विशिष्ट साहित्यकार
सुकीर्ति गुप्ता(कोलकाता )
सुकीर्ति जी के शब्दों में ही--
संग -संग की गंध
मौसम की गंध में रच- बस गई
उमंग भरी बाहों से दूर
पर याद की सुगंध में खोता मन
डूबता उतराता है ।
बड़े दुख की बात है कि महानगर कोलकाता की
साहित्यिकी नामक संस्था की अध्यक्ष सुकीर्ति गुप्ता का पिछले मास देहांत हो गया ।
वे कुछ समय से बीमार चल रही थीं । यही संस्था
हस्तलिखित पत्रिका ‘साहित्यकी ‘का
प्रकाशन भी करती है । हम सब उन्हें प्यार से सुकीर्ति दी कहते थे जिन्होंने करीब 50 बुद्धिजीवी महिलाओं को एक सशक्त नारी मंच दिया
ताकि उनसे संबन्धित मुद्दों पर विचार विनिमय हो सके और लेखनी की गतिशीलता से ऊर्जावान
लहरें उठ सकें ।
'एक बार उन्होंने मुझे 'शब्दों से घुलते मिलते हुए ' अपना कविता संग्रह दिया था ।बहुत सी कविताएं मर्म को छू -छू जाती हैं । कस्बे की बिटिया,बाघ ,दो औरतें उपन्यासों के अंश विभिन्न पत्र –पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके
हैं ।
शास्त्रीय संगीत ,चित्रकला
और नाटकों में उनकी विशेष रुचि थी । कवि गोष्ठियों में जब वे स्वर में कविता पाठ
किया करती थीं तो श्रोतागण मुग्ध हो उठते ।
सुकीर्ति दी ने ‘स्वात्ंत्र्योत्रर
हिन्दी लघु उपन्यासों में नारी व्यक्तित्व ‘पर कलकत्ता विश्वविद्यालय से पी .एच .डी की थी । कहानी संग्रह दायरे ,अकेलियाँ आदि
प्रकाशित हो चुके हैं ।
सुप्रसिद्ध साहित्यकार रवीन्द्र कालिया ने 'अकेलिया' कहानी संग्रह के संदर्भ में लिखा है –उनकी
कहानियों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे
धारा के साथ नहीं ,धारा के विरुद्ध लिखती हैं ।
उनकी कहानियों का मूल राग प्रेम ही है पर वे प्रेम
के श्रंगार पक्ष में नहीं खो जातीं बल्कि प्रेम की जटिलताओं ,विडंबनाओं और अंतर्विरोधोंकों अपनी कहानियों का आधार बनाती हैं । यद्यपि
उनकी नायिकाएँ प्रेम में ठगी जाती है ,प्रेम की हिंसा की
शिकार होती हैं मगर वे परास्त नहीं होतीं ,उम्मीद और
जिजीविषा का दामन नहीं छोडतीं । जैनेन्द्र की मृणाल की तरह अपनी राह स्वयं खोजती
हैं ।
आकर्षक व्यक्तित्व वाली सुकीर्ति दी मृदुभाषी थीं ।
सबसे बड़ी विशेषता उनकी यह थी कि वे सबको साथ लेकर आगे बढ़ना चाहती थीं और हमें
उत्साहित करती थीं । सामूहिक कवि गोष्ठियों में अनेक कवि –कवियित्री व साहित्यप्रेमियों से भेंट होती रहती थी । कविता
पाठ के बाद यदि उनसे प्रशंसा के दो बोल सुनने को मिल जाते तो धन्य हो उठते ।
शब्दों से घुलते मिलते हुये –कविता संग्रह में
उन्हों ने लिखा है --
कविता मेरे लिए एक आत्मीय सखी की तरह है जो मेरे दुख में दुखी
