सोमवार, 3 दिसंबर 2012

बारहवाँ पन्ना (अंतिम)

किशोर की  डायरी / सुधा भार्गव 







माँ-----मैंने अपने मन की हलचल के बारे में आपको कभी नहीं बताया ।मेरे ह्रदय का हाहाकार आपने कभी नहीं सुना ।भावनाओं की भीड़ में मैं खो गया पर आपने  मुझे ढूंढने की कोशिश नहीं की ।मुझ में जो परिवर्तन हो रहे थे यदि आप चाहती तो मेरी आँखों में झांककर ही देख सकती थीं ,मेरे मनोभावों को पढ़ सकती थीं पर मेरी तो हमेशा अवहेलना की गई ,उपेक्षा की दीवार में जीतेजी चुन दिया ।बीच -बीच में व्यंग भरी तीरों से छेदते  रहे ।ऎसी उम्मीद न थी आपसे ।

कल बीत गया पर मैं अपना कल नहीं भूला हूँ ।कैसे भूल जाऊं -----उमंगों पर छिडका तेजाब ,कल्पना की टूटी सुनहरी कमान ।  

मैंने जब भी फूल से  गीतों को गुनगुनाया ,आपने झटके से उनकी कोमलता छीन  ली ।ऐसा करने से मैं जगह -जगह से जख्मी हो गया हूँ ।यह  आपको और पापा को  दिखायी  देने वाला  नहीं ।जख्म  बाहर  नहीं --मेरे अन्दर ---मेरे दिल में हैं ।ये घाव जल्दी भरने वाले नहीं ।भर भी गए तो दुखन तो देते ही रहेंगे ।

मैंने तो पैदा होते ही सुना था --आप लोग बड़े हैं ।जब मैं बड़ा होने लगा तो सहा नहीं गया ।यह न समझना --आप हर हालत में मेरा प्यार पाने के अधिकारी हो ।यह कम भी हो सकता है --।पर मैं ऐसा होने नहीं दूंगा क्योंकि इसका नतीजा जानता हूँ । जिस तरह से बिना आपके प्यार के मैं तड़प रहा हूँ उसी प्रकार आप तड़पोगे और यह मैं देख नहीं सकता ।फिर एक बात और है जैसा आपने किया वैसा मैं भी करने लगूँ तो आपमें और मुझमें अंतर ही क्या रह जाएगा ।नहीं --नहीं मैं इतिहास नहीं दोहराऊँगा ।

जन्मदाता--- मैं घर छोड़ रहा हूँ ।सुना ---- आपने !मैं---जा रहा हूँ। बस एक बार कह दो --आज का दिन मंगलमय हो ।मेरे पंख निकल आये हैं ।हर दिशा में उडूँगा --उड़कर देखूँगा मेरी जीत कहाँ छिपी है ।छोटी हो या बड़ी अपनी लड़ाई स्वयं लडूँगा ।मुझे ,न रोकना न आँसू बहाना ।मुझे अपना रास्ता ढूँढने दो ।मैं बहती हवाओं को देखना ,छूना चाहता हूँ ।उनके इशारे समझना चाहता हूँ ।ऐसे में  संदेह और खौफ की खिचडी  दिमाग में पक सकती है ,खतरे की घंटियाँ नींद उड़ा सकती हैं ।
मुझे इन सबकी परवाह नहीं --मैं अपनी हँसी के लिए हँसूँगा ---अपनी खुशी के लिए नाचूँगा ।सोच रहे हो बहुत बोलता हूँ लेकिन बोलने दो ---।

मैं अपना संसार खोजने जा रहा हूँ ।बिखरे ---टूटे--- सपनों को भी बटोरना है ।जहाँ भी जाऊंगा आपकी यादें साथ रहेंगी ।उनसे निकलता प्रकाश ही मेरे लिए काफी है जो मेरे रास्ते के अँधेरे  को मिटाता चला जाएगा ।

विकास मंच की ओर कदम उठ रहे हैं ---बढ़ रहे हैं ।भूले से भी न टोकना न आवाज देना --थोड़ा संतोष  रखना ।एक दिन मैं लौटूँगा  अवश्य लेकिन कुछ बनकर जिससे आप गर्व से कह सकें --यह मेरा बेटा है |


समाप्त 

1 टिप्पणी:

  1. किशोरों के मन मेन उठाने वाले तूफान को सहेजे इस डायरी के पन्ने ... सोचने पर विवश कराते हैं ।

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