सोमवार, 20 फ़रवरी 2012


अपना दीप स्वयं बनें

 सुधा मूर्ति कम्प्यूटर विशेषज्ञ हैं |उन्होंने एक पुस्तक लिखी है जिसका
नाम है -- 'अपना दीप स्वयं बने'   ।  इसमें उन्होंने अपने अध्यापकीय 
जीवन के सच्चे जीवंत अनुभवों को सफलता व सहजता से लिखा है ।इस किताब का हिन्दी  अनुवाद श्री मती ज्योति उनियाल ने बहुत ही शुद्ध भाषा में किया है ।
 

आजकल मैं इसी को पढ़ रही हूं | उसमें निहित एक लेख  ' रूसी विवाह संस्कार, से मैं बहुत प्रभावित हुई हूं ।


रूसी विवाह संस्कार






एक दिन लेखिका ने पार्क में नव विवाहित युगल को देखा जिसकी हाल में ही शादी हुई थी ।युवक सैनिक वेश में था। दुल्हन ने सफेद साटन के कपड़े पहन रखे थे । वे दोनों स्मारक तक साथ -साथ गये।


यह रूस की परंपरा है कि विवाह शनिवार या इतवार को होते हैं। कोई भी ऋतु हो विवाह पंजीकृत करने के बाद नवविवाहित जोड़े को ख़ास -ख़ास राष्ट्रीय स्मारकों पर जाना ही पड़ता है । हर युवक को कुछ समय के लिए सेना में भरती होना जरूरी है ।विवाह के अवसर पर उसे सैनिक वेश में रहना पड़ता है ।




रूस ने तीन महायुद्धों में एतिहासिक विजय प्राप्त की है। मास्को में बहुत से युद्ध स्मारक हैं तथा जगह -जगह लड़ाई में भाग लेने वाले अनेक जनरलों की मूर्तियाँ लगी हैं।

उनके पूर्वजों ने रूस द्वारा लड़े युद्धों में अपने प्राणों का बलिदान दिया ।इस त्याग से परिचित होना नव युगल के लिए बहुत जरूरी है क्योंकि उन्हीं के कारण वे स्वतंत्रता की साँस लेकर अमन की जिन्दगी बसर करने में कामयाब हुए हैं ।


विश्वास किया जाता है कि शहीद हुए पूर्वजों का आशीर्वाद उनके दाम्पत्य जीवन के लिए मंगलकारी है ।
पढ़कर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि राष्ट्र प्रेम ---विवाह समारोह से ज्यादा महत्त्व रखता है।


मेरा माथा शर्म से भी झुक गया। हम भारतीय तो न जाने कितना पैसा शादी -विवाह ,जन्म -मरण से सम्बन्धित आयोजनों पर लुटा देते है। खान -पान ,साड़ी जेवर और झूठी शान से फुरसत ही नहीं ।
यकीन नहीं होता पर यह हकीकत है कि रूसी विवाह में आभूषण के नाम पर केवल दो सोने के छ्ल्ले होते हैं।
जिनमें न हीरे जड़े होते हैं न रूबी -पन्ने ।एक युवक पहने होता है और एक युवती। विवाह समारोह मेँ युगल जोड़ा इन्हें अदल -बदल कर पहन लेता है। दुल्हन की पोशाक घर में ही तैयार की जाती है । सभी महिलाएं सिलाई -कढ़ाई जानती हैं । यदि खरीदनी भी होती है तो ज्यादा महंगी नहीं पड़ती । बाद में उसे बेच दिया जाता है । सहेज कर नहीं रखा जाता उन्हें
रूसी विवाह के समय शानदार दावत का आयोजन जरूर एक यादगार बनकर रह जाता है। यदि तुम दावत पर जा रहे हो तो कहा जाता है -जाने के तीन दिन पहले और दावत उड़ाने के तीन दिन बाद तक कुछ खाने की जरूरत नही.

नई पीढ़ी को मोबाईल कम्प्यटर,आई .पैड की बारीकियां तो मालूम हैं पर स्वतंत्रता सेनानी ,संविधान और उसको कार्यान्वित करने वाले देश प्रेमियों से वे अनभिज्ञ हैं या सोचते हैं कि स्वतंत्रता तो हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है उसका सदुपयोग करें या दुरूपयोग--- कर्तव्य से क्या मतलब ---!

एक दूसरे को दोष देने से कोई लाभ नहीं ।यदि नई पीढ़ी कोई गलत कदम उठाती है तो कहीं न कहीं हम भी उससे जुड़े हुए है। स्वतंत्रता की कीमत तो मालूम होनी ही चाहिए ।वर्षों की गुलामी की बेड़ियाँ काटने में जिन्होंने अपना तन-मन- धन न्यौछावर कर दिया उनके स्मारक हमारे दिलों में होने चाहिए।
इस समय मुझे लतामंगेश्कर का वह गाना याद आ रहा है जो उन्होंने सर्वप्रथम 26 जनवरी 1963 को रामलीला मैदान में गाया था ---

ए मेरे वतन के लोगों
जरा आँख में भरलो पानी
जो शहीद हुए हैं उनकी
जरा याद करो कुर्बानी


* * * * *

1 टिप्पणी:

  1. अच्छा रहा यह संस्कार जानना भी..कभी मौका लगा तो पूरी किताब पढ़ी जायेगी. आपका आभार साझा करने हेतु.

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