भोजन न मिलने से केक-पेस्ट्री खाकर पेट भरा। वेटर और उसके साथी हमारी मुखमुद्राओं को देखकर हंस रहे थे जिसमें बड़ा तीखा व्यंग था।वहाँ से उठकर मैं गैलरी में निकल आई। सालों पुरानी चांदी की हसली शीशे के फ्रेम में जड़ी दीवार की शोभा बढ़ा रही थी।ठीक वैसी ही दादी माँ ने मुझे भी दी थी पर मुझ मूर्ख ने उसे पुराने फैशन की कहकर तुड़वा दिया। ब्रिटिशर्स के कलात्मक प्रेम को देखकर मुझे अपने पर बेहद गुस्सा आया। हम क्यों नहीं अपने पूर्वजों की धरोहर सुरक्षित रखते हैं। आगे बढ़ी तो नजरें उलझ कर रह गईं। 6/6 के आकार का, एक दूसरा खूबसूरत फ्रेम और टंगा था। चांदी पर मीनाकारी की दो पुरानी घड़ियाँ उसमें विराजमान थी। गुलाबी नगरी जयपुर की स्पष्ट झलक थी जो पुकार-पुकारकर कह रही थीं –हमें अपने वतन से जबर्दस्ती  लाया गया है । इस महल में लगता है कोई हमारा गला दबा रहा है। ओ मेरे देशवासी,मुझे अपनों के बीच ले चलो।
एक क्षण विचार आया ,शीशा तोड़कर उन्हें आजाद कर दूँ मगर मजबूर थी। कुछ शब्द हवा में लहरा उठे –गुलामी की दास्तान !
भोजन कक्ष में बड़ा सा दूरदर्शन रखा था। बी.बी.सी से समाचार प्रसारित हो रहे थे-------------------
अमरीकन फौज बगदाद में घुस गई है। सद्दाम हुसैन घायल हो गए हैं। अमरीकी फौज को पानी भी मयस्सर नहीं। पानी के पाइप काटकर व्यवस्था छिन्न –भिन्न कर दी गई है। फौजियों की कष्टप्रद दशा को देखकर ईराकवासियों का दिल भर आया है। अपने घरों से पानी –खाना लाकर दे रहे हैं।
 अमेरिका अपनी कूटनीति से यहाँ भी बाज नहीं आया।ईराकी भ्रमजाल में फंसे लगते हैं कि अमेरिका विजयी होने पर उनकी ज़िंदगी मे खुशियों का चंदोवा तानदेगा।वे अमेरिकन फौज के हरे –भरे वायदों के चक्कर में पड़े उनके चारों तरफ मक्खियों की तरह भिनभिना रहे हैं। मुझे तो ईराकी जनता पर तरस आने लगा है।  अमेरिका अपना मकसद (तेल के कुंओं पर आधिपत्य )पूरा होने पर  उनकी तरफ से गूंगा  ,बहरा  और अंधा  हो जाएगा ।
आग की तरह लपलपाती खबरों से यही समझ में आया कि अमेरिका ईराक की प्राचीन बहुमूल्य धरोहर तथा सांस्कृतिक गौरव की धज्जियां उड़ा कर रहेगा और छोड़ दिया जाएगा निर्दोष वतन प्रेमियों को केवल कराहने के लिए।हाँ ,मदद के नाम पर उनके सामने चुगगा जरूर डाल देगा। दिन दहाड़े एक राष्ट्र का बलात्कार ! यही द्वंद मुझे खोखला करने लगा ।नफरत का बीज फूट पड़ा। रात की स्याही गहरा उठी पर मेरी नींद चिंदी चिंदी होकर न जाने कहाँ उड़ गई।