होती है और सुख में मेरा हृदय उल्लास से भर देती है । भावनामयी समवेदनाओं ने मेरी रिक्तता को भरा तो है पर भीड़ में अकेला करके ।
इसी संग्रह से उनकी दो कविता उद्घृत कर रही हूँ –
एक हारी प्रतीक्षा
टिक-टिक
चलती घड़ी सी सुई
मिश्र के कैदियों सी
पत्थर का भार धोती
हृदय पर पिरेमिड बना रही है
थोड़े सी देर में
बहुत कुछ दफना दिया जाएगा
आशा ,अपेक्षा,गुंगुनाता मिलन संगीत
सब कूछ खामोश हो जाएगा
किलोपैट्रा मृत्यु का वरण करती है
संदेह सर्प सिर पर मँडराता रहेगा
अपराजित
अभिमान
ढलते सूरज की लाली में बादल जाएगा
सुंदर से ताबूत में
हरी डूब सा कोमल विश्वास है
जो जीवन की अंतिम लय तक
गर्माहट देगा ।
नारी मन
पुरइन के पत्तों पर
फिसलती बूंदों सा
नारी मन
पानी की आद्र्ता
हरियाली में डूबापन
रह रहकर कंपती
छाहों में सींजती
पंखुराया शरीर ले
करती केली गुनजन
छुई –मुई
कोमलांगी
ममता की दूधिया चाँदनी
स्रोतस्विनी स्त्री समर्पिता
को वहाँ
मिला सागर
पल –पल रिसकर
बूंद सी गई ढल
विशेषण के अभिशापों में
बांधा छ्ल से ओ मनस्विनी !
मुझे अच्छी तरह याद है –साहित्यिकी की कार्यकारिणी
समिति का गठन हो रहा था तो मुझे भी
जिम्मेवारी दी गई । मैंने कहा
–न जाने मैं अपना कर्तव्य पूरी तरह निभा पाऊँगी या
नहीं ।
सुकीर्ति दी ने बड़े स्नेह से मेरे कंधे पर हाथ रखते
हुए कहा –शुरूआत तो होने दो -- –जरूर कर लोगी फिर में तो हूँ ।
ऐसी थीं हमारी सुकीर्ति दी ।
एक बार वे पूना गई हुई थीं । तब उन्होंने मुझे एक पत्र लिखा था । अब तो वह मेरे लिए अमूल्य निधि बन गया है।
पूना से लिखा पत्र
आज वे हमारे बीच नहीं हैं –बस उनकी यादें है परंतु उनकी यादें भी साहस और शक्ति का संचार
करती हैं ।
सुधा भार्गव बैंगलोर
9731552847
subharga@gmail.com
आपके ब्लॉग पर आकर सुकृति गुप्ता जी की कविताओं से गुजरना तथा
जवाब देंहटाएंआपके माध्यम से उन्हें जानना मन को बेहद अच्छा लगा. जहां तक मैं समझता हूँ यह उनके प्रति सच्ची श्रधांजली भी है.मैं इस महान लेखिका को प्रणाम करता हूँ.
'साहित्यिकी' के जुड़ कर ही मैंने सुकीर्ति जी को जाना ,पहचाना और समझा … हस्त लिखित पत्रिका अपने आप में साहित्य जगत के लिए एक विशिष्ट और अभिनव प्रयोग है और वह भी महिलाओं के लिए … इसके लिए पत्रिका और सभी सदस्याएँ सदा उनकी आभारी रहेंगी … व्यकिगत तौर पर उनसे मिलने का मुझे सौभाग्य न मिल पाया …ईश्वर की जैसी इच्छा …. उनका आशीर्वाद हमेशा पत्रिका के साथ रहे और उसे नयी ऊंचाईयों तक ले जाये …. ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे ..
जवाब देंहटाएंishvr unhe apne chrnon me sthan den
जवाब देंहटाएंशब्दों से घुलते मिलते हुए मैंने प्रकाशित की थी। नाद प्रकाशन से। आपने यादें ताज़ा कर दीं-अभिज्ञात
जवाब देंहटाएं9830277656