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रेडिसन होटल में जूस ,फल चॉकलेट आदि का सेवन करते-करते गड़बड़ा गए। एयरलाइंस की ओर से प्रति व्यक्ति 42अमेरिकल डोलर्स खाने-पीने को मिले थे। मगर वहाँ तो सब फीका लगने लगा। स्वदेश की दाल-रोटी याद आ गई। एक डर अंदर ही अंदर हर शिरा को कंपा रहा था कि कहीं कल भी होटल में न रुकना पड़ जाए। होटल की गगन चुम्बी भव्य इमारत कहने को तो विलासिता की देवी थी पर उस सुनहरे पिंजरे में ज्यादा देर कैद होना हमें मंजूर न था।

(प्रकाशित -मार्च अंक 2015) 

क्रमश: 


10 अप्रैल 2003
(2) ओ.के.(o.k)की मार
 
,अगले दिन सुबह बड़ी रुपहली लगी। खुशी-खुशी गुनगुनाती धूप में रेडिसन होटल को नमस्कार किया और एयरबस से पुन: एयरपोर्ट जा पहुंचे। उसी दिन दोपहर 12:30 पर विमान कनाडा जाना था।डी जोनमें पहुँचकर जब हमने काउंटर पर टिकट दिखाकर बोर्डिंग पास मांगा तो कनेडियन पदाधिकारी ने कहा-आपका टिकट पूर्णतया स्वीकृत नहीं है। नाम प्रतीक्षासूची में है।
हमारे तो देवता कूच कर गए। सूखे पत्ते की तरह विदेशी भूमि पर खड़े खड़खड़ाने लगे। टिकट पर तो ओ.के.लिखा था और हम मान कर चल रहे थे कि आज अपने बेटे के पास पहुँच जाएंगे।
 –जब अनुमोदित टिकट न था तो आपने इस पर 0.k. क्यों लिख दिया। मैं झल्ला उठी।
-0.k. तो इसलिए लिख दिया ताकि आप एयरपोर्ट से बाहर जाकर होटल में आराम कर सकें। आप साढ़े ग्यारह बजे तक प्रतीक्षा कीजिए। टिकट मिल जाएगा, अगर नहीं मिला तो बताइएगा।
उन्हें हमारी रोनी सूरत पर शायद तरस आ गया होगा और हम--- हम ओ.के. की मार खाकर भी चुप हो गए। लगा दिमाग ठस हो गया है और कानों से कम सुनाई देने लगा है।
अब डेढ़ घंटा तो किसी तरह गुज़ारना ही था।

 3-एयरपोर्ट का नजारा

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कनाडा ऑफिस के सामने ही सुंदर सोफे पड़े थे। वही हम अपनी यात्रा का भविष्य जानने को बैठ गए। मन ही मन मैंने गायत्री मंत्र का जाप शुरू कर दिया। । ब्रह्मा,विष्णु महेश का आवाहन करने कगी। संकटमोचन हनुमान भी दिमाग में छाए थे पर शीघ्र ही वहाँ के शोर शराबा,तड़क भड़क और फैशनपरस्ती में खो गई।
हमारे जैसे बहुत से परेशान यात्री अपना समय किसी तरह बिताने के लिए मजबूर थे।बैठने वाला कभी खड़ा हो जाता ,कभी ट्रॉली पर अटैची रखकर कैपच्योनो कॉफी पीने चल देता। अंत में उसकी आँखें घड़ी पर टिक जातीं या उस सूची पर जहां विमानों के आने-जाने का समय बिजली की रोशनी में दमकता रहताहै।  
हाँ ,एक बात की मैं प्रशंसा किए बिना न रहूँगी । मैंने एयरपोर्ट पर देखा-विकलांगों ,रोगियों और वृद्धों की विशेष देखभाल हो रही है।
कुछ देर में मेरे सामने वाली बैंच पर एक बुजुर्ग आकर बैठे। वे खुद चलने में पूर्ण समर्थ न थे इसलिए पहिये वाली कुर्सी पर बैठकर लाए गए। एयरलाइंस के कर्मचारी आते जाते उन्हें हलो कह रहे थे। एक कर्मचारी आया उन्हें पानी पिला गया,सेवा धर्म निभा गया। पर ये वृद्ध बड़े हताश से लग रहे थे। गुमसुम से अपनी छड़ी हिला रहे थे मानो वह ही उनके शेष जीवन की साथिन हैं। चेहरे की मुसकान अकेलेपन के दर्द की चादर से ढकी नजर आई। कुछ देर बाद उनकी उड़ान का समय हुआ –एक कर्मचारी भागा आया और उनको ले गया।धीरे –धीरे वे दूर होते गए पर बहुत कुछ छोड़ गए मेरे मानस मंथन के लिए।   
व्हील चेयर वाले वुजुर्ग वहाँ काफी थे पर आश्चर्य! किसी के साथ भी उनका कोई
रिश्तेदार नहीं। मुझे बुढ़ापे का रंग बड़ा मटमैला और असहाय लगा। वैसे तो बुजुर्ग नागरिक की देखभाल का दायित्व लंदन,अमेरिका,कनाडा आदि देशों में सरकार पर है जिन बच्चों को माँ –बाप ने जन्म दिया है उसके प्रति संतान का भी तो कुछ कर्तव्य बनता है। बच्चों का भी क्या कसूर !व्यक्तिगत भोगवादी –सुविधावादी प्रवृति में लिप्त माता -पिता इतने व्यस्त हैं कि औलाद की खातिर अपने सुख का त्याग करने को ज्यादा समय के लिए शायद वे तैयार नहीं। ममता के आँचल और पिता की छत्रछाया के अभाव में रेतीली आंधियों का उठना तो स्वभाविक है फिर भावनाएँ भी दरक जाएँ तो आश्चर्य नहीं। इस शुष्कता के जंगल में वर्ष में एक बार मातृ दिवस या पितृदिवस मनाने से क्या होगा,हृदयस्थली तो सरस हो नहीं पाएगी। मुझे तो ऐसा लग रहा है कि यहाँ प्यार की बौछारें भी गणित के नियमों से बद्ध हैं।
आशा के विपरीत कुछ ही दूरी पर हंसी का फब्बारा छूटता  देख आश्चर्य से भर उठी। भारतीय अधेड़ पति –पत्नी की दंत पंक्तियाँ जगमगा रही थीं। लंदन में पढ़ने वाला जवान बेटा उनसे मिलने आया था। माँ ने अपने पुत्र का हाथ कसकर पकड़ रखा था ताकि  एहसास बना रहे कि उसका बच्चा दूर नहीं। बेटा भी बड़ी आत्मीयता से माँ-बाप के साथ अपने अनुभव बाँट रहा था।
कानों में उसका मृदुल स्वर गूँजा -
-माँ--माँ यहाँ कॉफी बहुत अच्छी मिलती है। ले आऊँ !
-न बेटा बड़ी मंहगी है।
बेटा अभी आया कहकर गायब हो गया। पलक ठीक से झपके भी नहीं थे कि दोनों हाथों में दो कॉफी गिलास लेकर हाजिर हो गया।
-पापा ---कॉफी लो।
-बेटा तू पी ले।
-मैं और माँ एक में से ही चुसकियाँ ले लेंगे। मैं तो पीता ही रहता हूँ। हाँ, माँ के हाथ की बनी पूरी-सब्जी नहीं मिलती। जल्दी से दो न माँ! शिशु की तरह जवान बेटा मचल उठा।
-न जाने कितने समय से तुम्हारे हाथ का जायकेदार खाना नहीं खाया है -कहकर माँ के पास भोली सूरत बनाकर वह बैठ गया।
शब्दों की गहराई को नाप माँ पुलकित हो उठी।
-मैं पूरी के साथ भरवां करेले भी बनाकर लाई हूँ। बहुत दिनों तक ये खराब नहीं होंगे ।फ्रिज में रख देना।
-ये तो बहुत हैं!
-बहुत नहीं हैं। जब भी तू इन्हें खाएगा 'माँ'शब्द की मिठास इनमें घुल जाएगफिर सब कुछ भूलभालकर मेरी यादों में खो जाएगा।
-माँ ऐसा कहोगी तो तुम्हारे पास ही बैठा रहूँगा।
-सच !माँ ने दोनों हाथों से पुत्र का चेहरा थाम लिया और बेटा निहाल हो गया।

माँ ने बड़े सधे हाथों से आधी पूरी में आलू की सब्जी रख उसे लपेटा और बेटे के मुंह में डाल दिया। तभी एक एंग्लोइंडियन वहाँ आकर खड़ा हो गया। एक मिनट उनको घूरता रहा फिर मंद हास से उसके ओठ थिरक उठे--हैपी फैमिली(happy family)रिश्तों की यह मधुरिमा पश्चिमी हवाओं में कहाँ?

(प्रकाशित -अप्रैल अंक 2015)

क्रमश:

सोमवार, 8 दिसंबर 2014

संस्मरण -वह चाँद सा मुखड़ा


यह  साहित्यिकी अंक अपने में विशेष है। इसकी परियोजना के समय किसी ने सोचा भी न था कि सुकीर्ति जी की स्मृति ही शेष रह जाएगी और उनकी मधुर यादों को इसमें संजोना पड़ेगा । पत्रिका के एक खंड में उनको समरण करते हुए श्रद्धांजलि देने का प्रयास है तो दूसरे खंड में साहित्यिकी मित्रों के विविध संस्मरणों का लेखा -जोखा है।

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निम्न लिखित संस्मरण इसी पत्रिका का एक अंश है।

वह चाँद सा मुखड़ा/सुधा भार्गव 
कभी -कभी जीवन में ऐसा घटित होता है जो भूलते भी नहीं बनता और याद आते ही  उसकी खरोंच दिल को लहूलुहान कर देती है । अनेक वर्षों पहले मेरे भाई  के आँगन में दो पुत्रियों के बाद पुत्र का जन्म लेना किसी समारोह से कम न था। पहली वर्षगाँठ  पर उस चाँद से  टुकड़े पर  अंजुली भर -भर आशीष लुटाया पर वह कम पड़  गया । 

रात का भोजन  मिलकर करना परिवार  का नियम था । भोजन समाप्ति पर माँ  ममता का आँचल पसार नन्हें नकुल को कुर्सी से उतारती और कहती -बेटा चल , हाथ मुँह धो ले वाशवेसिन पर।   कभी गोदी के झूले में झुलाती,कभी स्टूल पर खड़ा करके कुल्ले कराती। वह नटखट इतनी ज़ोर से कुल्ला करता कि नीचे पानी पानी ही हो जाता और फिर भागता फिसलता हुआ माँ की बाहों से।उसे पानी से खेलने का बड़ा शौक था इसीकरण कुल्ला खुद करना चाहता था ताकि पानी से खेल कर सके। नहाता तो नल की धार से जग में पानी भरभरकर अपने ऊपर उड़ेलता और अपनी माँ के ऊपर भी भिगो देता । 
-ठहर शरारती ,अभी तुझे बताती हूँ । मुझे सारा भिगोकर रख दिया। माँ डांटती भी और फिर खुद ही यशोदा मैया की तरह उसकी बाल सुलभ क्रीड़ाओं पर हंस देती।
उस वाशबेसिन के पास एक बाथरूम बना था। वहाँ एक स्टूल पर पानी का मग रक्खा रहता था ताकि पानी से भरे प्लास्टिक के ड्रम से पानी लेकर बाल्टी में डाला जा सके।वह ड्रम करीब 3फुटा होगा। पानी नलों में चौबीस घंटे नहीं आता था इसलिए पानी एकत्र करके रखना पड़ता था।  
उस काली रात नकुल खाने के बाद कब -कब में कुर्सी से सरककर कहाँ चला गया पति - पत्नी को पता ही नहीं चला । 
काफी देर बाद होश आया --अरे नकुल कहाँ चला गया !नकुल  --नकुल आवाज लगने लगीं । उसकी बहनों ने कमरे छान मारे । माँ  ने बाथरूम ,शौचालय ,रसोई देखी ,उसके पापा छत की ओर दौड़े ,नौकरों ने पास पड़ोस में पूछना शुरू कर दिया --अजी आपने नकुल को तो नहीं देखा । परेशान उसके पापा बोले -घर में ही होगा ! वह बाहर जा ही नही सकता --जरूर शैतान पलंग के नीचे  छिप गया होगा या दरवाजे  के पीछे खड़ा होगा ,मैं दुबारा देखता हूँ । .बाथरूम का दरवाजा अधखुला था और लाईट नही जली थी पर बरांडे के बल्व की रोशनी वहां पड  रही थी । भाई ने नकुल को खोजते समय जैसे ही दरवाजा पूरा खोला .उसकी चीख से घर हिल उठा । ,सब लोग दौड़े -दौड़े आये ...देखा --ड्रम के बीच में दो अकड़े सीधे पैर !ड्रम में मुश्किल से दो बाल्टी  पानी होगा । उसके बीच में था पानी से भरा मग्गा ,मग्गे मं फंसा हुआ था नकुल का सिर । आँख ,नाक मुँह सब  पानी में डूबे हुए थे । काफी पानी उसके शरीर में जा चुका था।पूरा शरीर अकड़कर सीधा खड़ा था । 

अंदाज लगाया गया -हाथ धोने नकुल बाथरूम में गया होगा । ड्रम में पानी कम होने के कारण उसने स्टूल पर खड़े होकर मग्गे से पानी झुककर लेना चाहा , इस कोशिश में वह इतना झुक गया कि  सर के बल ड्रम  में जा पड़ा और नियति का ऐसा भयानक खेल --सर उसका मग में फँसा । न वह हिलडुल सकता था न चीख -चिल्ला सकता था ।देखने वाले सदमें से बेहोश !भारी दिलों से उसे निकला और पेट से पानी निकालने की कोशिश की ,कृत्रिम सांस प्रक्रिया की । मेरा भाई डाक्टर --सब कुछ समझते हुए भी समझने का साहस खो बैठा था  । कोई चमत्कार होने की आशा में चिल्लाया --किसी डाक्टर को बुलाकर तो दिखाओ और ढाढें मारकर रो उठा।तब तक छोटे  भाई वहाँ पहुँच चुके थे। हितैषी पड़ोसियों से घर घिर गया था।डाक्टर साहब आए। एकसाथ सैकड़ों उम्मीद भरी निगाहें उनकी ओर उठ गई।  जैसे आये थे वैसे ही चले गए हरे -भरे घर आँगन में वेदना की मोहर लगा कर।मासूम नन्हा नकुल असमय ही खिलने से पहले ही इस दुनिया को छोडकर जा चुका था।

घर में आंसुओं की बाढ़ आ गई , वहाँ से आती कराहटें सुननेवालों के दिल दहला देती। किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि बेटे से बिछुड़े सुबकते माँ -बाप को किन शब्दों में सांत्वना दें । सांत्वना देने वाला कुछ कहे उससे पहले ही वह रो उठता। गमगीन वातावरण में हम सब जिंदा लाश बन कर रह गए थे। 

इस घटना को बीते वर्षों बीत गए पर जब भी  याद आती है तो एक छिलन पैदा होती है और रिसने लगती है उससे न कभी खत्म होने वाली अंतर्वेदना की कसमसाहट। क्या करूँ! अपने प्यारे चाँद से भतीजे की बड़ी बड़ी आँखें,भोली बातें,ठुमक ठुमक कर चलना भूल भी तो नहीं पाती।